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भाषा विवाद : शोषकों की मंशा को समझें दलित-बहुजन

यह आवश्यक है कि हिंदी को जबरन न थोपा जाए। हर राज्य का निवासी जब अपनी भाषा में पढ़ेगा तो अच्छा रहेगा। लेकिन यह याद रखा जाना चाहिए कि हमें अपनी भाषाओं में ज्ञान कोश बढ़ाना है और उन्हें सांस्कृतिक तौर पर मजबूत करना है। बता रहे हैं विद्या भूषण रावत

बहस-तलब

अभी कुछ दिनों से हिंदी और गैर हिंदी भाषी लोगों के बीच बहस छिड़ी है। भाषा के प्रश्न पर हिंदी भाषी अक्सर डॉ. राम मनोहर लोहिया को उद्धृत करते हुए कहते है कि जब वह शोध के लिए जर्मनी गए थे तब उनके प्रोफ़ेसर ने उन्हे जर्मन भाषा सीखने को कहा था। बाद में लोहिया हिंदीवाद के एक प्रमुख स्तंभ बने। उनके पद चिन्हों पर चलकर मुलायम सिंह यादव ने भी उत्तर प्रदेश में हिंदी का डंका बजाया, लेकिन इससे उत्तर प्रदेश के बच्चों का बहुत नुकसान हो गया। हालांकि लालू यादव ने बिहार में ऐसा नहीं किया और उन्होंने बच्चों के आगे बढ़ने के लिए अंग्रेजी के महत्व को समझा। इसके पीछे कोई ऐसी चाल नहीं थी कि लालू हिंदी का कोई अपमान कर रहे थे, लेकिन आज की हकीकत को देखकर ही वह बच्चों को अंग्रेजी सीखने पर जोर दे रहे थे ताकि उन्हें भी आगे बढ़ने के नए अवसर मिलें। इसलिए अंग्रेजी आज के दौर में बच्चों के आगे बढ़ने का साधन है, उनकी जरूरत है। 

कहा जाना चाहिए कि राजनैतिक तौर पर भाषा का हमेशा इस्तेमाल किया गया, लेकिन कोई भी राष्ट्रीय पार्टी ऐसा नहीं कर सकती है, क्योंकि उसे हर जगह के वोट लेने हैं। कांग्रेस क्योंकि दक्षिण में भी बहुत मजबूत थी, इसलिए वह हिंदी राष्ट्रवाद का नारा नहीं लगा सकती थी। लेकिन भाजपा की ऐसी मजबूरी नहीं है क्योंकि उसका दक्षिण में उसकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वह वहां अपनी स्थिति मजबूत नहीं करना चाहती। 

दरअसल, भाषा का प्रश्न भारत में हमेशा संवेदनशील रहा है, जिसे बेहद गंभीरता से देखे जाने की जरूरत है। आजादी के बाद से ही भारत सरकार ने यह महसूस किया था कि भारत में भाषाई विविधता बहुत व्यापक है और उसका सम्मान करने की जरूरत है। भाषाओं को थोपने के नाम पर या भाषा के विरोध की राजनीति को भी समझना होगा। तमिलनाडु में हिंदी विरोध की राजनीति के सूत्रधार पेरियार थे, लेकिन ऐसा नहीं था कि वह अचानक से उत्पन्न हो गई। 

पेरियार दरअसल हिंदी विरोधी नहीं थे, लेकिन वह हिंदी के जरिए आर्यवादी संस्कृति थोपे जाने के विरोधी थे और इसलिए उन्हें लगा कि चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के जरिए उत्तर भारत की सशक्त लॅबी तमिलनाडु के ऊपर अपना आधिपत्य जमाना चाहती है। हिंदी भाषा के सवाल पर कर्नाटक, केरल, पश्चिम बंगाल भी नाराजगी व्यक्त कर चुके हैं, लेकिन जो बहस भाषा के सवाल को लेकर चली है, वह मूल बहस से आगे निकल चुकी है और और उसमेंं पूर्वाग्रह शामिल हो गया है। 

भारत में भाषाओं की समस्या को समझना है तो उनके अंदर के जातिवाद को भी समझना पड़ेगा और यदि कोई भाषा बोलनेवाला यह कहे कि हमारी संस्कृति में ऐसा नहीं होता तो निश्चित तौर पर उसकी सराहना करनी पड़ेगी। 

भाषा के विषय में फुले, आंबेडकर और पेरियार लगभग एक ही सोच के थे, जिन्होंने अपने दलित-बहुजन समाज को अंग्रेजी सीखने के लिए कहा, क्योंकि उन्हें लगा कि ज्ञान-विज्ञान के विकास के लिए आवश्यक सोच अंग्रेजी में है और वह अंतराष्ट्रीय भाषा है, इसलिए उसे सीखना भी चाहिए। लेकिन हमें यह भी सोचना होगा कि अंतरराष्ट्रीय भाषा किसी की मातृभाषा का स्थान नहीं ले सकती। मतलब यह कि हमारी भाषाओं में कमियां हो सकती हैं, लेकिन हम अपनी भावनाओं और विचारों को सबसे बेहतर अपनी भाषाओं में ही व्यक्त कर सकते हैं। जिस उद्देश्य के लिए हम सभी अंग्रेजी सीखना चाहते है, वही उद्देश्य दक्षिण भारत के लोगों के लिए भी है, क्योंकि वे भी जानते हैं कि अंग्रेजी के कारण उनके लिए दुनिया के दूसरे हिस्सों में जाने के रास्ते खुलते हैं। मतलब हिंदी भाषा के कुलीन लोगों के बच्चे भी अंग्रेजी सीखकर ही विदेशों में अच्छे पदों और अधिक पैसा कमान चाहते हैं। मतलब यह कि एक भाषा अब केवल सांस्कृतिक जरूरत नहीं रह गई है, अपितु यह संसाधनों तक पहुंच का जरिया भी है। जहां संसाधनों की कमी होगी, वहां लोग अपनी भाषा का गुणगान तो करेंगे, उसमें घर के काम तो करेंगे, लेकिन बड़े बाजार में पहुंचने के लिए या अपनी पहुंच को बढ़ाने के लिए वह बड़ी भाषा को भी सीखेंगे। 

जब हिंदी भाषी लोग कोई और दूसरी भारतीय भाषा नहीं सीखना चाहते हैं, अंग्रेजी सीखना पसंद करते हैं। यही बात दक्षिण के राज्यों में भी लागू है। वहां भी लोग अंग्रेजी सीखना चाहते हैं और उन्हें लगता है कि हिंदी सीखकर उन्हे किसी प्रकार का लाभ नहीं होगा। तमिलनाडु के एक मंत्री ने तो यहा तक कह दिया कि हिंदी भाषा सीखकर आप पानी-पूरी ही बेच सकते हो। हालांकि यह बेहद ही निराशाजनक वक्तव्य था, क्योंकि खोमचे से लेकर भूमिहीन मजदूर सभी हर जगह पाए जाते हैं और यह नहीं कि तमिल बोलनेवाले कोई खोमचा या रेहड़ी नहीं चलाते या सारे तमिल अब अमरीका में जाकर शासक ही बन गए है। उधर भी अंग्रेजी बोलने वालों में उत्तर भारत के लोग ही अधिक मिलेंगे। बस दोनों में एक बात साझाी है और यह जाति की बात है। दोनों ही स्थानों के सवर्णों ने अंग्रेजी की महत्ता को समझा और उसपर अपना दबदबा बना लिया, जिससे उनको लाभ हुआ। 

हिंदी थोपे जाने का विरोध करते दिल्ली विश्वविद्यालय में पूर्वोत्तर भारत के छात्र

दरअसल, भाषायी राष्ट्रवाद भी सभी प्रदेशों में ताकतवर लोगों का सत्ता हथियाने का तरीका है। जैसे तमिलनाडु या दक्षिण से हिंदी विरोधी जो भी भावना भड़केगी, तो तमिलनाडु में डीएमके और दक्षिण के दूसरे प्रांतों में अन्य पार्टियों को राजनीतिक लाभ मिल सकता है, लेकिन उत्तर भारत में भाजपा इसका लाभ लेगी, क्योंकि उत्तर भारतीय राष्ट्रवाद में हिंदी एक प्रमुख पक्ष है, जिसे संघ परिवार के अलावा, समाजवादियों ने भी बहुत हवा दी। अब भाषाई राष्ट्रवाद में सबके अपने-अपने पक्ष हैं और उसकी राजनीति बेहद घटिया दर्जे की हो रही है। तमिल भाषा संस्कृत से भी पुरानी है और उसमें बहुत मजबूत साहित्य भी आया। पेरियार ने तमिल भाषावाद के जरिए ब्राहमणवाद पर चोट की, लेकिन क्या भाषाओ के नाम पर चलनेवाले सारे आंदोलन ऐसे ही हैं? यदि ऐसा होता तो दक्षिण में ब्रह्मणवाद की चूलें हिल चुकी होती। भाषा के नाम पर राष्ट्रवाद स्थानीय राजनीति है, जिसका जातिवाद के खात्मे से कोई मतलब नहीं। तमिलनाडु में भी दलितों की स्थिति बहुत खराब है। कर्नाटक में भाषावाद के नाम पर भी ऐसे लोग हावी होंगे, जो अपने इलाकों में दलितों के साथ दुर्व्यवहार करेंगे। मतलंब यह कि राज्य की अस्मिता या भाषाओ की अस्मिता की राजनीति से आप भारत में जातिवादी राजनीति खत्म नहीं कर सकते और इसलिए इस बात को समझने की आवश्यकता है। 

भाषाओं के नाम पर राजनीति करने वाले भूल जाते है कि भाषाएं लोगों को आपस में मिलाती भी है। भारत राष्ट्र की एकता के लिए भाषाओं को एक दूसरे का सहयोगी बनना पड़ेगा। हिंदी एक नई भाषा है, लेकिन यह भारत के विभिन्न प्रांतों में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। लेकिन इसे यह सम्मान इसलिए नहीं हासिल है, क्योंकि सत्ताओं ने इसमें हस्तक्षेप किया है। भाषा का विकास ऐसे भी सत्ताओ के हस्तक्षेप से नहीं होता। भाषा के पास अपनी एक ताकत भी होती है, जिसकी वजह सांस्कृतिक मान्यताएं होती हैं। हिंदी के बढ़ने में एक बड़ा कारण मुंबई के सिनेमा जगत का है, जिसे वर्तमान तक पहुचाने में सबसे बड़ा योगदान गैर हिंदी भाषी लोगों का है या फिर उन लोगों का है जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं थी। दिलीप कुमार, राज कपूर, देवानंद, नूरजहां, लता मंगेशकर, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, तलत महमूद, मन्ना डे, हेमंत कुमार, एस. डी. बर्मन, गुलाम मोहम्मद, कैफ़ी आजमी, शकील बदायूनी, साहिर लुधियानवी, कमाल अमरोही आदि सभी की पहली भाषा हिंदी नहीं थी। लेकिन आज बांग्लादेश से लेकर नेपाल और श्रीलंका में हिंदी गाने सुने जाते हैं। पाकिस्तान में तो ये बेहद लोकप्रिय हैं ही। लेकिन इंडोनेशिया जैसे देशों में भी लोग ‘कुछ कुछ होता है’ जैसे गीत गुनगुनाते हैं। मतलब हिंदी की लोकप्रियता सरकार के थोपने से कहीं ज्यादा उसके मनोरंजन या सांस्कृतिक नियंत्रण से आयी, जिसे अब क्षेत्रीय भाषाओं के जरिए चुनौती मिल रही है। 

सभी भारतीय भाषाओं की एक खास बात रही है। उनके राष्ट्रवाद की बात करने वाले एक बात भूल जाते है के इन भाषाओं ने तमाम बोलियों को खत्म कर दिया जो दलित आदिवासियों की मूल भाषाएं थीं। हिंदी ने भोजपुरी, मैथिली, गढ़वाली, कुमाऊनी, राजस्थानी, हरियाणवी आदि को किनारे लगा दिया। लेकिन जब-जब भाषाई राष्ट्रवाद आएगा, वैसे ही उप भाषाई राष्ट्रवाद भी आएगा और वह लोगों में अत्यधिक लोकप्रिय होगा। आज भोजपुरी का अपना क्षेत्र बहुत विस्तृत हो गया है, लेकिन भोजपुरी का हिंदी से बैर या मतभेद क्या हो सकता है। ऐसे भी नहीं है कि भोजपुरी ने जातिवाद और अंधविश्वास की जड़े हिला दी हो। उलटे वह तो परंपराओं के नाम पर सब कुछ कर रहा है। 

भाषा भी उपनिवेशवाद का सबसे बड़ा उदाहरण है। जैसे हम कहते हैं कि अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय भाषा है, और उसके बिना कोई आगे नहीं बढ़ सकता, विज्ञान चल नहीं सकता, हम अंतरिक्ष में नहीं जा सकते, मेडिकल नहीं पढ़ सकते और पता नहीं क्या क्या नहीं कर सकते। अंग्रेजी के बड़े प्रचारकों तक यह नहीं बता सकते कि रूस ने कैसे तरक्की कर ली। क्या वह साइंस या मेडिकल तकनीक में किसी से कम है? क्या उनके वैज्ञानिक अंतरिक्ष में नहीं जाते? क्या फ़्रांस में लोग साइंस और टेक्नॉलजी नहीं पढ़ते? आखिर क्यों? इस बात को समझने के लिए लोहिया जी की तरह हिंदी के पुजारी मत बन जाइए। हकीकत यह है कि अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पैनिश, इटालियन, रशियन, जर्मन आदि भाषाएं समृद्ध भाषाएं हैं और औपनिवेशिक भी है, जिनके अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में उन्हीं को अंतरराष्ट्रीय भाषा कहा गया। मसलन, फ्रेंच कालोनी वाले अफ्रीका के अधिकांश देशों में फ्रेंच ही कामकाज की मुख्य भाषा है। ब्रिटिश कालोनियों में अंग्रेजी प्रमुख भाषा बनी और स्पेन के अधीन देशों में आज भी स्पैनिश ही मुख्या भाषा है। दरअसल भाषा के जरिए आपकी अस्मिता को मारा जाता है। आपकी भाषा कितनी भी खराब क्यों न हो, वह आपको अपनी है, आप उसमें अपनी भावनाओ को व्यक्त कर सकते हैं। 

एक भाषा के सशक्त बनने के लिए केवल उसके भाषियों का सत्ताधारी होना काफी नहीं होता, अपितु उसमें रचे गए साहित्य का भी योगदान है। इसलिए अंग्रेजी की चौधराहट फ्रेंच, रशियन, जर्मन स्पैनिश में नहीं चलती है, क्योंकि उनका अपना साहित्या बहुत मजबूत है। लेकिन अंग्रेजी को केवल इस बात का लाभ मिल जाता है कि वह दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा हो गई है। इसलिए बाकी भाषाओ का साहित्य अंग्रेजी में आ रहा है। हिंदी की कमी केवल यही है कि उसमें मौजूद साहित्य तमिल, तेलुगु मराठी, बंगाली साहित्य की तुलना में कमतर साबित होता है। लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि भारत में हर भाषा में दलित-बहुजन विद्रोह हुआ है, क्योंकि उन सभी स्थानों पर भी ताकतवर समूहों ने भाषाओं के जरिए अपनी राजनीति की। बंगाल की भद्रलोक क्रांति में दलितों के लिए कोई जगह नहीं थी। तमिलनाडु की द्रविड राजनीति की भाषा में भी दलित मात्र उपयोग की वस्तु ही रहे। कर्नाटक में भाषा के सवाल को उठाने वाले क्या ये कहेंगे के वे जाति उन्मूलन के प्रश्नों पर आंबेडकरवाद की रह चलेंगे? आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी और तेलंगाना में के. चंद्रशेखर राव को दलित हितैषी बताने की भूल करने वाले जान सकते हैं कि भाषाओं के नाम पर राजनीतिक लड़ाई में हाशिए के लोग कहां हैं। 

1990 में मंडल कमीशन की रपट के लागू होने के बाद देश में एक अलग किस्म का ध्रुवीकरण हुआ। वह था दलित-पिछड़ों में गठबंधन और यह कि देशभर में लोगों ने एक-दूसरे को जानने-समझने का प्रयास किया। चाहे वे एक दूसरे की भाषा जानें या नहीं जानें, उन्हे पता था उत्पीड़न की भाषा एक ही होती है। देश में आप भाषाओ के नाम पर चाहे जो भी खेल खेल लें, लेकिन यह हकीकत है कि भाषाओं ने जातिवाद खत्म नहीं किया, अपितु उसकी पूरी राजनीति चलती रही। दलितों पर अत्याचार, पिछड़ों के विरुद्ध भेदभाव आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक में भी बदस्तूर जारी है। यह पंजाब में भी वैसे ही है जैसे कि बंगाल में। 

दूसरी ओर आप यह देखें कि आज भी डॉ. आंबेडकर के नाम पर देश भर के दलितों में एकता है और वह भाषाई एकता की सीमाओं को पार कर जाती है। तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक के दलित आज उत्तर प्रदेश में दलितों से मिलकर भाषा न समझने के बावजूद भी उन्हें समझने की कोशिश करते हैं और इस तरह उनकी एकता बनती है। 

अंग्रेजी के पैरोकार भी जानते हैं कि सारे समाज के लोग अंग्रेजी नहीं सीख पाएंगे और अगर समझ लीजिए कि वे सभी अंग्रेजी सीख गए तो क्या आपके कामकाज की भाषा बदल जाएगी? क्या आप अपनी मूल भाषा को छोड़ देंगे? इसलिए भाषा के नाम पर लोगों को अपमानित करना बंद होना चाहिए। 

यह आवश्यक है कि हिंदी को जबरन न थोपा जाए। हर राज्य का निवासी जब अपनी भाषा में पढ़ेगा तो अच्छा रहेगा। लेकिन यह याद रखा जाना चाहिए कि हें अपनी भाषाओं में ज्ञान कोश बढ़ाना है और उन्हें सांस्कृतिक तौर पर मजबूत करना है। भारत में भाषा केवल भक्त मंडली नहीं बन सकती। यदि उसमें बदलाव के वाहक लोगों का साहित्य और शैली आ जाएगी तो वे चमकेंगी। आप जितनी भी भाषाएं सीखें, वह अच्छा है और आज बाजार भाषा की ताकत निर्धारित करता है, इसलिए जैसे अंग्रेजी की ताकत उसका बाजार है। वही स्थिति भारतीय भाषाओ की है, लेकिन किसी भी भाषा को राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय होने के नाम पर न थोपी जाय। आखिर सारी बातें कानूनों से नहीं होतीं, यह देश मजबूत और एक तब तक है, जब तक यहां की जनता और लोग ऐसा चाहते हैं। भारत के सभी राज्यों को अपनी भाषाओं को मजबूत करने का अधिकार है, लेकिन भाषाएं तो तभी मजबूत होंगीं जब उसे बोलनेवाले लोग ऐसा चाहेंगे। याद रखिए कि आज महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में दलित-पिछड़े वर्ग का साहित्य मजबूत हुआ है तो इसकी वजह यह कि वे अपनी भाषा में लिख रहे थे। भाषाओं में लोकतंत्र की बयार बहाने की जरूरत है। भाषाओं के राष्ट्रवादी अपने इलाकों में दलितों व आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारों को कम करने और छुआछूत, जातिवाद के खात्मे की भाषा में बात करेंगे तो सब समझ जाएंगे। आखिर डॉ. आंबेडकर, फुले, पेरियार को हम सभी ने उनके विचारों के आधार पर अपनाया है न कि उनकी मातृभाषा को समझकर। 

भाषायी राष्ट्रवादियों के निशाने पर वे लोग हैं जो सामंती और वर्चस्ववादी भाषा और जाति आधारित समाज का विरोध कर रहे हैं। इसलिए भाषाओं के खेल में यह समझ लीजिए कि कौन कैसी राजनीति कर रहा है। विरोध के असली स्वर जातिवाद, अंधविश्वास, छुआछूत को खत्म करने के होने चाहिए, जो हर प्रांत और हर भाषा में है। भाषाओं के जरिए लोगों को तोड़ने का नहीं, बल्कि लोगों के बीच मेल-मिलाप की प्रक्रिया है, जो केवल बौद्धिक वर्ग कर सकता है, क्योंकि नेताओ को तो हर जगह एक नया मुद्दा चाहिए ताकि हम असली मुद्दों से भटक जाए। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विद्याभूषण रावत

विद्याभूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में 'दलित, लैंड एंड डिग्निटी', 'प्रेस एंड प्रेजुडिस', 'अम्बेडकर, अयोध्या और दलित आंदोलन', 'इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया' और 'तर्क के यौद्धा' शामिल हैं। उनकी फिल्में, 'द साईलेंस आॅफ सुनामी', 'द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल', 'अयोध्या : विरासत की जंग', 'बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तर प्रदेश' व 'लिविंग आॅन द ऐजिज़', समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

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