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नजरिया : ओबीसी का धर्म

कुल समाज जब गणराज्य के रूप में संगठित हुआ, तब उस समय गणों के सभागृह में सबसे पहले जिस कानून का मंजूरी दी गई, वह कुल बाह्य विवाह का कानून था। इस प्रकार भारतीय मूलनिवासी समाज बाह्य विवाही था। यही बात डॉ. आंबेडकर भी कहते हैं। उदाहरण के लिए मेरा सरनेम देवरे है। देवरे कुल की कुल माता का नाम धनदाई माता है। बता रहे हैं श्रावण देवरे

इस देश के पिछड़े वर्ग (ओबीसी) के लोग कौन हैं? क्या वे हिंदू हैं, जैसा कि उनके बारे में बताया जाता है? आखिर ओबीसी का धर्म क्या है? दरअसल, ओबीसी एक संस्कृति है, क्योंकि मानव सभ्यता का विकास अनेक चरणों में संस्कृति के माध्यम से होता रहा है। सैकड़ों वर्षों के सांस्कृतिक दौर के बाद एक धर्म का दौर भी आता है। धर्म संस्कृति का एक छोटा सा हिस्सा होता है। श्रम से ही भौतिक वस्तुओं का निर्माण होता है। यही उत्पादन का मूल आधार है। यही श्रम संस्कृति आगे चलकर श्रमण संस्कृति बनती है। इसी श्रमण संस्कृति आगे चलकर जैन धर्म व बौद्ध धर्म की स्थापना होती है। ये दोनों धर्म शूद्रातिशूद्रों के धर्म थे, क्योंकि वे श्रमजीवी एवं सृजनशील थे। 

खेती की खोज महिलाओं द्वारा होने के कारण इस श्रमण संस्कृति की निर्माण करनेवाली महिलाएं रही हैं। भारतीय भूभाग में सिंधु घाटी में संस्कृति निर्मित होने की शुरुआत हुई। इस संस्कृति ने मातृसत्तात्मक कुल समाज को जन्म दिया। एक ही स्त्री से उत्पन्न स्त्री-पुरुषों की टोली अर्थात कुल समाज का निर्माण हुआ। स्त्रियां आदि माता और कुलमाता मानी गईं। हाथ के सहारे खेती करनेवाली यह कुलमाता अपने बच्चों में अनाज को समान रूप से बांटती थी, इसलिए यह कुल समाज समतावादी था। कुल समाज खेती करने के लिए नदियों के किनारे पहुंचा तो उपजाऊ जमीन होने के कारण उत्पादन बढ़ा। इस तरह कुल समाज का विकास हुआ। ऐसे ही अनेक मातृसत्तात्मक कुलों के विकास व संगठनों से आगे चलकर स्त्री सत्तात्मक गणराज्यों का निर्माण हुआ।

मसलन, पहले गणराज्य की स्थापना करनेवाली कुलमाता निॠति थीं। यह शोध सुप्रसिद्ध इतिहासकार शरद पाटिल किया है। कूचीदार लाठी की मदद से ‘हस्त खेती’ करनेवाला समाज स्त्री सत्तात्मक गण समाज के रूप में जाना जाता था। निॠति चौपट, अक्ष व शलाका का उपयोग करके गण जमीन का एवं धन का अपने कुल में समान बंटवारा करती थी। अपने गण का राजकाज चलाने के लिए उन्होंने दो सभागृहों की लोकतांत्रिक व्यवस्था विकसित की थी।

गण समाज के विकास के अगले क्रम में लकड़ी के हल की खोज हुई। पालतू पशुओं को हल में जोतने से खेती का विस्तार हुआ और उत्पादन बढ़ा। हल की खोज पुरुषों ने की, जिसके कारण खेती स्त्रियों से पुरुषों के हाथ में आ गई। खेती के विस्तार के साथ खेती में काम आने वाले आवश्यक सामानों व औजारों का भी विकास होने लगा। खेती के सामान व औजार निर्मित करने के लिए समाज में बढ़ई, लोहार, कुंभार जैसे समूहों का गठन होने लगा। इन उत्पादक समूहों की सशुल्क सेवा करने के लिए नाई, धोबी जैसे समाज घटकों का निर्माण होने लगा। ये सभी श्रमजीवी समाज घटक कृषि केंद्रित संस्कृति के निर्माता हैं। ये सभी श्रमजीवी समाज घटक आज के ओबीसी के पूर्वज हैं। बाहर से आए विदेशियों ने सिंधु संस्कृति को ‘हिंदू’ नाम से संबोधित किया, इसलिए आज के ओबीसी अपने पूर्वजों की गौरवशाली सिंधु-हिंदू संस्कृति के वारिस हैं।

ओबीसी समाज आज भी अपनी मातृ-संस्कृति को प्राण प्रण से मानते हुए उसे जीवित रखे हुए है। आज भी वह अपनी कुलमाता को भूला नहीं है। लकड़ी के हल की मदद से कृषि संस्कृति का विकास करने वाले बलिराजा की स्मृति आज भी जागृत है। कुल संस्कृति व गण संस्कृति के इतिहास के पदचिन्ह आज भी स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। मसलन, महाराष्ट्र में “96 कुली मराठा” एक वाक्य प्रसिद्ध है, उसका सादा सरल अर्थ है– “96 कुलों को मिलाकर बना हुआ मराठा गणराज्य”। महाराष्ट्र में पवार, भामरे, चव्हाण, सोनवणे, सपकाळे, खोब्रागड़े, कांबळे ऐसे 96 कुल हैं। इन सभी 96 कुलों की 96 कुल माताएं हैं। इन कुल माताओं का वर्ष में दो बार महोत्सव होता है। पहला अक्टूबर-नवंबर में और दूसरा अप्रैल-मई के महीने में। ये दोनों उत्सव खेती की फसल कटाई के बाद मनाए जाते हैं। दरअसल, खरीफ फसल में पैदा अनाज अपने कुल के लोगों में समान बंटवारे के लिए जो उत्सव मनाया जाता है वह अक्टूबर-नवंबर में और दूसरा रबी की फसल में पैदा अनाज के वितरण का उत्सव अप्रैल-मई महीने में। आज भी गांव के अलूतेदार (अपनी कारीगरी से खेती में सेवा देकर सहयोग करने वाले अधिकतर ओबीसी) और बलूतेदार (अपने श्रम से खेती में अपनी सेवा देकर सहयोग करने वाले अधिकतर दलित) अपना बलूत (मजदूरी) अनाज के रूप में लेने के लिए खलिहान में जमा होते हैं।

एक कुल के सदस्य ये सभी आपस में कुल बंधु व कुल बहन होते हैं। उनके बीच विवाह संबंध नहीं होते।

कुल समाज जब गणराज्य के रूप में संगठित हुआ, तब उस समय गणों के सभागृह में सबसे पहले जिस कानून का मंजूरी दी गई, वह कुल बाह्य विवाह का कानून था। इस प्रकार भारतीय मूलनिवासी समाज बाह्य विवाही था। यही बात डॉ. आंबेडकर भी कहते हैं। उदाहरण के लिए मेरा सरनेम देवरे है। देवरे कुल की कुल माता का नाम धनदाई माता है। धनदाई मतलब धन-धान्य देनेवाली। प्राचीनकाल में धन सोने-चांदी के रूप में नहीं, बल्कि अनाज के रूप में था। हमारे देवरे कुल की कुलमाता का मंदिर धुळे जिला के साक्री तहसील के म्हसदी गांव की सीमा पर है। वहां पर भी वर्ष में दो बार यात्रा महोत्सव होता है। 

सप्तश्रुंगी माता मंदिर, नासिक

उत्पादन के साधनों के विकास से व खेती के विस्तार से कुल समाज के विभिन्न व्यवसायों का वर्गीकरण हुआ। प्रत्येक कुल की अपनी खेती थी। खेती के विस्तार के लिए खेती के लिए लगने वाले आवश्यक सामानों व औजारों के निर्माण के लिए देवरे कुल के कुछ लोग बढ़ई बने, कुछ देवरे लोहार बन गये। तो कुछ कुंभार और कुछ चमार बने। ऐसे ही इस कुल की सेवा करने के लिए कुछ देवरे नाई बने, कुछ धोबी बने। इसीलिए आज भी देवरे सरनेम कुनबी, माली, तेली, सोनार, बढ़ई, लोहार, कुंभार, चमार, महार जैसी सभी जातियों में मिलते हैं। ये सभी जातियों के देवरे आज भी धनदाई माता की यात्रा में इकट्ठा जमा होते हैं और अपनी कुलमाता का उत्सव हर्षोल्लास से मनाते हैं। देवरे कुटुंब की सुख समृद्धि व बाल-बच्चों की सुख संपन्नता के लिए आदि माता से मनौती मांगते हैं और वह चढ़ाने के लिए यात्रा में इकट्ठा होते हैं।

विभिन्न जातियों के ये सभी देवरे एक ही कुलमाता की संतान होने के नाते एक दूसरे से दूध का संबंध अर्थात भाई-बहन होते हैं। इस प्रकार कुल संस्कृति ने हमें मां और संतान के रूप में संसार का पहला पवित्र नाता दिया। दूसरा पवित्र नाता दिया भाई-बहन का। मातृसत्तात्मक वह स्त्री सत्तात्मक गण समाज में पति-पत्नी यह संबंध ही नहीं होने के कारण पिताका कोई संबंध ही नहीं था। मातृवंशक पुरुष सत्तात्मक समाज के निर्माण के बाद ही पति-पत्नी का संबंध अस्तित्व में आया।

शुरुआत के समय में एक ही कुल के स्त्री-पुरुष आपस में शारीरिक संबंध बनाते थे। उससे होने वाली संतानें दुर्बल एवं शारीरिक अपंगता की शिकार होती थीं। यह ध्यान में आने के बाद स्त्रीसत्तात्मक गण समाज में कुल बाह्य विवाह का कानून बनाया, जिसके अनुसार एक ही कुल के स्त्री-पुरुषों में शारीरिक संबंध पर पाबंदी लगी।

आज के विज्ञान ने कुल बाह्य विवाह का यह संशोधन मान्य किया है। इससे अपना यह सिंधु-हिंदू संस्कृति का प्राचीन गण समाज कितना विज्ञानवादी था, इसका प्रमाण मिलता है। ओबीसी बहुजन समाज आज भी कुल बाह्य विवाह कानून का अक्षरशः पालन करता है। जैसे मेरा सरनेम देवरे है इसलिए मैं देवरे सरनेम वाली लड़की से विवाह नहीं कर सकता क्योंकि वह लड़की मेरी कुल बहन है। परंतु मुझे विवाह के लिए देवरे कुल छोड़कर बाकी 95 कुल उपलब्ध हैं। मैं भामरे सरनेम वाली लड़की से विवाह कर सकता हूं, सोनवणे की लड़की से विवाह कर सकता हूं। आज भी विवाह के लिए बातचीत करते समय पहला सवाल क्या पूछा जाता है? मामा का कुल कौन सा है? अर्थात विवाह की इच्छुक लड़की के मामा का कुल यदि देवरे है तो लड़की की मां देवरे कुल में पैदा हुई है यानी लड़की भी देवरे कुल में पैदा हुई है। इसलिए देवरे सरनेम वाला व्यक्ति उससे विवाह नहीं कर सकता।

आज भी मां के कुल के आधार पर ही शारीरिक संबंध नकारे अथवा स्वीकारें जाते हैं। पुरुष सत्तात्मक समाज आने के बाद स्त्री विवाह करके दूसरे कुल में जाने के कारण मां का मूल जन्म कुल उसके भाई के नाम से जाना जाने लगा। इसीलिए मां का भाई अर्थात मामा का कुल पूछा जाता है।

96 कुल के लोग जब कुल बाह्य विवाह करने लगे तब सभी 96 कुल के लोग आपस में नाते रिश्तेदार बने। इस प्रकार अपनी सिंधु-हिंदू संस्कृति भी फली-फूली। इस सुखी व समृद्ध रही सिंधु-हिंदू संस्कृति को बाहरी आर्यों ने वर्ण-भेद के विचार से दूषित कर दिया। एक भाई दूसरे सगे भाई से जाति द्वेष करने लगा। कुनबी देवरे को और माली देवरे को नीचे समझने लगा। माली देवरे महार देवरे को अस्पृश्य समझता है। भाई-भाई का वैरी क्यों हुआ? 

वर्ष 1994 में हम देवरे कुल के कुछ लोगों ने धनदाई कुलमाता की यात्रा में “देवरे कुल धर्म परिषद” का आयोजन किया था। इस परिषद में हमने कुल धर्म को दुनिया के सभी धर्मों से पहले का धर्म कहा। इस कुल धर्म का उद्गम सिंधु संस्कृति में होने के कारण आगे चलकर विदेशियों के आगमन के बाद हिंदू नाम प्राप्त हुआ और उसे धर्म का स्वरूप प्राप्त हुआ। मूल सिंधु संस्कृति की नाल से जुड़ा हिंदू धर्म और बाद में आए आर्य आक्रमणकारियों द्वारा विकृत किए हुए हिंदू धर्म में जमीन-आसमान का अंतर है। वैसे भारत में अनेक आक्रमणकारी आए, लेकिन सबसे अधिक आक्रामक व विध्वंसक आर्य थे। उन्हें सिर्फ इस देश में आकर केवल बसना ही नहीं था, बल्कि उन्हें यहां अपना वर्चस्व भी स्थापित करना था। इसलिए उन्होंने सिंधु संस्कृति का विनाश करने की शुरुआत की। उन्हें यहां हंसी-खुशी से साथ-साथ रहना नहीं था, बल्कि मूलनिवासी सिंधु-हिंदू जनता का शोषण करके अय्याश का जीवन जीना था।

पहले ही वर्णित किया जा चुका है कि स्त्री सत्तात्मक गण समाज में खेती स्त्रियों के हाथ में था। उनसे क्षत्र वर्ण का आगाज हुआ। जबकि पुरुषसत्तात्मक समाज का वर्ण ब्राह्मण था। लकड़ी के हल से खेती करनेवाला मातृवंशी समाज के हाथ से खेती जब पुरुषों के हाथ में चली गई तब उनका वर्ण क्षत्रिय हो गया। जबकि ॠषि-पुरोहितों का वर्ण ब्राह्मण हो गया। स्त्रियां कार्य से व सत्ता के कामकाज से बाहर हो जाने के कारण वर्णहीन हो गईं।

पहले हस्त खेती से भरपूर उत्पादन न होने के कारण ‘टोली युद्ध’ में पराजित गणों के सदस्यों की हत्या कर दी जाती थी। लकड़ी के हल के कारण खेती का विस्तार संभव अवश्य हुआ परंतु उसके लिए अधिकाधिक मानव शक्ति की जरूरत थी। इसलिए टोली युद्ध में पराजित गण के सदस्यों की हत्या करने के बजाय उन्हें हल में जोता जाने लगा और उत्पादन बढ़ाया जाने लगा। इससे तीसरे दास वर्ण का निर्माण हुआ।

ठीक इसी दरम्यान आर्यों का आक्रमण शुरू हुआ। इन आक्रमणों का विरोध करने के लिए अनेक मूलनिवासी राजाओं ने युद्ध किया। दशावतार के वाराह, नरसिंह, वामन जैसे उनके अवतार दरअसल आर्य सेनापति थे। नरकासुर, हिरण्याक्ष और बलिराजा, जैसे मूलनिवासी सिंधु-हिंदू राजा आर्यों के आक्रमणों का डटकर मुकाबला कर रहे थे। लेकिन मूलनिवासियों में राम जैसे क्षत्रिय राजा भी थे, जो आर्य आक्रमणकारियों से जा मिले। क्षत्रिय सामंतवादियों की ब्राह्मणों का साथ देने की फितरत राम जितनी प्राचीन है, वह महाराष्ट्र में आज के एकनाथी रामायण तक पहुंचती है। राम के नेतृत्व में व विश्वामित्र के मार्गदर्शन में ताड़का और सूर्पनखा का स्त्री सत्तात्मक गण समाज व मंदोदरी का रावण शासित मातृवंशीय गण समाज नष्ट करके उसकी जगह पुरुष सत्तात्मक गण समाज स्थापित किया गया।

दशावतारों के युद्धों के कारण आर्यों की घुसपैठ स्थाई होती गई। उनकी बस्तियां स्थापित हो गईं। दशावतारी युद्धकाल समाप्त होने के बाद शांति पूर्ण सह-अस्तित्व का काल शुरू हुआ। इस काल में आर्यों ने ब्राह्मण वर्ण में घुसपैठ की । सर्वप्रथम उन्होंने मूलनिवासियों के तांत्रिकी श्रुति को विद्रूप करके वैदिक श्रुति का निर्माण किया। यज्ञ संस्थाओं का निर्माण करके आर्य ब्राह्मणों का वर्चस्व स्थापित किया गया। मूलनिवासियां का शोषण करने में राम जैसे राजाओं ने आर्य ब्राह्मणों को आश्रय दिया।

आर्यों के वैदिक साहित्य में वैदिक धर्म ऐसा कहीं भी उल्लेख नहीं है, क्योंकि धर्म नामक संस्था ही उस समय नहीं थी। इसलिए आर्य ब्राह्मण व मूलनिवासी भारतीयों के बीच का संघर्ष सांस्कृतिक ही था। गुलाम व शूद्रों के श्रम से भरपूर अनाज उत्पादन होने के कारण बाजार व व्यापार बढ़ा। चतुर्वर्णी व्यवस्था में खेती करनेवाले किसान व व्यापार करनेवालों को वैश्य वर्ण में मिला लिया गया। खेती करने के लिए औजार बनाने वालों बढ़ई, लोहार व सेवा करने वाले नाई, धोबी आदि को चौथे शूद्र वर्ण में धकेल दिया गया। यही शूद्र वर्ण आज का ओबीसी है। इस ओबीसी समाज को स्थायी तौर पर गुलाम बनाने के लिए सांस्कृतिक गुलाम बना दिया गया। उनकी सांस्कृतिक प्रेरणा नष्ट करने के लिए आर्यों ने ओबीसी बहुजनों का इतिहास विद्रूप किया।

एक उदाहरण बलिराजा का है। वे मूलनिवासियों के शासक थो। परंतु पुराण लिखते समय ब्राह्मणों ने इस तरह लिखा ताकि लड़ने का इतिहास ही नष्ट हो जाय। उन्होंने ऐसे लिखा जैसे ‘तुम्हारा बलिराजा हमसे लड़ा ही नहीं। बस तीन पग जमीन वामन नामक ब्राह्मण ने मांगी और बलिराजा ने संपूर्ण त्रैलोक्य का राज्य ही

ब्राह्मणों को दे दिया। इस तरह तुम्हारा बलिराजा बिना लड़े ही पराधीन हो गया। उसी प्रकार ओबीसी के लोगों को आज भी कहा जा रहा है कि वे उनसे बिना लड़े अपनी मेहनत की कमाई दान करके ब्राह्मणों की झोली में डाल दो! गुलामी का ऐसा ही पाठ पीढ़ी-दर-पीढ़ी गप्प के जैसे पुराणों के माध्यम से ओबीसी समुदाय के लोगों मन-मस्तिष्क में डाला गया। मूल रूप से देखें तो हिंदू नामक कोई धर्म नहीं, बल्कि विकासशील संस्कृति है। धर्म की व्याख्या के अनुसार हिंदू धर्म का कोई प्रमाण किसी ग्रंथ में नहीं है। कोई संस्थापक नहीं है। या फिर यरूशलम, मक्का-मदीना जैसा कोई एक पवित्र स्थल नहीं। कोई भी संहिता नहीं है, जिसकी प्रामाणिकता हो। 

मूल बात तो यह है कि सिंधु संस्कृति का आधार रही समतावादी मातृसत्तात्मक समाज जब भारत के अन्य भागों में विस्तारित होने लगी तब सिंधु यह प्रादेशिक नाम अपभ्रंशित रूप में हिंदू के रूप में व्यापक स्तर पर स्वीकारा गया। धर्म प्रमाणभूत ग्रंथों व प्रार्थना स्थलों में कर्मकांडी बनकर डुबकी लगाता है तो संस्कृति अपने अपने भौगोलिक प्रदेशों के नीति नियमों एवं आवश्यकतानुसार विकासशील प्रवाह होती है। गुलाम और शोषक का धर्म एक हो सकता है, लेकिन संस्कृति एक नहीं हो सकती।

शूद्र ओबीसी की संस्कृति सिंधु-हिंदू संस्कृति है व शोषक आर्य ब्राह्मणों की संस्कृति वैदिक संस्कृति है, जिसे सिंधु-हिंदू संस्कृति का विकृतिकरण कर अप्राकृतिक रूप से निर्मित कर दी गई है। शोषक शोषण करते समय गुलामों को यह एहसास दिलाता है कि तुम पराए नहीं हो, हम भी पराए नहीं हैं, हम सब एक ही हैं, हम सब हिंदू हैं। ऐसा वे अहसास दिलाते हैं। परंतु प्रत्यक्षत: सत्य नहीं है।

ब्राह्मण सिंधु-हिंदू संस्कृति के नहीं हैं। इसे कई प्रमाणों से साबित किया जा सकता है। वर्ष 1994 में संपन्न हुए ‘देवरे कुल धर्म परिषद’ में मैंने इस बारे में विस्तारपूर्वक बताया था–

1) “इडापिडा जाए! बलि का राज्य आए!!” – यह मनोकामना वाक्य आज भी दीवाली-दशहरे पर ओबीसी बहुजन महिलाएं बोलती हैं। अर्थात बलिराजा को आदर्श राजा माननेवाला ओबीसी बहुजन लगभग 95 प्रतिशत हैं और वे सिंधु-हिंदू ही हैं। परंतु साढ़े तीन प्रतिशत ब्राह्मण भी खुद को हिंदू कहते हैं तो वे बलिराजा को अत्याचारी क्रूर राजा मानकर दीवाली-दशहरे पर उसका खून क्यों करते हैं?

2) शूद्र ओबीसी कमर में धागा बांधते हैं, किंतु ब्राह्मण कंधे पर धागा डालकर उसे पवित्र धागा बताता है।

3) शूद्र अपनी चोटी कुलमाता को चढ़ाने के लिए रखता है, किंतु ब्राह्मण गांठ बांधने के लिए चोटी रखता है। शूद्र राजाओं का नाश करने के लिए प्रतिज्ञा लेते समय वह चोटी में गांठ बांधता है।

4) ओबीसी शूद्र कुल को वरीयता देते हैं। यह कुलमाता से आता है। वे आज भी मातृसत्तात्मक संस्कृति को मानते हैं। ब्राह्मण गोत्र को वरीयता देते हैं। यह पुरुष ॠषियों से आता है, क्योंकि ब्राह्मण पशुपालक पुरुष सत्तात्मक संस्कृति से आए हुए हैं और वे आज भी पुरुष सत्तावादी ही हैं।

5) विवाह तय करते समय शूद्र ओबीसी ‘मामा का कुल’ पूछते हैं, क्योंकि भाई-बहन के बीच विवाह नहीं हो सकता। इसका वे अत्यंत कड़ाई से पालन करते हैं। इसीलिए ओबीसी बहुजनों में मामा-भांजे एक ही कुल के नहीं हो सकते। ब्राह्मण विवाह के समय गोत्र पूछते हैं इसलिए ब्राह्मणों में मामा-भांजे एक ही कुल के हो सकते हैं एवं भाई-बहन में विवाह भी हो सकता है।

बतौर उदाहरण महाराष्ट्र के भूतपूर्व मुख्यमंत्री मनोहर जोशी अपनी ही के मंत्रिमंडल सदस्य (शिक्षा मंत्री) सुधीर जोशी के भांजे थे। ये दोनों एक ही कुल के थे। इसलिए उनके यहां विवाह भाई-बहन के बीच ही हुआ। 

6) कुछ अपवादों को छोड़कर कुल माता अर्थात मातृदेवताओं के मंदिर के गर्भगृह में ब्राह्मणों का प्रवेश निषिद्ध है। इनके गर्भगृह में ओबीसी-बहुजन पुजारी के रूप में प्रवेश कर सकते हैं, क्योंकि ओबीसी-बहुजनों के अधिकृत पुजारी गुरव (महाराष्ट्र में ओबीसी वर्ग में शामिल एक जाति) हैं, ब्राह्मण नहीं।

इस प्रकार आर्य ब्राह्मण विदेशी वैदिक धर्म के होते हुए भी सिंधु-हिंदू धर्म में जबर्दस्ती घुसपैठी बने हुए हैं। इसीलिए तात्या साहेब महात्मा जोतीराव फुले बारंबार आह्वान करते हैं कि भट्ट-ब्राह्मणों की गुलामी से शीघ्रातिशीघ्र मुक्त हो जाओ और समतावादी मातृसत्तात्मक संस्कृति का बलिराज अपने देश में लाओ! 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

श्रवण देवरे

अपने कॉलेज के दिनों में 1978 से प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े श्रवण देवरे 1982 में मंडल कमीशन के आंदोलन में सक्रिय हुए। वे महाराष्ट्र ओबीसी संगठन उपाध्यक्ष निर्वाचित हुए। उन्होंने 1999 में ओबीसी कर्मचारियों और अधिकारियों का ओबीसी सेवा संघ का गठन किया तथा इस संगठन के संस्थापक सदस्य और महासचिव रहे। ओबीसी के विविध मुद्दों पर अब तक 15 किताबें प्राकशित है।

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