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अंतत: सवर्णों के पक्ष में आया एक सामाजिक न्याय विरोधी फ़ैसला

भाजपा ने पहले चरण में दलित, पिछड़े और अन्य पिछड़े जातियों के अंतर्विरोधों का फ़ायदा उठाया तथा अति दलित, अति पिछड़ी जातियों को साथ लेकर सत्ता पर मजबूती से कब्ज़ा कर लिया। उच्च जातियों का आरक्षण इसी दिशा में उठाया गया कदम है। सवर्ण गरीब किसी भी तरह से देश की आबादी के पांच से छः प्रतिशत से अधिक नहीं होंगे। उन्हें दस प्रतिशत आरक्षण देना कहां तक न्यायसंगत है? पढ़ें, स्वदेश कुमार सिन्हा यह विश्लेषण

बीते 7 नवंबर, 2022 को सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिलों और सरकारी नौकरियों में सवर्ण जाति के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करने वाले 103वें संविधान संशोधन को वैधता प्रदान कर दिया। दो के मुकाबले तीन मतों के बहुमत से पीठ ने इस आरक्षण को न सिर्पु बरकरार रखा बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि इस आरक्षण के दायरे में अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और पिछड़े वर्ग (ओबीसी) के गरीब शामिल नहीं किए जाएंगे। 

शीर्ष न्यायालय की संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा कि, “वर्ष 2019 में किया गया 103वां संविधान संशोधन भेदभाव वाला नहीं है और संविधान के मूल ढांचे‌ का उल्लंघन नहीं करता है।” पीठ ने कहा कि ”ईडब्ल्यू एस को अलग श्रेणी के रूप में देखना एक तर्कसंगत वर्गीकरण है और मंडल मामले के फ़ैसले के तहत कुछ आरक्षण पर पचास‌ प्रतिशत की सीमा गैरलचीली नहीं है।” इस संविधान पीठ की अध्यक्षता निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति यू.यू. ललित ने की और इसके सदस्यों में न्यायमूर्ति दिनेश महेश्वरी, न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति रवींद्र भट शामिल थे।

निवर्तमान प्रधान न्यायाधीश व न्यायमूर्ति रवींद्र भट ने अल्पमत वाले अपने फ़ैसले में इससे असहमति जताई। न्यायमूर्ति भट ने अपने और प्रधान न्यायाधीश ललित के लिए सौ पृष्ठों में फ़ैसला लिखा। न्यायमूर्ति भट ने कहा कि ”आरक्षण के लिए आर्थिक आधार पेश करना एक नये मापदंड के तौर पर अनुमति देने योग्य है, फिर भी एससी, एसटी और ओबीसी सहित सामाजिक तथा शैक्षणिक रूप से वंचित वर्गों को पूर्व से प्राप्त लाभ के आधार पर इसके दायरे से बाहर रखना नये अन्यायों को बढ़ाएगा।” प्रधान न्यायाधीश ने भी उनके विचारों से सहमति जताई।

इसके बावजूद कि संविधान पीठ का यह फैसला खंडित है, एक ऐसा महत्वपूर्ण फ़ैसला है, जो लंबे समय तक देश की राजनीति और समाज को गहराई से प्रभावित करता रहेगा। इसके पक्ष और विपक्ष में अनेक तर्क दिए जा रहे हैं। कांग्रेस और भाजपा से लेकर सपा, बसपा, राजद, जदयू सहित उत्तर भारत की लगभग उन सभी पार्टियों ने भी जो सामाजिक न्याय की राजनीति करने का दावा करती हैं, शीर्ष अदालत की संविधान पीठ का समर्थन किया है। कांग्रेस ने तो इसे मनमोहन सरकार की पहल का‌ नतीज़ा बताया। पार्टी के महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि, “यह संवैधानिक संशोधन 2005-06 में मनमोहन सिंह की सरकार द्वारा सिन्हो आयोग का गठन करके शुरू की गई प्रक्रिया का परिणाम है। इस आयोग ने जुलाई 2010 में रिपोर्ट दी थी, इसके बाद व्यापक रूप से चर्चा की गई और 2014 तक विधेयक तैयार कर लिया गया।” जयराम दावा किया कि केंद्र की भाजपानीत एनडीए सरकार को विधेयक को कानून की शक्ल देने में पांच साल का समय लगा। 

गत 7 नवंबर, 2022 को फैसला सुनाते सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के सदस्य (तस्वीर : सुप्रीम कोर्ट के द्वारा लाइव स्ट्रीमिंग से प्राप्त)

एक बात गौर करने की है कि कांग्रेस के घटक दल डीएमके पार्टी के तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने कहा कि “दाखिलों और सरकारी नौकरियों में ऊंची जाति के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग से संबंधित लोगों के लिए दस प्रतिशत आरक्षण पर उच्चतम न्यायालय का फ़ैसला सदियों पुराने सामाजिक न्याय के संघर्ष के लिए एक झटका है।” वहीं कांग्रेस के ही प्रवक्ता एवं अनुसूचित जाति और जनजाति प्रकोष्ठ के प्रमुख पूर्व सांसद उदित राज ने शीर्ष न्यायालय को ‘जातिवादी’ बतलाया। हालांकि बाद में उन्होंने यह भी कहा कि वे ईडब्ल्यूएस के लिए दस फीसदी आरक्षण के विरोधी नहीं हैं। 

इन अन्तर्विरोधी बयानों से यह सिद्ध होता है कि इस फ़ैसले को जितना सहज और स्वीकार्य समझा जा रहा है, उतना है नहीं। भविष्य में इसके पक्ष में खड़े अनेक राजनीतिक दल राजनीतिक रुख़ देखकर अपने फ़ैसले से पलट‌ भी सकते हैं। इस पर अभी आगे और बहसें चलती रहेंगी, लेकिन कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिनके ऊपर बहस अवश्य होनी चाहिए। मसलन, एससी, एसटी और ओबीसी को जो आरक्षण दिया गया था, उसके पीछे सामाजिक न्याय की अवधारणा थी। हज़ारों साल से इन जातियों को शिक्षा और रोज़गार से वंचित रखा गया, जिसके कारण वे आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक दृष्टि से काफी पिछड़ गए थे। वर्ष 1990 में मंडल कमीशन लागू होने से पहले कमोबेश यह स्थिति बनी हुई थी। लेकिन आरक्षण मिलते ही सरकारी नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी बढ़ी। 

आज भी उच्च न्यायपालिका में सवर्ण जाति के लोग ही बहुसंख्यक हैं। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि इसका प्रभाव उनके फ़ैसलों पर पड़ता ही होगा। यह अनेक उदाहरणों में देखा जा सकता है। जैसे 103वें संविधान संशोधन को चुनौती दिये जाने वाले इस फ़ैसले में इस बात को अनदेखा किया गया कि सामाजिक न्याय और समाज कल्याण दो अलग-अलग बातें हैं। सवर्ण वर्ग के गरीब भले ही आर्थिक रूप से पिछड़े हों, लेकिन वे सामाजिक दृष्टि से कदापि पिछड़े नहीं हैं। 

नब्बे के दशक में जब मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू हुई, तब मैंने और मेरे साथियों ने मिलकर इस विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया था, जिसमें अनेकसवर्ण वामपंथी प्रोफेसर तक योग्यता का हवाला देकर रिपोर्ट का विरोध कर रहे थे। उसी में भूगोल के प्रोफेसर रामनरेश राम ने महत्वपूर्ण बात कही थी कि “उच्च जाति के गरीब सवर्ण भी अपने संपर्कों के आधार पर सरकारी नौकरियां पा लेते हैं।” उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया था कि विश्वविद्यालयों में भारी पैमाने पर सवर्ण प्रोफेसरों के घर काम करने वाले नौकर भी उनके रिश्तेदार ही होते हैं। उनके घर नौकर का काम करते हुए भी वे पढ़-लिख लेते हैं तथा कई तो पीएचडी तक कर लेते हैं। अगर आप विश्वविद्यालय के कर्मचारियों को देखें, जिनमें चतुर्थ वर्ग के कर्मी तक शामिल हैं, अधिकांश इन्हीं लोगों के रिश्तेदार होते हैं। मंडल कमीशन इस वर्चस्व को काफी हद तक तोड़ेगा।

एक दूसरा उदाहरण बैंकिंग क्षेत्र का है, जहां ऊंची जाति के लोगों का शीर्ष पदों पर कब्जा रहा है। इन जातियों के बड़े अधिकरी अपने रिश्तेदारों को चतुर्थ श्रेणी में रखवा देते थे, बाद में वे विभागीय परीक्षा देकर क्लर्क तक बन जाते थे। कमोबेश यही हालात रेलवे तथा अन्य सरकारी नौकरियों में भी रही।

ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं। मंडल कमीशन की रिपोर्ट ने इस वर्चस्व को तोड़ने की‌ कोशिश की। अगर हम देखें तो सवर्ण जातियों की बौखलाहट का एक बड़ा कारण यह भी था। कांग्रेस और भाजपा मूलतः उच्च जाति के सवर्ण हिन्दुओं की पार्टी है। कांग्रेस में उदारवादी तत्वों के बहुतायत होने के कारण सवर्ण हिंदुओं ने भाजपा पर दांव लगाया, जिसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जबरदस्त नेटवर्क था, जो मूलतः एक बाह्मणवादी संगठन है। पिछले बिहार चुनाव में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का बयान सबको याद होगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि “आरक्षण की व्यवस्था अनंत काल तक नहीं चल सकती।” उनके इस बयान से भाजपा को बिहार के चुनाव में काफी नुकसान उठाना पड़ा था।

सवर्ण वर्ग को लगातार यह आशा बंधी रही कि भाजपा एक न एक दिन आरक्षण को समाप्त कर देगी। भाजपा ने पहले चरण में दलित, पिछड़े और अन्य पिछड़े जातियों के अंतर्विरोधों का फ़ायदा उठाया तथा अति दलित, अति पिछड़ी जातियों को साथ लेकर सत्ता पर मजबूती से कब्ज़ा कर लिया। उच्च जातियों का आरक्षण इसी दिशा में उठाया गया कदम है। सवर्ण गरीब किसी भी तरह से देश की आबादी के पांच से छः प्रतिशत से अधिक नहीं होंगे। उन्हें दस प्रतिशत आरक्षण देना कहां तक न्यायसंगत है? 

दूसरी बात यह कि वैसे तो हमारे देश में जाति का झूठा सार्टिफिकेट बनवाना कठिन है, लेकिन गरीबी का झूठा प्रमाणपत्र बनवाना‌ सबसे आसान है‌। जो जितना अमीर है, वह गरीबी का प्रमाणपत्र उतनी ही आसानी से बनवा सकता है। बहुजन समाज जब तक अपने अंतर्विरोधों को हल न‌ करके आपस में ही संघर्षरत रहेगा, तब तक इस तरह‌ के सामाजिक न्यायविरोधी फ़ैसलों के लिए उसे तैयार रहना होगा। देखना यह है कि इस फ़ैसले को पलटने के लिए अब कितने वर्ष या कितने दशक लगते हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

स्वदेश कुमार सिन्हा

लेखक स्वदेश कुमार सिन्हा (जन्म : 1 जून 1964) ऑथर्स प्राइड पब्लिशर, नई दिल्ली के हिन्दी संपादक हैं। साथ वे सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक विषयों के स्वतंत्र लेखक व अनुवादक भी हैं

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