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पंजाब में आत्मसम्मान की अलख जगाने गलियों से गुजरते लोग

यात्रा का आयोजन पंजाब के ‘संत समाज’ द्वारा किया गया है। यात्रा का मकसद लोगों को ‘बेगमपुरा’ के बारे में बताना है। ‘बेगमपुरा’ (बे-गमपुरा) यानी ऐसा शहर, जहां गम का नामो-निशां न हो। अमन-चैन हमेशा कायम रहता हो। यह वह सपना है जो रैदास ने छह सौ साल पहले देखा था। बता रहे हैं ओमप्रकाश कश्यप

यह सच है कि लोकतंत्र में असली लड़ाई सड़कों पर लड़ी जाती है, लेकिन उस लड़ाई के असली योद्धा गांव-गांव, गली-गली जाकर आम जनता से संवाद करके तैयार किए जाते हैं। इसके लिए न तो ज्यादा तामझाम की जरूरत पड़ती है, न ही भड़कीले नारों की। बस इतनी संवेदना होनी चाहिए कि जनता के दुःख-दर्द और उसके कारणों को समझ सकें। साथ में इतनी ईमानदारी होनी चाहिए कि जनता विश्वास कर सके। जनता के विश्वास कर लेने के बाद डगर एकदम आसान हो जाती है। जोतीराव फुले, ईवी रामासामी पेरियार, डॉ. आंबेडकर, संत गाडगे, डॉ. रामस्वरूप वर्मा, जगदेव प्रसाद, स्वामी अछूतानंद, से लेकर कांशी राम तक सब इस लड़ाई के अविस्मरणीय योद्धा रहे हैं। जनता ने पहले इन सभी नेताओं पर विश्वास करना शुरू किया, उसके बाद उनके विचारों को अपनाया। 

इधर अच्छी खबर पंजाब से आ रही है। वहां कुछ लोग हैं जो जनता को जगाने निकले हैं। वे अपनी ओर से कोई उपदेश नहीं देते। बस इतना कहते हैं कि लोग अपने स्वाभिमान को याद रखें। लोकतंत्र में राज और समाज दोनों जनता के फैसले पर निर्भर होते हैं। जनता अपना स्वाभिमान गंवा देगी तो स्वतंत्र फैसले कैसे ले पाएगी। यह स्वाभिमान बाहर से नहीं आएगा। यह लोगों की एकता से ही आएगा। इसलिए उन्होंने अपने संगठन का नाम रखा है– “सामाजिक एकता शक्ति”। उनका नारा है– “अलख जगाओ… आजादी पाओ।” अलख जगाना यानी एक-दूसरे को उसकी ताकत का अहसास दिलाना, आत्मविश्वास लौटाना।

इस नारे के साथ पेरियार ई.वी. रामासामी के आत्मसम्मान आंदोलन की याद का आना स्वाभाविक है। 1926 में इरोड से शुरू हुए उस आंदोलन ने पूरे तमिलनाडु में जो क्रांति-लौ जलाई थी, उसकी रोशनी लोगों को आज तक राह दिखा रही है। 

सामाजिक एकता शक्ति के सदस्यों की कामना रैदास के ‘बेगमपुरा’ की है। उनमें न तो कोई बड़ा नेता है, न ही जाना-पहचाना चेहरा। वे बस आम लोग हैं, जो जनता के बीच से निकले हैं। जनता को उसकी शक्ति का एहसास कराने के लिए हैं। पंजाब के होशियारपुर जिले के गांव मुगोबाल, तहसील माहलपुर से 26 फरवरी को आरंभ हुई यह यात्रा अप्रैल तक चलेगी। समस्त पंजाब से गुजरने के बाद यह यात्रा अमर शहीद उधम सिंह की मूर्ति के पास, गांव सुनाम, जिला संगरूर में समाप्त होगी। सुनाम ऊधम सिंह का पैतृक गांव है।

 ध्यातव्य है कि पंजाब में एक-तिहाई आबादी अनुसूचित जाति की है। सिख धर्म भी जाति का विरोध करता है। फिर भी स्वार्थी लोगों द्वारा जातिवाद और सांप्रदायिकता का जहर इस तरह फैलाया जाता है कि लोग बंट जाते हैं। बंटने के साथ ही उनकी ताकत एक-दूसरे से टकरा कर जाया होने लगती है। इसका फायदा स्वार्थी राजनीतिज्ञ उठाते हैं। इसलिए इस यात्रा का उद्देश्य है– लोगों को छुटपुट मतभेद भुलाकर सामाजिक एकता की शक्ति के बारे में बताना। 

संस्था के कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर लोगों को आम आदमी के संवैधानिक अधिकारों पर डाले जा रहे डाकों के विरुद्ध सावधान करते हैं। वे उनसे अपील करते हैं कि समाज की बेहतरी के सभी लोग राजनीतिक, धार्मिक, जातीय और मज़हबी मतभेदों से उठकर एकजुट हों। निजी स्वार्थ का त्याग करके आगे आएं; और एक स्वर में पूरे समाज की भलाई के लिए आवाज बुलंद करें। ऐसा हुआ तो मुश्किलें भाग खड़ी होंगी। समस्याओं के समाधान के लिए किसी का मुंह न देखना पड़ेगा। 

एक स्कूल परिसर में सभा को संबोधित करते सामाजिक एकता शक्ति संगठन के सदस्य

यात्रा का आयोजन पंजाब के ‘संत समाज’ द्वारा किया गया है। यात्रा का मकसद लोगों को ‘बेगमपुरा’ के बारे में बताना है। ‘बेगमपुरा’ (बे-गमपुरा) यानी ऐसा शहर, जहां गम का नामो-निशां न हो। अमन-चैन हमेशा कायम रहता हो। यह वह सपना है जो रैदास ने छह सौ साल पहले देखा था– 

बेगमपुरा शहर कौ नांउ, दुखू अंदोह नहीं तिहिं ठांउ
नां तसवीस खिराजु न मालु, खउफु न खता न तरसु जवालु
अब मोहि खूद वतन गह पाई, ऊंहा खैरि सदा मेरे भाई
काइमु दाइमु सदा पातसाही, दोम न सेम एक सो आही
आबादानु सदा मसहूर, ऊंहा गनी बसहि मामूर

अर्थात मैं बेगमपुरा का वासी हूं। वहां न तो गम है। न शोषण। न झगड़े और न ही दंगे-फसाद। लोग निडर-निर्भीक रहते हैं। चिंता और पछतावे के लिए उस शहर में कोई जगह नहीं है। लोग कम से कम गलती करते हैं। सच्चाई का राज चलता हो। सब ख़ुशी-ख़ुशी अपना काम करते हैं। न कोई छोटा है न बड़ा। सब बराबर हैं। रैदास का ठीक ऐसा ही सपना यह भी था

ऐसा ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिले सबन को अन्न।
छोट-बड़ो सब सम बसे, रहे रैदास प्रसन्न।

आजादी की शुरुआत मानसिक गुलामी दूर करने से होती है। असली स्वाभिमान तभी संभव है जब लोग पूरी तरह स्वतंत्र हों। मनुष्य जब मुक्त मन से सोचना आरंभ कर देता है, उसी क्षण से उसकी गुलामी की जंजीरें कमजोर पड़ने लगती हैं। इसलिए संत समाज की ओर से यात्रा के लिए जो पर्चा छपवाया गया है, उसमें अपनी ओर से कुछ न कहकर सिर्फ सवाल उठाए गए हैं। मकसद बस इतना है कि दैन्य और अभावों के बीच जी रहे आम लोग अपने हालात के बारे में सोचना शुरू कर दें। उनके लिए कुछ सवाल तो अत्यंत विचारणीय है, और न केवल पंजाब बल्कि पूरे देश से संबंध रखते हैं, जैसे कि– 

“राजनीतिक लोगों का समाज के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण क्यों? शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का व्यापारीकरण क्यों? जिस नागरिक स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे का सपना डॉ. आंबेडकर ने संविधान के माध्यम से देखा था, वह अधूरा क्यों? निजी संस्थान लाभ में और सरकारी संस्थान घाटे में क्यों? कार्यपालिकाएं, अदालतें, मीडिया और सरकारी संस्थाएं आजाद क्यों नहीं? आजादी के 75 वर्षों के बाद भी रोटी, कपड़ा और मकान की समस्या का समाधान क्यों नहीं हुआ?”

बहरहाल, ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनके उत्तर जानते सब हैं, पर देना कोई नहीं चाहता। जनता भी जानती, समझती है। वह बस मौन है। इस यात्रा का उद्देश्य शांत और बेखबर पड़ी जनता को जगाकर उसमें स्वाभिमान चेतना का संचार कर रहा है। 

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

ओमप्रकाश कश्यप

साहित्यकार एवं विचारक ओमप्रकाश कश्यप की विविध विधाओं की तैतीस पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। बाल साहित्य के भी सशक्त रचनाकार ओमप्रकाश कश्यप को 2002 में हिन्दी अकादमी दिल्ली के द्वारा और 2015 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के द्वारा समानित किया जा चुका है। विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में नियमित लेखन

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