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आंखन-देखी : ऐसे जीते हैं अब उत्तर प्रदेश के बांसफोड़

बांसफोड़, बंसोड़ समाज के जैसे ही धरकार समाज की पहचान भी एक शिल्पी के रूप में है। इस समुदाय का पारंपरिक पेशा बांस से डलिया, मौंनी, टोकरी, बेना, दउरी बनाना हैं। इस समाज के लोग वेनवंशी उपनाम भी लगाते हैं। बता रहे हैं सुशील मानव

दोपहर का समय है। आसमान में सूरज और बादल धूप-छांव का खेल खेल रहे हैं। नंग-धड़ंग बच्चे आते-जाते चेहरे को निरीहता से ताक रहे हैं। फुटपाथ पर समतल जोड़ चारपाई डाले कमजोर दिखनेवाली स्त्रियां और मैले कुचैले कपड़ों में पुरुष लेटे कमर सीधी कर रहे हैं। आस-पास फुटपाथ पर बड़े-बड़े कचनार के लाल फूल झरकर भेहलाये (बिखरे) हुए हैं। बड़े-बूढ़े कहते हैं कि हाथ में हुनर हो तो आदमी कहीं भी कमा खा सकता है। यह हुनर लेकर ही वे अपने गांवों से पलायन कर शहर के फुटपाथ पर डेरा डाले हुए हैं। लेकिन प्लास्टिक उनके हुनर के साथ ही उनके अस्तित्व के लिए भी ख़तरा बन गया है।

 

रवि कुमार भंडरिया स्टेशन, जिला जौनपुर (उत्तर प्रदेश) के रहने वाले हैं। इनके पास वहां भी कोई खेत नहीं है। ये लोग सपरिवार इलाहाबाद संग्रहालय से यूनिवर्सिटी जाने वाली सड़क के फुटपाथ पर डेरा डाले हुए हैं। रवि कुमार खुद को वेनवंशी धरकार बताते हैं। ये लोग केवल बांस की सीढ़ी, स्टैंड, सीवर साफ करने की खपाची आदि ही बनाते हैं। और चीजें क्यों नहीं बनाते, पूछने पर रवि बताते हैं कि बांस का काम करने वाली सात उप- जातियां हैं, सबका काम बंटा हुआ है। रवि कुमार बताते हैं कि वे लोग मुट्ठीगंज बांस मंडी से बांस ख़रीदकर ले आते हैं। एक बांस क़रीब 150 रुपए का पड़ता है। 

गांव में ही क्यों नहीं रुक गए? वहां रहते तो कम-से-कम आपके बच्चे तो पढ़-लिख जाते। इसके जवाब में रवि कुमार कहते हैं कि जो सामान वे लोग बनाते हैं, उनकी मांग वहां नहीं है या कहिए कि वहां बाजार नहीं। जबकि यहां इलाहाबाद शहर में यह है कि दिन-भर में 400-500 रुपए की कमाई हो जाती है। यानि इनके लिए रोटी का सवाल पहले है, शिक्षा का सवाल बाद में। अभी तो ये लोग पहले ही सवाल से जूझ रहे हैं।  

सोनू और रेशमा का परिवार भी इसी फुटपाथ पर यही काम करता है। यह परिवार प्रतापगढ़ जिले से आया है। रेशमा बताती हैं कि वे लोग एक स्टैंड का दाम ग्राहक से 150 रुपये बताती हैं। लोग मोल-भाव करते हैं और आखिर में 70 रुपए तक में दे देती हैं। वे बताती हैं कि यूनिवर्सिटी व कॉलेज आदि में पढ़ने वाले छात्र इसे अधिक ले जाते हैं। वे लोग इसमें किताबें रखते हैं। जबकि घर-परिवार वाले लोग जूते-चप्पल आदि के लिए इसका उपयोग करते हैं। 

जिल्लत की जिंदगी क्या होती है, यह यहां रह रहे लोगों से बेहतर कोई नहीं समझ सकता। रेशमा बताती हैं कि आये दिन नगर निगम वाले गाड़ी लेकर आते हैं और उनका बसेरा उजाड़ कर तंबू और बांस सहित सब उठा ले जाते हैं। फिर पन्नी (प्लास्टिक की शीट), पंडाल व डंडा ख़रीदना पड़ता है। बताते बताते रेशमा का गला भर आता है। बच्चों की ओर देखकर कहती हैं कि क्या करें, छोटे-छोटे बच्चे हैं, खुले में नहीं सो सकते। कीड़े-मकोड़े मच्छर सब काटते हैं। 

काम में तल्लीन एक परिवार की महिलाएं (तस्वीर : सुशील मानव)

मुंह में पान की गिलोरी दबाये चांदनी स्टैंड बनाने में व्यस्त हैं। उनके तीन बच्चे हैं। सभी बच्चे देखने में ही कुपोषित लगते हैं। कितनी कमाई हो जाती है दिन भर में? पूछने पर चांदनी बताती हैं कि कमाई क्या होती है, बस जी रहे हैं किसी तरह। 

चांदनी अपने रोज़मर्रा के संघर्ष के बारे में बताती हैं कि पानी के लिये दो किलोमीटर दूर आनंद हॉस्पिटल जाना पड़ता है। वहां लगे नल से पानी भरकर रिक्शे पर लादकर ले आती हैं। रिक्शावाला 20 रुपए भाड़ा लेता है। शौच के लिए पूरा परिवार सुलभ शौचालय पर निर्भर है, जहां एक बार में प्रति व्यक्ति पांच रुपए देना पड़ता है। 

चूंकि घर-बार नहीं है, इसलिए इन लोगों में से किसी का वोटर कार्ड नहीं बना है। पैतृक आवास के पते पर आधार कार्ड किसी तरह बनवा लिया है। लेकिन किसी भी सरकारी योजना का लाभ इन लोगों को नहीं मिलता है।

तमन्ना की उम्र 22 साल है। उनके दो बच्चे हैं। तमन्ना अपने पति को छोड़कर फिलहाल पिता के परिवार के साथ इलाहाबाद के फुटपाथ पर रह रही हैं। तमन्ना की शादी फाफामऊ में हुई थी। पति शराबी है, रोज़ मारता-पीटता था, खर्चा-वर्चा भी नहीं देता था। तमन्ना ने बांस का काम नहीं सीखा है। पति को छ़ोड दिया है, फिर गुज़ारा कैसे करोगी, पूछने पर तमन्ना बताती हैं कि अभी बच्चा बहुत छोटा है थोड़ा और बड़ा हो जाएगा तो वह शहर में लोगों के यहां चूल्हा-बर्तन व झाड़ू-पोंछा का काम करके गुज़ारा करेंगी। 

खानाबदोश जिंदगी का सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि बच्चों को शिक्षा नहीं मिल पाती है। बच्चों के भविष्य के बारे में आप लोगों ने कुछ सोचा नहीं है? पूछने पर चांदनी निराश स्वर में कहती हैं, क्या सोचना है साहेब, जैसे-तैसे करके हम लोग जी रहे हैं, ऐसे ही ये लोग भी जी लेंगे। 

हां, लेकिन प्लास्टिक और एल्युमिनियम का जोरदार चलन आपके इस काम को तो खत्म कर ही रहा है। आने वाले वर्षों में यह हुनर क्या इन बच्चों के काम आएगा? ऐसे में जब आप अपने बच्चों को शिक्षा भी नहीं दे रही हैं तो आपके बच्चे बिना शिक्षा के कैसे जी सकेंगे, बिना ज्ञान के? चांदनी, रेशमा और तमन्ना, किसी ने भी इन सवालों का जवाब नहीं दिया। बस खामोश हो गईं।

भोला धरकार के पूर्वज कहीं से आकर गिरधरपुर गांव में बस गये थे। भोला बांस की झाब, झबिया (विवाह व अन्य मांगलिक अवसरों पर लड़ुआ-खाजा भरकर देने के लिए), बेना (हाथ पंखा), डलिया, दउरी आदि बनाकर देते थे। कई गांवों में उनकी जजमानी थी। लोग बदले में उन्हें तूर व धान आदि अनाज दे दिया करते थे। लेकिन तेजी से हुए बदलाव के बाद झाबा, झबिया, बेना और दउरी आदि का चलन खत्म हो गया। इनकी जगह प्लास्टिक के बर्तनों ने ले लिया। भोला धरकार भी अब बूढ़े हो चले हैं। बच्चे अलग-अलग पेशे में चले गये हैं। स्त्रियां कुछ बनाती हैं तो बाज़ार में बनिया की दुकान पर दे आती हैं। बनिया इनके सामानों को बेचकर कुछ पैसा इन्हें थमा देते हैं और मुनाफ़ा खुद रख लेते हैं। लेकिन भोला धरकार के परिवार के साथ सहूलियत यह है कि एक गांव में रह जाने के चलते उनके बच्चों ने थोड़ी बहुत बुनियादी तालीम हासिल कर ली।

धरकार समाज की पहचान एक शिल्पी के रूप में है। इस समुदाय का पारंपरिक पेशा बांस से डलिया, मौंनी, टोकरी, बेना, दउरी बनाना हैं। इस समाज के लोग वेनवंशी उपनाम भी लगाते हैं। पलायन इस समाज की बड़ी समस्या है। उत्तर प्रदेश में यह लोग अनुसूचित जाति में आते हैं और समाज में इनकी स्थिति अति-दलित की है। राजा वेन धरकार समाज के पूर्वज हैं। ये लोग बेंत से कुर्सी, सोफा आदि बनाते हैं।

धरकार समाज की एक उपजाति बांसफोड़ कहलाती है। यह घुमंतू तथा खानाबदोश जातियों की तरह जीविकोपार्जन के लिए बांस की तलाश में अपने डेरे बदलती रहती है। सड़क किनारे सपरिवार झुंड बनाकर अस्थायी डेरा डालकर रहने को मजबूर हैं।

बता दें कि उत्तर प्रदेश की अनुसूचित जाति सूची में बांसफोर, बंसोर और धरकार अलग अलग जाति के रूप में अधिसूचित हैं, जबकि तीनों बांस का ही काम करते हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में बांसफोर समुदाय की जनसंख्या 59,025 है, जोकि कुल जनसंख्या का 0.2 प्रतिशत है। बांसफोर जातियां मुख्यतः फर्रुखाबाद, सहारनपुर, पीलीभीत, सीतापुर, खीरी, हरदोई, प्रतापगढ़ और लखनऊ, मिर्जापुर, ललितपुर में रहते हैं। सीमांत आर्थिक अस्तित्व जीवन जीते हैं। 

बंसोर या बसोर जाति के लोग भी यही काम करते हैं। ये लोग जालौन, हमीरपुर, महोबा, झांसी, कानपुर और बांदा जिले में मिलते हैं। बसोर जाति की जनसंख्या 1,37,013 है। जोकि कुल जनसंख्या का 0.4 प्रतिशत है। 

धरकार या धारकर मुख्य रूप से पूर्वांचल के ग़ाज़ीपुर, आजमगढ़, इलाहाबाद, गोंडा और गोरखपुर में रहते हैं। इनकी जनसंख्या 94,610 है, जो प्रदेश की कुल आबादी का 0.3 प्रतिशत है। 

(संपादन : राजन/नवल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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