बहस-तलब : नफरत और दमन के इस माहौल में क्या करें फुले-पेरियार-आंबेडकरवादी?

इस समय हमारी ऊर्जा दलित-बहुजनों के मूलभूत सवालों पर होनी चाहिए। यह जरूर अच्छी बात है कि हम संघर्षरत दूसरे आंदोलनों के साथ जुड़ें और अपनी बात रखें, लेकिन बातों को रखते समय ध्यान रखे कि क्या हम अपनी बात को आसानी से बिना कड़वाहट के रख सकते हैं या नहीं। पढ़ें, विद्या भूषण रावत का यह विश्लेषण

पिछले एक महीने में तीन बड़ी घटनाओं पर सरकारी पार्टी के रुख को देखकर लगता है कि वे आंबेकरवादी सरकार के निशाने पर हैं। सबसे पहली घटना गुजरात के निर्दलीय दलित विधायक जिग्नेश मेवानी से जुड़ी है, जिन्हें गिरफ्तार करने असम सरकार पुलिस गुजरात गई। असम पुलिस गुजरात गई और रात के समय उन्हें अपराधियों की तरह पकड़ कर अपने साथ असम ले गई। उनका कसूर यह था कि उन्होंने एक ट्वीट कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल किया था। उनके ट्वीट से असम के एक जिले के भाजपा कार्यकर्ता की भावनाएं ‘आहत’ हो गईं और उसने मेवानी के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कर दी और पुलिस, जो आमतौर पर अन्य गंभीर मसले पर कार्यवाही करने में लेटलतीफी के नये रिकार्ड बनाती है, वही मेवानी के मामले में वह तनिक भी देर नहीं लगाती नजर आई। 

यहां तक कि गुजरात विधानसभा अध्यक्ष को भी बताने की कोशिश नहीं की गई और ना ही विधानसभा अध्यक्ष ने पता करने की कोई कोशिश की कि उनके विधायक को इतनी रात को क्यों गिरफ़्तार किया गया। जबकि यह संवैधानिक प्रावधान है। असम में जब न्यायालय ने दो दिन की हिरासत के बाद जिग्नेश को जमानत दे दी, तो असम पुलिस ने उन्हें एक-दूसरे मामले में फंसा दिया और आरोप लगाया कि उन्होंने हिरासत के दौरान ही बरपेटा जिले की एक महिला पुलिसकर्मी से अभद्र व्यवहार किया। इस संबंध में एक मुकदमा उनके खिलाफ और दर्ज कर लिया गया और हिरासत में ले लिया गया। और फिर एक-दूसरे जिले में उनके पर केस चला, लेकिन निचली अदालतने न केवल जिग्नेश को जमानत पर रिहा कहने का आदेश दिया बल्कि अपने फैसले में साफ कह दिया कि गौहाटी हाईकोर्ट को इस मामले की जांच करनी चाहिए कि असम पुलिस क्यों जिग्नेश को जानबूझकर परेशान कर लंबे समय तक जेल मे रखने की तैयारी कर रही है? 

क्या कानूनों का इस्तेमाल अपने विरोधियों को फंसाने के लिए किया जा रहा है? क्या कानूनी प्रक्रिया जानबूझकर जटिल कर दी गई है ताकि लोग उसकी जटिलताओ और प्रक्रियाओं में फंसे रहें और सत्ताधारी बिना किसी जवाबदेही के अपने काम करते रहें?

जिग्नेश करीब एक हफ्ते बाद रिहा होकर जब गुजरात आए तो एक अन्य मामले में उनके उपर प्राथमिकी गुजरात में दर्ज कर ली गई और इस प्रकार हम देखते हैं कि उन्हेंं बोलने से रोकने के लिए तमाम कोशिशें की जा रही हैं। लेकिन उनका जज्बा कायम है और वे संघर्षरत हैं। 

अभी उत्तर प्रदेश में ज्ञानवापी मस्जिद के तथाकथित विवाद मे सभी लोग कूद पड़े हैं। चैनलों पर चर्चा हो रही है और एंकर आग उगल रहे हैं। आज कल मुख्यधारा के ‘प्रगतिशील’ सवर्ण एक-दो लोगों को दलित होने के नाम पर भी बुला लेते है। फिर बहस होती है, तल्खी बढ़ती है और फिर कोई संघी उनके उपर केस कर देता है। अब लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रविकांत का मामला देखिए। उन्होंने कुछ कहा और फिर छात्रों का हुजूम उनको गालियां देते हुए उनके चैंबर मे घुस गया और उनकी गिरफ़्तारी की मांग करने लगा। प्रो. रविकांत को गालियां दी गईं और सोशल मीडिया पर ट्रोल भी किया गया। कई लोग उनकी बर्खास्तगी की मांग भी करने लगे। 

प्रो. रविकांत. जिग्नेश मेवानी व प्रो. रतन लाल की तस्वीर

इधर दिल्ली में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर डॉ. रतन लाल भी फेसबुक पर एक टिप्पणी के कारण हिन्दुत्ववादियों के निशाने पर आ गए। उनके विरुद्ध एफआईआर हो गई और फिर एक दिन पुलिस ने उन्हें भी रात के अंधेरे में गिरफ्तार कर लिया। हालांकि अगले ही दिन दिल्ली की तीसहजारी कोर्ट ने उन्हें पचास हजार रुपए के मुचलके पर जमानत दे दी। अपने आदेश में कोर्ट ने मानीखेज टिप्पणी की कि इस देश में 130 करोड़ लोग रहते हैं और सभी के मंतव्य अलग हो सकते हैं तथा हर किसी का मंतव्य महत्वपूर्ण है। कोर्ट के इस फैसले को सभी लोग ‘क्रांतिकारी’ बताया रहे हैं। सवाल यह है कि यदि किसी के पास पचास हजार रुपए न हों तो क्या होगा? यदि न्यायालय यह सोचता है कि हमारे यहां 130 करोड़ लोग है और करोड़ों देवी-देवता है और सभी उनको मानते हैं और आलोचना भी कर सकते हैं तो मुचलके जमा करने का क्या मतलब?

ऐसा नहीं है कि दलितों ने हिन्दुत्व की कोई आलोचना नहीं की हो और डॉ. रतन लाल या प्रो. रविकांत कोई अलग किस्म की बात कर रहे थे। जो आंबेडकरी-फुले-पेरियार की परंपरा को जानते हैं, उन्हें पता होगा कि ब्राह्म्णवाद की आलोचना और विकल्प तीनों के कार्यक्रम का हिस्सा था। लेकिन यह भी हकीकत है कि तीनों ने अपने को आलोचना से बाहर निकालकर एक बेहद मानवीय विकल्प लोगों के सामने रखा, जिसे मानववादी सोच कहा जा सकता है। आलोचनाएं हो रही हैं और आंबेडकरी मिशन के लोगों को यह सब पता है, इसलिए बुद्ध के धम्म मिशन के प्रति लोगों में लगातार दिलचस्पी बढ़ी है, और उसे अपनाया भी गया है। 

ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हो रहा है लेकिन हमें यह सोचना भी जरूरी है कि क्या जिन बातों के कारण सरकार ऐसा कर रही है, उसे क्या उसे दूसरी प्रकार से कहा जा सकता है? दरअसल सोशल मीडिया के दौर में हम अपनी बातों को रखते हुए बहुत उत्तेजित भी हो रहे हैं। सोशल मीडिया का यह दबाव भी है कि जो जितना लच्छेदार और ‘प्रभावशाली’ बात रखेगा, वह उतना ही अधिक ‘लोकप्रिय’ होगा। दूसरी बात, हम हमेशा से बात करते आए है कि मनुवादी मीडिया हमारा इस्तेमाल करता है और हमारी बातों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करता है, लेकिन अभी तक जो भी लोग निशाने पर है, वे सभी मनुवादी मीडिया मे ‘दलितों’ के ‘प्रतिनिधि’ के तौर पर ही जाने जाते हैं और खूब लोकप्रिय भी हो रहे हैं। इस देश मे आंबेडकरी आंदोलन के लोगों ने बहुत बड़े बड़े काम किए और डॉ. आंबेडकर के आंदोलन को जिंदा रखा। ‘भीम’ पत्रिका के संपादक लाहोरी राम बाली का तो एकबार पासपोर्ट भी जब्त कर लिया गया था। ‘दलित वायस’ के संपादक वी. टी. राजशेखर ने अपनी बातों को हमेशा ही बेहद मजबूती से रखा था। राजा ढाले ने ‘दलित पैंथर’ आंदोलन के समय से ही बेहद सशक्त रूप से बात रखी थी। उनके पहले अपने दौर में फुले, आंबेडकर और पेरियार ने तो ब्राह्मणवादी ग्रंथों का कच्चा चिट्ठा ही खोल दिया था। लेकिन ये सभी अपनी बातों को रखने और उस विचार करने के लिए ब्राह्मणवादी मीडिया और संस्थानों पर निर्भर नहीं रहे, अपितु उन्होंने अपने संस्थान बनाए और उन्हीं के जरिए बात रखी। 

दूसरी बात, आंबेडकरवादी आंदोलन का ज्यादा फोकस समाज को जागृत करने मे था न कि ब्राह्मणवादी तंत्र मे अपनी बात रखने का। आज के दौर मे हम अधिक से अधिक बात उन लोगों के बीच रख रहे हैं, जो कही गयी बातों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करते हैं और कभी भी आपको पर्याप्त अवसर नहीं देंगे ताकि कोई धैर्यपूर्वक अपनी पूरी बात रख सके। 

दरअसल, मीडिया के मामले में यह देखा जाता है कि इसने लोगों के ज्ञान को उनकी जाति तक सीमित कर दिया है। कोई लाख जानता हो, लेकिन दूसरे उसे सीमित दायरे मे कैद कर देना चाहते हैं। कम समय में ‘प्रभावशाली’ बात कभी भी ‘नपे-तुले’ शब्दों में नहीं रखी जा सकती है। आप कुछ न कुछ ऐसा बोलेंगे, जो ‘चुभेगी’, क्योंकि उसके कारण ही टीआरपी इन संस्थानों को प्राप्त होती है। हम सब कहते है कि सबको बोलने की स्वतंत्रता है, लेकिन यह सब कहने की बातें है। ये बहसें अक्सर बेतुकी हो जाती हैं और फिर तू-तू-मैं-मैं की शक्ल अख्तियार कर लेती है। क्या यह जरूरी है कि हम हर बात पर अपनी बात कहें? मैं सबकी बोलने की स्वतंत्रता का सम्मान करता हूं। मैं बिल्कुल मानता हूं कि इस दौर में यह बहुत मुश्किल है। लेकिन मैं यह भी मानता हूं कि बहुत से मुद्दे हम जबरन लोगों के उपर थोपा जाता है। हमें यह सोचना ही होगा कि क्या हम इन बेतुकी बहसों मे पड़ें? हमें पता है कि संघ परिवार के विशेषज्ञ चौबीस घंटे मुद्दे ढूंढ रहे हैं। वे इस संबंध में बहस करेंगे तो क्या हम उनके साथ उलझें? ऐसे भी हो सकता है कि वे अपने साजिशपूर्ण प्रश्नों को बेहद सादे ढंग से अपने लोगों के सामने रखे।

लेकिन सवाल है कि आखिर क्या कारण है कि हम मनुवादी पत्र-पत्रिकाओ में तो छपना चाहते है, लेकिन जो आंबेडकरी आंदोलन से निकल रही है, उनसे दूर है। हमें मुद्दों को गंभीरता मे बदलना पड़ेगा, क्योंकि मीडिया आपसे एक ‘बाइट’ चाहता है ताकि उसे वह सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत कर सके। 

मुझे भी इस तरह की बहसों में शामिल होने का मौका मिला है। मुझे आज भी याद है कि एक चैनल मे कुछ समय तक जाने के बाद ‘विरोध’ मे बोलने वाले एक व्यक्ति ने मुझसे कहा कि आप तो प्यार से ऐसा बोलते है कि उसके बाद कुछ बात कहने की जरूरत नहीं होती। कार्यक्रम के संचालक ने कहा कि शांति से बहस करने पर टीआरपी नहीं बनती, तो वह बहस के प्रतिभागियों को सीधे सीधे भड़का रहा था। मैंने यह भी देखा के कैसे नामचीन एंकर बहस मे भाग लेने आए बाबाओं के पांव तक छूते हैं। बहुत वर्षों पूर्व मैंने यह सोचा कि इस मुख्यधारा से अलग रहना चाहिए। होता यह है कि हम इनकी बहस में अपने को इनके मुताबिक ढालते हैं और फिर वे हमारी बाइट को अपने हिसाब से दिखाते हैं। जो हिस्सा उनके लिए चुनौती होती है, उसे वे हटा ही देते हैं। 

मैं यह कहना चाहता हूं कि अपनी बात को रखने के लिए हम मनुवादी मीडिया तंत्र का इस्तेमाल न करें। आप सोचते है कि आप उसके जरिए ज्यादा लोगों तक पहुंच रहे हैं, लेकिन मैं फिर वही बात कहता हूं कि चाहे वी. टी. राजशेखर हों, राजा ढाले हों, या एल. आर बाली, मनुवादी तंत्र के लोग उन्हें नहीं जानते होंगे क्योंकि दलितों के नाम पर ओमप्रकाश वाल्मिकी और अन्य कहानीकार सवर्णों की तिलस्मी दुनिया में ज्यादा जाने जाते है, परंतु जब भी आंबेडकरी आंदोलन की बात होंगी तो भगवान दास, के. जमना दास, राजा ढाले, बाली साहब, आदि का नाम सम्मान से लिए जाएगा। मुझे नहीं पता कि आज के दौर में इन लोगों से अधिक सशक्त और ताकतवर बोलने वाला कोई मिलेगा या नहीं, लेकिन वे अंत तक मनुवादी समाज और मीडिया से लाइसेंस नहीं लेते रहे। 

इस समय हमारी ऊर्जा दलित-बहुजनों के मूलभूत सवालों पर होनी चाहिए। यह जरूर अच्छी बात है कि हम संघर्षरत दूसरे आंदोलनों के साथ जुड़ें और अपनी बात रखें, लेकिन बातों को रखते समय ध्यान रखे कि क्या हम अपनी बात को आसानी से बिना कड़वाहट के रख सकते हैं या नहीं। सवाल स्वतंत्रता का नहीं है, लेकिन इस बात का है कि हम सबकी जरूरत समाज के संघर्षों को मजबूत करने और उसे मंजिल तक पहुंचाने की है और यह सोचना चाहिए कि उसकी जगह यदि हम खुद ही खबर बन गए तो क्या होगा। 

हम सब जानते हैं कि आज हमारे तंत्र की हालत क्या हो गई है। संविधान बचाने वाली संस्थाओ के क्या हाल हैं और इसलिए इस दौर मे हमें और भी सावधानी से काम करने की जरूरत है। वैसे भी हम देख रहे हैं कि किस प्रकार से पुलिस आंबेडकरी विचारकों पर तुरंत कार्यवाही करती है और जब दलितों पर अत्याचार का प्रश्न सामने आता है तो सबसे पीछे होती है। देश भर मे दलितों पर हो रही हिंसा की घटनाओं को हम जानते हैं और कैसे उन मामलों में लीपापोती होती है, इससे भी वाकिफ हैं। दिल्ली मे अभी 12 दिन से लापता एक गायिका, जो दलित समाज से आती है, का शव मिला है। उसके परिवार के लोग पुलिस से गुहार लगाते रहे, लेकिन उसके उपर कोई विशेष कार्रवाई नहीं की गई। परिवार के सदस्यों ने दिल्ली पुलिस पर समय से कार्रवाई न करने का आरोप लगाया है। लड़की के परिवार वालों ने भारी बारिश के बावजूद शब के साथ प्रदर्शन किया तब जाकर दिल्ली पुलिस हरकत मे आई और आरोपियों को गिरफ्तार किया। 

दलितों के ऊपर अत्याचारों को लेकर पुलिस और प्रशासन का रवैया कैसा रहता है, यह जगजाहिर है, लेकिन बुद्धिजीवी और कार्यकर्ता, जो दलित समाज से आते हैं, उनकी आलोचनाओं से आखिर हमारा तंत्र क्यों परेशान हो जाता है? यह हकीकत है कि मनुवादी जातिवादी तंत्र की सबसे प्रखर आलोचना फुले-आंबेडकरी-पेरियार के आंदोलन से निकलती है और वर्तमान तंत्र जानता है कि ये सभी एक वैकल्पिक संस्कृति देने की बात कहते हैं। इसलिए जरूरी है कि डॉ. आंबेडकर के प्रबुद्ध भारत के मिशन को साकार करें और उनलोगों के एजेंडे पर अपनी ऊर्जा न लगाएं, जो लगातार मीडिया और प्रचार चाहते हैं तथा उसके लिए मुद्दों की खोज मे लगे होते हैं। कौन से स्थान पर क्या था, इसकी बात तो हम नहीं जानते, क्योंकि यदि इस देश में खुदाई शुरू हो जाएगी तो बौद्धकालीन इतिहास के अलावा और कुछ भी नहीं मिलेगा। इसलिए खुदाई से बहुत कुछ नहीं होने वाला। डॉ. आंबेडकर ने बहुत समय तक कोशिश की कि जाति के प्रश्न पर कोई सार्थक बहस हो, लेकिन गांधी जैसे व्यक्ति ने उनको बेहद निराश किया और इसलिए उन्होंने हिन्दुओ के सुधार के प्रश्न से अपने एजेंडे से हटा दिया और फिर प्रबुद्ध भारत के लिए नवयान की बात कही। वर्ष 1945 के बाद से उनकी अधिकांश टिप्पणियां व रचनाएं एक नए भारत के निर्माण की दिशा के प्रश्नों पर थी, जिसमें बुद्ध धम्म की सांस्कृतिक क्रांति का मार्ग सबसे महत्वपूर्ण था। आज हम समुदायों मे लगकर वही काम करें, जिसमें हो सकता है कि प्रचार न हो, लेकिन लंबे समय में वही बदलाव का असली वाहक बनेगा। आंबेडकरवादी बौद्धिकता ही इस देश में चेतना के स्तर पर सबसे बड़ा बदलाव लाई है और ब्राह्मणवादी मीडिया उसे स्वीकारे या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है, क्योंकि लोग सब जानते है कि इतिहास को कैसे तोड़ा-मरोड़ा गया। उसके लिए फुले की ‘गुलामगिरी’ और ‘किसान का कोड़ा’ या डॉ. आंबेडकर की किताब ‘अछूत का सवाल’ और ‘जाति का विनाश’ बहुत महत्वपूर्ण हैं। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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