द्रौपदी मुर्मू : भाजपा की बिसात का अपराजेय मोहरा

शायद, ममता बनर्जी की अपने लिए एक केंद्रीय जगह बनाने की महत्वाकांक्षा को विपक्ष की कीमत चुकानी पड़ी। हालांकि संख्या पहले विपक्ष के पक्ष में थी, लेकिन यह स्पष्ट है कि यशवंत सिन्हा को विपक्ष के वोट भी नहीं मिल सकते क्योंकि अधिकांश क्षेत्रीय दल उन्हें वोट देने से पहले दो बार सोचेंगे। बता रहे हैं विद्या भूषण रावत

बहस-तलब 

द्रौपदी मुर्मू को भाजपा और गठबंधन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार घाेषित किया है। जबकि विपक्ष ने उनके मुकाबले में पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा को मैदान में उतारा है। फिलहाल जो परिस्थितियां हैं, वे इस संभावना को मजबूती प्रदान करती हैं कि मुर्मू भारत की पहली आदिवासी और दूसरी महिला राष्ट्रपति बनेंगी। इस संभावना और इससे जुड़े राजनीतिक-सामाजिक पहलुओं पर विचार करने से पहले कुछ बातें हाल के घटनाक्रम की। हालांकि इन्हें भी इसी कड़ी में जोड़कर देखा जाना चाहिए।

प्रवर्तन निदेशालय ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी से पांच दिनों तक करीब 50-60 घंटे तक पूछताछ की। नेशनल हेराल्ड मामले में पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के पास भी समन भेजा गया है। हर कोई इस वास्तविकता को जानता है कि ‘नेशनल हेराल्ड’ कांग्रेस पार्टी का मुखपत्र था। इसे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जवाहरलाल नेहरू द्वारा शुरू किया गया था। आजादी के बाद भी अखबार और इसके दो अन्य अखबार हिंदी में ‘नवजीवन’ और उर्दू में ‘कौमी आवाज़’ का प्रकाशन जारी रहा। हालांकि बाद में इस अखबार को गंभीर नुकसान हुआ और वर्ष 2008 में बंद कर दिया गया था। राहुल गांधी ने 2016 में इसके पुनरुद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इससे संबंधित सभी मुद्दे मूल रूप से तकनीकी व्याख्या पर आधारित हैं। कोई वास्तव में यह नहीं कह सकता कि कुछ निकायों ने पैसा कमाया लेकिन जैसा कि वकीलों और चार्टर्ड एकाउंटेंट की सलाह पर होता है, लोग अपने व्यवसाय की रक्षा के लिए कुछ पैटर्न का पालन करते हैं। यह विशुद्ध रूप व्यावसायिक है और इस पर निर्भर करता है कि आप सिक्के के किस तरफ हैं और आप इसकी व्याख्या कैसे करते हैं।

ईडी की कार्रवाई के विरोध में कांग्रेस के कार्यकर्ता सड़क पर थे, लेकिन डीएमके पार्टी और उसके नेता एमके स्टालिन को छोड़कर, हमने प्रवर्तन निदेशालय और अन्य एजेंसियों के दुरुपयोग के लिए सरकार की निंदा में कोई आवाजें नहीं सुनीं, जो आज की राजनीति का दुखद पक्ष है। हर कोई जानता था कि यह राहुल गांधी और सोनिया गांधी को डराने और पार्टी को बर्बाद करने या राष्ट्रपति चुनाव से पहले इसे चुप कराने के लिए किया जा रहा है। इस बीच ममता बनर्जी ने बिना किसी से सलाह-मशविरा किए विपक्षी दलों के एक संयुक्त उम्मीदवार को लेकर ‘विपक्षी सम्मेलन’ शुरू कर दिया। उस समय तक ममता ने प्रवर्तन निदेशालय द्वारा राहुल गांधी को लगातार प्रताड़ित करने के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा था। प्रारंभ में, उन्होंने इस पद के लिए शरद पवार को राजी करने की कोशिश की। लेकिन जैसा कि सेफ गेम खेलने का शरद पवार का राजनीतिक आचरण रहा है, वह तैयार नहीं हुए। उसके बाद ममता ने विपक्षी उम्मीदवार के लिए फारूख अब्दुल्ला और गोपालकृष्ण गांधी का नाम प्रस्तावित किया। यह सब सामूहिक परामर्श के बिना हो रहा था। नतीजतन इन दोनों ने भी इंकार कर दिया। 

इस प्रकार, बीस दलों वाले यूपीए गठबंधन को शुरुआत में ही हार का सामना करना पड़ा क्योंकि वे एक अदद उम्मीदवार को खोज पाने में असमर्थ थे। अंत में, ममता ने फिर से अपनी बात उछली और किसी तरह राष्ट्रपति चुनाव में अपनी पार्टी को आगे की स्थिति में लाने में कामयाब रहीं। वह उस अवसर का लाभ उठाना चाहती थीं जब कांग्रेस अपनी लड़ाई लड़ रही थी और इसलिए उन्होंने अपनी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष यशवंत सिन्हा को इस्तीफा देने और विपक्ष के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने के लिए कहा, जिसे उन्होंने खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। 

यूपीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा और एनडीए की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू

कांग्रेस पार्टी ने जयराम रमेश और मल्लिकार्जुन खड़गे को ममता बनर्जी द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में भाग लेने के लिए भेजा था और अंत में सिन्हा के नाम पर सहमति व्यक्त की थी। तथ्य यह है कि बहस करने का समय नहीं था, क्योंकि कांग्रेस खुद अपने संकट में थी और वजह यह कि राहुल गांधी से प्रवर्तन निदेशालय पूछताछ कर रहा था। 

हम और आप जिसे भाजपा कहते हैं, सच तो यह है कि वह प्रतिनिधित्व की राजनीति में अपने विरोधियों से कहीं बेहतर सफल हुई है। एक संथाल आदिवासी द्रौपदी मुर्मू का एनडीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए चुनाव का राजनीतिक महत्व बहुत अधिक है और जो उनका विरोध करते हैं उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। भाजपा दो सबसे शक्तिशाली सहयोगियों, ओडिशा से नवीन पटनायक और आंध्र प्रदेश से जगनमोहन रेड्डी को अपने पक्ष में लाने में सफल रही। यहां तक कि अन्य गैर-एनडीए दलों के लिए भी मुर्मू का विरोध करना मुश्किल होगा। यह भारतीय इतिहास में पहली बार है कि कोई आदिवासी और वह भी महिला भारत की राष्ट्रपति बनेंगीं। इसका एक बड़ा प्रतीकात्मक मूल्य है। हम इसे स्पष्ट रूप से यह कहकर कम नहीं आंक सकते कि वह आदिवासियों के लिए क्या करेंगी। लेकिन हेमंत सोरेन के लिए झारखंड में उनका विरोध करना मुश्किल होगा, क्योंकि जब वह राज्यपाल थीं, तो उन्होंने छोटा नागपुर काश्तकारी-सीएनटी अधिनियम, 1908, में संशोधन पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था, जब रघुवर दास ने जंगल में आदिवासी अधिकारों की रक्षा करने वाले मूल अधिनियम को बदलने की कोशिश की थी। झारखंड में इसके खिलाफ बहुत विरोध हुआ और अंततः राज्यपाल ने इस पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया।

अनेक लोग द्रौपदी मुर्मू द्वारा शिव मंदिर में झाड़ू लगाने को लेकर सवाल उठा रहे हैं। जबकि यह सभी जानते हैं कि राजनेतागण अपनी सियासत के तहत इस तरह का आचरण करते ही हैं। क्या हम भूल गए हैं कि भूतपूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने अकाल-तख्त के सर्वोच्च निकाय के निर्देशों का पालन किया, जिसने उन्हें तन्खैया घोषित किया और इसलिए प्रायश्चित करने के लिए उन्होंने हरमंदिर साहब में आने वाले भक्तों के जूते साफ किए। वहीं प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने राष्ट्रपति भवन मे ब्राह्मणों को बुलाकर उनके पैर धोए थे। तब तो ब्राह्मण वर्गों ने उनके उपर कोई सवाल खड़ा नहीं किया था। मेरे हिसाब से व्यक्तिगत निष्ठा पर ज्यादा सवाल करने से कुछ लाभ नहीं है। हांलाकि यह उम्मीद करनी चाहिए कि द्रौपदी मुर्मू अपनी व्यक्तिगत आस्था के प्रश्न को व्यक्तिगत ही रखेंगी। वैसे यह भी उम्मीद से ज्यादा है, क्योंकि आज जब हर बात का राजनीतिकरण है तो सत्ताधारी उनके धार्मिक मूल्यों की भी मार्केटिंग करेंगे ही। 

आप भाजपा या आरएसएस को दोष नहीं दे सकते कि वे आदिवासियों के साथ क्यों काम कर रहे हैं। यह उनका दीर्घकालिक कार्यक्रम है और वे वर्षों से वहां काम कर रहे हैं। आज उनके पास सरकार और सत्ता है, इसलिए उनकी पहुंच पहले ही बढ़ा दी गई है। लेकिन अब वे इतने मात्र से संतुष्ट नहीं हैं। भाजपा दीर्घकालीन राजनीति व अन्य लाभों को ध्यान में रखते हुए आदिवासियों के साथ अपने संबंधों को मजबूत करना जारी रखे हुए है। झारखंड, छत्तीसगढ़ , ओडिशा, महाराष्ट्र, तेलंगाना, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात में महत्वपूर्ण आदिवासी उपस्थिति है। इन राज्यों में निकट भविष्य में चुनाव होने हैं। राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने चुनावों के दौरान उत्तर प्रदेश के कई दौरे किये। कहना गैरवाजिब नहीं कि इसका लाभ भी भाजपा को इसी साल हुए विधानसभा चुनाव में अवश्य मिला। लेकिन कोविंद का प्रभाव सीमित था, क्योंकि दलित आबादी का राजनीतिकरण पहले ही हो चुका है। लेकिन आदिवासी मुद्दे के संदर्भ में स्थिति अलग हो सकती है क्योंकि आदिवासियों में राजनीतिक चेतना का विस्तार दलितों के जैसे नहीं हुआ है। 

मुर्मू को चुनकर जहां भाजपा और एनडीए को फायदा हुआ है। वहीं विपक्ष को यशवंत सिन्हा को चुनने से नुकसान। विपक्ष चाहता तो बेहतर विकल्प चुन सकता था। हालांकि यशवंत सिन्हा राजनीति के मंजे खिलाड़ी रहे हैं। उन्हें चंद्रशेखर द्वारा राजनीति में लाया गया था। फिर भी सिन्हा ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ अच्छे संबंध बनाए, जिन्हें उनकी आवश्यकता थी। वीपी सिंह के मंडल काल में सिन्हा विपक्षी खेमे में बैठे थे। सिन्हा के साथ समस्या यह थी कि वे खुद को अन्य राजनेताओं की तुलना में उनके बारे में जितना सोच सकते थे, उससे कहीं अधिक मानते थे। एक अभिमानी सवर्ण नेता, सिन्हा अल्पकालिक चंद्रशेखर शासन में वित्त मंत्री थे और फिर वाजपेयी ने उन्हें अपने मंत्रिपरिषद में शामिल किया। तब उन्होंने वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी निभायी। 

दरअसल, यशवंत सिन्हा वास्तव में आरएसएस से कभी अलग नहीं हुए और अरुण शौरी की तरह वह भी उम्मीद कर रहे थे कि मोदी उनका ख्याल रखेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और उन्होंने भाजपा को छोड़ दिया और अब मोदी की कार्यशैली के आलोचक बन गए। वह मोदी की आलोचना करते रहे हैं। यह तथ्य भी काबिले-गौर है कि उनके बेटे जयंत सिन्हा अभी भी भाजपा का एक महत्वपूर्ण पदाधिकारी है और 2014-19 के दौरान मोदी केबिनेट के सदस्य थे। ।

बहरहाल, विपक्षी दलों को राष्ट्रपति चुनाव को गंभीरता और अधिक समझ के साथ निपटना चाहिए था। लेकिन वे ऐसा करने में विफल रहे। शायद, ममता बनर्जी की अपने लिए एक केंद्रीय जगह बनाने की महत्वाकांक्षा को विपक्ष की कीमत चुकानी पड़ी। हालांकि संख्या पहले विपक्ष के पक्ष में थी, लेकिन यह स्पष्ट है कि यशवंत सिन्हा को विपक्ष के वोट भी नहीं मिल सकते क्योंकि अधिकांश क्षेत्रीय दल उन्हें वोट देने से पहले दो बार सोचेंगे। अगर उन्होंने दलित-आदिवासियों के लिए कुछ किया होता, तो पार्टियों को उनसे निपटने में परेशानी नहीं होती, लेकिन उनका अपना ट्रैक रिकॉर्ड कहीं नहीं है और इसलिए मुझे डर है कि उनके बहुत कम दोस्त रह जाएंगे।

(संपादन : नवल/अनिल)


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  1. J n Shah Reply

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