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अंकिता हत्याकांड : उत्तराखंड में बढ़ता जनाक्रोश और जाति का सवाल

ऋषिकेश के जिस वनंतरा रिजार्ट में अंकिता की हत्या हुई, उसका मालिक भाजपा के ओबीसी प्रकोष्ठ का नेता रहा है और उसके बड़े बेटे को प्रदेश में ओबीसी आयोग का उपाध्यक्ष बनाया गया था। जाहिर तौर पर आरोपी रसूखदार हैं और शायद यही वजह रही कि पुलिस इस मामले में असंवेदनशील बनी रही। बता रहे हैं विद्या भूषण रावत

बहस-तलब

अंकिता हत्याकांड को लेकर उत्तराखंड मे जनाक्रोश की आग धधक रही है। अगर समय रहते राज्य सरकार ने ईमानदार कदम नहीं उठाए तो हिमालय के इस खूबसूरत क्षेत्र में असंतोष को और बढ़ा सकती है। यह देश की सुरक्षा के लिहाज से भी खतरनाक होगा, क्योंकि उत्तराखंड देश का सीमांत राज्य है। पिछले कुछ समय से उत्तराखंड मे किसी न किसी कारण से व्यापक असंतोष है। आगामी 2 अक्टूबर को उत्तराखंड बंद का आहवान लोगों ने किया है। स्थानीय लोगों के अनुसार भाजपा इस राज्य को नहीं चला पा रही है, जिसके चलते कानून व्यवस्था की स्थिति खराब है। महिलाएं अब सुरक्षित महसूस नहीं करतीं। यह बेतरतीब रूप से बढ़ते पर्यटन के कारण भी हुआ है।

 

क्या हुआ था अंकिता के साथ?

ऋषिकेश के वनंतरा रिज़ॉर्ट मे परिचारिका (रिसेप्शनिस्ट) के पद पर कार्यरत 19 वर्षीया अंकिता भंडारी की हत्या से उपजे सवालों ने उत्तराखंड की जनता में आक्रोश पैदा कर दिया है। अंकिता श्रीनगर गढ़वाल के पास के एक गांव श्रीकोट से पढ़ी और उसने हाई स्कूल तथा इंटर में 80 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त किए। उसके बाद एक वर्ष का होटल मैनेजमेंट में डिप्लोमा किया। अभी उसे नौकरी जॉइन किए 22 दिन भी नहीं हुए थे कि उसकी गुमशुदगी की खबर उसके परिजनों को दी गई। यह खबर उन्हें रिज़ॉर्ट के मालिक पुलकित आर्य ने दी। 

बेहद घबराए हुए उसके पिता 150 किलोमीटर दूर गांव से ऋषिकेश आए तो पुलिस ने उनकी अर्जी इसलिए खारिज कर दी कि ये उनके अधिकार क्षेत्र का मामला नहीं है और उन्हें पटवारी के पास शिकायत दर्ज करवानी पड़ेगी। 

दरअसल उत्तराखंड देश का अकेला राज्य है जहां अभी भी अधिकांश हिस्से में राजस्व पुलिस ही पुलिस का काम करती है तथा इसके बादशाह गांव के पटवारी होते हैं। जब अंकिता के पिता वहां के पटवारी से मिले तो वह छुट्टी पर था और एक दूसरे पटवारी ने रिपोर्ट लिखी। उनकी परेशानी बढ़ती जा रही थी लेकिन फिर जब सोशल मीडिया पर हंगामा शुरू हुआ तो जिला अधिकारी ने लक्ष्मण झूला थाने को इसकी जांच करने को कहा। जब पुलिस हरकत में आई तो कई संदेहों की बुनियाद पर होटल के मालिक पुलकित आर्य सहित दो अन्य लोगों जो उसके मैनेजर और कर्मचारी थे, को गिरफ्तार कर लिया। जब तक यह हुआ तब तक अंकिता के गायब होने और गंगा नहर मे डूबा दिए जाने की खबर पूरे उत्तराखंड मे आग की तरह फैल चुकी थी। लोगों ने सरकार से सवाल पूछने शुरू कर दिए। अगले दिन चीला नहर में पुलिस को बहुत मशक्कत के बाद अंकिता का शव बरामद हो गया और उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया। इस बीच मे पुलिस ने आरोपियों को लेकर न्यायालय में प्रस्तुत किया। रास्ते में महिलाओं की एक भीड़ ने पुलिस की गाड़ी को रोककर उन्हें मारा-पीटा तथा उनके कपड़े फाड़ दिए। 

पुलिस की कार्यशैली पर सवाल

सामान्य तौर पर ऐसे संगीन मामलों में पुलिस आरोपियों को न्यायालय में प्रस्तुत करने के बाद उन्हें अपनी रिमांड में लेने का अनुरोध करती है। ऐसा इसलिए किया जाता है कि ताकि पुलिस आरोपियों से पूछताछ कर सके। लेकिन अंकिता के मामले में पुलिस ने ऐसा नहीं किया और न्यायालय ने तीनों आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या स्थानीय पुलिस ने आरोपियों से पर्याप्त पूछताछ कर लिया था और आगे पूछताछ करने की जरूरत नहीं रह गई थी या पुलिस उन्हें बचाना चाहती थी?

अभी तक स्थानीय पुलिस द्वारा इस मामले में आगे की जानकारी नहीं दी गई है।। पहले तो जनता के आक्रोश को दूर करने के लिए वनंतरा रिज़ॉर्ट पर बुलडोजर चला दिया गया, लेकिन जब खबर आई कि इससे सब सबूत नष्ट हो जाएंगे या हो गए तो फिर सभी इस बात से मुंह मोड़ने लगे कि रिज़ॉर्ट पर बुलडोजर चलाने का आदेश सरकारी था। 

किसका सबूत मिटाने के लिए चलाया गया बुलडोजर?

हकीकत यह है कि इसके पहले मीडियाकर्मियों से बातचीत में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने खुद कहा था कि अपराधियों के घर पर बुलडोजर चलाने का आदेश कर दिया गया है। लेकिन अगले दिन अधिकारियों ने इस बात से इनकार कर दिया। 

सवाल यह है कि आखिर किसके आदेश पर बुलडोज़र चलाया गया और इससे भी बड़ा सवाल यह कि बुलडोजर केवल उसी कमरे में चलाया गया, जिसमें अंकिता रहती थी? 

इसका मतलब साफ है कि किसी ने यह कार्यवाही जानबूझकर की है। वैसे पुलिस अधिकारी ये बता रहे हैं कि उन्होंने रिज़ॉर्ट मे बुलडोजर चलाने से पहले ही सारी जांच पूरी कर ली थी और सबूत भी इकट्ठा कर लिये गये थे। साथ ही पूरे अपराध स्थल की विडियोग्राफी भी हुई है।

आखिर लोग इतने गुस्से मे क्यों है?

अंकिता के माता-पिता आर्थिक रूप से गरीब हैं। हालांकि वे राजपूत जाति के हैँ। उत्तराखंड में इस जाति को प्रभावशाली जाति माना जाता है और स्वयं मुख्यमंत्री भी इसी जाति से आते हैं। इसके बावजूद अपनी बेटी की गुमशुदगी की प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए उन्हें जलील किया गया। यह आरोप भी लग रहे हैं कि पटवारी विवेक प्रताप जान-बूझकर छुट्टी पर चला गया और फिर तीन दिन बाद दूसरे पटवारी ने रिपोर्ट लिखी। क्या यह पुलिस की कार्यशैली पर सवाल नहीं उठाता और यह कि किन कारणों से घटना स्थल को भी सुरक्षित नहीं रखा गया? पुलिस अपनी रपट में नहीं बता रही है कि क्या अंकिता के साथ कोई दुष्कर्म हुआ था या उसकी केवल हत्या कर दी गई। यहां तक कि यह बात भी नहीं बताई जा रही है कि उसकी हत्या कब हुई।

अंकिता हत्याकांड के विरोध में प्रदर्शन करतीं महिलाएं

उत्तराखंड की पुलिस की असंवेदनशील कार्यशैली की वजह से जनता में यह संदेश चला गया कि प्रशासन और सत्ताधारी भाजपा सब मिलकर पुलकित आर्य को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। 

ध्यातव्य है कि पोस्टमार्टम की प्रारंभिक रिपोर्ट में बताया गया है कि अंकिता की मौत नदी में डूबने पर सांस लेने की प्रक्रिया बाधित हो जाने से हुई। जिन लोगों ने अंकिता के शव को चीला बैराज से निकाले जाते समय देखा था, उनका कहना था कि शव फुला हुआ नहीं था और वह पांच दिन पुराना नहीं लग रहा था। लोग यह मानते हैं कि यदि शव पांच दिन पुराना होता तो गंगा नहर बैराज की बड़ी-बड़ी मछलियां उसे खा जातीं। 

अंकिता के चैट से मिल रहे नये संकेत

दूसरी बात जिसे लेकर स्थानीय लोगों में आक्रोश है, वह उसकी दोस्त पुष्प के साथ चैट है, जिसमें वह कह रही है कि उसके ऊपर ‘वीआईपी’ अतिथि को स्पेशल सर्विस देने का दबाव दिया जा रहा है। वह यह भी कह रही है कि उसे दस हजार रुपए तक की पेशकश की गई, जिसे उसने लात मार दी। वह चैट में कहती है कि वह गरीब हो सकती है, लेकिन अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करेगी। 

दरअसल, आज के दौर मे रंगीन और हसीन दुनिया के सपने देखने वाले युवा अक्सर ऐसे तिलिस्म का शिकार होते हैं। वे ‘बड़े’ और प्रसिद्ध लोगों के साथ ‘दिख’ जाने या संपर्क में आने के लिए ही समझौता कर लेते हैं। शायद रिज़ॉर्ट के मालिक को इस बात का अंदाजा रहा होगा कि शायद अंकिता भी इस बात के लिए समझौता कर ले, परंतु अंकिता ने कोई समझौता नहीं किया और शायद यही उसकी मौत का कारण बना। 

उत्तराखंड अपेक्षाकृत एक शांतिपूर्ण प्रदेश है। इसे भी दो हिस्सों मे बांटकर देखा जाना चाहिए। एक पर्वतीय क्षेत्र और दूसरा मैदानी क्षेत्र, जिसमें हरिद्वार, शहीद उधम सिंह नगर आदि जिले आते हैं, जहां की जातीय और सांस्कृतिक संरचना पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जैसी है। बाकी पर्वतीय क्षेत्र की स्थिति बिल्कुल उलट है। 

बनिया बिरादरी काे शह

बताया जा रहा है कि ऋषिकेश के जिस वनंतरा रिजार्ट में अंकिता की हत्या हुई, उसका मालिक भाजपा के ओबीसी प्रकोष्ठ का नेता रहा है और उसके बड़े बेटे को प्रदेश में ओबीसी आयोग का उपाध्यक्ष बनाया गया था। जाहिर तौर पर आरोपी रसूखदार हैं और शायद यही वजह रही कि पुलिस इस मामले में असंवेदनशील बनी रही। उत्तराखंड के पहाड़ों मे आर्य सरनेम शिल्पकार समाज के लोग लगाते हैं। यहा आर्य समाजियों का काफी प्रभाव रहा है और 1925-1930 के आसपास आर्य समाज ने दलितों के बीच काफी काम किया। इस कारण ही उत्तराखंड में दलित जातियों की बड़ी आबादी भी अपने नाम के पीछे आर्य शब्द लगाती है। 

जब इस घटना की पहली खबर आई तो मैं अपने एक मित्र से देहरादून में बात कर रहा था। वे काफी चिंतित थे, क्योंकि उन्हें लगा कि एक आर्य का नाम आरोपियों में आ जाने से दलितों के प्रति गुस्सा बढ़ सकता है। थोड़ी देर में मैंने जानकारी ढूंढ ली कि पुलकित आर्य के पिता भाजपा के ओबीसी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष रहे। मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ। लेकिन फिर पता चला कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बहुत से आर्य समाजी विशेषकर बनिए लोग भी अपना सरनेम आर्य लिखते हैं। पुलकित आर्य के बारे में यह बताया जा रहा है कि वह बनिया जाति का है। 

इन बातों से इतर दोनों बाप-बेटे भाजपा और सरकार मे महत्वपूर्ण पद पर कैसे पहुंच गए जबकि हरिद्वार और रूड़की के बीच में पिछड़ी जातियों में सैनी अधिक हैं। 

दो महीने में तीन बड़ी घटनाएं

उत्तराखंड में पिछले दो महीनों मे यह तीसरी बड़ी घटना हुई है। अल्मोड़ा में जगदीश की हत्या इसलिए कर दी गई थी क्योंकि उसने एक राजपूत जाति की लड़की के साथ प्यार किया। जगदीश शिल्पकार समाज से आता था और वह एक राजनीतिक कार्यकर्ता भी था। उनके विवाह को लड़की की मां का समर्थन भी था, लेकिन लड़की के सौतेले भाई और सौतेले पिता ने जगदीश की हत्या कर दी। जगदीश के लिए सामाजिक संगठनों ने आवाज उठाई लेकिन उत्तराखंड के मुख्यमंत्री और किसी भी पार्टी के नेताओं ने अपना मुंह भी नहीं खोला। अभी तक जगदीश की हत्या के मामले में पुलिस ने क्या कार्रवाई की, इसकी जानकारी सामने नहीं आ रही है। 

अभी 4 सितंबर को उत्तरकाशी के डूंड़ा तहसील में एक नाबालिग दलित बच्ची के साथ व्यभिचार की घटना सामने आई। लेकिन इस मामले में भी प्रशासन की कार्रवाई बेहद मुश्किल से हुई है। दुखद यह कि इस मामले को लेकर स्थानीय लोगों ने कोई संवेदना नहीं दिखाई। मीडिया के लिए भी यह खबर नहीं थी। 

जाति का प्रश्न

अंकिता हत्या कांड और जगदीश हत्याकांड मे एक बात कॉमन है कि उत्तराखंड में पट्टी-पटवारी व्यवस्था के दोनों शिकार बने और पुलिस कार्रवाई में बहुत समय लग गया। उत्तराखंड मे अब स्थितिया बदल रही हैं और बड़ी संख्या में लोग बाहर से आ रहे है। चूंकि गांव दूर दूर हैं और पहाड़ों में आबादी बहुत कम है, इसलिए निकट के राज्यों से रुसूखदार लोग इन इलाकों को अपनी ऐशगाह बना देना चाहते हैं। इस तरह देखें तो अंकिता भंडारी हत्याकांड के बाद उपजा जनाक्रोश पहली बार प्रदेश मे आर्थिक नीतियों के विरुद्ध आंदोलन भी है। साथ ही पर्यावरण का सवाल भी महत्वपूर्ण है। इससे पहले इसी वर्ष अगस्त महीने में हैलंग में घास काटने गई मंदोदरी देवी के साथ पुलिस के दुर्व्यवहार के विरुद्ध एक जनाक्रोश पैदा हुआ था और आज वह जनाक्रोश अंकिता हत्याकांड से और अधिक बढ़ गया है। हालांकि पर्वतीय क्षेत्रों मे दलितों के प्रति आज भी भेदभाव है लेकिन पिछले कुछ समय मे सामाजिक आंदोलनों ने उनके प्रश्नों को भी लेना शुरू किया है। इसके बावजूद वे अभी बहुत पीछे हैं और आरक्षण का प्रश्न सुनते ही लोग असंयमित हो जाते हैं। यह तो कहना ही होगा कि छोटे राज्य में सत्ताधारियों और राजनीतिक नेतृत्व का यह कर्तव्य है कि वह सभी समाजों को साथ लेकर चलें। 

बहरहाल, अंकिता हत्याकांड को लेकर जो आक्रोश पूरे राज्य में है, उसके राजनीतिक व सामाजिक मायने हैं। अंकिता के हत्यारों को सजा मिले और इसी तरह की मांग उत्तरकाशी में दलित नाबालिग के साथ बलात्कार के मामलें में भी की जानी चाहिए। 

अहम यह कि कानूनों के जरिए अपराध कम नहीं होते। उत्तरखंड मे विकास का जो मोडेल तैयार किया जा रहा है, वह अपराध बढ़ाएगा, क्योंकि पर्यटन के नाम पर देह व्यापार को बढ़ाने वाले बहुत ताकतवर हैं और सत्ता उन्हें बचा देती है। सरकार की पर्यटन नीति में लोगों की भागीदारी महत्वपूर्ण है और पुलिस तंत्र को जनता के प्रति ईमानदार और जिम्मेवार बनाना होगा। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विद्याभूषण रावत

विद्याभूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में 'दलित, लैंड एंड डिग्निटी', 'प्रेस एंड प्रेजुडिस', 'अम्बेडकर, अयोध्या और दलित आंदोलन', 'इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया' और 'तर्क के यौद्धा' शामिल हैं। उनकी फिल्में, 'द साईलेंस आॅफ सुनामी', 'द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल', 'अयोध्या : विरासत की जंग', 'बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तर प्रदेश' व 'लिविंग आॅन द ऐजिज़', समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

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