h n

अपनी जाति तक सीमित न रहें महाराष्ट्र के माली

माली समाज के लोगों को यह बात याद रखनी चाहिए कि सत्ता पाने के लिए मराठा समाज पहले ‘सत्यशोधक’ बना और बाद में कांग्रेस में जाकर बहुजन बना। बहुजन समाज की सभी जातियों ने मराठों को बड़ा भाई माना, जिसके कारण मराठा महाराष्ट्र में कम से कम 50 साल तक सत्ता में रहे। आज ओबीसी आंदोलन के माध्यम से माली जाति के लिए बड़ा अवसर चलकर आया है। बता रहे हैं श्रावण देवरे

महाराष्ट्र में ‘माली राजकीय मिशन’ नामक संगठन बनाया गया है। इस संगठन के तहत माली समाज के लोगों ने 2024 में अपनी जाति के 4 सांसद व 40 विधायक बनाने का लक्ष्य रखा है। सबसे पहले यह स्पष्ट कर दूं कि मैं किसी भी जातिगत संगठन का विरोध नहीं करता, क्योंकि हर जाति अपने आप में नाते-रिश्तेदारों का एक संगठन ही है। इसलिए जब तक जाति है तब तक जातिगत संगठन रहेंगे ही। किन्तु जब कोई जातिगत संगठन सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने का इच्छुक होता है तब उसका स्वरूप कैसा होना चाहिए? ध्येय व लक्ष्य कौन से होने चाहिए? उसके लिए कौन-सी विचारधारा स्वीकार की जानी चाहिए? उसकी रणनीति व कार्यक्रम क्या होने चाहिए, इन सबका गहराई से अध्ययन व विचार विमर्श करने के उपरांत ही कोई निर्णय लिया जाना चाहिए।

यह सच है कि जाति के नाम पर संगठन बनाना व एकाध कार्यक्रम करने के लिए ज्यादा कुछ कष्ट उठाने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि जाति का प्रत्येक कार्यक्रम यह “वर वधू सूचक” सम्मेलन से ज्यादा गंभीरता से कोई लेता नहीं। जाति का बैनर लगते ही 100-150 लोग सहज ही जमा हो जाते हैं। एक-दूसरे से पहचान बढ़ाते हैं तथा पुरानी पहचान को ताजा करते हैं। किसकी लड़की की शादी कहां हुई, किसकी शादी जम नहीं रही है, किसका तलाक हो गया, किसका लड़का शादी योग्य हो गया है, इस तरह की जानकारियां आपस में साझा करते हैं। हमारी भी लड़की शादी योग्य हो गई है, यह बात दो-चार लोगों के कान में डालकर लोग भोज आदि में शामिल होने के बाद लोग ऐसे कार्यक्रमों से निकलकर घर चले जाते हैं और चादर तानकर सो जाते हैं। खास यह कि भोजन के बाद 30-35 लोग भी नहीं बचते। मैं बीते 40-42 सालों से सामाजिक क्षेत्र में काम कर रहा हूं। अनेक जातियों के कार्यक्रमों में मुझे मार्गदर्शक-वक्ता के रूप में निमंत्रित किया गया है और इस कारण जातियों के कार्यक्रम कैसे होते हैं इसका मुझे अच्छा अनुभव है।

जाति का कार्यक्रम करने के लिए किसी विचारधारा के अभ्यास की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन किसी जाति को संगठित रूप से व्यापार, शिक्षण, राजनीति, समाज नीति जैसे विविध क्षेत्रों में जाना होता है तो उन्हें गहन अध्ययन व अभ्यास करके ही काम करना होता है। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है।

वर्ष 1917-18 में स्वतंत्रता आंदोलन की हलचल से अंग्रेजी हुक्मरानों ने अपनी रणनीति में कुछ बदलाव किया। परिणाम यह हुआ कि जनता के हाथ में सीमित सत्ता देने हेतु विधानसभाओं का गठन किया गया। विधानसभाओं में जनता के बीच से विधायक चुनकर जाते थे। उस समय स्वतंत्रता आंदोलन करने वाली कांग्रेस पार्टी पर ब्राह्मणों का वर्चस्व था, वे जनता के नेता के रूप में लोकप्रिय थे। इसलिए विधानसभा में बड़ी संख्या में ब्राह्मण विधायक ही चुनकर जाएंगे, इसमें कोई शंका नहीं थी। चुनाव मतलब राजनीति व राजनीति मतलब सत्ता, संपत्ति और प्रतिष्ठा, यह समीकरण मराठा समाज के ध्यान में आया और वे भी चुनाव की तैयारी में जुट गए। उन्होंने ताबड़तोड़ जातिगत संगठन “मराठा लीग” की स्थापना की। परंतु सिर्फ जाति का संगठन बनाने से कोई फायदा नहीं, क्योंकि उस वक्त के कांग्रेसी नेता बाल गंगाधर तिलक की अपार लोकप्रियता के सामने मराठों का टिकना मुश्किल है।, यह बात कुछ मराठा विद्वानों के जेहन में आयी। इसलिए मराठा समाज ने अपने लिए राजनीतिक आरक्षण की मांग की। उसके बाद दैनिक ‘केसरी’ के माध्यम से तिलक गरजे– “कुनबटों (कुनबियों) को असेंबली में जाकर हल चलाना है क्या?” तिलक की इस गर्जना से मराठे तात्कालिक रूप से थोड़ा हड़बड़ाए।

ब्राह्मणों ने जिस प्रकार स्वतंत्रता आंदोलन में घुसकर अपना वर्चस्व कायम किया, उसी प्रकार हमें भी किसी आंदोलन से जुड़कर राजनीतिक वर्चस्व निर्माण करना पड़ेगा, यह बात मराठा समाज के ध्यान में आते ही विकल्प की तलाश शुरू हुई। उस समय तात्यासाहेब जोतीराव फुले का सत्यशोधक आंदोलन जनमानस में काफी लोकप्रिय था। मराठों ने सत्यशोधक आंदोलन में शामिल होकर अपना सामाजिक वजन बढ़ाया एवं सत्यशोधक आंदोलन को ही ब्राह्मणेतर पार्टी बनाकर अपना राजनीतिक वर्चस्व भी बढ़ाया। यह बात ध्यान में आने पर कि ब्राह्मणेतर पार्टी के कारण हम सिर्फ विधायक ही बन पाएंगे, लेकिन सत्ता सिर्फ कांग्रेसी ब्राह्मणों के कब्जे में रहेगी, इस पर विचार करने के बाद मराठा समाज ने कांग्रेस में जाने का निर्णय लिया। कांग्रेस गांधी के कारण सर्वधर्मीय व सर्वजातीय होने से मजबूत बन चुकी थी। नतीजा यह हुआ कि कुछ मराठे सांसद भी हुए।

अब इससे कुछ बातें समझी जा सकती हैं। मराठे केवल मराठा-मराठा करते रहे होते तो उनके एक-दो विधायक भी न चुने जाते। इसी प्रकार माली समाज माली-माली करते रहा तो माली समाज का एक भी सांसद चुनकर नहीं जा पाएगा। जाति-व्यवस्था में एक जाति का अनुकरण दूसरी जाति तुरंत करती है। मालियों ने माली-माली किया तो धोबी जाति भी धोबी-धोबी करेगी, तेली जाति भी तेली-तेली करेगी, फिर किसी माली को अपना मत कौन देगा? और माली सांसद कैसे बनेंगे?

रहेगी एकता तभी सफल होगी ओबीसी की राजनीति

माली राजकीय मिशन का ध्येय व लक्ष्य एक ही है कि माली व्यक्ति ही चुनकर आना चाहिए, चाहे वह किसी भी पार्टी से हो! यह ध्येय तो और भी घातक है। यह तो अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारने जैसा है, क्योंकि अभी स्थापित पार्टियों की तरफ से जो बड़ी संख्या में विधायक सांसद चुनकर आते हैं, वे सभी पार्टियां मराठा व ब्राह्मणों की मालिकी की हैं। माली समाज के लोगों ने कांग्रेस अथवा राष्ट्रवादी कांग्रेस के टिकट पर खड़े माली को चुनकर भेजा तो वह मराठा व ब्राह्मण समाज की ही राजनीति मजबूत करेगा। राष्ट्रवादी कांग्रेस के सांसद अमोल कोल्हे माली हैं, फिर भी ‘मराठा समाज को ओबीसी में से आरक्षण देने की मांग’ इस माली सांसद ने की, क्योंकि वह पार्टी मराठों की है। उस पार्टी के सभी सांसद और विधायक मराठा समाज के हित के लिए काम करेंगे, फिर ओबीसी (या माली) गड्ढे में जाए तो भी चलेगा, किंतु मराठों का भला होना चाहिए, ऐसा ही विचार कोल्हे जैसे माली सांसद करते हैं। कांग्रेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस के कितने भी माली चुनकर भेज दो, फिर भी वित्तमंत्री व उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ही बनेंगे। अजीत पवार वित्तमंत्री बनने के बाद ओबीसी का इंपेरिकल डाटा इकट्ठा करने के लिए निधि नहीं देते, जिसके कारण ओबीसी का राजनीतिक आरक्षण खत्म हुआ। अजीत पवार ने ओबीसी का प्रमोशन में आरक्षण खत्म कर दिया। 

इतना बड़ा अन्याय होने के बाद भी माली जाति (ओबीसी) का एक भी सांसद-विधायक अजीत पवार के विरोध में नहीं बोल सका। सवाल है कि क्या ऐसे ही सांसद-विधायक ओबीसी का भला करेंगे? अब भाजपा के टिकट पर खड़े माली जाति के सांसद-विधायक उम्मीदवार को यदि समर्थन दिया तो माली-ओबीसी और ज्यादा गहरे गड्ढे में गिरेगा। वजह यह कि भाजपा में कितने भी माली/ओबीसी विधायक चुनकर आएं तो भी मुख्यमंत्री या तो कोई ब्राह्मण बनेगा या कोई मराठा।

क्या यह बात भूली जा सकती है कि देवेंद्र फडणवीस ने 2016 से 2019 के दरम्यान सत्ता में रहते हुए ओबीसी का इंपेरिकल डाटा इकट्ठा करने में टालमटोल किया, जिसके कारण ओबीसी का राजनीतिक आरक्षण संकट में आया। तो यह तो साफ है कि भाजपा, कांग्रेस, शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस, मनसे जैसी पार्टियों से कितने भी माली/ओबीसी विधायक बन जाएं, फिर भी माली समाज गड्ढे में ही जाएगा।

माली समाज के लोगों को यह बात याद रखनी चाहिए कि सत्ता पाने के लिए मराठा समाज पहले ‘सत्यशोधक’ बना और बाद में कांग्रेस में जाकर बहुजन बना। बहुजन समाज की सभी जातियों ने मराठों को बड़ा भाई माना, जिसके कारण मराठा महाराष्ट्र में कम से कम 50 साल तक सत्ता में रहे। आज ओबीसी आंदोलन के माध्यम से माली जाति के लिए बड़ा अवसर चलकर आया है। समस्त ओबीसी समाज माली जाति को बड़ा भाई मानता है। ऐसी परिस्थिति में मालियों को इस ओबीसी आंदोलन का नेतृत्व करना चाहिए। उन्हें ओबीसी संगठन में काम करना चाहिए। इस संगठन के पास फुले, शाहू जी महाराज और डॉ. आंबेडकर के विचारों का मजबूत आधार होना चाहिए। ऐसे संगठित होकर ओबीसी समाज राजनीति करें तभी बड़ी संख्या में ओबीसी समाज के सांसद-विधायक चुनकर आयेंगे और वे ही माली समाज सहित अन्य ओबीसी जातियों का भी भला करेंगे। 

(मराठी से अनुवाद : चंद्रभान पाल, संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

 

लेखक के बारे में

श्रवण देवरे

अपने कॉलेज के दिनों में 1978 से प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े श्रवण देवरे 1982 में मंडल कमीशन के आंदोलन में सक्रिय हुए। वे महाराष्ट्र ओबीसी संगठन उपाध्यक्ष निर्वाचित हुए। उन्होंने 1999 में ओबीसी कर्मचारियों और अधिकारियों का ओबीसी सेवा संघ का गठन किया तथा इस संगठन के संस्थापक सदस्य और महासचिव रहे। ओबीसी के विविध मुद्दों पर अब तक 15 किताबें प्राकशित है।

संबंधित आलेख

भारतीय समाज में व्याप्त पूर्व-आधुनिक सोच का असर
देश भर में दलितों, पिछड़ों और‌ आदिवासियों के नरसंहार तथा उनके साथ ‌भेदभाव एवं गैरबराबरी से इतिहास भरा पड़ा है और कमोबेश यह आज...
अंकिता हत्याकांड : उत्तराखंड में बढ़ता जनाक्रोश और जाति का सवाल
ऋषिकेश के जिस वनंतरा रिजार्ट में अंकिता की हत्या हुई, उसका मालिक भाजपा के ओबीसी प्रकोष्ठ का नेता रहा है और उसके बड़े बेटे...
महाकाल की शरण में जाने को विवश शिवराज
निश्चित तौर पर भाजपा यह चाहेगी कि वह ऐसे नेता के नेतृत्व में चुनाव मैदान में उतरे जो उसकी जीत सुनिश्चित कर सके। प्रधानमंत्री...
आदिवासी दर्जा चाहते हैं झारखंड, बंगाल और उड़ीसा के कुर्मी
कुर्मी जाति के लोगों का यह आंदोलन गत 14 सितंबर, 2022 के बाद तेज हुआ। इस दिन केंद्रीय मंत्रिपरिषद ने हिमालच प्रदेश की हट्टी,...
ईडब्ल्यूएस आरक्षण : सुनवाई पूरी, दलित-बहुजन पक्षकारों के तर्क से संविधान पीठ दिखी सहमत, फैसला सुरक्षित
सुनवाई के अंतिम दिन डॉ. मोहन गोपाल ने रिज्वांडर पेश करते हुए कहा कि सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग एक ऐसी श्रेणी...