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बहस-तलब : बाबाओं को क्यों बचाना चाहती है भारतीय मीडिया?

यह तो अब आम बात है कि बाबाओं की बड़ी फौज देश मे हर प्रदेश में खड़ी हो गई है। अब उनके पास न केवल जनबल है, अपितु धनबल भी है। इनके जरिए लोगों को धर्म के फेर में फंसाए रखना शासक के लिए आसान है, ताकि वे किसी भी अन्याय के लिए सत्ता से सवाल पूछने के बजाए सिर्फ अपने भाग्य को कोसते रहें। बता रहे हैं विद्या भूषण रावत

इन दिनों भारतीय मीडिया का हिंदूवादी चेहरा स्पष्ट रूप से नजर आ रहा है। इतना ही नहीं, जिस हिंदू धर्म के दर्शन को स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद या अरविंदो घोष आदि के विचारों के कारण अहम माना जाता था, अब वह चमत्कारों के आसरे हो गया है। आज बागेश्वर बाबा के नाम से प्रसिद्ध धीरेंद्र शास्त्री की असीमित शक्तियों के नाम पर देश मे हिंदुत्व के सभी स्वयंसेवक आगे आ गए हैं। रोज रोज टी वी पर बहस हो रही है और बहुत से लोग शास्त्री की आलोचना को हिंदुओं की आलोचना और अंतरराष्ट्रीय साजिश तक करार दे रहे हैं। विभिन्न चैनलों द्वारा कहा जा रहा है कि धीरेंद्र शास्त्री को कटघरे में खड़ा करने वाले ईसाइयों द्वारा किए जा रहे ‘धर्म परिवर्तन’ के विषय में क्यों नहीं बोलते। बहुत से लोग मुसलमानों द्वारा किए जा रहे ‘धर्म परिवर्तन’ के मामले में लोगों की ‘चुप्पी’ पर सवाल खड़े करते हैं। वैसे देखा जाय तो ये सब लोगों को मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने के तरीके हैं।

 

यह सर्वविदित है कि मध्य प्रदेश सरकार की पेंशन योजना के कारण वहां ऐसे बाबाओं की पौ बारह है और उसका कारण है भाजपा की सरकार का लचीला रवैया और दलितों, पिछड़ों व आदिवासियों की राजनीतिक चेतना को कुंद करना। 

यह भी किसी से छिपी बात नहीं है कि महाराष्ट्र में अंधविश्वास से संबंधित एक कानून है, जिसकी वकालत वहां के एक प्रमुख संगठन अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति लगातार करता रहा है। साथ ही, यह भी कि समिति के संस्थापक नरेंद्र दाभोलकर (1 नवंबर, 1945 – 20 अगस्त, 2013) की हत्या में हिंदुत्ववादी संगठनों का हाथ है और करीब नौ साल बाद भी अभी तक उनकी हत्या से संबंधित मुकदमे पूरे नहीं हुए है। दाभोलकर की हत्या के बाद महाराष्ट्र मे अंधश्रद्धा के विरुद्ध एक कानून आया था और अन्य राज्यों मे भी ऐसे कानून बने थे, लेकिन 2014 के बाद पुराने पारित विधेयकों को छोड़कर किसी भी राज्य ने नए कानून नहीं बनाए हैं। 

यह तो अब आम बात है कि बाबाओं की बड़ी फौज देश मे हर प्रदेश में खड़ी हो गई है। अब उनके पास न केवल जनबल है, अपितु धनबल भी है। इनके जरिए लोगों को धर्म के फेर में फंसाए रखना शासक के लिए आसान है, ताकि वे किसी भी अन्याय के लिए सत्ता से सवाल पूछने के बजाए सिर्फ अपने भाग्य को कोसते रहें।

खुद को चमत्कारी बताने वाले धीरेंद्र शास्त्री उर्फ बागेश्वर बाबा के सामने हाथ जोड़ते केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री नितिन गडकरी

आज से 10 वर्ष पूर्व तक बाबागण केवल अपनी धार्मिक बातों को रखते थे और सावधान रहते थे कि संविधान के विरुद्ध कोई बात न हो, लेकिन आज तो सभी खुले तौर पर घृणा फैला रहे हैं और नफरत की भाषा बोल रहे हैं। इसी प्रकार की नफरती भाषा के चलते नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे और गौरी लंकेश जैसे लोगों की हत्या हुई, जो प्रेम की भाषा बोल रहे थे। 

अभी धीरेंद्र शास्त्री के विरुद्ध नागपुर मे अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की और से श्याम मानव ने प्राथमिकी दर्ज करवाई। धीरेंद्र शास्त्री वापस नागपुर चले गए और उन्होंने चमत्कारों को दिखाने का दावा किया। फिर उन्होंने आरोप लगाया कि उनके खिलाफ बोलने वाले क्या कभी पादरियों के विरुद्ध भी बोलेंगे?

कोई भी अंधविश्वास ऐसे ही नहीं पनपता। अंधश्रद्धा निर्मूलन ने हालांकि अपना काम ईमानदारी से किया लेकिन वे कभी भी अंधविश्वास के मूलबिंदू तक नहीं पहुंच सके हैं। उनकी अपनी सीमायें हैं और उन्होंने कभी भी धर्मग्रंथों या धर्म के विषय मे टिप्पणी नहीं की। आंबेडकर ने जब कहा कि शास्त्रों मे यदि कोई बात गलत हो तो उसे हटा दिया जाना चाहिए, वे महाराष्ट्र में जोतीराव फुले और सावित्रीबाईफुले के आंदोलन को आगे ले जा रहे थे। अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के पास भी फुले-आंबेडकरवादी आंदोलन के रास्ते पर चलने का विकल्प था। लेकिन उन्होंने इसे नहीं अपनाया। 

दरअसल, भारत सहित पूरी दुनिया में अंधविश्वास को धर्म से अलग रखकर देखने की परंपरा चली है। भारत में तर्क दिया जा रहा है कि जाति व्यवस्था खराब है और यह हिंदू ‘धर्मग्रंथों’ मे नहीं था तथा इसे अंग्रेज लेकर आए। ब्रिटेन और अमेरिका के बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों में हिंदुत्व के सवाल पर शोध हो रहा हैं। भारत के बड़े-बड़े उद्योगपति ऐसी योजनाओं को वित्तीय रूप से संपोषित कर रहे हैं। 

बाबाओं से जब चमत्कारिक शक्तियों के बारे में सवाल किया जाता है तो कह दिया जाता है कि दूसरे धर्मों के विषय में सवाल क्यों नहीं उठाया जाता? यह बिल्कुल वैसा ही जैसे कोई आज कश्मीर के सवाल पर या चीन द्वारा भारतीयजमीन को हथियाने के सवाल पर बात करे तो उसे केंद्र सरकार व भाजपा के द्वारा नेहरू के ऊपर सवाल उठाने को कहा जाएगा। ऐसे ही आज यदि दलित जातिभेद व उत्पीड़न का शिकार होता है तो पूरी दुनिया में रंगभेद का सवाल उठाने की बात कही जाती है। 

अभी बीबीसी की लघु फिल्म को लेकर जो विवाद हुआ है, उसके बारे में सत्ता पक्ष के लोग कह रहे हैं कि यह जान-बूझकर किया गया है। वे कह रहे हैं कि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था खराब है, बीबीसी उसके ऊपर चर्चा क्यों नहीं करता। यह भी कहा जा रहा है कि क्या बीबीसी कभी नस्लभेद पर चर्चा करेगा? यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि क्या बीबीसी विंस्टन चर्चिल के ऊपर भी फिल्म बनाएगा। भारतीय मीडिया का एक हिस्सा कोहिनूर के ऊपर चर्चा करने की बात कर रहा है। कुतर्कों को यदि सही मान लें तो भारतीय मीडिया से आगे कोई नहीं हो सकता। इस पर कमाल यह कि जो भारतीय पत्रिकारिता जगत अंधविश्वास का गुणगान कर रहा हो, संदिग्ध व प्रायोजित खबरें चला रहा हो और सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता का धूर विरोधी हो, वही आज बीबीसी को अभिव्यक्ति की आजादी का सीख दे रहा है। 

निश्चित तौर पर बीबीसी भी आलोच्य है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है, लेकिन उसकी आलोचना करने के लिए भारतीय मीडिया को पहले अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए। केवल कुतर्कों से बीबीसी को कटघरे मे खड़ा नहीं कर सकते। पुरोहितवादी शक्तियां, जिन्होंने अभी जनता को अपने अंधविश्वास की जकड़न मे फंसा कर रखा है, वे दूसरों को तर्कवादी और नैतिक्तावादी होने की सलाह दें तो यह बेमानी और पाखंड ही कही जाएगी। 

भारतीय संविधान में साफ तौर पर समाजवादी, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की बात कही गई है। अनुछेद 51 (अ) में वैज्ञानिक चिंतन को बढ़ावा देना और तर्क और मानववादी सोच को आगे बढ़ाने की बात कही गई है। अब जरा यह सोचिए कि भारत का कौन-सा ऐसा चैनल है जो इन संवैधानिक मूल्यों को आगे बढ़ाने की बात कहता हो। 

रही बात तर्कवाद की तो एक समय था जब भारत में इतनी गुंजाइश थी कि पाखंड और अंधविश्वास के विरुद्ध आवाज उठाई जा सकती थी। और यह भी जानते हुए कि ऐसे सवालों पर कम लोग साथ आएंगे, लेकिन फिर भी आलोचनाओं के लिए जगह थी और यह कहा जाता था कि ये सवाल उठानेवाले ‘बुद्धिजीवी’ हैं। आज के दौर में तो ऐसे कहना भी खतरनाक है। अब तो किसी भी तार्किक बात का मुकाबला राष्ट्रभक्ति और हिंदू समाज की धार्मिक भावना से जुड़ा हुआ है। बाकी किसी और की भावनाएं आहत होती हों तो हुआ करें। 

कई बार लोग कहते हैं कि आखिर मीडिया और नेता इतनी बड़ी संख्या में क्यों इन बाबाओं के पीछे खड़े हो रहे हैं? जाहिर तौर पर इसका जवाब यही है कि ये लोग ही चुनाव के समय लोगों को असली मुद्दे से भटकाएंगे। कुल मिलाकर बात बस इतनी है कि सियासी लाभ के लिए देश में अंधविश्वास और नफरत की फसल को बोने की तैयारी है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विद्या भूषण रावत

विद्या भूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता हैं। उनकी कृतियों में 'दलित, लैंड एंड डिग्निटी', 'प्रेस एंड प्रेजुडिस', 'अम्बेडकर, अयोध्या और दलित आंदोलन', 'इम्पैक्ट आॅफ स्पेशल इकोनोमिक जोन्स इन इंडिया' और 'तर्क के यौद्धा' शामिल हैं। उनकी फिल्में, 'द साईलेंस आॅफ सुनामी', 'द पाॅलिटिक्स आॅफ राम टेम्पल', 'अयोध्या : विरासत की जंग', 'बदलाव की ओर : स्ट्रगल आॅफ वाल्मीकीज़ आॅफ उत्तर प्रदेश' व 'लिविंग आॅन द ऐजिज़', समकालीन सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों पर केंद्रित हैं और उनकी सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

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