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योगी सरकार के निशाने पर दलित छात्रावास

ऐसा नहीं है कि यह केवल इलाहाबाद जैसे एक जिले में हो रहा है। इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधछात्र मनीष कुमार बताते हैं कि उनके पैतृक जिले आजमगढ़ में प्रोफ़ेसर तुलसीराम जिस हॉस्टल में रहते थे, वह भी एक दलित हॉस्टल था। उसे भी बंद कर दिया गया है। बता रहे हैं सुशील मानव 

दलित छात्र उच्च शिक्षा ग्रहण करने से कैसे वंचित रखे जाएं, इसके लिए तमाम तरकीबें इजाद की जा रही हैं। एक उदाहरण है फ़ीस बढ़ोत्तरी। इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में छात्र पिछले एक साल से 400 गुना फ़ीस वृद्धि के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करते रहे हैं। दूसरा तरीका है उच्च शिक्षण संस्थानों के बजट में कटौती और निजी संस्थानों को प्रोत्साहन देना। और अब तीसरा तरीका जो उत्तर प्रदेश की योगी सरकार द्वारा इजाद की गई है, वह है दलित छात्रों के छात्रावासों को खत्म कर देना।

 

यह किंवदंती नहीं है कि इलाहाबाद उत्तर प्रदेश में उच्च शिक्षा का गढ़ है। यहां पूर्वांचल के तमाम जिलों के दलित बहुजन छात्र उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए आते हैं। ग़रीब घरों के बच्चों के लिए फ़ीस और किताबों का इंतज़ाम करना ही दूभर है, उस पर शहर में रहने के लिए एक अदद कमरा लेना, बिजली-पानी का बिल देना आदि उनके शिक्षा हासिल करने के उम्मीदों को हतोत्साहित करता है। ऐसे में शहर में मौजूद तमाम दलित छात्रावास ग़रीब छात्रों को सहारा देते थे। लेकिन अब उनसे यह सहारा भी छीना जा रहा है। 

एक-एक करके शहर के दलित छात्रावासों को तोड़कर ज़मीन भू-माफियाओं के सुपुर्द किया जा रहा है। अभी हाल ही में जिला प्रशासन ने इलाहाबाद के बालसन चौराहा स्थित दलित छात्रावास में रह गये ग़रीब छात्रों के सामान को बाहर सड़क पर फेंककर हॉस्टल को जर्जर बताकर ध्वस्त कर दिया है। 

काबिल-ए-गौर है कि सन् 1952 में इलाहाबाद के फूलपुर के प्रथम सांसद मसूरियादीन पासी द्वारा बालसन चौराहे के समीप मौजूद सरकारी ज़मीन (नज़ूल भूखंड) पर दलित छात्रावास का निर्माण करवाया गया था। इसके रख-रखाव और संचालन के लिए समाज कल्याण विभाग से लगातार उसके निधि आवंटित की जाती थी, जिससे पिछले कई दशकों से यह हॉस्टल सुचारू रूप से चल रहा था। 

पीड़ित छात्रों का कहना है कि इस हॉस्टल की ज़मीन पर शुरू से भू-माफिया और धन्ना सेठों की नज़र थी, जिनके प्रभाव में आकर खासकर के मौजूदा योगी सरकार ने ना सिर्फ़ समाज कल्याण से आवंटित होने वाले निधि पर रोक लगाई, बल्कि इसको जर्जर होने के लिए छोड़ दिया और अब उसी जर्जर इमारत को आधार बनाकर जबरन छात्रों को इस छात्रावास से बाहर कर दिया गया तथा उसकी सीढ़ियों से लेकर कमरों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया है। इस हॉस्टल को बचाने के लिए जो छात्र आगे आए उन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। वहां उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है।

दलित छात्रावास बचाओ संघर्ष समिति का कहना है कि प्रयागराज प्रशासन भू-माफिया के इशारे पर चल रहा है। प्रशासन की मंशा है कि छात्रावास की जमीन स्थानीय भू-माफिया को दिया जाय, जो कि दलित छात्रावास के रहते मुमकिन नहीं था।

छात्रावास तोड़े जाने के खिलाफ प्रदर्शन करते छात्र व स्थानीय लोग

इलाहाबाद के अन्य दलित छात्रावास समेत कुल आठ छात्रावासों को बंद करने के लिए यही पैटर्न अपनाया जा रहा है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के आसपास स्थित जीबी पंत राजकीय छात्रावास, हिंदू छात्रावास राजापुर, गणेश शंकर विद्यार्थी छात्रावास बलुआघाट, लाल बहादुर छात्रावास सलोरी, ईश्वर शरण छात्रावास सलोरी को कागजी कमी दिखाकर जिला प्रशासन ने उन्हें बंद करवा दिया है। जीबी पंत छात्रावास को नोटिस भेजा गया है कि छात्रावास जर्जर हो गया है, इसे खाली करें। ईश्वर शरण दलित छात्रावास (सलोरी इलाके में) एकदम जर्जर हो चुका है। वहां से छात्रों को भगा दिया गया है। कहने को तो ईश्वर शरण दलित छात्रावास बंद है पर वहां माफिया द्वारा दूसरे लोगों को रखकर उनसे हर महीने किराया वसूला जा रहा है। 50-60 कमरों वाले इस छात्रावास कोमाफिया चलाते हैं और महीने में अवैध तौर पर रहने वाले प्रत्येक लड़के से एक हजार रुपए लेते हैं। सामान्य तौर पर एक कमरे में दो छात्र रहते हैं। सलोरी में ही राजेंद्र छात्रावास था, वह बंद हो चुका है।

ऐसा नहीं है कि यह केवल इलाहाबाद जैसे एक जिले में हो रहा है। इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधछात्र मनीष कुमार बताते हैं कि उनके पैतृक जिले आजमगढ़ में प्रोफ़ेसर तुलसीराम जिस हॉस्टल में रहते थे, वह भी एक दलित हॉस्टल था। अपनी आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ में ‘आजमगढ़ में फाकाकशी’ उपखंड उन्होंने इसी होस्टल के इर्द-गिर्द लिखा था। दिलचस्प यह कि इस हॉस्टल को भी इसी तरीके से खत्म कर दिया गया। पहले उसका भी आवंटन रोक दिया गया और फिर जर्जर घोषित करके तोड़ दिया गया। बाद में सरकारी ज़मीन को भू-माफियाओं के नाम कर दिया गया। जबकि वहां पर तुलसीराम मेमोरियल बनाया जा सकता था। इस तरह यह दलित छात्रावासों को खत्म करने का मोडस ऑपरेंडिं है। 

शोधछात्र भानू बताते हैं कि ये सभी छात्रावास सरकारी जमीन पर बने हैं, जिसका स्वामित्व नगर निगम के पास है। एक तरह से ये हॉस्टल लीज पर बने हुए थे। सूबे का समाज कल्याण विभाग इन्हें मान्यता देता था और इन छात्रावासों के संचालन हेतु वित्तीय आवंटन जारी करता था। इसके लिए बाकायदा कमेटी वगैरह थी। लेकिन यह एक ट्रस्ट के रूप में ही काम करता था। लेकिन अभी उसका दस्तावेज उन लोगों के पास नहीं है। वे कुछ दिखा नहीं पा रहे हैं, इसकी वजह से प्रशासन कार्रवाई कर रहा है। अमूमन जर्जर होने का मतलब यह होता है कि नई इमारत का निर्माण करके जो चीज वहां चल रही थी, उसका संचालन फिर से किया जाए। लेकिन सरकार और प्रशासन के मंसूबे कुछ और हैं। 

वहीं इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्रों ने दलित छात्रावासों को बचाने के संघर्ष को संगठित रूप देने के लिए दलित छात्रावास बचाओ संघर्ष समिति का गठन किया है। इस समिति की तीन प्रमुख मांगे हैं कि बालसन स्थित दलित छात्रावास पर भू-माफ़िया और धन्ना सेठों को क़ब्ज़ा दिलाना बंद करके दलित छात्रावास की मरम्मत करवाकर छात्रों को वापस प्रवेश दिलवाया जाए। दूसरी मांग है कि बालसन स्थित दलित छात्रावास समेत राजापुर स्थित आदि हिंदू छात्रावास, बलुआघाट स्थित दलित छात्रावास, सलोरी स्थित ईश्वर शरण छात्रावास, पंत छात्रावास और राजेंद्र प्रसाद दलित छात्रावास को भी मरम्मत करवाया जाए। वहीं तीसरी मांग है कि दलित छात्रावासों को समाज कल्याण से आवंटित होने वाली राशि को बहाल किया जाए। 

इस बीच प्रशासन की कार्रवाईयों के शिकार छात्र हो रहे हैं। मसलन, बलिया जिले के चंदन कुमार ईश्वर शरण डिग्री कॉलेज इलाहाबाद में शोधछात्र हैं। वे बेहद ग़रीब पृष्ठभूमि से आते हैं। अपनी फ़ीस भरने तक के लिए उन्हें उधार लेना पड़ा है। ऐसे में उन्हें रहने के लिए किराये के कमरे का ख़र्च उठाना बहुत मुश्किल हो रहा है। उन्होंने आंबेडकर छात्रावास में कमरे के लिए प्रयास किया पर नहीं मिला। जर्जर ईश्वर शरण दलित छात्रावास में उन्होंने प्रयास किया तो वहां अवैध तरीके से रहने वालों द्वारा उनसे कहा गया कि तेलियरगंज के आंबेडकर छात्रावास में धोबी रहते हैं, यह चमारों को नहीं मिलता। 

मीडिया स्टडीज के छात्र आशुतोष कुमार दूबे भी दलित छात्रावास तोड़े जाने के ख़िलाफ़ हो रहे आंदोलन का हिस्सा थे। और यूनिवर्सिटी कैम्पस में अपनी आकस्मित मौत से पहले वो आंदोलन स्थल पर गये थे। 12 जुलाई को उनकी मौत को लेकर छात्र लगातार यूनिवर्सिटी प्रशासन को जिम्मेदार बताते हुए विरोध करने पर 14 छात्रों को जो कि दलित छात्रावास बचाओ आंदोलन में हिस्सा लेते हैं, उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज़ करके उन्हें गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया जाता है। छात्र मनीष कुमार को बिना अनुमति धरना प्रदर्शऩ कर परिसर को अशांत करने और पूर्व आईपीएस अमिताभ ठाकुर को कैम्पस में बुलाकर परिसर को अस्थिर करने का आरोप लगाकर निलंबित कर दिया गया। हालांकि पिता के अनुरोध के बाद उनका निलंबन वापिस हो गया। वहीं दो पूर्व छात्र अजय यादव सम्राट और अतेंद्र सिंह के ख़िलाफ़ विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा बार काउंसिल को पत्र भेजकर इनका लाइसेंस रद्द करने की संस्तुति की है। 

एक अगस्त को सूबे के मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के दस सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने प्रयागराज के जिलाधिकारी को ज्ञापन देकर मांग किया था कि जिन छात्रावासों को कागजी कमी दिखाकर खाली और बंद कराने का कार्य किया गया है उसे चालू कराया जाये और छात्रों का तत्काल पुनर्वास कराया जाए। इस प्रतिनिधिमंडल में सपा के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल, सपा राष्ट्रीय महासचिव इंद्रजीत सरोज, विधायक गीता शास्त्री, बाबा साहेब आंबेडकर वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मिठाईलाल भारतीया, राष्ट्रीय महासचिव राजू पासी, छात्र नेता अरविंद सरोज, संदीप यादव, गंगापार सपा जिलाध्यक्ष अनिल यादव, यमुनापार पप्पूलाल निषाद, महानगर अध्यक्ष सैयद इफ़्तेखार हुसैन शामिल रहे थे। 

 (संपादन : राजन/नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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