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आंखन-देखी : सावन और मलमास में मांस विक्रेता दलित-बहुजनों के समक्ष रोजी-रोटी का संकट

उत्तर प्रदेश में अमूमन यह एक आम धारणा है कि बकरा काटने और मांस बेचने वाले मुस्लिम समुदाय के लोग होते हैं। इस अर्थ में चिकवा और कसाई शब्द बहुत प्रचलित है। जबकि इसमें हिंदू समाज के चक जाति के लोग भी शामिल हैं, जो खटिक समुदाय की एक उपजाति मानी जाती है। बता रहे हैं सुशील मानव

सावन का महीना लगे अभी एक पखवारा ही बीता है। बीच में एक महीने का मलमास (अधिमास) रहेगा और फिर 15 दिन का सावन लगेगा। यानि कांवड़ यात्रा अभी डेढ़ महीना जारी रहेगा। कांवड़ यात्रा शुरू होने से पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने एक फरमान ज़ारी करके आदेश दिया कि कांवड़ यात्रा वाली सड़कों के किनारे मीट की दुकानें और रेस्टोरेंट नहीं खुलेंगे। इसका नतीजा यह हुआ कि जो फुटपाथ के छोटे मांस विक्रेता थे, उनके सामने पूरे दो महीने तक के लिए रोटी-रोजी का संकट खड़ा हो गया है। नोएडा के गोश्त विक्रेताओं ने इसे अपनी आजीविका पर हमला बताया है। 

प्रयागराज-जौनपुर-आजमगढ़-गोरखपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित फूलपुर तहसील के बाबूगंज बाज़ार, सहसों बाज़ार, चिलौड़ा बाज़ार में सड़क किनारे साप्ताहिक बाज़ार लगता है। जहां सब्जियों की दुकानों के एकदम किनारे मछली, मुर्गा और बकरे का गोश्त बेचने वालों की दुकानें लगती आ रही हैं। फिलहाल कांवड़ यात्रा के रूट में होने के नाते यहां अब गोश्त की दुकानें नहीं लग रही हैं। हमने इस विषय पर कुछ लोगों से बात करने की कोशिश की तो अधिकांश लोगों ने बात करने से ही मना कर दिया। कुछ ग्रामीण दुकानदार जो साप्ताहिक बाज़ारों में घूम-घूमकर सड़क किनारे फुटपाथ पर मांस बेचने का काम करते आ रहे हैं, वो खेतों और बाग़ों को एक विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करने की छोटी-सी कोशिश करते दिखे। हमने एक तस्वीर खींचने के लिए कैमरे का फोकस उधर किया ही था कि एक दुकानदार दौड़ता आया और करुणा-कातर आवाज़ में बोला– “ग़रीब आदमी हूं साहेब, हमें भी जीने-खाने दीजिए। आमदनी का और कोई ज़रिया नहीं है। घर में छोटे-छोटे बच्चे हैं।”

हमने दिलासा देने की कोशिश की कि हम उस समूह से नहीं है, बल्कि पत्रकार हैं, और भरोसा दिलाते हैं कि आपकी रोटी-रोज़ी के ख़िलाफ़ इस तस्वीर का इस्तेमाल नहीं करेगें। लेकिन उनका भरोसा नहीं जीत सका। तब तक और कई लोग आ गये और फोटो डिलीट करवाकर ही माने।   

सावन के दौरान अपनी दुकान पर निराश खड़ा एक विक्रेता (फाइल फोटो)

डर नहीं लगता सावन में गोश्त बेचते? जानते नहीं खेत और बाग़ में भी कोई छुपी सड़क निकल सकती है। या कहीं से लाठी-डंडों से लैस भगवा गमछाधारियों का झुंड ‘जय श्री राम’ का उद्घोष करते हुए आप सबको घेर ले। इसके जवाब में एक युवा गोश्त विक्रेता कहता है कि डर तो लगता है साहेब। लेकिन भूख का सवाल हर डर को छोटा कर देता है। तभी उसकी बात को संभालते हुए बूढ़ा दुकानदार कहता है कि गांव में अभी माहौल उस तरह से खराब नहीं हुआ है।  

एक अन्य दुकानदार ने कहा कि इससे उनके परिवार के सामने भरण-पोषण का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। सरकार को वैकल्पिक व्यवस्था बनानी चाहिए ताकि हम लोगों के परिवार की रोटी रोजी न छिने।

उत्तर प्रदेश में अमूमन यह एक आम धारणा है कि बकरा काटने और मांस बेचने वाले मुस्लिम समुदाय के लोग होते हैं। इस अर्थ में चिकवा और कसाई शब्द बहुत प्रचलित है। जबकि इसमें हिंदू समाज के चक जाति के लोग भी शामिल हैं, जो खटिक समुदाय की एक उपजाति मानी जाती है। बुंदेलखंड और प्रयागराज मंडल में चक को ही चिकवा और कानपुर बरेली आगरा मंडल में चिक कहा जाता है। मुस्लिम समुदाय में भी एक चिक जाति होती है जो यही काम यानि बकरा पालने, बेचने, बकरा काटकर उसका मांस बेंचने का काम करती है। जबकि खटिक जाति का पुश्तैनी काम भी बकरे के मांस काटने और बेचने का रहा है। 

वित्तीय वर्ष 2003-04 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने हरदोई, बदायुं, आगरा, फ़िरोज़ाबाद, एटा, फर्रूखाबाद, मैनपुरी, इटावा, चित्रकूट और बांदा जिलों में व्यापक स्तर पर इस तथ्य को लेकर अध्ययन सर्वेक्षण करवाया था कि क्या चक, चिक और हिंदू चिकवा एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं तथा खटिक जाति की एक उपजाति हैं या नहीं। और सर्वे में यह बात प्रमाणित भी हुआ था। 

उत्तर प्रदेश में खटिक जाति अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल है। वहीं इसकी उपजाति चक (चिक, चिकवा) ओबीसी वर्ग में सूचीबद्ध है। वर्ष 1995 में मायावती सरकार ने चक जाति को पिछड़े वर्ग में शामिल किया था। 76 जातियों की ओबीसी सूची में चिकवा, कसाब (कुरेशी), कसाई, चक को एक साथ 17वें स्थान पर अधिसूचित किया गया है। चिकवा और कुरेशी कसाब पूरी तरह से मुस्लिम हैं जबकि चक हिंदू हैं। वहीं खटिक मूल रूप से वह जाति है जिनका काम यज्ञ में पशु बलि देना होता था। संस्कृत भाषा में इनके लिए शब्द है– खट्टिक। ये वाममार्गी मंदिरों में पशु बलि का कार्य करते थे। पुराणों में खटक ब्राह्मणों का भी उल्लेख है, जो पशु बलि देते थे। जिनके हाथ से दी गई बलि ही स्वीकार होती थी। खटिक शब्द खटक से बना है। यानि जो खटका (एक झटके में) मांस काटे। कसाई (मुस्लिम) ज़बा (रेतकर गर्दन काटते) और खटिक झटके से।         

सामाजिक कार्यकर्ता भीमलाल बताते हैं कि घूरपुर बाज़ार में (मिर्जापुर-प्रयागराज रोड पर) मीट-चिकेन–मछली की दुकानें खुलती हैं। सारी दुकानें हिंदू समुदाय के लोगों की है शायद इसलिए प्रशासन के डंडे से बची हुई हैं। हालांकि बकरा यहां इस रोड पर नहीं कटता है। वे आगे कहते हैं कि सही चीज तो यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार यह सब साल 2016 में सत्ता में आने के बाद से ही करती आ रही है। उत्तर प्रदेश में किन-किन सड़कों से कांवड़ यात्रा गुज़रना है, उसका रोड मैप तो सरकार के पास है ही। सरकार उसी के मुताबिक सड़क यातायात और सुरक्षा के तमाम इंतज़ाम करती है। तो इसके साथ ही सरकार यदि एक छोटा-सा आंकड़ा जुटा लेती कि इन सड़कों पर कितने लोगों की मीट की दुकानें चलती हैं। जब दो महीने जब उनकी दुकानें बंद रहेंगीं उस दरमियान गुज़र-बसर लायक एक व्यवाहारिक धनराशि सरकार उन पीड़ित दुकानदारों के के खाते में डाल देती, तो इससे उनके परिवारों की आर्थिक मदद हो जाती और दुकान बंद होने से उनका परिवार भी संकट में नहीं पड़ता। 

बता दें कि एक जुलाई, 2023 को प्रयागराज जिले के पुलिस लाइन सभागार में पुलिस महानिदेशक विजय कुमार और प्रमुख सचिव (गृह) संजय प्रसाद ने मीटिंग के बाद दिशा निर्देश ज़ारी किया था कि कांवड़ यात्रा के दौरान पहले की तरह रास्ते में गोश्त और शराब की दुकानें बंद रहेंगी। इस मीटिंग में प्रयागराज, कानपुर, झांसी और चित्रकूट मंडल के मंडलायुक्त, पुलिस आयुक्त, जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक शामिल हुए थे।   

वहीं कांवड़िया मार्ग पर वाराणसी नगर निगम के पशु चिकित्साधिकारी डॉ. अजय प्रताप ने मीडिया से कहा था कि शहर में कई दुकानों को चिह्नित करके दुकानदारों से कहा गया है कि सावन में दुकान न खोलें। वर्ना मुक़दमा दर्ज़ होगा। वाराणसी के सभी रेलवे स्टेशनों पर रेलवे ने एक और क़दम बढ़ाते हुए लहसुन व प्याज पर भी पाबंदी लगा दी। वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन निदेशक गौरव दीक्षित ने सावन शुरू होते ही एक आदेश की जानकारी देते हुए मीडिया से कहा था कि कंट्रोल रूम से स्टेशन परिसर की 24 घंटे निगरानी शुरू हो गई है। रेलवे स्टेशन तक के फूड प्लाजा और खाद्य स्टॉल संचालकों से बिना लहसुन-प्याज का खाना परोसने को कहा गया है। 7 जुलाई को ग़ाज़ियाबाद और नोएडा में भी मांस की दुकानें बंद रखने के निर्देश जिला प्रशासन की ओर से ज़ारी किए गए थे। 

इस एक पखवारे में कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए है, जिनमें देखा गया कि विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के लोग सावन में मटन-चिकन की दुकान खोलने वालों को मारते-धमकाते दुकानें बंद कराते दिख रहे हैं। 

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)

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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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