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उत्तर प्रदेश : सरकारी पट्टे की ज़मीन के लिए दलित परिवार के तीन लोगों की हत्या

गत 15 सितंबर, 2023 को घटित इस लोमहर्षक घटना के पीछे जातिगत भेदभाव के अलावा राज्य सरकार की वह नीति भी है, जिसके जरिए दलितों की जमीन कब्जाने की प्रक्रिया को आसान कर दिया गया है। पढ़ें, सुशील मानव की यह रपट

गत 15 सितंबर, 2023 को उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी जिले में पट्टे की ज़मीन पर क़ब्ज़े को लेकर एक दलित परिवार के तीन लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई। मृतकों में छह माह की एक गर्भवती महिला भी शामिल थी। हत्यारों का दुस्साहस यह कि उन्होंने पीड़ित परिवार के घर जाकर खुद बताया कि उनलोगों ने मार डाला है, जाकर लाश उठा लो। इस लोमहर्षक वारदात के सामने आने के बाद स्थानीय दलितों में गहरा आक्रोश बरकरार है। इसका प्रमाण यह कि गत 19 सितंबर, 2023 को पुलिसकर्मियों की मौजदूगी में एक आरोपी का घर फूंक दिया गया। इससे पहले घटनावाले दिन ही गुस्साई भीड़ ने सात आरोपियों के घरों और दुकानों में आग लगा दी थी। इस संबंध में 30-40 लोगों के खिलाफ़ बलवा का केस दर्ज़ किया गया है। लोगों में किस क़दर गुस्सा है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एडीजी भानु भाष्कर ने गांव में अस्थायी थाना बनाने का निर्देश दिया है। इंस्पेक्टर रोशनलाल और 11 दरोगा समेत 72 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। एएसपी (अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक) कैंप लगाकर मॉनिटरिंग कर रहे हैं। 

मामला प्रयागराज से सटे पड़ोसी जिले कौशाम्बी के मंझनपुर मोहिउद्दीनपुर गौस गांव के पंडा चौराहा स्थित बस्ती का है। बीते 15 सितंबर, 2023 की भोर में झोपड़ी के बाहर सो रहे पति-पत्नी और ससुर की गोली मारकर हत्या कर दी गई। बताया जा रहा है कि करीब दस बिस्वा पट्टे की ज़मीन पर झोपड़ी डाल लेने के चलते शिवसरन सरोज (28 वर्ष), उसकी छह माह की गर्भवती पत्नी बृजकली और ससुर होरीलाल सरोज (55 वर्ष) की गोली मारकर हत्या कर दी गई। पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने आननफानन में जेसीबी से गंगा किनारे गड्ढा खुदवाकर लाश को दफ़ना दिया।  

छविलाल गांव निवासी होरीलाल सरोज ने क़रीब दो साल पहले अपनी बेटी बृजकली की शादी कांकरबादा के शिवसरन सरोज से की थी। शिवसरन सरोज पंडा चौराहे पर एक किराये के कमरे में सहज जनसेवा केंद्र चलाता था। वहीं बृजकली आशा कार्यकर्ता थी। क़रीब तीन साल पहले शिवसरन सरोज ने गांव के ही लालचंद्र निर्मल की दस बिस्वा सरकारी पट्टे की ज़मीन को अपने नाम एग्रीमेंट करवाया था। इसी ज़मीन पर क़ब्ज़े को लेकर तीन पक्षों में विवाद चल रहा था, जिसमें एक पक्ष पीड़ित सरोज परिवार भी था। 

शिवसरन ने ज़मीन पर क़ब्ज़े को लेकर सिविल कोर्ट में ग्रामसभा के ख़िलाफ़ वाद भी दायर कर रखा था, जिसके ऊपर अदालत ने स्थगन आदेश दे रखा है। शिवसरन सरोज इसी ज़मीन पर एक झोपड़ी डालकर पत्नी और ससुर के साथ रहता था और हत्याकांड से ठीक एक दिन पहले ही उसने अपनी झोपड़ी में बांस का दरवाजा लगवाया था, जिसे यादव और चौहान जाति के दबंगों ने अपने जातीय वर्चस्व को दलितों की चुनौती समझ लिया। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक आरोपी दशरथ लाल चौहान ने खुद मृतक के भांजे के घर जाकर मार डालने और जाकर लाश उठाने की बात कही। पुलिस को यह बयान मृतक होरीलाल के बेटे सुरेश ने दी है। 

बता दें कि पंडा चौराहा स्थित 50 घरों की इस नई बस्ती में ज़्यादातर यादव और चौहान जाति के लोग रहते हैं। यादव और चौहान बस्ती में पासी शिवसरन का आकर बसना दबंग जातियों को अखर रहा था। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन दबंगों ने लालचंद्र निर्मल को भी ज़मीन पर क़ाबिज़ नहीं होने दिया था, जिसके चलते लालचंद्र ने ज़मीन शिवसरन सरोज को बेचकर दबंगों से अपनी जान छुड़ाई थी।

गत 15 सितंबर, 2023 को पासी समुदाय के तीन लोगों की दिनदहाड़े हत्या की ख़बर जब इनके मूल गांवों तक पहुंची तो आस-पास के तमाम गांवों के दलित समुदाय की गुस्सायी भीड़ ने मुख्य आरोपियों दशरथ लाल चौहान, सरोजा देवी, सुरेश सिंह, दुर्गा सिंह, अयोध्या सिंह, सुग्रीव सिंह और चरन सिंह के घर फूंक दिए। घर के बाहर खड़ी पांच बाइक और एक लोडर को भी फूंक दिया। भीड़ की ओर से फायरिंग भी की गई, जिसमें अनूप सिंह चौहान के पेट में गोली लगी। उन्हें इलाहाबाद के स्वरूप रानी अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। इतना ही नहीं गुस्सायी भीड़ ने ज़मीनी विवाद को सुलझाने के बजाय टाल-मटोल करते आ रहे चायल तहसील के तहसीलदार पुष्पेंद्र गौतम और अंचलाधिकारी मिथिलेश कुमार को पुलिस के सामने दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। 

घटना के बाद आक्रोशित परिजन व स्थानीय लोग

होरीलाल सरोज के बेटे सुभाष की तहरीर पर छबिलवा गांव के गुड्डू यादव, अरविंद सिंह, पथहा गांव के अमर सिंह, मोहीउद्दीनपुर गांव के अजय सिंह, अनुज सिंह, राजेंद्र सिंह, सुरेश व अजीत के ख़िलाफ़ हत्या, बलवा, और एससी एसटी एक्ट के तहत मुक़दमा दर्ज़ करवाया गया है। पट्टे की जिस ज़मीन को लेकर तीन जानें ले ली गईं, उस ज़मीन पर पीएसी का सिपाही सुरेश सिंह भी दावा करता आ रहा है। पीएसी सिपाही सुरेश सिंह उस ज़मीन का पट्टाधारक से एग्रीमेंट कराने का दावा करते हुए उस ज़मीन को बेचना भी शुरू कर दिया था, जिसके चलते उसका पीड़ित पक्ष से तकरार भी चल रहा था। सुरेश सिंह मोहिउद्दीनपुर गांव का ही रहने वाला है और उसका घर मृतकों के घर के ठीक सामने है। 

भ्रष्ट प्रशासन की अनदेखी का नतीजा है ये कांड

इस हत्याकांड के बाद पुलिस प्रशासन कटघरे में है। पीड़ितों का आरोप है कि लगातार शिक़ायत के बावजूद पुलिस ने दबंगों के ख़िलाफ़ कभी कोई कार्रवाई नहीं की। वहीं गांव में चकबंदी चल रही है। ग्रामीण चकबंदी अधिकारियों पर भी आरोप लगा रहे हैं।

मृतक होरीलाल के दूसरे दामाद रामचंद्र बताते हैं कि उनके साढ़ू शिवसरन को हमेशा दबंग लोग धमकी देते थे। वे कहते थे– “तुम पासी बिरादरी का होकर हमारे बीच रहोगे। यहां से चले जाओ वर्ना जान से मार देंगे और उन लोगों ने मार ही डाला।”  

वहीं मृतक होरीलाल के बेटे सुभाष सरोज का कहना है कि उनके बहनोई शिवसरन सरोज ने पंद्रह दिन पहले ही थाना से लेकर एएसपी तक को लिखित शिक़ायत देकर अपनी हत्या की आशंका जताई थी, लेकिन प्रशासन ने उनकी शिक़ायत पर कोई कार्रवाई नहीं की। सुभाष ने आरोप लगाया है कि नायब तहसीलदार की लापरवाही के चलते यह घटना हुई है। राजस्वकर्मियों द्वारा उनके पक्ष में रिपोर्ट होने के बावजूद दबंग उन्हें उस ज़मीन से भगाना चाहते थे।     

वहीं मृतक के भांजे सुरेश चंद्र का आरोप है कि ग्रामप्रधान अमर सिंह और सिपाही सुरेश सिंह के लोग लगातार जान से मारने के धमकी देते आ रहे थे। वो लोग धमकी में कहते थे कि जब मारेंगे 8-10 लोगों को इकट्ठे मारेंगे और जेल जाएंगे। शिक़ायत करने पर भी पुलिस ने कोई कार्रवाई उनके ख़िलाफ़ नहीं की।  

यह हत्याकांड पट्टे की ज़मीन को लेकर हुआ है। अतः जांच दल यह पता लगाने की कोशिश कर रहा है कि इसमें राजस्व विभाग की ओर से कहां चूक हुई जो विवाद का कारण बनी। इसके लिए डीएम और एसपी कौशाम्बी की ओर से अलग-अलग जांच का आदेश दिया गया है। मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत ने मीडिया को दिए बयान में कहा है कि पीड़ितों ने चकबंदी व तहसील के कर्मचारियों के ख़िलाफ़ गंभीर आरोप लगाए हैं। इसकी जांच कराई जा रही है। दोषी पाए जाने पर इनके ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की जाएगी। 

वहीं प्रयागराज जोन के एडीजी भानु भाष्कर ने अपने मीडिया वक्तव्य में कहा है कि आठ लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज़ कर लिया गया है। खुलासे के लिए चार सीओ की अगुवाई में आठ टीमें बनाई गई हैं। गांव में तनाव के माहौल को देखते हुए पीएसी की तीन कंपनियों के साथ क्षेत्र की पुलिस बल भी तैनात की गई है। 

हालांकि कौशाम्बी जिले के सरायअकिल कोतवाली क्षेत्र के युसुफपुर गांव में भी तीन दशक पहले पट्टे की ज़मीन को लेकर तीन लोगों की हत्या की गई थी। साल 1993 में युसुफपुर गांव निवासी जमील अहमद ने ज़मीन के लिए अपने सगे भाई अनीस अहमद, बेग़म शबाना और दो साल के बेटे टीपू की गोली मारकर हत्या कर दी थी। अनीस और शबाना की तीन बेटियां तुबा, शाहीन और साहिबा जिंदा बच गई थी, जिन्हें उनके नाना रायपुर उठा ले गये थे। बाद में हत्यारे जमील के बेटों कफ़ील और वकील अहमद ने राजस्व विभाग के संबंधित अधिकारियों से मिलकरअभिलेखों में हेराफेरी करके अपने चाचा अनीस की ज़मीन अपने नाम करा, खतौनी में दोनों को नाम भी दर्ज़ हो गया। जबकि अनीस की हत्या के बाद उनकी बेटियों ने वापिस आकर सरायअकिल थाने में कफील अहमद और वकील अहमद के ख़िलाफ़ धोखाधड़ी व हत्या की धमकी का केस दर्ज़ करवाया है।   

पासी बाहुल्य क्षेत्र है कौशाम्बी

कौशाम्बी जिला दलित बाहुल्य है। दलितों में भी पासी समुदाय के लोग ज़्यादा हैं। तीन विधानसभाओं में से प्रत्येक में दलित मतदाताओं की संख्या सवा लाख से ज़्यादा है। वहीं जिस मंझनपुर क्षेत्र में यह घटना हुई है, उस मंझनपुर से सपा के राष्ट्रीय महासचिव इंद्रजीत सरोज विधायक हैं। जातीय आबादी को देखें तो मंझनपुर में डेढ़ लाख दलित मतदाता हैं। जबकि यादव 21 हजार, लोध 35 हजार, पटेल 25 हजार, ब्राह्मण 40 हजार, वैश्य 30 हजार, मुस्लिम 10 हजार और धोबी 22 हजार हैं।  

हत्याकांड के बाद इस क्षेत्र में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ने लगी है। रविवार को कांग्रेस महासचिव सुरेश पासी पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे थे। जन शक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और सांसद चिराग पासवान भी पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे। सपा विधायक पूजा पाल भी पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचीं। कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव प्रदीप नरवाल के नेतृत्व में सोमवार को 26 सदस्यीय प्रतिनिधि दल पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचा। कांग्रेस ने पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए कौशाम्बी से लखनऊ तक की पदयात्रा निकालने की घोषणा की है। गत 18 सितंबर, 2023 को पूर्व मंत्री आर.के. चौधरी के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी का एक प्रतिनिधि मंडल भी पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचा। सुभासपा का प्रतिनिधि दल भी पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचा। योगी सरकार में समाज कल्याण मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) असीम अरुण भी पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे।  

बस्ती में पासी बर्दाश्त नहीं

गत 17 सितंबर को ही प्रयागराज प्रभारी सुनील मौर्या की अगुवाई में भाकपा माले के तीन सदस्यीय जांच दल ने भी मौका-ए-वारदात पर पहुंचकर पीड़ित परिवार से भेंट की। अपनी जांच रिपोर्ट में माले ने बताया है कि घर के नाम पर एक झोपड़ी जिस पर तिरपाल डाली गई है, उसी में रहकर मृतक और उनका परिवार गुज़ारा कर रहा था। हत्या के पीछे मुख्य वजह ज़मीन ही थी। साथ ही चौहान और यादव जाति के लोग नहीं चाहते थे कि उनकी बस्ती में पासी जाति के लोग आकर बसें। हत्यारोपी यादव और चौहान जाति से आते हैं, जोकि अपने आप को क्षत्रिय जाति के जोड़ते हैं। 

मृतक होरीलाल की बड़ी बेटी का कहना है कि यह सरकारी ज़मीन है, जिस पर उनके परिवार के लोगों ने एक दशक से भी ज़्यादा समय पहले पट्टा करवाया था। जिन लोगों ने हत्या की है, वे बिना पट्टे ही छह बीघे ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ा करके रह रहे हैं। उनको स्थानीय भाजपा सांसद और कई अऩ्य प्रभावशाली लोगों का संरक्षण प्राप्त है। राजनीतिक संरक्षण के चलते ही उनका मनोबल बढ़ा। 

वहीं तमाम सामाजिक संगठन भी अपने-अपने तरीके से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इस क्रम में 19 सितंबर, 2023 को सामाजिक संगठनों के डेढ़ सौ लोगों ने डायट मैदान से कलेक्ट्रेट तक पैदल मार्च निकालकर जातीय हिंसा विरोधी नारे लगाए और राज्यपाल के नाम एक ज्ञापन डीएम सुजीत कुमार को सौंपा।  

दलितों को मिले पट्टे की ज़मीनों को डरा धमकाकर क़ब्ज़ा किया जा रहा है

‘बहुजनकरण’ पाक्षिक के संपादक और इलाहाबाद व आसपास के जिलों की ज़मीनी व जातीय राजनीति पर नजर रखने वाले विशम्भर पटेल कहते हैं कि दलित जातियों के पास ज़मीन वैसे ही नहीं है। पट्टे के ज़रिए ग्रामसभा की थोड़ी-सी ज़मीन उन्हें किसी तरह मिली भी है तो वो घूम-फिरकर वापिस दबंग जातियों के क़ब्ज़े में चली जा रही है। प्रॉक्सी तरीके से दूसरे के नाम पर ज़मीन का एग्रीमेंट करवाकर दबंग जातियों के लोग पट्टे की ज़मीन अपने क़ब्ज़े में ले रहे थे। अब ‘यूपी टाउनशिप नीति 2023’ ने उनके मंसूबों को पूरा करने के लिए और भी आसान बना दिया है।   

‘उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन व भूमि सुधार अधिनियम-1950’ का उल्लेख करते हुए विशम्भर पटेल बताते हैं कि वह क़ानून दलित आदिवासी लोगों को ज़मीन का मालिक बनाने और उनकी ज़मीनों की रक्षा करने के लिए था ताकि दलितों को दिए गये पट्टे आदि का ज़मीन गैरदलित जतियों के लोग क़ब्ज़ा नहीं कर सकें। इस नियम के तहत सरकारी पट्टे की ज़मीन को बेंचने-ख़रीदने के लिए भी कलेक्टर की मंजूरी ज़रूरी होती है। जिलाधिकारी के आदेश का मक़सद दलित और आदिवासी समुदाय की ज़मीनों को आसानी से डरा धमकाकर ख़रीदने क़ब्ज़ाने से रोकना था, ताकि उनके पास उनकी ज़मीन बची रहे, जिसका उनकी राजनीतिक और सामाजिक स्थिति सुदृढ़ करने के लिए बहुत ज़रूरी है। मंजूरी देते समय जिलाधिकारी यह देखता था कि ज़मीन बेचने के बाद अनुसूचित जाति के व्यक्ति के पास 3.125 एकड़ ज़मीन बचेगी या नहीं। यदि उसके पास 3.125 एकड़ से कम ज़मीन बच रही हो तो जिलाधिकारी मंजूरी नहीं देता था। लेकिन 2015 में सूबे की तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार ने इस विधेयक में सुधार कर दिया था, जिसके तहत अनुसूचित जाति के व्यक्तियों के खास ज़रूरत के मद्देनज़र उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता (संशोधन) विधेयक 2015 में तीन शर्तें जोड़ी गई। इसमें पहली शर्त थी कि बेचने वाला का कोई वारिस न हो, दूसरा अनुसूचित जाति का व्यक्ति किसी दूसरे प्रदेश में या कहीं और बस गया हो। और तीसरा परिवार का कोई सदस्य गंभीर जानलेवा बीमारी से ग्रस्त हो। इन शर्तों के साथ वो गैरदलित को भी ज़मीन बेच सकता था। इस संशोधन के बाद सूबे में बहुत से दलितों और आदिवासियों की ज़मीनें बिकीं। 

इस साल जून महीने में योगी कैबिनेट ने ‘यूपी टाउनशिप नीति 2023’ को मंजूरी दी, जिसके तहत अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की ज़मीन ख़रीदने के लिए डीएम की मंजूरी की शर्त खत्म हो गई है और अब दलितों-आदिवासियों की ज़मीनें कब्ज़ाना अपेक्षाकृत आसान हो गया है।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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