h n

वंचितों के साहित्य का बंटवारा न हो : सुधा अरोड़ा

‘यह ओबीसी और बहुजन साहित्य भला क्या है? एक प्रभुताशाली सुविधाभोगी वर्ग है और एक वंचित और शोषित समुदाय है, उसमें दलित हो, ओबीसी या बहुजन समुदाय हो, सबको एक ही जगह रखना चाहिए। साहित्य हमेशा वंचितों व शोषितों के पक्ष की बात करता है और उनके साथ खड़ा होता है।’ पढ़ें, प्रसिद्ध साहित्यकार सुधा अरोड़ा से यह बातचीत

[4 अक्टूबर, 1946 को लाहौर (पाकिस्तान) में जन्मी सुधा अरोड़ा हिंदी साहित्य के प्रमुख कथाकारों में एक हैं। इनका पहला कहानी संग्रह ‘बगैर तराशे हुए’ वर्ष 1967 में लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित किया गया। करीब डेढ़ दर्जन कहानी संग्रहों के अलावा सुधा अरोड़ा ने स्त्री विमर्श पर आलेखों की तीन पुस्तकें, कविताएं, उपन्यास, नाटक आदि भी लिखे हैं। इनका उपन्यास ‘यहीं कहीं था घर’ वर्ष 2010 में सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ।

हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श की पैरोकार रहीं सुधा अरोड़ा को वर्ष 2010 में मानव प्रकाशन, कोलकाता द्वारा प्रकाशित ‘एक औरत की नोटबुक’ के लिए भी जाना जाता है।

हाल ही में उनकी कहानी ‘भीमटोला की छोकरी’ साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ में प्रकाशित हुई है।

पिछले दिनों वे दिल्ली में थीं। अतीत से लेकर मौजूदा साहित्य तक किस तरह के बदलाव हुए हैं और इन बदलावों का समाज पर किस तरह का असर हुआ है, आदि सवालों को लेकर नवल किशोर कुमार ने उनसे बातचीत की। प्रस्तुत है इस बातचीत का संपादित अंश]

महिलाओं को भी वंचित समुदाय के रूप में पृथक करके देखा जाता है। आज उनका साहित्य है, जिसे स्त्रीवादी साहित्य भी कहा जाता है। यदि हम इस दृष्टिकोण से देखें तो अब तक, आजादी के बाद जो साहित्य आया है, उनका महिलाओं के नजरिये से आप कैसे मूल्यांकन करती हैं?

सिर्फ महिलाओं के नजरिये से क्यों, एक मानवीय नजरिये से मूल्यांकन किया जा सकता है। महिला समस्याओं पर महिलाओं द्वारा रचा गया वह साहित्य तो जरूरी था। दिक्कत यह है कि जब मैं, या अन्य कोई रचनाकार महिलाओं के बारे में लिखना शुरू करते हैं तो महिलाएं भी कहती हैं कि यह सीमित दायरे में लिखा गया साहित्य है या आप लेखन को संकुचित, सीमित कर रही हैं। महिलाओं की समस्याओं को महिलाएं भी समझ नहीं पातीं, आकलन तो दूर की बात है। पुरुषों को तो छोड़ ही दीजिए, क्योंकि महिलाओं को भी समझ नहीं आता कि पुरुषों द्वारा उनके साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है। हर वर्ग में – यहां सिर्फ़ निचले, मध्य वर्ग या उच्च वर्ग की ही बात नहीं है, दलित वर्ग से लेकर ऊपरी वर्ग तक, यानी आप सुशीला टांकभौरे की आत्मकथा से लेकर लीना नायडू तक देख लीजिए। लीना नायडू बहुत ऊपर के ओबेराय खानदान की बहू थी। उसके साथ कैसा सुलूक किया गया। प्रताड़ित महिला खुद लिखे, तो समाज उसके उपर चारों तरफ से आक्रमण करता है। लीना नायडू ने जब लिखा तो उसे कितना बुरा-भला कहा गया। हमारे यहां के प्रबुद्ध पत्रकारों ने कहा कि 27 साल रहने के बाद आप क्यों बोल पड़ीं। तो चारों तरफ से ऐसा माहौल है ही नहीं। सिवाय जागरूक महिलाओं के एक छोटे से हिस्से को छोड़ दें, कुछ महिला संगठन, कुछ सामाजिक कार्यकर्ता, कुछ आप जैसे पत्रकार, उनको छोड़ दें, और समग्रता में देखें तो बहुत अच्छा माहौल आज भी नहीं है महिलाओं के प्रति। सहानुभूति का माहौल भी नहीं है।

पूरा आर्टिकल यहां पढें : वंचितों के साहित्य का बंटवारा न हो : सुधा अरोड़ा

लेखक के बारे में

नवल किशोर कुमार

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस के संपादक (हिन्दी) हैं।

संबंधित आलेख

दलित : हिंदू नहीं, अल्पसंख्यक समुदाय
डॉ. आंबेडकर ने इस पुस्तक में पूना पैक्ट के प्रति असंतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि पूना पैक्ट में जो भरोसा दिया गया था,...
‘हड़प्पा : गॉड्स सिटी ऑफ़ सिविलाईजेशन’ : क्यों और कैसे?
न तो ‘रामायण’ की अयोध्या और न ही ‘महाभारत’ की द्वारका के प्राचीन नगर होने के कोई पुरातात्विक प्रमाण हैं। मेरा उपन्यास दुनिया के...
आजाद मुल्क में हाशिए की मुक्ति संग्राम का उद्घोष करतीं कविताएं
कवि राजेश पाल उम्मीद के रचनाकार हैं। उनका आक्रोश विध्वंसक नहीं है, सृंजनशील है। वे हर तरह की असमानता, अन्याय और भेदभाव का ख़ात्मा...
पश्चिमी राजस्थान में जमींदार और खेतिहर मजदूरों का हाल
अगर जमींदार के घर में चाय बनी है और बटाईदार के पास खुद का बर्तन नहीं है और न ही जमींदार के पास बटाईदार...
टुकड़े-टुकड़े आईना : दलितों की व्यथा-कथा और प्रतिरोध-प्रतिवाद का जीवंत इतिहास
यदि कोई हिंदी पट्टी का इतिहास सबसे बड़े मेहनतकश हिस्से दलित को केंद्र में रखकर देखना-पढ़ना-लिखना चाहे तो दलित आत्मकथाएं इसका सबसे बड़ा स्रोत...