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जातिवादी व सांप्रदायिक भारतीय समाज में लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता

डॉ. आंबेडकर को विश्वास था कि यहां समाजवादी शासन-प्रणाली अगर लागू हो गई, तो वह सफल हो सकती है। संभव है कि उन्हें यह अहसास रहा हो कि एक दिन पूंजीवाद से त्रस्त जनता समाजवाद का रास्ता अपना सकती है। बता रहे हैं कंवल भारती

क्या भारतीय समाज में सामाजिक परिवर्तन के लिए गुंजाइश है? यह एक ऐसा सवाल है, जिस पर मैं अक्सर विचार करता रहता हूं। मुझे प्रेमचंद का उपन्यास ‘रंगभूमि’ याद आ रहा है। उसमें एक पात्र सूरदास कहता है– “हम मिलकर नहीं खेले, इसलिए हारे। दुश्मन मिलकर खेले, इसलिए जीत गए। हम भी मिलकर खेलेंगे, और एक दिन जीतेंगे।” इस उपन्यास का रचना-काल 1925 है। सौ साल हो गए, लेकिन भारतीय समाज प्रेमचंद के ‘रंगभूमि’ के समय से आज शिवमूर्ति के ‘अगम बहै दरियाब’ के दौर तक वहीं खड़ा है, जहां दुश्मन मिलकर खेलते हैं, और समाज को बदलने वाले, या सामाजिक न्यायवादी शक्तियां अलग-अलग खेलती हैं।

इसे समझना मुश्किल नहीं है, अगर हम भारतीय समाज के चरित्र और स्वरूप को समझ लें। भारतीय समाज का सबसे गहरा और पहला अध्ययन डॉ. आंबेडकर ने किया था। वैसा अध्ययन उनके बाद शायद ही किसी विद्वान ने किया। उन्होंने कहा था कि भारतीय समाज अपने मूल चरित्र में जातिवादी और सांप्रदायिक है। वह लोकतांत्रिक नहीं है। मोटे तौर पर भारतीय समाज दो वर्गों में विभाजित है– शासक और शासित। यह विभाजन इतना रूढ़ है कि शासक हमेशा शासक वर्गों से बनते हैं, और शासित वर्ग हमेशा शासित रहता है। यह सिर्फ़ राजनीतिक समाज की बात नहीं है, बल्कि आर्थिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी समाज का यही सच है। इसमें कुछ जातियां समाज में शासक हैं, जो राजनीति में हों या न हों, पर हमेशा शासक वर्ग बनी रहती हैं, जबकि शेष जातियां हमेशा निम्न वर्ग बने रहने के लिए बाध्य हैं।

ऐसा भारतीय समाज, जो अपने चरित्र में ही सांप्रदायिक और जातिवादी है, एक लोकतांत्रिक समाज का निर्माण नहीं कर सकता। ऐसे समाज में या तो धर्म की व्यवस्था चल सकती है, या राजतंत्र चल सकता है, या अधिनायकवादी (तानाशाही) व्यवस्था काम कर सकती है। ऐसे जातिवादी और सांप्रदायिक समाज में अगर लोकतंत्र कायम हो भी गया, तो उसकी बागडोर शासक वर्ग के ही हाथों में रहेगी, और वह इस सामाजिक विभाजन को खत्म करने के लिए शायद ही काम करेगा। वह इन्हीं तीनों व्यवस्थाओं, धर्मतंत्र, राजतंत्र और अधिनायकतंत्र के रूप में काम करेगा, अन्य कोई रास्ता नहीं है। वह शासित वर्गों को लाभार्थी बनाकर और कुछ रियायतें देकर लोकतंत्र का भ्रम बनाए रखेगा, जबकि किसी भी समुदाय को लाभार्थी बनाना लोकतंत्र की प्रणाली ही नहीं है। ऐसा केवल राजतंत्र की व्यवस्था में ही होता है। हालांकि राजतंत्र और अधिनायकवाद चलाने की गुंजाइश भी लोकतंत्र में ही ज्यादा होती है। अगर कोई शासक लोकतंत्र में धर्म की व्यवस्था कायम करना चाहता है, तो वह राजतंत्र और अधिनायकतंत्र की शक्ति अपनाकर ही ऐसा कर सकता है, अन्य कोई विकल्प नहीं है। 

संसद भवन के नए परिसर में उद्घाटन से पहले राजदंड के प्रतीक सेंगोल को साष्टांग प्रणाम करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व मंत्र पढ़ते साधुगण

यहां यह उल्लेखनीय है कि इनमें से कोई भी प्रणाली सामाजिक बदलाव की प्रणाली नहीं हैं, बल्कि समाज को शासक और शासित के बीच विभाजित रखने की ही प्रणाली है, जिसे भारत में सदियों से कठोरता से कायम रखा गया है। यह बदलाव तभी आ सकता है, जब व्यवस्था में कोई गुणात्मक परिवर्तन हो। लेकिन ऐसे किसी भी गुणात्मक परिवर्तन की उम्मीद नहीं की जा सकती, जो शासक वर्ग की सामाजिक सत्ता के लिए चुनौती बन जाए। इसलिए भारतीय लोकतंत्र में शासित वर्गों के खिलाफ उठने वाली आवाजें, चाहे वह उनके आरक्षण के विरुद्ध हों, भूमि-सुधार के विरुद्ध हो, या किसी भी सामाजिक-आर्थिक भेदभाव के विरुद्ध हों, शासक वर्गों की सत्ता पर पकड़ बनाए रखने लिए ही होती हैं।

इसी पृष्ठभूमि में डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि भारत जैसे देश में, जहां सत्ता में बैठे लोग सांप्रदायिक और जातिवादी मानसिकता के हैं, उनसे यह आशा करना व्यर्थ होगा कि वे उन लोगों के साथ समानता का व्यवहार करेंगे, जो उनके धर्म या जाति के नहीं हैं। उन्होंने कहा था कि भारत का बहुमत एक राजनीतिक बहुमत नहीं है, बल्कि एक सांप्रदायिक बहुमत है, जिसका राजनीतिक कार्यक्रम कुछ भी क्यों न हो, पर वह अपना सांप्रदायिक बहुमत बनाए रखेगा। यहां तक कि लोकतंत्र में कार्यपालिका में भी यही सांप्रदायिक बहुमत काम करता है। ऐसा कोई विभाग नहीं, जो इस सांप्रदायिक बहुमत के नियंत्रण में न हो। लोकतंत्र की प्रत्येक संस्था इसी सांप्रदायिक बहुमत के कब्जे में है। यह सांप्रदायिक बहुमत मूर्त-अमूर्त हर रूप में बना रहता है, और इस पर उंगली इसलिए नहीं उठती, क्योंकि यही बहुमत भारतीय समाज का नेतृत्व करता है। 

ऐसा नहीं है कि इस सांप्रदायिक और जातिवादी बहुमत के अपने अंतर्विरोध और अपनी समस्याएं नहीं हैं। वे हैं, और हमेशा रहेंगी, क्योंकि शासक जातियों के बीच भी वर्चस्व के संघर्ष मौजूद रहते हैं, लेकिन जब मामला गैर-हिंदुओं और निम्न जातियों के दमन का होता है, तो वे अपने सारे अंतर्विरोध और संघर्ष भुलाकर एक हो जाते हैं।

क्या भारतीय समाज के इस रोग का कोई इलाज है? बहुत गौर करने के बाद भी मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि लोकतंत्र में इसका इलाज नहीं है। लोकतंत्र में कानून अपना काम करता है, पर विडंबना यह है कि भारतीय समाज में सदियों से प्रचलित धार्मिक क़ानून और रीति-रिवाज भी अपना काम करते हैं। लोकतंत्र में कानूनन हर व्यक्ति समान है, और सभी का एक राजनीतिक मूल्य है। लेकिन भारतीय समाज में असमानता है और हरेक का अलग-अलग सामाजिक मूल्य है, किसी का सर्वोच्च, किसी का उच्च, किसी का निम्न और किसी का कुछ भी नहीं। लोकतंत्र में कानून किसी भी समुदाय का खून बहाने की इजाजत नहीं देता, पर इसके बावजूद सांप्रदायिक बहुमत एक समुदाय के विरुद्ध नरसंहार की अपीलें करने में भी शर्म नहीं करता। लोकतंत्र में अस्पृश्यता गैर-कानूनी है, पर सांप्रदायिक बहुमत के कानून में वह धर्म-सम्मत है। लोकतंत्र में कोई किसी से ऊपर नहीं है, लेकिन सांप्रदायिक बहुमत के समाज में अशोक वाजपेयी जैसा विद्वान भी यह कहने का साहस रखता है कि वह बीस बिस्वे का श्रेष्ठ ब्राह्मण है। वहीं एक दलित को उसकी अछूत स्थिति का बोध हमेशा कराया जाता रहता है। भारतीय समाज का यह एक ऐसा चरित्र है, जहां दो भिन्न जातियों के हिंदू भी परस्पर ऐसे मिलते हैं, जैसे वे दो अलग-अलग राष्ट्रों के नागरिक हों। मुसलमानों के खिलाफ जो नफ़रत पिछले कुछ वर्षों से दिखाई दे रही है, वह सांप्रदायिक बहुमत के समाज में पहले से ही थी, उसे बस राजनीतिक कारणों से उभारा गया है। 

आपको मालूम होना चाहिए कि यही सांप्रदायिक और जातिवादी बहुमत हमारी पुलिस-व्यवस्था में मौजूद है। राष्ट्रवादी सरकारें इसका राजनीतिक लाभ उठाती हैं। अब भाजपा की सरकारों में तो इसी सांप्रदायिक मानसिकता वाले लोगों को, जो हद दर्जे के दलित-विरोधी हों, मुस्लिम विरोधी हों और आदिवासी विरोधी हों, पुलिस में भर्ती किया जा रहा है। जब कोरोना काल में भारत में लॉकडाउन था, तो पुलिस ने थोक के भाव में सड़कों पर अपनी जरूरत का सामान लेने के लिए निकलने वाले लोगों में अधिकांश दलितों और मुसलमानों को ही पकड़कर बंद किया था, उनकी गाडियां सीज की थीं, और उनके भारी चालान काटे थे। आप जेलों का मुआयना कर लीजिए, नब्बे प्रतिशत कैदी दलित, आदिवासी और मुसलमान मिलेंगे। पुलिस के बनाए यातना गृहों में दलित-मुसलमानों के ही हाथ-पैर तोड़े जाते हैं, और पुलिस हिरासत में इन्हीं लोगों की मौतें होती हैं। इस यातना का लोमहर्षक वर्णन शिवमूर्ति ने अपने हाल के उपन्यास ‘अगम बहै दरियाब’ में किया है, जिसे पढ़कर पुलिस के विरुद्ध क्रोध का एक ज्वालामुखी अंदर भर जाता है। दलित लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी आत्मकथा ‘जूठन’ में लिखा है कि जब उनके पिता ने प्राइमरी स्कूल में उनका दाखिला करवाया, तो स्कूल का हेडमास्टर त्यागी गुस्से में भरकर बोला था– “एक चूहड़े को पढ़ने की क्या जरूरत है, जब उसे सफाई का ही काम करना है।” कथाकार रजत रानी मीनू की एक कहानी पिछले दिनों ‘हंस’ में छपी थी। उसका नाम है ‘क्या मैं बता दूं?’। इसमें एक दलित पत्रकार वर्षा सिंह हैं, जिसे उसका सवर्ण सहकर्मी फोटोग्राफर शिवांग रांची में कोयला खदानों की रिपोर्टिंग करने के बाद, अपनी मौसी के घर ले जाता है। उनके साथ जब गाड़ी का ड्राइवर भी घर में जाने लगता है, तो मौसी उसे बाहर ही रोक देती है और अंदर जाकर शिवांग को डांटते हुए कहती है, तुम इस आदिवासी जंगली को घर में क्यों ला रहे थे? तुम्हें मालूम नहीं है कि ये अछूतों से भी ज्यादा गंदे और नीच होते हैं।

ये उद्धरण आकस्मिक नहीं हैं, बल्कि यह हिंदू समाज के सांप्रदायिक और जातिवादी चरित्र का परिणाम हैं। यह सीख हिंदुओं को घुट्टी में ही मिलती है कि दलित, आदिवासी और मुसलमान नीच और गंदे होते हैं।

डॉ. आंबेडकर ने 1955 में बीबीसी को एक महत्वपूर्ण इंटरव्यू दिया था, जिसमें उन्होंने पुन: अपनी बात को दोहराते हुए कहा था कि भारत में लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता, क्योंकि भारतीय समाज का चरित्र लोकतांत्रिक नहीं है। लेकिन इसी इंटरव्यू में वह यह भी कहते हैं कि भारत में केवल दो ही शासन-प्रणालियां चल सकती हैं; या तो यहां धर्म का राज्य कायम हो सकता है, या समाजवादी। यह एक बड़ी बात उन्होंने कही थी। क्या वास्तव में यहां समाजवादी व्यवस्था कायम हो सकती है? यह एक ऐसा प्रश्न है, जिस पर अभी तक के विश्लेषण से भी कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। लेकिन डॉ. आंबेडकर को विश्वास था कि यहां समाजवादी शासन-प्रणाली अगर लागू हो गई, तो वह सफल हो सकती है। संभव है कि उन्हें यह अहसास रहा हो कि एक दिन पूंजीवाद से त्रस्त जनता समाजवाद का रास्ता अपना सकती है। दूसरे शब्दों में, निजी पूंजीवाद के तीव्र विकास से उत्पन्न गरीबी, बेरोजगारी और अशिक्षा से पीड़ित जनता का आक्रोश एक समाजवादी क्रांति को जन्म दे सकता है। अगर ऐसा हो गया, तो निश्चित रूप से यह भारतीय समाज के हित में होगा। हालांकि यह असंभव नहीं है, बेरोजगार और गरीब जनता समाजवाद की ही कल्पना में जीती है, उसे समाजवादी राजनीति से जोड़ने का प्रयास किया जा सकता है। इसके लिए हमें समान विचारधारा वाले लोगों के साथ संवाद बढ़ाने की जरूरत है। समाजवाद ही वास्तव में वह विकल्प है, जिसकी भारत को आवश्यकता है, क्योंकि लोकतंत्र में पूंजीवादी और धर्मवादी शक्तियों को हावी होने से नहीं रोका जा सकता, लेकिन समाजवादी व्यवस्था में इसे पूरी तरह रोका जा सकता है।

लेकिन, बड़ा सवाल यह है कि क्या शासक वर्ग ऐसा होने देगा? और जब मैं शासक वर्ग की बात करता हूं तो वह भारत के सांप्रदायिक और जातिवादी समाज से संचालित लोकतंत्र का ही शासक वर्ग होता है।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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