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गांधी को आंबेडकर की नजर से देखें दलित-बहुजन

आधुनिक काल में गांधी ऊंची जातियों और उच्च वर्ग के पुरुषों के ऐसे ही एक नायक रहे हैं, जो मूलत: उनके ही हितों के लिए आजीवन काम करते रहे। ऊंची जातियों और उच्च वर्ग के पुरुषों ने उन्हें महात्मा और राष्ट्रपिता का दर्जा दिया। लेकिन डॉ. आंबेडकर ने प्रमाणों के साथ इसे खारिज किया। बता रहे हैं डॉ. सिद्धार्थ

वंचित तबकों की आंतरिक स्वीकृति के बिना वर्चस्वशाली तबकों का वैचारिक वर्चस्व कायम नहीं रह सकता है, क्योंकि वंचित तबके अक्सर बहुसंख्यक होते हैं और वर्चस्वशाली तबके अल्पसंख्यक। भारत के वर्चस्वशाली तबके (ऊंची जातियों के) के पुरुषों ने बहुसंख्यक दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और महिलाओं पर अपना वैचारिक वर्चस्व कायम करने के लिए बहुत सारे मिथकीय नायक गढ़े, मिथकीय साहित्य रचे, अपने मनोनुकूल ईश्वर की रचना की, धर्मशास्त्रों-पुराणों का निर्माण किया और इतिहास की अपने अनुसार व्याख्या की। वर्चस्व कायम करने और बनाए रखने की इस प्रक्रिया के हिस्से के रूप में इतिहास के विभिन्न कालों में ऐतिहासिक नायक भी गढ़े गए और उन्हें वंचित तबकों के मुक्तिदाता और नायक के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है तथा वंचित तबकों के एक बड़े हिस्से ने इसे स्वीकार भी कर लिया। 

आधुनिक काल में गांधी ऊंची जातियों और उच्च वर्ग के पुरुषों के ऐसे ही एक नायक रहे हैं, जो मूलत: उनके ही हितों के लिए आजीवन काम करते रहे। ऊंची जातियों और उच्च वर्ग के पुरुषों ने उन्हें महात्मा और राष्ट्रपिता का दर्जा दिया। 

आधुनिक भारतीय इतिहास में एक व्यक्ति ऐसा भी हुआ, जिसने गांधी की महानता और नायकत्व को किसी रूप में स्वीकार नहीं किया और उनके नायकत्व के हर रूप को हर स्तर चुनौती दी। इस व्यक्तित्व का नाम डॉ. आंबेडकर है। 26 फरवरी, 1955 को बीबीसी को दिए गए साक्षात्कार में डॉ. आंबेडकर ने गांधी के बारे में जो अंतिम बात कही है, वह इस प्रकार है, “मैंने अपने जीवन में कभी भी उन्हें महात्मा नहीं कहा। वे इस उपाधि के लायक नहीं थे, यहां तक कि नैतिकता के लिहाज से भी नहीं।” (आंबेडकर के नजर में गांधी और गांधीवाद, फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली, पृ. 159)  

गांधी और डॉ. आंबेडकर

डॉ. आंबेडकर की नजर में गांधी महात्मा के भेष में एक पाखंडी हैं। ‘क्या गांधी महात्मा है’ शीर्षक अपने लेख में वे लिखते हैं, “गांधी के शील के बारे में सोचकर मेरी यह राय बनी कि इस आदमी में पाखंड अधिक है। मेरी राय में उनके हर काम का शोर नकली सिक्के का है और उनकी विनम्रता ‘डेविड कॉपरफिल्ड’ के उराया हीप की विनम्रता की तरह है।” (वही, पृ. 124) वे आगे कहते हैं, “‘मुंह में राम, बगल में छुरी’ रखने वाले आदमी को यदि महात्मा कहा जाए, तो मोहनदास गांधी वास्तव में महात्मा हैं।” (वही, पृ. 125) 

भारतीय राजनीति में गांधी के पाखंड को समाप्त करने को डॉ. आंबेडकर एक बड़ी चुनौती मानते थे। उन्होंने लिखा, “आज राजनीति में आए गांधी के इस पाखंड को कैसे समाप्त किया जाए, यही इस समय का दूसरा महत्वपूर्ण सवाल है। हिंदू जनता को सही मार्ग पर आकर इस महात्मा के मनचाहे ताल पर नाचने की बजाय स्वतंत्र रूप से अपने विचार बनाने में शायद काफी समय लग सकता है।” (वही, पृ 126) आंबेडकर गांधी के बारे में सही राय बनाने की बात उस समय कह रहे थे। हकीकत यह है कि आज तक भारतीय समाज गांधी के बारे में सही राय कायम नहीं कर पाया, क्योंकि भारत में जिन हिंदू धर्म के ऊंची जातियों के पुरुषों का बौद्धिक वर्चस्व है, वे गांधी की तथाकथित महानता का गुणगान करते रहते हैं। 

आंबेडकर खुलेआम गांधी को विश्वासघाती कहते हैं। गांधी के बारे में ‘विश्वासघाती हैं गांधी’ शीर्षक से उनका लेख 26 नवंबर, 1938 को प्रकाशित हुआ था। यह गुजरात में उनका दिया हुआ भाषण है। इस भाषण में वे स्वीकार करते हैं कि गांधी के खिलाफ बोलना आसान नहीं, क्योंकि करोड़ों लोग उन्हें अवतारी पुरूष मानते हैं। फिर भी आंबेडकर साफ-साफ शब्दों में कहते हैं, “मेरे ऊपर यह आरोप लगाया जाता है कि मैं गांधी का विरोधी हूं, मैं उन्हें नहीं मानता। यह बात बिलकुल सही है और गुजरात के इस मैंदान में गांधी के किले में आप सभी के सामने खुलेआम कह रहा हूं। यह कहते हुए मुझे कोई कठिनाई महसूस नहीं हो रही है। मैं यह बात अच्छी तरह जानता हूं कि गांधी के विरोध में बोलना आसान नहीं है। आज करोड़ों लोग उन्हें अवतारी पुरूष मानते हैं।” (वही, पृ. 116) 

गांधी के विरोध कारण बताते हुए वे लिखते हैं, “मैं गांधी का जो विरोध कर रहा हूं, वह मेरे अपने स्वार्थ के लिए नहीं है। यह महात्मा विश्वासघात करने वाले हैं, इसलिए मैं उनका विरोध करता हूं। उनके विश्वासघात के मेरे पास पर्याप्त प्रमाण है।” (वही, पृ. 117) इसके बाद वे विस्तार से गांधी के विश्वासघात के उदाहरण प्रस्तुत करते है, विशेषकर द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1932) में दलित वर्गों को पृथक प्रतिनिधित्व दिए जाने के अधिकार के संदर्भ में।

गांधी को आंबेडकर वैचारिक तौर पूरी तरह रूढ़िवादी हिंदू मानते थे। 26 फरवरी, 1955 को बीबीसी को दिए गए साक्षात्कार में उन्होंने कहा, “हां, वह पूरी तरह रढ़िवादी हिंदू थे। एक तो यह कि वह कभी सुधारक नहीं रहे, उनमें किसी तरह की कोई गतिशीलता नहीं थी और अस्पृश्यता के बारे में उनकी सारी बातें सिर्फ अछूतों का कांग्रेस में शामिल करने के उद्देश्य से थीं। दूसरे, वे चाहते थे कि अछूत उनके स्वराज आंदोलन का विरोध न करें। मुझे नहीं लगता कि इससे आगे बढ़कर वास्तव में उनका उत्थान करने का उनका [गांधी का] कोई मकसद था। वह संयुक्त राज्य अमेरिका के गैरिसन [अमेरिका के श्वेत व्यक्ति] की तरह नहीं थे, जिन्होंने नीग्रो के लिए संघर्ष किया।” (वही, पृ. 155) 

डॉ. आंबेडकर किसी अन्य की तुलना में गांधी को ज्यादा बेहतर तरीके से जानते थे। इसका वजह उन्होंने इन शब्दों में स्वयं बताई है, “मैं हमेशा कहता हूं, जब भी में उनसे मिला, एक प्रतिपक्ष की हैसियत से मिला, मुझे लगता है कि ज्यादातर अन्य लोगों की तुलना में मैं उन्हें बेहतर जानता हूं, क्योंकि उन्होंने मेरे ही सामने अपने जहरीले दांत खोले थे। मैं उस आदमी के भीतर झांक सकता था। आप जानते हैं कि आम तौर अन्य लोग उनके सामने उनके भक्तों की तरह जाते थे। ऐसे लोग उनका बाहरी रूप देखने के अलावा कुछ भी नहीं देख पाते थे। बाहरी तौर पर उन्होंने अपना बाना महात्मा के रूप में बना रखा था, लेकिन मैं उन्हें इंसान के तौर पर देखता था, बिलकुल उनके असली रूप में।” (वही, पृ. 153) भारत में डॉ. आंबेडकर ने ही गांधी को उनके असली रूप में देखा था। उन्होंने गांधी के पूरे व्यक्तित्व, जीवन-यात्रा और उनकी विचारधारा के बारे में 1945 में प्रकाशित अपनी किताब ‘ह्वाट कांग्रेस एडं गांधी हैव डन टू द अनटचेबिल्स’ में विस्तार से लिखा है। खासकर इसके दसवें और ग्यारहवें अध्याय में। दसवें अध्याय का शीर्षक ‘बीवेयर ऑफ मिस्टर गांधी’ और ग्याहरवे अध्याय का शीर्षक ‘दी डूम ऑफ दी अनटचेबिल्स’ है और इसका उपशीर्षक उन्होंने ‘गांधीज्म’ दिया है। हिंदी में गांधी संबंधी डॉ. आंबेडकर लेखन के अधिकांश हिस्से को फारवर्ड प्रेस ने ‘आंबेडकर की नजर में गांधी और गांधीवाद’ शीर्षक से प्रकाशित किया है। गांधी संबंधी अपने लेखन में डॉ. आंबेडकर ने विस्तार से गांधी के पूरे जीवन, व्यक्तित्व, विचारों, कार्यों और गांधीवाद की मूल तत्वों का विस्तार से विवेचित किया है। उन्होंने गांधी के संदर्भ में अपनी जो भी राय अभिव्यक्त की है, उसका विस्तार से प्रमाण दिया है। 

डॉ. आंबेडकर यह स्वीकार करते हैं कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद विरोध संघर्ष के अगुवा के रूप में गांधी भारतीय इतिहास के एक अध्याय हैं, लेकिन वे युग निर्माता नहीं हैं– “जहां तक भारत का प्रश्न है, मेरी परख के लिहाज से वे भारत के इतिहास के एक अध्याय थे, वे युग निर्माता कभी नहीं रहे।” (वही, पृ. 153) कुछ लोग कहते हैं कि संविधान सभा में शामिल होने, मंत्री बनने और गांधी की हत्या के बाद गांधी के बाद डॉ. आंबेडकर की राय बदल गई थी, लेकिन तथ्य इसके बिलकुल उलट है। इसका प्रमाण गांधी के बारे में 26 फरवरी, 1955 को बीबीसी को दिया गया उनका साक्षात्कार है। 

निश्चित तौर पर बहुसंख्यक दलित-बहुजनों को गांधी को वर्तमान के संदर्भ में समझने की आवश्यकता है ताकि वर्चस्वशाली तबकों के वैचारिक वर्चस्व को चुनौती मिले। इसकी दृष्टि हमें डॉ. आंबेडकर प्रदान करते हैं, जो तार्किक, वैज्ञानिक, तथ्यपरक और वस्तुपरक है। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सिद्धार्थ

डॉ. सिद्धार्थ लेखक, पत्रकार और अनुवादक हैं। “सामाजिक क्रांति की योद्धा सावित्रीबाई फुले : जीवन के विविध आयाम” एवं “बहुजन नवजागरण और प्रतिरोध के विविध स्वर : बहुजन नायक और नायिकाएं” इनकी प्रकाशित पुस्तकें है। इन्होंने बद्रीनारायण की किताब “कांशीराम : लीडर ऑफ दलित्स” का हिंदी अनुवाद 'बहुजन नायक कांशीराम' नाम से किया है, जो राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है। साथ ही इन्होंने डॉ. आंबेडकर की किताब “जाति का विनाश” (अनुवादक : राजकिशोर) का एनोटेटेड संस्करण तैयार किया है, जो फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित है।

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