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इंद्र मेघवाल हत्याकांड : मटकी छिपाने से नहीं छिपेगा जातिवादी घृणा का सच

खोजी पत्रकारिता के नाम पर काउंटर नॅरेटिव सेट कर लिया गया है, जिसमें न्याय के लिए आवाज़ उठा रहे लोगों को जातिवादी बताया जा रहा है, पानी की मटकी छूने की बात को स्पष्ट रूप से नकारा जा रहा है और यहां तक कहा जा रहा है कि आरोपी प्रधानाध्यापक छैल सिंह ने इंद्र कुमार मेघवाल के साथ मारपीट भी नहीं की। बता रहे हैं भंवर मेघवंशी

राजस्थान के जालोर जिले के सायला प्रखंड के सुराणा गांव के सरस्वती बाल विध्या मंदिर की तीसरी कक्षा के दलित छात्र नौ वर्षीय इंद्र कुमार मेघवाल की स्कूल के प्रधानाध्यापक छैल सिंह द्वारा की गई पिटाई के बाद इलाज़ के दौरान गत 13 अगस्त, 2022 को मौत हो गई। परिजनों द्वारा दर्ज करवाई गई प्राथमिकी में आरोप लगाया गया कि इंद्र कुमार ने प्रधानाध्यापक के लिए रखी पानी की मटकी से पानी पी लिया था, जिससे नाराज़ होकर हेडमास्टर ने 20 जुलाई को उसकी पिटाई की। इसके कारण अस्वस्थ हुए इंद्र कुमार को बागोडा, भीनमाल, डीसा, मेहसाणा, उदयपुर तथा अहमदाबाद, गुजरात के अस्पताल में चिकित्सा हेतु भर्ती करवाया गया। लेकिन 23 दिनों के दौरान छह अलग-अलग अस्पतालों में चले इलाज़ के बाद भी दलित छात्र को नहीं बचाया जा सका। उसने 13 अगस्त की सुबह 11 बजे अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में दम तोड़ दिया।

इस प्रकरण में सबसे पहला सवाल तो यही उठता है कि क्या शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव व्याप्त है? क्या आज भी सरकारी व निजी विद्यालयों में पानी पीने की अलग-अलग व्यवस्था बनी हुई है? क्या विद्यार्थियों व शिक्षकों के मध्य छुआछूत को स्वीकार किया जा सकता है? परिजनों ने तो स्पष्ट आरोप लगाया है कि इंद्र कुमार को पानी की मटकी को छूने की वजह से मरना पड़ा है, जबकि प्रधानाध्यापक के स्वजातीय लोग कह रहे है कि उक्त स्कूल में सभी लोग टंकी पर लगे नल से पानी पीते हैं। वहां कोई मटकी है ही नहीं। यह बात विद्यालय के विध्यार्थी और सभी शिक्षक कह रहे हैं, जिनमें ज़्यादातर दलित व आदिवासी हैं। विद्यालय में बड़ी संख्या में दलित छात्र भी पढ़ते हैं। उनका भी वही कहना है जो अन्य समुदायों के छात्र कह रहे हैं और यहां तक कि जालोर से भाजपा के विधायक जोगेश्वर गर्ग भी यही बात कह रहे हैं।

बताया यह भी जा रहा है कि इस विद्यालय के भागीदार अशोक जीनगर हैं, जो स्वयं दलित समुदाय से आते हैं। हालांकि एक न्यूज चैनल से बातचीत में अशोक जीनगर ने पार्टनर होने से इंकार किया है। एक आदिवासी शिक्षक, जो विगत चार माह से वहां पढ़ा रहे हैं, उनका कहना है कि वे प्रधानाध्यापक छैल सिंह के साथ ही रहते थे और खाते थे, कभी उन्होंने कोई भेदभाव नहीं किया। एक अन्य दलित शिक्षक गटाराम मेघवाल ने भी स्कूल में किसी भी प्रकार के जातीय भेदभाव से साफ़ इंकार किया है।

सबका सुर इतना सुनियोजित समवेत है कि पानी की मटकी तो थी ही नहीं? यह भेदभाव का मामला है ही नहीं? एक ऐसा भी विडियो सामने आया है, जिसमें सरस्वती बाल विद्या मंदिर में पढ़ने वाले विद्यार्थियों से एक जैसा जवाब देने के लिए रटवाया जा रहा था। मृतक छात्र के बड़े भाई नरेश मेघवाल ने पानी की मटकी होने और भेदभाव की बात कही है। मृतक छात्र के चाचा ने कहा है कि विद्यालय से जुड़े दो कमरे हैं, जिसमें छैल सिंह का आवास था। वहीं पर रखी मटकी से इंद्र कुमार ने पानी पीया था,और अब मटकी वहां से हटा दी गई है।

इस घटनाक्रम ने बहुत सारे सवाल खड़े किये हैं। सबसे बड़ा सवाल तो राजस्थान के बहुप्रचारित स्वास्थ्य मॉडल पर ही है। जिस चिरंजीवी योजना की बहुत बात हो रही है, क्या उसका धरातल पर अस्तित्व है? अगर है तो फिर अस्वस्थ इंद्र कुमार का राजस्थान में इलाज़ क्यों संभव नहीं हुआ? मृतक छात्र के पिता देवा राम को क्यों उसे छह अस्पतालों में लेकर घूमना पड़ा? इनमें तीन अस्पताल राजस्थान के थे तो तीन गुजरात के? बावजूद इसके भी इलाज़ नहीं हो पाया। क्या यह राजस्थान की दम तोड़ती स्वास्थ्य सेवाओं की निशानी नहीं है?

मटकी की प्रतीकात्मक तस्वीर

दूसरा सवाल राजस्थान के शिक्षा विभाग पर है, जिसने इस विद्यालय को मान्यता प्रदान कर रखी थी? एक अत्यंत जर्जर भवन में कैसे यह विद्यालय संचालित हो रहा है? इतनी असुरक्षित बिल्डिंग जो कभी भी बच्चों पर गिर सकती है? जिसके एक गंदे कोने में पानी की पुरानी टंकी बनी हुई है, जिसको कपड़े से ढंका गया है और जिसका एक नल इतना नीचे है कि छोटे बच्चों तक को पानी पीने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। जबकि शिक्षक अगर उसी नल पर पानी पिये तो उन्हें घुटने टेक कर पानी पीना पड़ेगा। जब यह बात सामने आई तो तुरत फ़ुरत एक ऊंचा नल फ़िट किया गया, ताकि बच्चों द्वारा टंकी से पानी पीने के दावे को सही साबित किया जा सके।

शिक्षक की पिटाई से छात्र की मौत हो जाने की बात को छोड़ कर कथित सर्व समाज जो कि वस्तुतः सवर्ण समाज है, “वह पानी की मटकी थी ही नहीं, भेदभाव वाली बात ग़लत है, जातिवाद की बात कहकर हमारे गाँव का भाईचारा बिगाड़ा जा रहा है, एक निर्दोष शिक्षक को फंसाया जा रहा है, जबकि शिक्षक ने तो बच्चे के इलाज के लिए डेढ़ लाख रुपए तक देने का समझौता किया था, ऐसी बातें कहते हुये” कथित तौर पर 36 क़ौम के लोगों ने सुराणा गांव में महापड़ाव डाल दिया है। यह सर्व समाज या छत्तीस क़ौम का बैनर दलितों की आवाज़ दबाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके पीछे हिंदुत्ववादी ताक़तें सक्रिय रहती हैं।

इस प्रकरण में अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित विधान सभा क्षेत्र जालोर के विधायक जोगेश्वर गर्ग की भूमिका संदिग्ध है। एक तरफ़ भाजपा के राष्ट्रीय व प्रादेशिक नेता दलित छात्र के मामले पर ट्वीट करके राजस्थान की कांग्रेस सरकार को घेर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ स्थानीय जनप्रतिनिधि, वह भी वे जो अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित सीट से चुने गये, का दलित मासूम की हत्या के आरोपी के पक्ष में खड़ा होना सबको आश्चर्यचकित कर रहा है? क्या जोगेश्वर गर्ग ऐसा जान बुझकर कर रहे हैं, या किसी एजेंडे के तहत उनसे ऐसा कहलवाया जा रहा है? 

जानकार लोगों का कहना है कि जोगेश्वर गर्ग सिर्फ़ तकनीकी तौर पर अनुसूचित जाति में हैं। मतलब कि वे काग़ज़ों में भले ही दलित हैं, लेकिन समाज में तो वे ब्राह्मण ही हैं। उनके समुदाय को भी गर्ग ब्राह्मण ही माना जाता है और उनके साथ कोई भेदभाव भी नहीं होता है। यह समुदाय भी दलितों से भेदभाव करता है। उनका छुआ नहीं खाता है और दलितों के यहां पुरोहिताई का काम करता है। वैसे भी जोगेश्वर गर्ग व्यक्तिगत रूप से पीड़ित मेघवालों को अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखते हैं और उनसे ख़फ़ा रहते हैं। उनको मेघवालों को नीचा दिखाने और अपने कथित उच्च जातीय समर्थकों की सहानुभूति पाने का यह बेहतरीन मौक़ा मिल गया है।

जोगेश्वर गर्ग जैसे दलित जन प्रतिनिधियों की संदिग्ध भूमिका यह सवाल खड़े करती है कि क्या आरक्षित सीटों से जीतकर आने वाले लोगों को पूना पैक्ट की निर्बल संतानें कहा जाना उचित नहीं होगा? आख़िर दलित समुदाय के जन प्रतिनिधि अन्याय, अत्याचार, शोषण और भेदभाव के मामलों में अपने समुदाय के साथ क्यों खड़े नहीं होते हैं?

सरस्वती बाल विद्या मंदिर में दलित छात्र से भेदभाव और प्रताड़ना के इस मामले ने दलितों को बेहद आक्रोशित किया है। मृतक छात्र के अंतिम संस्कार में शामिल होने और उसके परिजनों को न्याय दिलाने हज़ारों की तादाद में दलित युवा पहुंचे। सोशल मीडिया पर भी ज़बर्दस्त ग़ुस्सा देखने को मिला। पूरे राज्य में कैंडल मार्च, ज्ञापन और रैली व प्रदर्शन हो रहे हैं। राज्य की राजधानी जयपुर में स्थित राजस्थान विश्वविद्यालय में आमरण अनशन चल रहा है और चार युवा पानी की टंकी पर जा चढ़े और ठोस आश्वासन के बाद ही उतरे। दूसरी तरफ़ मृतक छात्र के घर पहुंचे लोगों पर पुलिस ने लाठीचार्ज करके जिस असंवेदनशीलता का परिचय दिया, उसकी चारों तरफ़ भर्त्सना की जा रही है, जिसमें मृतक के परिजनों को भी चोटें आईं।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के आदेश पर पुलिस ने आरोपी की त्वरित गिरफ़्तारी की है। साथ ही राज्य सरकार ने मृतक के माता-पिता को पांच लाख रुपए का मुआवज़ा दिया है। इसे अपर्याप्त बताते हुए परिजनों और सामाजिक संगठनों ने 50 लाख रुपए और एक परिजन को नौकरी तथा स्कूल की मान्यता रद्द करने के अलावा जिला मुख्यालय में रहने हेतु घर देने की मांग की है। राज्य सरकार ने इस पर विचार करने का ठोस आश्वासन दिया है। हालांकि मामले को तूल पकड़ता देख राज्य सरकार ने अपने मंत्रियों की पूरी फ़ौज को उतार दिया है। प्रदेश कांग्रेस ने मृतक छात्र के परिजनों को अपनी ओर से 20 लाख रुपए देने की घोषणा की है और परिजन को नौकरी देने हेतु राज्य सरकार को पैरवी करने का वादा किया है। 

बहरहाल, जालोर मटकी कांड पर सियासत भी हो रही है और आंदोलन भी। परिजनों को फ़ौरी तौर पर कुछ राहतें भी मिल पाई हैं, लेकिन इस मामले में न्याय मिले, इसकी उम्मीद अभी से धुंधलाती नज़र आ रही है। स्थानीय मीडिया में पुलिस द्वारा चयनित रूप से खबरें प्लांट की जा रही हैं। खोजी पत्रकारिता के नाम पर काउंटर नॅरेटिव सेट कर लिया गया है, जिसमें न्याय के लिए आवाज़ उठा रहे लोगों को जातिवादी बताया जा रहा है, पानी की मटकी छूने की बात को स्पष्ट रूप से नकारा जा रहा है और यहां तक कहा जा रहा है कि आरोपी प्रधानाध्यापक छैल सिंह ने मारपीट भी नहीं की। ऐसे में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि आख़िर इंद्र कुमार मेघवाल को किसने मारा? प्रधानाध्यापक के जातिवाद ने या फिर स्कूली सिस्टम में व्याप्त प्रताड़ना ने? स्वास्थ्य की लचर व्यवस्था ने या हमारे समाज और कथित धर्म में मौजूद जात-पात की घिनौनी व्यवस्था ने? और यह भी कि क्या आर्थिक मुआवज़ा और नौकरी तथा स्कूल की मान्यता रद्द कर देने भर से दलितों को सुरक्षा व गरिमापूर्ण ज़िंदगी का सपना पूरा हो पाएगा? अगर नहीं तो इस सबके लिए कौन ज़िम्मेदार है और उसकी सजा क्या है?

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

भंवर मेघवंशी

भंवर मेघवंशी लेखक, पत्रकार और सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता हैं। उन्होंने आरएसएस के स्वयंसेवक के रूप में अपना सार्वजनिक जीवन शुरू किया था। आगे चलकर, उनकी आत्मकथा ‘मैं एक कारसेवक था’ सुर्ख़ियों में रही है। इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद हाल में ‘आई कुड नॉट बी हिन्दू’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। संप्रति मेघवंशी ‘शून्यकाल डॉट कॉम’ के संपादक हैं।

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