h n

अप्रैल महीने में खरीदें फुले-आंबेडकर वैचारिकी पर आधारित ये पांच किताबें, पाएं 25 प्रतिशत की छूट

फारवर्ड प्रेस इस पूरे महीने को फुले-आंबेडकर महीने के रूप में मना रहा है। इस अवधि में पाठक फुले दंपत्ति और डॉ. आंबेडकर की वैचारिकी पर आधारित पांच किताबों के सेट की खरीद पर 25 प्रतिशत की छूट का लाभ उठा सकते हैं

विज्ञापन

देश भर के दलित-बहुजनों के लिए अप्रैल का महीना बेहद खास है। वजह यह कि इस महीने में दो महत्वपूर्ण तारीखें हैं– 11 अप्रैल और 14 अप्रैल। ये तारीखें इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि 11 अप्रैल, 1827 को जोतीराव फुले और 14 अप्रैल, 1891 को डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म हुआ। 

फारवर्ड प्रेस इस पूरे महीने को फुले-आंबेडकर महीने के रूप में मना रहा है। इस अवधि में पाठक फुले दंपत्ति और डॉ. आंबेडकर की वैचारिकी पर आधारित पांच किताबों के सेट की खरीद पर 25 प्रतिशत की छूट का लाभ उठा सकते हैं। इस सेट को अमेजन के जरिए  आसानी से घर बैठे खरीदा जा सकता है। ये किताबें हैं – ‘ब्राह्मणवाद की आड़ में गुलामगिरी’, ‘जाति का विनाश’, ‘सावित्रीनामा : सावित्रीबाई फुले का समग्र साहित्यकर्म’, ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ व ‘आंबेडकर की नजर में गांधी और गांधीवाद’।

बिना छूट के इन पांच किताबों का मूल्य 1080 रुपए है, जिसे पाठक 1 अप्रैल, 2023 से लेकर 30 अप्रैल, 2023 के दौरान अमेजन के जरिए केवल 810 रुपए का भुगतान कर प्राप्त कर सकते हैं।

दलित-बहुजनों की वैचारिकी को समृद्ध करनेवाली ये पांचों किताबें व्यापक स्तर पर सराही गई हैं। इनमें ‘ब्राह्मणवाद की आड़ में गुलामगिरी’ का प्रकाशन मराठी में पहली बार वर्ष 1873 में हुआ था। फारवर्ड प्रेस द्वारा इस पुस्तक का मूल पाठ से सीधे हिंदी में अनुवाद कराया गया है। यह कार्य मराठी-हिंदी की अध्येता उज्ज्वला म्हात्रे ने किया है। इस पुस्तक को डॉ. राम सूरत और आयवन कोस्का ने संदर्भ-टिप्पणियों से समृद्ध किया है ताकि पाठक जोतीराव फुले के विचारों को आसानी से समझ सकें व ऐतिहासिक संदर्भों से परिचित हो सकें।

संदर्भित टिप्पणियों से समृद्ध पुस्तकों की सूची में फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित ‘जाति का विनाश’ एक चर्चित किताब रही है। डॉ. आंबेडकर द्वारा 1936 में लिखी गई इस किताब जो कि मूल रूप में उनका वह संबोधन था, जिसे उन्होंने जाति-पाति तोड़क मंडल, लाहौर के वार्षिक अधिवेशन में बतौर अध्यक्ष संबोधित करने के लिए तैयार किया था, लेकिन मंडल के सदस्यों द्वारा इसके कुछ अंश पर आपत्ति व्यक्त किये जाने के बाद अधिवेशन को ही स्थगित कर दिया गया। जब यह पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया था तब इसने गांधी का ध्यान भी अपनी ओर आकृष्ट किया था और उन्होंने इसके संबंध में आलोचनात्मक आलेख लिखे। फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में गांधी, संतराम बीए और डॉ. आंबेडकर के बीच हुए विमर्श को भी संगृहीत किया गया है। इसके अलावा कोलंबिया विश्वविद्यलय में डॉ. आंबेडकर का प्रथम शोध पत्र ‘भारत में जातियां : उनका तंत्र, उत्पत्ति और विकास’ भी संगृहीत है, जिसे ‘जाति का विनाश’ के साथ प्रकाशित करने की इच्छा डॉ. आंबेडकर की थी। इस कारण यह पुस्तक आंबेडकरवादी साहित्य के अध्येत्ताओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण बन गई है। प्राख्यात पत्रकार और लेखक रहे राजकिशोर द्वारा मूल अंग्रेजी अनूदित और डॉ. सिद्धार्थ द्वारा संदर्भ-टिप्पणियों से सुसज्जित इस पुस्तक की लोकप्रियता का इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि जुलाई, 2018 में प्रथम बार प्रकाशन के बाद दस बार पुनर्मुद्रित किया जा चुका है।

अप्रैल महीने में फारवर्ड प्रेस के खास तोहफे में ‘सावित्रीनामा : सावित्रीबाई फुले का समग्र साहित्यकर्म’ भी शामिल है। यह फारवर्ड प्रेस की नवीनतम प्रस्तुति है जिसमें सावित्रीबाई फुले की कविताएं, जोतीराव फुले को लिखे उनके पत्र और उनके भाषण के अलावा जोतीराव फुले के वे भाषण संगृहीत हैं, जिन्हें स्वयं सावित्रीबाई फुले ने संपादित किया। उज्ज्वला म्हात्रे द्वारा मूल मराठी से सीधे अनूदित यह किताब सावित्रीबाई फुले के व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन के विभिन्न आयामों से परिचित कराती है। फुले साहित्य के मर्मज्ञ प्रो. हरी नरके की विस्तृत भूमिका ने इस पुस्तक को उल्लेखनीय तरीके से समृद्ध किया है।

वहीं चौथी किताब डॉ. आंबेडकर की बहुप्रशंसित ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ है, जो कि फारवर्ड प्रेस द्वारा संदर्भ-टिप्पणियों से सुसज्जित पुस्तक शृंखला में दूसरी किताब है, जिसकी भूमिका प्रो. आइलैय्या शेपर्ड ने लिखी है और संदर्भ-टिप्पणियों से डॉ. सिद्धार्थ ने समृद्ध किया है। यह किताब हिंदू धर्म की विसंगतियों के बारे में डॉ. आंबेडकर की वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बारे में बताती है और उन कारणों का विश्लेषण करती है, जिनके कारण उन्होंने हिंदू धर्म का परित्याग किया व बौद्ध धम्म अपनाया।

फारवर्ड प्रेस द्वारा 25 प्रतिशत की छूट के साथ उपलब्ध करायी जा रही पांच किताबों के सेट में अंतिम किताब ‘आंबेडकर की नजर में गांधी और गांधीवाद’ है, जिसका संपादन डॉ. सिद्धार्थ व डॉ. अलख निरंजन ने संयुक्त रूप से किया है। यह किताब आंबेडकर के उस दृष्टिकोण को सामने लाती है, जिसके करण उन्होंने गांधी के बारे में बीबीसी को दिए अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि उन्होंने गांधी के असली दांत देखे हैं।

बहरहाल, दलित-बहुजन वैचारिकी को समग्रता में समेटे इन पांचों किताबों के सेट को अमेजन द्वारा आसानी से घर बैठे खरीदा जा सकता है और वह भी 25 प्रतिशत की छूट के साथ।


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

एफपी डेस्‍क

संबंधित आलेख

ब्रह्मेश्वर मुखिया हत्याकांड : बिहार की भूमिहार राजनीति में फिर नई हलचल
भोजपुर जिले में भूमिहारों की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही। एक समय सुनील पांडे और उसके भाई हुलास पांडे की इस पूरे इलाके...
लोकसभा चुनाव के बाद उपचुनावों में भी मिली एनडीए को हार
अयोध्या लोकसभा क्षेत्र में हार के सदमे से अभी भाजपा उबरी भी नहीं थी कि उपचुनाव में बद्रीनाथ विधानसभा सीट हारने के बाद सोशल...
बिहार : दलितों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एससी की सूची से तांती-तंतवा बाहर
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि वर्तमान मामले में राज्य की कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण और सांविधानिक प्रावधानों के विरुद्ध पायी...
अयोध्या में राम के नाम पर जमीन की लूट
अयोध्या के सुरेश पासी बताते हैं कि “सारा धंधा नेताओं, अफसरों, और बड़े लोगों की मिलीभगत से चल रहा है। ग़रीब की कहीं कोई...
बिहार : राजपूतों के कब्जे में रूपौली, हारे ओबीसी, जिम्मेदार कौन?
भाजपा ऊंची जाति व हिंदू वर्चस्ववाद को बढ़ावा देने वाली पार्टी के रूप में मानी जाती है। उसका राजनीतिक कार्य व व्यवहार इसी लाइन...