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सावित्रीबाई फुले : पहली मुकम्मिल भारतीय स्त्री विमर्शकार

स्त्रियों के लिए भारतीय समाज हमेशा सख्त रहा है। इसके जातिगत ताने-बाने ने स्त्रियों को दोहरे बंदिशों मे जकड़ रखा था। उन्हें मानवीय अधिकारों से भी वंचित रखा गया था। स्वयं सावित्रीबाई फुले काे भी इन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था। बता रही हैं डॉ. संयुक्ता भारती

(3 जनवरी, 1831-10 मार्च, 1897) पर विशेष

आज की हर भारतीय स्त्री जब अपने को आधुनिक शिक्षित होने पर गर्व करेगी तब उसे सावित्रीबाई फुले का स्मरण करना ही पड़ेगा। उसे यह समझना ही पड़ेगा कि कैसे एक महिला ने मनुवादी विचारों को ठोकर मारते हुए इस अवधारणा को बदल दिया कि ज्ञान पर केवल मनुवादी पुरूषों का अधिकार है। इस लिहाज से देखें तो यह कहना गैर-वाजिब नहीं कि यदि भारत में स्त्री विमर्श का प्रस्थान बिंदू है तो वह सावित्रीबाई फुले की क्रांति ही है। 

जब हम भारतीय समाज का समाजशास्त्रीय अध्ययन करते हैं तो सावित्रीबाई फुले का जीवनकाल (3 जनवरी, 1831-10 मार्च, 1897) एक मानक कालखंड के रूप में सामने आता है। इस कालखंड के पहले मध्यकाल में बेशक मीराबाई का नाम आता है, लेकिन उनकी पूरी जद्दोजहद व्यक्तिगत आराधना तक सीमित रही। उन्होंने सावित्रीबाई फुले की तरह भौतिक रूप से समाज में संघर्ष नहीं किया। इसलिए मीराबाई की गणना केवल मध्यकाल के साहित्यकारों में की जाती है।

जबकि दूसरी ओर सावित्रीबाई फुले एक ऐसी महिला के रूप में सामने आती हैं, जिन्होंने भले ही अध्यात्म के क्षेत्र में कोई उपलब्धि हासिल न किया हो, लेकिन महिलाओं के शिक्षा के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिए। उन्नीसवीं सदी का दौर एक ऐसा दौर था, जब भारत में अंग्रेजी शासन भारत के सामाजिक जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की प्रक्रिया में जुट गई थी। 

दरअसल, यह समझा जाना चाहिए कि पहले ईस्ट इंडिया कंपनी का ध्यान तत्कालीन भारतीय समाज की बेहतरी पर नहीं था। लेकिन बाद में उसने जब अपने साम्राज्य को चिर-स्थायी बनाने की कोशिश की तो उसका सामना भारतीय समाज के सवालों से पड़ा जो कि मनुवादी व भेदभाववादी संरचना के कारण जड़ था। इसके आलोक कंपनी द्वारा सन् 1781 में कलकत्ता में ‘कलकत्ता मदरसा’ और 1792 में बनारस में ‘संस्कृत कालेज’ स्थापित किए गए। फिर वर्ष 1813 में आज्ञापत्र जारी किया गया जिसमें शिक्षा में धन व्यय करने का निश्चय किया गया। किस प्रकार की शिक्षा दी जाए, इसपर प्राच्य और पाश्चात्य शिक्षा के समर्थकों में मतभेद रहा। वाद विवाद चलता चला। अंत में लार्ड मेकाले से प्रभावित हो 1835 ई. में लार्ड बेंटिक ने निश्चय किया कि अंग्रेजी भाषा और साहित्य और यूरोपीय इतिहास, विज्ञान, इत्यादि की पढ़ाई हो।

सावित्रीबाई फुले (3 जनवरी, 1831-10 मार्च, 1897)

यह भारतीय समाज को बदलने की पहली सकारात्मक कवायद शुरू हुई, जिसका प्रभाव दिखने लगा था। अंग्रेजी विद्यालयों में अधिक संख्या में विद्यार्थी नामांकित होने लगे। इसकी वजह यह रही कि अंग्रेजी पढ़े भारतीयों को सरकारी पदों पर नियुक्त करने की नीति की सरकारी घोषणा हो गई थी। सरकारी प्रोत्साहन के साथ-साथ अंग्रेजी शिक्षा को पर्याप्त मात्रा में व्यक्तिगत सहयोग भी मिलता गया। अंग्रेजी साम्राज्य के विस्तार के साथ ही अधिक कर्मचारियों की और चिकित्सकों, इंजिनियरों और कानून जाननेवालों की आवश्यकता पड़ने लगी। उपयोगी शिक्षा की ओर सरकार की दृष्टि गई। मेडिकल, इजिनियरिंग और लॉ कालेजों की स्थापना होने लगी। 

यह सब सरकार के स्तर पर और मिशनरियों द्वारा किया जा रहा था। लेकिन चारवर्णी व्यवस्था के कारण भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति पूर्ववत ही रही। इन्हीं सामाजिक हालातों के बीच सावित्रीबाई फुले और उनके जीवनसाथी जोतीराव फुले का ऐतिहासिक सामाजिक आंदोलन सामने आया। जोतीराव फुले ने उन्हें पढ़ाया और शिक्षक प्रशिक्षण के लिए मिशनरी स्कूल भेजा। इसके बाद सन् 1848 में उन्होंने लड़कियों को पढ़ाने के लिए स्कूल खोला। लड़कियों की शिक्षा के लिए किसी भी भारतीय द्वारा स्थापित यह पहला स्कूल था। उस समय पढ़ाने के लिए अध्यापिकाएं नहीं थीं। 

इस बीच सन् 1853 में शिक्षा की प्रगति की जांच के लिए एक समिति बनी। इस समिति ने सन् 1854 में अपनी रपट और अनुशंसाएं ईस्ट इंडिया कंपनी को समर्पित कर दिया। इस समिति की अनुशंसाओं में अंग्रेजी के अलावा संस्कृत, अरबी और फारसी की पढ़ाई के अलावा औद्योगिक विद्यालयों और विश्वविद्यालयों की स्थापना आदि शामिल रहे। वहीं इस समिति ने स्त्री शिक्षा के लिए व्यापक स्तर पर अभियान चलाने की बात कही। फिर 1857 में जिस साल अंग्रेजी शासन के विरूद्ध पहला संग्राम भारतीय शासक वर्ग द्वारा किया गया, उसी साल कलकत्ता, बंबई और मद्रास में विश्वविद्यालय स्थापित हुए।

जाहिर तौर पर अंग्रेजी हुकूमत ने महाराष्ट्र में फुले दंपत्ति द्वारा किये जा रहे प्रयासों को संज्ञान में लिया था। इस आधार पर यह तो कहा ही जा सकता है कि सावित्रीबाई फुले ने 19वीं शताब्दी में नारी-मुक्ति की लड़ाई लड़ी। आगे उन्होंने अपने संघर्ष यात्रा को सामाजिक न्याय से भी जोड़ा। 

स्त्रियों के लिए भारतीय समाज हमेशा सख्त रहा है। इसके जातिगत ताने-बाने ने स्त्रियों को दोहरे बंदिशों मे जकड़ रखा था। उन्हें मानवीय अधिकारों से भी वंचित रखा गया था। स्वयं सावित्रीबाई फुले काे भी इन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था। केवल 9 वर्ष की आयु में सन् 1840 में उनकी शादी जोतीराव फुले से कर दी गई थी। यह बाल विवाह था। जोतीराव फुले स्वयं तब केवल 13 साल के थे। लेकिन जोतीराव फुले क्रांतिकारी विचारों वाले थे। वे शिक्षा का महत्व समझते थे। सावित्रीबाई फुले उनकी सहयोगिनी बनीं। यदि हम दोनों को एक-दूसरे की प्रेरणा कहें तो अतिशयोक्ति नहीं। वह पहली दलित-बहुजन भारतीय महिला रहीं, जिन्होंने पारंपरिक व्यवस्था को हाशिए पर रखकर सामाजिक जीवन को अंगीकार किया। 

जब उन्होंने 1848 में इस दंपत्ति ने लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला तब भले ही यह आज के हिसाब से एक महत्वपूर्ण उपलब्धि महसूस हो, लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह था कि कोई स्त्री पितृसत्ता को चुनौती देकर महिलाओं को अशिक्षित बनाए रखने की परंपरा के खिलाफ जाकर एक पहल कर रही थी। वह महिलाओं को बता रही थीं कि उनका भी अपना सामाजिक जीवन है। वह शिक्षा के महत्व से महिलाओं को परिचित करा रही थीं और इसके साथ ही उन्हें मानवाधिकारों के बारे में भी सजग बना रही थीं। फुले दंपति ने एक के बाद एक अट्ठारह बालिका स्कूल खोले, जो कि हजारों सालों के इतिहास में पहली बार हुआ था। सावित्रीबाई फुले की सलाह पर जोतीराव फुले ने मजदूर और कामगारों के लिए भी रात्रि स्कूल और प्रौढ़ स्कूल खोले ताकि दलित-बहुजन पुरूष भी शिक्षा का महत्व समझें। उनके इस संघर्ष ने यह संदेश दिया कि सदियों से जारी ब्राह्मणवादी गुलामी को समाप्त किया जा सकता है। उनके प्रयासों को मौजूदा परिवेश के सापेक्ष भी देखा जाना चाहिए कि आज किस तरह से गरीब-गुरबों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा से वंचित करने के लिए शिक्षा का निजीकरण किया जा रहा है। साथ ही यह भी कि आज के शैक्षणिक संस्थानों में किस तरह का जातिगत भेदभाव व्याप्त है, जिसके कारण बड़ी संख्या में दलित-बहुजन युवा हताशा के शिकार हो रहे हैं। रोहित वेमूला की खुदकुशी इसी तरह के जातिगत भेदभाव के रूप में सामने आया।

सावित्रीबाई फुले दूरदर्शी क्रांतिकारी थीं। वे महिलाओं के समाज को समझती थीं और इसलिए उन्होंने 1863 में बाल हत्या प्रतिबंधक गृह खोले। इन गृहों में विधवा महिलाएं, जो बलात्कार या फिर छल-प्रपंच के कारण गर्भवती हो जाती थीं, उन्हें को बच्चे जन्मने की सुविधा दी जाती थी। उनकी पहचान गुप्त रखी जाती थी ताकि वे समाज में सम्मान के साथ जी सकें। सावित्रीबाई फुले विधवा विवाह को महत्वपूर्ण मानती थीं तथा इसके लिए लोगों को जागरूक भी करती थीं। इसी क्रम में 25 जुलाई, 1859 काे भारत में विधवा विवाह के लिए कानून बनाए गए। 

आज के संदर्भ में यदि हम सावित्रीबाई फुले के क्रांतिकारी विचारों व उनके व्यवहारों का आकलन करें तो हम पाते हैं कि आज भी हमारे सामने एक सवाल है। सवाल यह कि क्या हम आज ऐसी किसी संस्था की कल्पना कर सकते हैं जहां इस अंतरजातीय व अंतरधार्मिक विवाह करनेवाले युगलों को सुरक्षा मिल सके। एकल महिलाओं का सवाल तो आज भी एक बड़ा सवाल है। 

बहरहाल, 1890 में जोतीराव फुले के निधन के बाद भी सावित्रीबाई फुले ने धीरज नहीं खोया। उन्होंने सत्यशोधक समाज के नेत‍ृत्वकर्ता के रूप में उसके कार्यों और संकल्पों को गति दी। साथ ही, उन्होंने मराठी में उल्लेखनीय लेखन कार्य किया। वह निश्चित तौर पर मराठी भाषा की पहली कवयित्री थीं, जिन्होंने महिलाओं की जागृति के लिए, उन्हें सामाजिक जीवन में लाने के लिए कविताएं रचीं। उनके जीवन संघर्ष को भारतीय समाज में स्त्री विमर्श का पहला अध्याय अवश्य माना जाना चाहिए, जिसमें नारी मुक्ति के विभिन्न आयाम ठोस रूप में शामिल थे।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

संयुक्ता भारती

तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, बिहार से पीएचडी डॉ. संयुक्ता भारती इतिहास की अध्येता रही हैं। इनकी कविताएं व सम-सामयिक आलेख अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं।

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