बहुजन साप्ताहिकी : पिछड़े राज्यों में ‘अग्निपथ’ परियोजना से युवाओं में आक्रोश की वजह

इस सप्ताह पढ़ें, हिंदी प्रदेशों में केंद्र सरकार की ‘अग्निपथ’ परियोजना के खिलाफ हो रहे विरोधों के बारे में। इसके साथ ही तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन द्वारा केंद्र सरकार को दिए गए एक खास सलाह और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के पुनर्गठन संबंधी मांग के बारे में

हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा अग्निपथ परियोजना का एलान केंद्र सरकार को महंगा पड़ता दीख रहा है। इस परियोजना का विरोध बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश आदि प्रदेशों में युवाओं द्वारा किया जा रहा है। दरअसल राजनाथ सिंह ने एलान किया था कि रक्षा मंत्रालय इस वित्तीय वर्ष में 46 हजार रंगरूटों की भर्ती करेगी, जिन्हें अग्निवीर कहा जाएगा। ये अग्निवीर चार साल तक के लिए सेना का हिस्सा रहेंगे और इस दौरान उन्हें 30 से 40 हजार रुपए तक वेतन दिया जाएगा। इसके बाद अग्निवीरों को करीब 11 लाख रुपए दिये जाएंगे। हालांकि उन्हें प्रोविडेंट फंड का लाभ मिलेगा और ना ही पेंशन का। हालांकि राजनाथ सिंह यह अवश्य कहा कि उत्कृष्ट प्रदर्शन करनेवाले 25 फीसदी रंगरूटों की सेवाओं को मंत्रालय नियमित करेगा। 

रक्षा मंत्री की इस घोषणा के बाद से बिहार और उत्तर प्रदेश के युवाओं में काफी आक्रोश है। इस क्रम में 17 जून को प्रदर्शनकारी युवाओं ने बिहार के बेतिया जिलें में उपमुख्यमंत्री रेणी देवी के पैतृक आवास तथा इसी जिले में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल के मकान पर भी हमला बोला। इसके एक दिन पहले यानी 16 जून को भी बिहार के कई जिलों में विरोध प्रदर्शन हुए। मसलन, नवादा जिले में भाजपा विधायक अरुणा देवी के वाहन पर प्रदर्शनकारियों पर हमला बोला। साथ ही, भाजपा के जिला कार्यालय में भी तोड़फोड़ की। इसके अलावा बक्सर जिले में एक पैसेंजर ट्रेन को आग के हवाले कर दिया गया।

आंदोलनरत युवाओं का कहना है कि सरकार अपनी घोषणा वापस ले और पूर्ववत सैनिकों की नियुक्तियां करे। वहीं इस संबंध में विपक्षी नेतागण जहां आंदोलनरत युवाओं के साथ दीख रहे हैं तो भाजपा के नेताओं द्वारा ‘अग्निपथ’ परियोजना के फायदे बताए जा रहे हैं। जबकि बिहार में जदयू के कद्दावर नेता व नीतीश सरकार में मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने इस मामले में कहा है कि केंद्र सरकार को युवाओं से बात करनी चाहिए। 

बिहार के आरा में पटरी पर बैठकर विरोध करते युवा

दरअसल, जिन राज्यों में युवा विरोध कर रहे हैं, वे राज्य पिछड़े राज्यों की श्रेणी में आते हैं। खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य। इन राज्यों में रोजगार के अवसर कम होने की वजह से युवाओं में सेना व अर्द्धसैनिक बलों के जवान की नौकरी के प्रति आकर्षण रहता है। इसकी एक वजह यह कि इसके कारण उन्हें वित्तीय स्थिरता प्राप्त होती है। व्यापक विरोध की एक वजह यह भी मुमकिन है कि 2019 के बाद से भर्तियां बाधित रही हैं।

हालांकि प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ‘अग्निपथ’ परियोजना के तहत हुई बहाली में भविष्य की सुरक्षा नहीं है। हालांकि केंद्र सरकार ने बढ़ते विरोध के बीच कल स्पष्टीकरण भी जारी किया और युवाओं को समझाने की कोशिश की है कि यह एक नये मौके के समान है। भाजपा शासित राज्यों यथा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में विज्ञापनों के जरिए यह बताया गया है कि चार साल के बाद जब रंगरूट सेवानिवृत्त होंगे तब उन्हें उद्यम की स्थापना के लिए ऋण के अलावा अन्य सेवाओं में वरीयता दी जाएगी। 

स्टालिन ने दी पीएम को सलाह, हर साल अंतरर्राज्यीय परिषद की कम से कम तीन बैठकें हों

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने केंद्र सरकार को केंद्र व राज्य सरकारों के बीच संघीय ढांचे को मजबूत बनाने के लिए सलाह दी है। गत 16 जून, 2022 को जारी अपने बयान में स्टालिन ने कहा कि अंतर्राज्यीय परिषद की बैठक साल में कम से कम तीन आयोजित हो। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि वैसे सारे फैसले, जिनसे पूरा देश प्रभावित होता है या फिर होने की संभावना है, उन्हें केंद्र सरकार मंत्रिपरिषद की बैठक से पहले अंतर्राज्यीयी परिषद में साझा करे। इससे राज्यों को भी अपना पक्ष करने का अवसर मिलेगा तथा केंद्र व राज्यों के बीच गतिरोध कम होगा।

प्रधानमंत्री से राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के जल्द गठन की मांग

वर्तमान में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग अस्तित्वहीन है। वजह यह कि आयोग के अध्यक्ष भगवान लाल साहनी व इसके सदस्यों का कार्यकाल इस साल फरवरी माह में समाप्त हो गया है और नये अध्यक्ष व सदस्यों का मनोनयन केंद्र सरकार द्वारा नहीं किया गया है। इस संबंध में ऑल इंडिया ओबीसी इम्प्लॉयज फेडरेशन के राष्ट्रीय महासचिव जी. करुणानिधि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर आयोग के गठन की मांग की है। अपने पत्र में उन्होंने कहा है कि वर्ष 2017 में हालांकि केंद्र सरकार ने आयोग को वैधानिक शक्तियां प्रदान की, लेकिन आयोगों के गठन के मामले में सरकार शिथिलता बरतती रही है। मसलन पिछली बार ही आयोग का गठन ढाई साल के अंतराल पर किया या था। इस बार भी केंद्र सरकार शिथिलता बरत रही है। उन्होंने कहा कि आज पिछड़ा वर्ग के अधिकारों का हनन पूरे देश में किया जा रहा है, ऐसे में आयोग का सक्रिय रहना आवश्यक है। 

पूर्वी उत्तर प्रदेश की वरूणा नदी को बचाने की मुहिम

नदियों को प्रदूषण मुक्त करके फिर से जीवनदायिनी बनाने की मुहिम के क्रम में वरुणा नदी को लेकर गाँव के लोग सोशल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट के तत्वावधान में रविवार को नदी एवं पर्यावरण संचेतना यात्रा निकाली गई। वाराणसी जिले में वरुणा नदी के किनारे स्थित बाबाजी की मड़ई से यात्रा की शुरुआत हुई जिसमें सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ-साथ स्थानीय ग्रामीणों ने भी अपनी सहभागिता दिखाई। लोगों ने वरुणा में गंदगी को लेकर निराशा और गहरी चिंता जाहिर की। उबड़-खाबड़ रास्तों पर चलकर यात्रा के माध्यम से कई गांवों के लोगों को वरुणा नदी को स्वच्छ रखने और इसकी उपयोगिता के बारे में विस्तार से बताया गया। 

इस मौके पर स्थानीय किसान नेता रामजनम ने कहा कि वर्षा की एक-एक बूंद की कीमत का अहसास हमें बीते कई वर्षों में अच्छी तरह होता रहा है लेकिन प्रकृति के इस कोप से हम सबक नहीं ले पाए। इस दौरान कोई बड़ा इंतजाम नहीं कर सके जिससे वर्षा के जल को सहेजा जा सके। पोखरे-तालाब और नदियों का इसमें बड़ा अहम योगदान होता है। ‘गांव के लोग सोशल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट’ की अपर्णा ने कहा कि आज की स्थिति में वरूणा भारत की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में से एक है। नदी के तट से 200 मीटर दूरी के नियमों को तोड़कर मकान, बड़ी-बड़ी इमारतें और होटल बन गए हैं। सदानीरा रहने वाली कलकल करती यह नदी आज गंदी नाली की शक्ल में परिवर्तित हो चुकी है। वहीं कहानीकार संतोष कुमार ने लंदन के टेम्स नदी का उदाहरण देते हुए बताया कि एक समय टेम्स नदी में इतना मल बहता था कि ब्रिटिश पार्लियामेंट की बैठकें भी नहीं हो पाती थीं लेकिन लोगों ने अपनी इच्छाशक्ति और कर्मठता से आज उसे एक शानदार नदी में बदल दिया। भारत की नदियों की दशा बहुत ख़राब है। नदियों को प्रदूषित करनेवालों के खिलाफ कोई सख्ती या नियम कानून नहीं हैं। 

(संपादन : अनिल)


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