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‘मनखे मनखे एक समान’ का नारा देने वाले गुरु घासीदास

गुरु घासीदास ने बुद्ध, कबीर और रैदास के द्वारा शुरू किए गए आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए शोषित वंचित समाज को जागरूक करने का बीड़ा उठाया। उनका मानना था कि दूसरों से अपना हक अधिकार मांगने से पहले हमें स्वयं में सुधार करने की जरूरत होती है। उनकी जयंती पर पढ़ें, मनीष भट्ट मनु का यह आलेख

गुरु घासीदास (18 दिसंबर, 1756 – 1850) ने एक समतामूलक समाज की परिकल्पना की। उन्होंने कहा– “मनखे-मनखे एक समान”। उनका कहना था कि सभी मनुष्य एक समान है। कोई छोटा या बड़ा नहीं है। ईश्वर ने सभी मनुष्यों को एक जैसा बनाया है। इसलिए जन्म के आधार पर किसी के साथ भी कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने वर्ण-भेद से परे, समाज की स्थापना पर बल दिया, जो कि जातिविहीन और आत्मनिर्भरता के सिद्धांत पर आधारित था। इसका निहितार्थ जातियों में बंटे हुए समाज को एक सूत्र में बांधना और समुन्नत समाज की स्थापना करना था।

 

वे स्पष्ट तौर पर मानते थे कि छुआछूत का भाव और ऊंच-नीच का व्यवहार मनुष्य को एक-दूसरे से अलग करता है। उनके सिद्धांत को ही आज सतनामी दर्शन का नाम दिया जाता है। उनके सिद्धांत के दो महत्वपूर्ण पक्ष थे। पहला, मनुष्य के भीतर चेतना पैदा करना और दूसरा, जाति प्रथा समाप्त कर एक समतावादी समाज की स्थापना करना।

गुरु घासीदास ने उस समय की सामाजिक विषमता को देखा, जिसमें समाज का एक वर्ग हर स्थान पर भेदभाव का शिकार हो रहा था। उनके पास आर्थिक संसाधन भी नहीं थे। वह वर्ग जमींदारों की दया-दृष्टि पर जी रहा था। जमींदारों के द्वारा न केवल आर्थिक शोषण किया जा रहा था, बल्कि सामाजिक रूप से भी इस वर्ग के लोगों को एक तरह से बहिष्कृत करके रखा गया था। न तो उनके पास किसी प्रकार की भूमि का स्वामित्व था और न ही किसी अन्य प्रकार की उनके पास संपत्ति थी। किसी को पढ़ने-लिखने का अधिकार भी नहीं था। वे जमींदार के लिए केवल एक मजदूर थे। 

गुरु घासीदास की जन्मस्थली गिरौदपुरी में स्थापित जैतखाम

उस समय छत्तीसगढ़ के क्षेत्र पर मराठों का शासन था। गुरु घासीदास दलितों की दयनीय स्थिति से बहुत चिंतित थे, क्योंकि समय के प्रवाह से समाज में उनकी स्थिति अत्यधिक गर्हित हो चुकी थी। वे अज्ञानता, बीमारी, शोषण के शिकार तो थे ही, मदिरापान और अंधविश्वास आदि के कारण उनका नैतिक पतन भी हो रहा था। 

यह सब देख गुरु घासीदास ने बुद्ध, कबीर और रैदास के द्वारा शुरू किए गए आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए शोषित वंचित समाज को जागरूक करने का बीड़ा उठाया। उनका मानना था कि दूसरों से अपना हक अधिकार मांगने से पहले हमें स्वयं में सुधार करने की जरूरत होती है, इसलिए उन्होंने समाज के लोगों में व्याप्त सामाजिक बुराइयों यथा– मूर्ति पूजा, आडंबर, नशाखोरी आदि से दूर रहने की बात कही थी। 

अध्यात्म के स्तर पर गुरु घासीदास का मानना था कि सत्य ही ईश्वर है। हमेशा व्यक्ति को सच ही बोलना चाहिए। उन्होंने समाज को आर्थिक एवं सांस्कृतिक रूप से मजबूत करने का अभियान भी छेड़ा। वे स्वयं भी एक किसान के रूप में काम करते थे। खेती में ज्यादा से ज्यादा कैसे उत्पादन बढ़ाया जा सकता है, इसके लिए मिश्रित खेती के बारे में वे लोगों को जागरूक किया करते थे। उनका मानना था कि व्यक्ति आर्थिक रूप से मजबूत होने से ही स्वाभिमानी हो सकता है।

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सन् 1993 में लिखे गये रायपुर जिला गजेटियर के अनुसार गुरु घासीदास जी का जन्म अगहन पूर्णिमा दिन सोमवार 18 दिसंबर, 1756 को एक किसान परिवार में ग्राम गिरोदपुरी, जिला रायपुर (वर्तमान में बलौदाबाजार) में हुआ था। 

घासीदास के पिता पवित्र दास संपन्न किसान थे। पवित्र दास के पांच बेटे हुए– मेदिनी दास, दुकालु दास, सगुन दास, मंहगु दास और घासीदास। घासीदास की पीढ़ी 1756 से 1850 ई. तक मानी गई है। सामाजिक भेदभाव एवं ऊंच-नीच की प्रताड़ना से पीड़ित लोगों का कष्ट देखकर गुरु घासीदास ने भी छत्तीसगढ़ में पीड़ित समाज को जागृत एवं संगठित करने के उद्देश्य से सतनाम पंथ का सूत्रपात किया। 

गुरु घासीदास के सात वचन सतनाम पंथ के सप्त सिद्धांत के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिनमें सतनाम पर विश्वास, मूर्ति पूजा का निषेध, वर्ण भेद से परे रहना, हिंसा का विरोध, व्यसन से मुक्ति, परस्त्रीगमन की वर्जना और दोपहर में खेत नहीं जोतना हैं। इनके द्वारा दिये गये उपदेशों से समाज के असहाय लोगों में आत्मविश्वास, व्यक्तित्व की पहचान और अन्याय से जूझने की शक्ति का संचार हुआ। सामाजिक तथा आध्यात्मिक जागरण की आधारशिला स्थापित करने में ये सफल हुए और छत्तीसगढ़ में इनके द्वारा प्रवर्तित सतनाम पंथ के आज भी लाखों अनुयायी हैं। 

गुरु घासीदास का सतनाम आंदोलन मूल रूप में एक जनक्रांति थी, जो वास्तव में सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक उत्पीड़न से मुक्ति का मार्ग दिखाती थी और मनुष्य को अमानवीयता, झूठी नैतिकता, धार्मिक पाखंड और अंधविश्वास के गहरे दलदल से बाहर निकालती थी। यह आंदोलन दलित समाज को हीन भावना से उबारने और उनके भीतर आत्मविश्वास पैदा करने में भी समर्थ रहा। उनके भीतर का भय दूर हुआ। समाज में सम्मानजनक व्यवहार पाने के लिए राह बनी। कुरीतियों की जकड़न से मुक्ति और अपनी अस्मिता का बोध हुआ। आज छत्तीसगढ़ के मूलनिवासी समाज को समतामूलक समाज के रूप में देखा जाता है। इसमें गुरु घासीदास के सतनाम आंदोलन का बहुत बड़ा योगदान है। वर्तमान समय में जबकि समाज अनेक समाजिक कुरीतियों से जूझ रहा है, गुरु घासीदास और उनके सिद्धांतों की महत्ता और अधिक बढ़ जाती है।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

मनीष भट्ट मनु

घुमक्कड़ पत्रकार के रूप में भोपाल निवासी मनीष भट्ट मनु हिंदी दैनिक ‘देशबंधु’ से लंबे समय तक संबद्ध रहे हैं। आदिवासी विषयों पर इनके आलेख व रपटें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं।

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