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जेएनयू और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के बीच का फर्क

जेएनयू की आबोहवा अलग थी। फिर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में मेरा चयन असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद पर हो गया। यहां अलग तरह की मिट्टी है और अलग तरह का संघर्ष है। यहां पर मुझे बार-बार एहसास दिलाया गया कि मैं दलित हूं और कोटे से आया हूं। पढ़ें, प्रो. विक्रम हरिजन की आत्म-कहानी का अंतिम भाग

इसके पहले आपने पढ़ा – ‘मैंने बचपन में ही जान लिया था कि चमार होने का मतलब क्या है’अब आगे

जातिवादी प्रताड़ना झेलते-झेलते मैं दसवीं कक्षा तक आते-आते एक विद्रोही बन चुका था। बंगाल के समाज में राजा राममोहन राय का प्रभाव होने के नाते मैं भी उनकी ओर आकर्षित हुआ और मूर्तिपूजा का विरोध करने लगा। मेरे विश्वास और डर को टेस्ट करने के लिए कुछ दोस्तों ने एक बार एक प्रतिमा का अपमान करने की चुनौती दी, जिसे मैंने स्वीकार किया और प्रतिमा का अपमान करके दिखाया, क्योंकि मैं अपने दोस्तों को दिखाना चाहता था कि मेरे इस कृत्य की सज़ा मुझे कोई भगवान नहीं देगा। उस समय तो कुछ नहीं हुआ, लेकिन वर्षों बाद डॉ. आंबेडकर की जयंती पर उस घटना का जिक्र करने पर मुझे बहुत प्रताड़ित किया गया। जान से मारने की धमकी दी गई। इसे देखते हुए मैंने पुलिस से सुरक्षा मुहैया कराने की मांग की तो एक नामी मनुवादी अख़बार के पत्रकार नें मेरे सामाजिक आर्थिक हैसियत का मजाक उड़ाते हुए– ‘चलते हैं बाइक से, गनर की ख्वाहिश है’ शीर्षक से ख़बर छापा।

बड़े होने के साथ ही जातिगत संघर्ष बढ़ता गया। पश्चिम बंगाल के जे.के. नगर हाईस्कूल से मैंने दसवीं की परीक्षा पास की। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए गोरखपुर आ गया। वहां मेरी जाति की वजह से मुझे कमरा नहीं मिला। कई जगह लोग कहते कि चमार तो हिंदू होते ही नहीं, वे मुसलमान होते हैं और कमरा देने से इंकार कर देते। उस वक्त मेरे एक अध्यापक थे के.पी. सिंह। उन्होंने मेरी मदद के लिए कहा कि जो छात्र विक्रम को कमरा दिला देगा, उसे वो पास कर देंगे। तब एक छात्र ने मुझे अपने घर में कमरा दिलवाया और सर नें उसे पास कर दिया। 

इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान का एक दूसरा अनुभव भी है। मेरा एक सहपाठी था रवींद्र दुसाध। वह पढ़ने में कमज़ोर था। उसे फटकारते हुए एक शिक्षक ने कहा कि – हम लोग टैक्स देते हैं और तुम लोगों को आरक्षण मिलता है। तुम लोग गंदी नाली के कीड़ा थे। 

उनके इस कथन पर मैंने अगले दिन कक्षा में उनसे सवाल पूछा तो उन्होंने हमदोनों को कक्षा के बाहर भेज दिया। मैंने लात मारकर दरवाजा खोला और कमरे में घुसकर उनसे कहा कि कबीर के दोहे पढ़ाकर आप जातिगत समानता की शिक्षा देते हैं, लेकिन खुद कक्षा में जातिवाद करते हैं। हम नहीं, बल्कि आप गंदी नाली का कीड़ा हैं। इसके बाद हमदोनों को निलंबित कर दिया गया। इंटरमीडिएट पास करने के बाद बी.ए. में आया तो मेरे नाम में हरिजन को लेकर बड़ा विवाद हुआ। ऊंची जाति के लोग मेरे साथ बैठते नहीं थे। दलित छात्र भी नहीं बैठते थे, क्योंकि हरिजन शब्द लगा हुआ था। 

ग़रीबी बहुत थी, लेकिन मुझे आगे पढ़ना था तो एम.ए. की पढ़ाई के लिए कई गांवों से चंदा इकट्ठा करके मुझे जेएनयू भेजा गया। राम मिलन गौड़, अनिल आनंद, वर्मा भैय्या ने चंदा इकट्ठा किया था। उन्होंने तीन-चार महीने तक दो-दो हजार रुपए भेजे। जेएनयू के शुरुआती दिनों में यह पैसा बहुत काम आया। जेएनयू का जीवन बहुत कठिन था। कई बार चाय पीने का भी पैसा नहीं होता था। हॉस्टल की फ़ीस देने के लिए पैसा नहीं होता था। इसके अलावा भी जेएनयू में अलग तरह का संघर्ष था। मैं हिंदी पट्टी का छात्र था और अंग्रेजी सीखने की चुनौती थी, जिसके लिए मैंने कई अध्यापकों और सहपाठियों की मदद भी पाई। इंसाफ मूवमेंट के डायरेक्टर अनिल चौधरी मुझे हर महीने 8000 रुपए देते थे। यह रकम वो मुझे एमफिल करने के लिए देते थे, जिसकी वजह से मैं एमफिल कर पाया। अनिल चौधरी सर की वजह से ही मैं कई बार इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस में अपना पेपर पढ़ने गया तो ट्रेन का ख़र्चा उन्होंने ही मुझे दिया था। इतना ही नहीं, जब मैंने पहली बार असम सेंट्रल यूनिवर्सिटी ज्वाइन किया तब उन्होंने ही पहली बार फ्लाइट का भी पैसा मुझे दिया था। इसके पहले जब दैनिक हिंदी ‘प्रभात खबर’ की नौकरी चली गई थी, तब उन्होंने मुझे अपने ऑफिस में काम दिया था। इस प्रकार उन्होंने मुझे बहुत आर्थिक मदद की थी। प्रोफ़ेसर आनंद कुमार ने मुझे अंग्रेजी सीखने के लिए प्रेरित किया। रेडियो ख़रीदने के लिए खुद आनंद सर के अलावा प्रोफेसर सुखदेव थोरात, कमल मित्र आदि ने मेरी मदद की थी।  

प्रो. विक्रम हरिजन

जॉय एल.के. पछुआउ मैडम मुझे हर महीने 500 रुपए देती थीं। प्रोफ़ेसर विवेक कुमार सर ने मुझे हॉस्टल नाइट के लिए कई बार पैसे दिए थे। इसके अतिरिक्त मेरे पिताजी जब बीमार पड़े थे तब भी उन्होंने मुझे लगभग बीस हजार रुपए दिए और एक केस के सिलसिले में इन्होंने मुझे और बीस हजार रुपए दिए थे। जब कभी जरूरत पड़ती तो मैं उनसे पैसे की मदद ले लेता, जिन्हें आज तक नहीं वापस नहीं किया। मैंने प्रोफ़ेसर गीता विशाल मैडम से भी एक बार 500 रुपए लिया था, जिसे आज तक वापस नहीं किया। उन्होंने मुझे पढ़ने के लिए पैसा दिया था। इन्हीं लोगों की मदद और प्रेरणा से मैं आगे बढ़ पाया। और अब उसी प्रेरणा और जीवन से सीख लेकर मैं अपने जीवन में आगे बढ़ रहा हूं। जब भी कोई छात्र पैसे के चलते पढ़ाई छोड़ रहा होता है तो मैं उसकी आर्थिक मदद करता हूं और उससे कहता हूं कि यदि और ज़रूरत हो तो बताना, पर पढ़ाई मत छोड़ना।    

मुझे आगे बढ़ाने में जेएनयू के प्रोफेसर चिन्ना राव सर ने भी बड़ी मदद की। आज साउथ इंडिया में मुझे अगर कोई जानता है तो केवल चिन्ना राव सर की वजह से जानता है। उन्होंने न केवल अंग्रेजी सीखने में मदद की, बल्कि ओरिएंट ब्लैक और रावत पब्लिकेशंस में मेरे आर्टिकल पब्लिश करवाये। मुझे पीएचडी में एडवाइस किया और साउथ इंडियन हिस्ट्री को समझने में मेरी बहुत मदद की। दलित पैनल में भी उन्होंने मुझे जगह दिया। जेएनयू के दिनों में मुझे कई प्रोफेसरों से मानसिक साथ भी मिला, जिनमें मेरे सुपरवाइजर प्रोफेसर योगेश शर्मा, प्रोफेसर रणवीर चक्रवर्ती, प्रोफेसर कुमकुम राय, प्रोफेसर भगवान जोस, प्रोफेसर निलाद्री भट्टाचार्य, प्रोफेसर आदित्य मुखर्जी आदि शामिल रहे। इनके अलावा प्रोफेसर हीरामन तिवारी ने भी मेरी बहुत मदद की। उन्होंने मुझे नेपाल की किताब देकर मुझे अंग्रेजी सीखने में मदद की। इस प्रकार से मैं कुछ हद तक इंग्लिश सीखने में कामयाब भी रहा। मुझे जेएनयू के सीनियर साथियों की भी बड़ी मदद मिली। अनुभूति मौर्य मैडम जो वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक हैं और उनके जीवनसाथी रोहित कुमार जेएनयू में इकोनॉमिक्स डिपार्मेंट में प्रोफेसर हैं। इन्होंने भी मुझे जेरॉक्स के लिए कई महीने तक पैसे तो दिए ही, अपनी किताबें देकर भी मेरी सहायता की।

मेरे दोस्तों में उमाशंकर पांडे, नदीम और निविता (जोकि वर्तमान में आईपीएस अधिकारी है) ने मुझे अंग्रेजी सिखाने में बहुत योगदान दिया। निवेदिता कुकरेती मेरे लिए रोज क्लास का नोट्स हिंदी में ट्रांसलेट करती थीं। गोदावरी गर्ल्स हॉस्टल में वह मेरे लिए प्रत्येक दिन क्लास के नोट्स को हिंदी में ट्रांसलेट करती और मुझे समझाती थीं। उन्होंने मुझे बहुत सहयोग और आत्मबल दिया। क्लासमेट शक्ति और नदीम ने भी मुझे बहुत सहयोग किया।

हरबंस मुखिया सर के ऑफिस स्टाफ ने भी मुझे अंग्रेजी सीखने में बहुत मदद की। जब भी मैं अंग्रेजी की समस्या लेकर उनके दफ्तर जाता था, तो सर से पहले वे लोग ही उसको करेक्ट करते और मुझे समझाते। प्रोफेसर हरबंस मुखिया सर जेएनयू में हमारे समय में इतिहास पढ़ाते थे और रेक्टर थे। उन्होंने तीन बार जी. पार्थ सारथी नामक फंड से, पांच-पांच हजार रुपए दिलवाया था। इसका इस्तेमाल मैंने दो बार हॉस्टल की फीस भरने और एक बार अंग्रेजी सीखने के लिए किया था।

एमफिल की पढ़ाई के दौरान ही मैंने दैनिक प्रभात खबर अख़बार में ब्यूरो कॉरेस्पांडेंट की नौकरी कर ली। जहां पहले ढाई हजार और बाद में तीन हजार रुपए मुझे तनख्वाह मिलती थी। एमफिल पास करने के बाद पहली सरकारी नौकरी असम सेंट्रल यूनिवर्सिटी में मिली। वहां दूसरे तरह का संघर्ष था। फिर नागालैंड सेंट्रल यूनिवर्सिटी में मेरा चयन हो गया। हालांकि मैंने वहां ज्वाइन नहीं किया। इसके बाद मैं इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडी, शिमला में फेलो हो गया। फिर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में मेरा चयन असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद पर हो गया। यहां अलग तरह की मिट्टी है और अलग तरह का संघर्ष है। यहां पर मुझे बार-बार एहसास दिलाया गया कि मैं दलित हूं और कोटे से आया हूं। यहां चपरासी से लेकर स्टाफ तक चोरी-चमारी शब्द का इस्तेमाल करते हैं। सवर्णों के भीतर जातिवाद के बरअक्श यहां दलितों में भी जातिवाद है। यहां आकर मैंने चमार और पासी को अलग-अलग पाया। जेएनयू में तो दलित कैटेगरी चलती थी। पासी जाति के एक मेरे रिसर्च स्कॉलर ने मुझे ब्लैकमेल करने के लिए मेरा एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किया। उस वीडियो की वजह से लोग मुझे जलाने चले आए। यह मॉब-लिंचिग की घटना होती। लेकिन मैं किसी तरह से बच कर भाग निकला। करीब 52 दिनों तक यूनिवर्सिटी नहीं ज्वाइन कर पाया। फिर यूनिवर्सिटी में जाति के आधार पर नंबर देने की बात मैंने उठाई तो मुझे ट्रोल किया गया। फ़ीस वृद्धि मामले में छात्रों का साथ देने के मामले में कुछ महिलाओं को लाकर मेरे ऊपर सेक्सुअल हैरेसमेंट का केस करने की कोशिश की गई। और इसकी वजह से यूनिवर्सिटी ने मुझे चार बार कारण बताओ नोटिस दिया। जाति वाले मसअले पर भी यूनिवर्सिटी ने मुझे कारण बताओ नोटिस ज़ारी किया। हिंदू देवी-देवताओं के अपमान के मामले में भी मुझे दो नोटिस अलग से मिल चुके हैं। कुल मिलाकर मुझे 8 शोकॉज नोटिस आए हैं। और एक ट्वीट के मसअले पर एक एफआईआर मेरे ख़िलाफ दर्ज़ किया गया है। 

यह कहना अतिरेक नहीं है कि जाति और भेदभाव दिखाई नहीं देती, लेकिन जाति के इर्द-गिर्द ही सारी घटनाएं घटती हैं।

मुझे हरिजन शब्द को लेकर बहुत दुख झेलना पड़ा। इस पर बात किए बिना मेरी बात पूरी नहीं होगी। जब मैं पश्चिम बंगाल में छठी कक्षा में पढ़ता था। एक सर पढ़ा रहे थे कि राम स्कूल जाता है, सीता खाना पकाती है। मैंने अपने शिक्षक अम्बिका प्रसाद सिंह से सवाल किया कि आपने ये बाते क्यों कही कि राम स्कूल जाता है, क्या आंबेडकर स्कूल नहीं जा सकता। तब शिक्षक ने मेरी ज़िद की वजह से कहा कि ठीक है आज के बाद आंबेडकर भी स्कूल जाएगा। सारे छात्र मेरे ऊपर हंसने लगे। यह वह दौर था जब मायावती का प्रभाव पड़ने लगा था और हरिजन शब्द को लेकर बवाल मचा हुआ था। मेरे शिक्षक ने कई बार नाराज़गी जताते हुए कहा कि ऐसे लोगों को तो गोली मार देनी चाहिए। हरिजन को लेकर विवाद था कि गांधी ने हरिजन कह दिया तो क्या ग़लत कह दिया। 

फिर जब मैंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी पहली बार ज्वाइन किया तो विभागाध्यक्ष ने मुझसे कहा कि यदि आप अपना नाम विक्रम हरिजन लिखेंगे तो बच्चे क्लास नहीं करेंगे। दरअसल, अपने नाम के साथ हरिजन लिखने के दो-तीन कारण हैं। पहला यह कि यह मेरे हाथ में नहीं था। पिता जी को बंगाल सरकार ने कोयला खदान में नौकरी दी। पिता जी जब काम करने गए तो वहां उनसे नाम पूछा गया तो उन्होंने अपना नाम रघुनाथ चमार बताया। तो उस दौरान गांधी के प्रभाव के चलते चमारों को लोग हरिजन कहते थे तो शायद इसी कारण पिता के नाम के साथ हरिजन शब्द जुड़ गया। इसके बाद जब मेरा दाख़िला कराने की बात आई तो पिता जी का नाम रघुनाथ हरिजन था और मेरा नाम विक्रम हरिजन हो गया। हालांकि तब बच्चे बहुत हंसते भी थे। मेरा एक दोस्त था अंबिका प्रसाद। वह पूछता था कि तुम कैसे हरिजन हो, क्या तुम सूअर खाने वाले हरिजन हो तो मैं उससे कहता कि नहीं मैं सूअर खाने वाला हरिजन नहीं हूं। मैं एक अच्छा हरिजन हूं, मेरे यहां पर इस तरह के खाने नहीं बनते। एक मेरा दोस्त था बीरबल राजभर। उसके चाचा मुझे देखकर कहते कि चमार तो खरहा मारकर खाते हैं। फिर वो मुझसे पूछते कि खरहा खाए हो तो मैं कह देता कि हां खाया हूं। तब वे मुझ पर हंसते थे और मैं भी हंसता था। एक भोलानाथ यादव लड़का था। एक बार वह मुझे अपने घर ले गया। वहां मेरी जाति पता चलने पर उसकी मां ने उसे फटकारा कि वो मुझे अपने घर लेकर न आए। तो हरिजन बताने पर लोग चिढ़ते थे जिसके चलते मैंने कई बार अपनी जाति छुपाई। प्रोफ़ेसर होने के बाद भी एक-दो मौके ऐसे आए, जब मैंने अपनी जाति छुपाई।  

एक वाकया गोरखपुर का है। जैसे आप प्रवेश भवन में आईकार्ड, एडमिट कार्ड लेने जाएं तो वे छात्रों का नाम चिल्लाकर बुलाते हैं। तो जब कभी मेरा इस तरह से नाम पुकारा गया और सवर्ण जाति के छात्र, जो हमारे दोस्त थे, वे तो मुझसे दूरी बनाते ही थे, मेरी जाति के छात्र भी मुझसे दूरी बना लेते थे। मेरा एक सहपाठी जोकि दलित समुदाय का ही था, उसने कहा कि तुम हरिजन क्यों लिखते हो। तो मुझे भी एक चिढ़-सी हो गई कि जब सब हरिजन शब्द से इतना चिढ़ते हैं तो मैं इसे लगाकर ही दम लूंगा। और इस तरह हरिजन शब्द मेरे साथ चलता रहा। 

हालांकि इस शब्द की वजह से मुझे अपने जीवन में बहुत नुकसान भी उठाना पड़ा है। इलाहाबाद में एक प्रोफ़ेसर साथी हैं। उनकी मां बहुत जातिवादी थीं। तब हम तीन लोग एक मकान में रहते थे। उनके घर में गृह प्रवेश हुआ तो उन्होंने मुझे छोड़कर सबको बुलाया। मेरे साथ ही एक और ब्राह्मण भी प्रोफ़ेसर बने थे। उन्हें सब अपने घर बुलाते थे और गिफ्ट भी देते थे। लेकिन मुझे नहीं। अगर मैं कैंपस में किसी दूसरी जाति के प्रोफ़ेसर के साथ खड़ा हूं तो छात्र आएंगे और केवल गैर-दलित प्रोफेसर के पैर छुएंगे, मेरा नहीं। ये सब बेहद पीड़ादायी होता है। मुझे हरिजन शब्द लिखने से बहुत जलालत झेलनी पड़ी है। हरिजन शब्द को लेकर मैंने एक कविता लिखी है। कविता मैंने इसी गुस्से और तकलीफ़ से लिखा था –

“मेरे ऑफ़िस के गेट पर,
लगी है मेरे नाम की तख्ती,
लिखा है प्रोफ़ेसर डॉ विक्रम हरिजन,
अब कुछ लोगों को नींद नहीं आती।”  

एक बार मैं आंध्र प्रदेश, तेलांगाना में काकत्या यूनिवर्सिटी में पेपर प्रजेंट करने गया था। कार्यक्रम के संचालक हार्डकोर दलित थे। उन्होंने मुझे पेपर प्रजेंट करने से पहले ही रोक दिया और पूछा कि तुम हरिजन क्यों लगाते हो? क्या तुम खुद को सन ऑफ गॉड होने को सहमति देते हो? यह मुझे बहुत बुरा लगा। उसी सेमिनार में लोगों ने मुझसे हरिजन पर मोनोग्राफ लिखने के लिए कहा। भले ही इस शब्द को गांधी ने दिया है, भले ही यह देवदासी से जुड़ा हुआ शब्द है, लेकिन मैं हरिजन शब्द को एक जिद के आधार पर साथ लेकर चल रहा हूं कि मैं कम-से-कम मैं उन दलितों से तो अच्छा हूं जो अपनी जाति छुपाते हैं। हालांकि फजीहत यह रही कि बहुजन समाज पार्टी में, और कई दफ़ा बामसेफ के कार्यक्रमों में जाता था तो इस हरिजन शब्द की वजह से मुझे लोग पूरा नाम से इंट्रोड्यूस नहीं करते थे। केवल डॉ. विक्रम या डॉ. विक्रम सिंह बोलते थे। हिंदी दैनिक प्रभात ख़बर में जब मैं काम करता था तो मेरा नाम विक्रम हरिजन नहीं लिखा जाता था। हमारे ब्यूरो चीफ रंजन श्रीवास्तव कहते थे कि विक्रम हरिजन लिखोगे तो लोग तवज्जो नहीं देंगे। तो मेरे सारे आर्टिकल अख़बार में एस. विक्रम के नाम से छपता था। हद तो यह है कि कई छात्र मुझसे अपनी जाति छुपाते हैं और मुझसे कहते हैं कि मैं भी हरिजन न लिखूं। यूट्यूब पर तमाम इंटरव्यू लेने वाले कहते हैं कि मैं विक्रम हरिजन न लिखा करूं। तो मेरी विचारधारा पीछे छूट जाती है। दलित समाज के लोग भी मुझ पर हरिजन शब्द के चलते हमला करते हैं। यह जानते हुए भी कि मैं आंबेडकरवादी हूं। मेरे गांव में आज भी बड़े बुजुर्ग खुद को हरिजन ही कहते हैं। मैं खुद को अपनी उसी परंपरा से जोड़कर स्वीकारता हूं। हम अपनी जाति, अपनी पहचान, अपने ओरिजिन को नकार कर नहीं उसे स्वीकार कर, उसे अपनाकर, उसे उजागर करके ही सशक्त हो सकते हैं।

(समाप्त)

(सुशील मानव से बातचीत के आधार पर)

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विक्रम हरिजन

लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय (केंद्रीय) में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं

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