पलामू के आदिम जनजातियों के समक्ष कोरोना काल के उपरांत की चुनौतियां

कोरोना ने लोगों पर दोहरा हमला किया है। चूंकि पीवीटीजी पहले से ही अकुशल श्रमिक के रूप में काम करते है, इसलिए आदिवासी समुदाय के लिए काम ढूंढना और भी मुश्किल हो गया है क्योंकि मुख्यधारा के बहुसंख्यक कुशल लोगों को कोरोना ने अकुशल श्रम के रूप में काम करने के लिए मजबूर किया है। इसलिए पीवीटीजी परिवारों के रोजगार सृजन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। बता रहे हैं अच्छेलाल प्रजापति व तबरेज आलम

झारखंड भारत के पूर्वी भाग में स्थित पठारों, छोटी पहाड़ियों और जंगलों से युक्त प्राकृतिक सम्पदाओं के दृष्टिकोण से एक समृद्ध राज्य है। हालांकि इसके बावजूद, यह  कुपोषण, भुखमरी, बेरोजगारी, निरक्षरता, भ्रष्टाचारचार और लचर स्वास्थ्य सेवाएं जैसे चुनौतियों का सामना करता रहा है। खनिज संपदा के कारण यहां औद्योगिक विकास भी हुआ है लेकिन त्रासदी यह है कि यहां के मूलनिवासी पीड़ित रहे हैं। उन्हें विस्थापित होने के लिए मजबूर किया जाता रहा है। उनकी आजीविका के साधन बाधित किये जाते रहे हैं और उन्हें सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और राजनीतिक अधिकारों से वंचित किया जाता रहा है। इन तमाम दुश्वारियों के कारण लोगों को समाजिक-आर्थिक स्तर पर दुगनी चुनौतियों का सामना करना पड़ता रहा है। इनमें बड़ी संख्या में आदिवासी समुदायों के लोग हैं, जो कि यहां के मूलनिवासी हैं।

हाल ही में कोरोना महामारी ने इन हाशिए पर रहने वाले समूहों को इतनी बुरी तरह से प्रभावित किया है कि उनके पास अपने दैनिक जीवन को समुचित ढंग से संचालित करने  के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हैं।

जनांकिकीय संरचना 

भारत दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला देश है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या 121.08 करोंड़ है। वहीं झारखंड की जनसंख्या 3.29 करोड़ है। यहां 32 आदिवासी समूहों की करीब 75 लाख आदिवासी आबादी निवास करती है। इनमें 8 आदिवासी समूहों असुर, बिरहोर, बिरजिया, कोरवा, मल पहाड़िया, परहिया, सौरिया पहाड़िया और सबर की पहचान “विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह” (पीवीटीजी) के रूप में की गई है। इन समुदायों की आबादी करीब 2.92 लाख है। 

झारखंड के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित जिला पलामू की वही स्थिति है। 2011 की भारत की जनगणना के अनुसार, पलामू की जनसंख्या 19 लाख 39 हजार 869 है। आबादी के लिहाज से यह झारखंड के 24 जिलों में छठे स्थान पर है। यहां की आबादी में अनुसूचित जाति की 27.65 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति की 9.34 प्रतिशतहिस्सेदारी है।  यहां पीवीटीजी समूहों की आबादी काफी कम है। लेकिन जितने भी हैंं, बदहाली के शिकार हैं। वे अपनी आजीविका वनों और भूमि संसाधनों से प्राप्त करते हैं। उनमें साक्षरता का स्तर बहुत कम है और वे खराब स्वास्थ्य स्थितियों से रहने को मजबूर हैं। क्षेत्र अवलोकन के दौरान यह देखा गया है कि वे औपचारिक शिक्षा, आवास, स्वास्थ्य, परिवहन और पीने के पानी से वंचित हैं। जिले में पीवीटीजी की सामाजिक-आर्थिक स्थिति दयनीय है और इसका विश्लेषण उनके जीवन स्तर और दैनिक जीवन के संघर्ष से किया जा सकता है। 

प्रारम्भ में उनकी पहचान आदिम जनजातीय समूहों (पीटीजी) के रूप में की गई थी, जिन्हें बाद में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) नाम दिया गया। समकालीन विकसित समाज की दौड़ में भी इन समुदायों ने अब तक सामाजिक-आर्थिक विकास हासिल नहीं किया है और विभिन्न कारणों से प्रशासनिक सहायता के आभाव में बुनियादी ढांचा विहीन बस्तियों में अलग-अलग रहते हैं। हालांकि सरकार द्वारा संचालित कुछ योजनाएं जैसे डाकिया योजना, आदिवासी पेंशन योजना, आवास योजन आदि का लाभ इन समुदायों के लोगों को प्राप्त हो रहा है।  

दरअसल, पीवीटीजी के प्रमुख मुद्दों में पहला कदम उन्हें कानूनी मान्यता दिलाना है और यह कदम 1961 में ढेबर आयोग द्वारा उठाया गया था। पुनः 1969 में शीलू एओ टीम ने पीवीटीजी के सर्वंगीण विकास एवं उत्थान के लिए अलग केंद्रीय योजनाओं की आवश्यकता महसूस की। पीवीटीजी को चिन्हित करने के लिए कुछ दिशा-निर्देश तय करना भी आवश्यक था। आदिम जनजातीय समुदायों पर आयोजित कार्यशालाओं, सम्मेलनों के बाद  1975 में  कुछ दिशा-निर्देश तय किये गए। पांचवीं पंचवर्षीय योजना के बाद से केंद्र सरकार द्वारा कुछ खास पहल भी किये गए।

उत्तर-कोरोना काल का प्रभाव 

कोराेना महामारी संकट का प्रभाव धीरे-धीरे समाज के बड़े पैमाने पर गरीब और हाशिए के समुदायों को सामाजिक-आर्थिक रूप से प्रभावित करने लगा है। कोरोना काल में मजदूरों की घर वापसी के समय मजदूरों से पूछने से ज्ञात हुआ कि अधिकांश मजदूर कमजोर एवं हाशिये पर रहने वाले समुदाय से संबंध रखने वाले थे। कोरोना ने ग्रामीण या दूरस्थ क्षेत्रों के आय मानकों को गहराई से प्रभावित किया है। महामारी के कारण कई औद्योगिक इकाइयों और निर्माण स्थलों के कामकाज ठप्प हो गए। परिणामस्वरूप अधिकांश लोग बेरोजगार हो गए हैं। वहां कार्यरत कुशल श्रमिकों को अकुशल श्रमिक के रूप में काम करने के लिए मजबूर किया है। इस तरह कोरोना ने लोगों पर दोहरा हमला किया है। चूंकि पीवीटीजी पहले से ही अकुशल श्रमिक के रूप में काम करते है, इसलिए आदिवासी समुदाय के लिए काम ढूंढना और भी मुश्किल हो गया है क्योंकि मुख्यधारा के बहुसंख्यक कुशल लोगों को कोरोना ने अकुशल श्रम के रूप में काम करने के लिए मजबूर किया है। इसलिए पीवीटीजी परिवारों के रोजगार सृजन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

झारखंड के पलामू में एक आदिवासी परिवार

सरकारी योजनाओं का हाल 

आदिम कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) के आर्थिक विकास के लिए अनेक योजनाओं का क्रियान्वयन राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा किया गया है, जिसमें आधारभूत सुविधाओं के विकास पर बल दिया गया है। आवास, भूमि वितरण, भूमि विकास, कृषि विकास, पशुपालन, गैर-पारंपरिक जीवनयापन स्रोतों की स्थापना, ऊर्जा, जनश्री बीमा योजना सहित सामाजिक सुरक्षा या पीवीटीजी के व्यापक सामाजिक-आर्थिक विकास  जैसी गतिविधियों के लिए धन उपलब्ध करना शामिल है। संविधान के अनुच्छेद 275(1) के अनुसार जनजातीय उप-योजना (टीएसएस) को विशेष केंद्रीय सहायता (एससीए) योजनाओं के तहत पीवीटीजी को विशेष प्राथमिकता दी जाती है और अनुसूचित जाति के विकास के लिए काम करने वाले स्वैच्छिक संगठनों को सहायता अनुदान दिया जाता है। 

दिशा-निर्देशों के अनुसार, प्रत्येक राज्य/क्षेत्र प्रशासन को अपने क्षेत्र में प्रत्येक पीवीटीजी समुदाय के लिए लगभग पांच वर्षों के लिए एक व्यापक संरक्षण-सह-विकास (सीसीडी) योजना तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। पहलों की रूपरेखा में वित्तीय नियोजन और योजना को पूरा करने की जिम्मेदारी वाली एजेंसियों को शामिल किया जाएगा। अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 (एफआरए) पीवीटीजी परिवारों के वन और आवास अधिकार प्रदान करते हैं।

विशेष रूप से कमजोर जनजातिय समूहों (पीवीटीजीएस) की सुरक्षा व संरक्षण के लिए झारखंड सरकार ने भी अनेक नई योजनाओं की शुरूआत की है। जिसके तहत आदिम जन जाति के परिवारों को आदिम जनजाति खाद्यान्न योजना (डाकिया योजना), बिरसा मुंडा आवास योजना, बिरसा पेंशन योजना आदि के माध्यम से आधारभूत सुबिधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। उन्ही योजनाओं में एक योजना है डाकिया योजना। इस योजना से पहले राशन लेने हेतु पीवीटीजी समुदाय के परिवारों को पीडीएस डीलर की दुकान का चक्कर लगाना पड़ता था। लेकिन इस योजना के माध्यम से प्रत्येक माह उनके घरों तक नियमित रूप से अनाज पहुंचाया जा रहा है। हालांकि इस योजना में जमीनी स्तर पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। विभिन्न हितधारकों की भागीदारी व समुचित भागीदारी से, इन समस्याओं को कम किया जा सकता है और जो इसके लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। 

बहरहाल, कोरोना ने पूरी दुनिया को मानसिक और आर्थिक रूप से कमजोर और सामाजिक रूप से अलग-थलग कर दिया है। हालांकि पूरी दुनिया अब कोरोना से उबर रही है, लेकिन हाशिए पर रहने वाले समुदाय अभी भी रोजमर्रा की जिंदगी जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सबसे कमजोर हाशिए के लोगों के लिए स्थितियां अभी भी सामान्य नहीं हैं। उसमें भी, विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूह (पीवीटीजी) परिवारों को रोजगार प्राप्त करने के लिए संघर्ष करने जैसी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। झारखंड राज्य में जैसे-जैसे सामाजिक और आर्थिक गतिविधियां सामान्य हो रही हैं, अब हाशिए के लोग भी अपनी आजीविका के साधन खोजने के लिए पलायन करने लगे हैं। हालांकि, पीवीटीजी के बीच अभी भी मुख्यधारा के समाज के साथ मिलाने-जुलने में हिचकिचाहट अधिक है, जिससे उन्हें रोजगार प्राप्त करने तथा समुचित मजदूरी प्राप्त करने में अत्यधिक समस्याओं का सामाना करना पड़ रहा है। इस संबंध में  सरकारी और गैर-सरकारी एजेंसियों को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। अन्यथा पूर्व से ही सामाजिक एवं आर्थिक समस्याओं से  ग्रसित पीवीटीजी के लिए अस्तित्व का संकट उत्पन्न हो जायेगा, सभी PVTGs का अपनी भूमि और आवास के साथ एक सहज संबंध है तथा ये आत्मीय रूप में जल, जंगल, ज़मीन से जुड़े हुए हैं, इसलिए, किसी भी नीति निर्माण या विकास पहल के केंद्र में उनके जल, जंगल और भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए। पीवीटीजी को उनकी नाजुक जीवन स्थिति, विद्यमान सामाजिक-आर्थिक भेद्यता और घटती संख्या, सुरक्षा और संबर्धन हेतु विशेष और निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है। जिससे वे मुख्या धारा का हिस्सा बन एक मजबूत एव प्रगतिशील भारत का निर्माण कर सकें.

(संपादन : नवल/अनिल)


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  1. Pradeep kumar Reply

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