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स्त्रियों की मुक्ति का सवाल और डॉ. आंबेडकर

आंबेडकर ने लिखा है कि वास्तव में मनु अपनी समाज-व्यवस्था में स्त्री की स्वतंत्रता छीनकर बौद्धधर्म के विस्तार को रोकना चाहता था। वह अपने कानून में न्याय अथवा अन्याय के विचार से चिंतित नहीं था, बल्कि स्त्रियों को बौद्ध शासन के तहत मिली स्वतंत्रता से चिंतित था। पढ़ें, कंवल भारती का यह सुचिंतित आलेख

विषय प्रवेश के लिए एक इतिहास-बोध लेते हैं। 1848 का वर्ष पूरे विश्व में महान परिवर्तन का वर्ष था। यही वह वर्ष है, जब कार्ल मार्क्स का कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो जारी हुआ था। इसी वर्ष अमेरिका में स्त्रियों ने अपनी मुक्ति का आंदोलन शुरू किया था। न्यूयार्क के सेनेका फ़ाल्स में वेस्लेयन चर्च में स्त्री-अधिकारों का पहला सम्मेलन हुआ था। जब अमेरिका की स्त्री चौराहा पार कर रही थी, तब भारत की स्त्री बंधनों में थी। इन बंधनों को खोलने का काम ईसाई अंग्रेजों ने किया। ईसाई मिशनरियों ने भारत में स्कूल खोले, उसके बाद ही संभ्रांत हिंदू परिवारों, ख़ास तौर से सामंतों, जमींदारों और रईसों की कुछ लड़कियों ने पढ़ना-लिखना सीखा, जिसके बाद वे बड़े-बड़े पदों पर आसीन हुईं, ख़ास तौर से राजनीति में। वे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती हुईं सात समंदर पार गईं, और न केवल राजनीति और समाज-सुधार के क्षेत्र में, बल्कि चिकित्सा के क्षेत्र में भी नामीगिरामी हस्ती बनीं। इसी 1848 में पूना में लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल खुला और इसे खोलने वाले शूद्र समुदाय के जोतीराव फुले थे।

अब इस गुत्थी को समझने की जरूरत है कि ईसाई मिशनरी स्कूलों में दलित-पिछड़ी जातियों के लड़के-लड़कियों की शिक्षा क्यों नहीं हो सकी, और उनके लिए अलग से जोतीराव फुले को स्कूल खोलना क्यों पड़ा, जबकि आरोप यह लगाया जाता है कि ईसाई मिशन भारत में निम्न वर्गों को धर्मांतरित करने के लिए आया था? डॉ. आंबेडकर ने अपने लेख ‘क्रिश्चियनाइजिंग दी अनटचेबुल्स’ में इस तर्क का खंडन किया है, और स्पष्ट किया है कि भारत में ईसाई मिशन वास्तव में ब्राह्मणों का धर्मांतरण करने के उद्देश्य से आया था। उसकी योजना यह थी कि अगर वह ब्राह्मण वर्ग को धर्मांतरित करने में सफल हो गया, तो शेष हिंदू समाज को ईसाई बनाने का उसका काम आसान हो जाएगा। इसलिए उसने बहुत से स्कूल, कॉलेज और अस्पताल वगैरह खोले, जिनके माध्यम से वह ब्राह्मणों के साथ संपर्क स्थापित करना चाहता था। लेकिन ब्राह्मणों ने मिशन के इन संस्थानों से लाभ तो भरपूर उठाया, जिसके कारण भारत में अंग्रेजीदां ब्राह्मणों की पहली पीढ़ी तैयार हुई, पर वे ईसाई नहीं बने, और उनको ईसाई बनाने की मिशनरी योजना फेल हो गई। इन संस्थानों में शूद्रों को शिक्षा से दूर रखने की मुख्य वजह ब्राह्मणों की शर्त थी।[1]

लेकिन ब्राह्मण अपने सिवा, गैर-ब्राह्मणों की शिक्षा के विरोधी थे। स्त्री-शूद्रों की शिक्षा को वे ब्राह्मण-धर्म के विरुद्ध समझते थे। इसलिए जब जोतीराव फुले ने लड़कियों, बाद में शूद्र लड़कों के लिए भी, स्कूल खोला, तो ब्राह्मणों ने उसे ईश्वर के विधान के खिलाफ हमला बताया और फुले को हिंदू धर्म का शत्रु घोषित किया।[2]

इस पृष्ठभूमि के बाद, अब हम स्त्री-मुक्ति के संबंध में डॉ. आंबेडकर की भूमिका पर चर्चा करेंगे।

डॉ. आंबेडकर के जिस हिंदू कोड बिल को भारतीय स्त्रियों, ख़ास तौर से हिंदू स्त्रियों की मुक्ति का कानून माना जाता है, उसके बारे में कहा जाता है कि उसमें तलाक और पति की संपत्ति में पत्नी के अधिकार का प्रावधान इस्लामी कानून से लिया गया था। लेकिन डॉ. आंबेडकर ने अपने लेख ‘दी वुमैन एंड दी काउंटर रिवॉल्यूशन’ में विस्तार से बताया है कि उनका यह विचार भारतीय ही है, इस्लामिक नहीं है। उन्होंने लिखा है कि मनु-पूर्व काल में स्त्रियों को ये दोनों अधिकार प्राप्त थे।[3] उन्होंने लिखा है कि अथर्ववेद में स्त्री के उपनयन-अधिकार का साक्ष्य मिलता है। श्रौत-सूत्र में कहा गया है कि स्त्रियां वेद पढ़ती थीं और वेद-मंत्रों का पारायण करती थीं। पाणिनि के अष्टाध्यायी का साक्ष्य है कि स्त्रियां गुरुकुल जाती थीं और वेदों की विभिन्न शाखाओं का अध्ययन करके मीमांसा में पारंगत होती थीं। पतंजलि के महाभाष्य में कहा गया है कि स्त्रियां आचार्य थीं और बालिकाओं को पढ़ाती थीं। सार्वजनिक मंचों से स्त्रियों के धर्म, दर्शन और तत्वमीमांसा जैसे विषयों पर शास्त्रार्थ करने के भी अनेक साक्ष्य मिलते हैं। जनक और सुलभा, याज्ञवल्क्य और गार्गी, याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी एवं शंकराचार्य और विद्याधरी के बीच शास्त्रार्थ बताते हैं कि मनु-पूर्व समय में भारतीय स्त्रियां विद्याध्ययन और शिक्षा में उच्चतम शिखर तक पहुंच सकती थीं।[4]

इसी लेख में डॉ. आंबेडकर ने आगे लिखा है कि कौटिल्य के समय में स्त्रियां आपसी मतभेदों के आधार पर तलाक भी ले सकती थीं। कौटिल्य के अनुसार, यदि कोई पुरुष, अपनी पत्नी से खतरे की आशंका होने पर, तलाक (मोक्षमिच्छेत) लेना चाहता था, तो उसे अपनी पत्नी को वह सब कुछ वापस करना होता था, जो उसे विवाह के समय प्राप्त हुआ था। इसी तरह, यदि कोई स्त्री अपने पति से खतरा अनुभव होने पर, तलाक लेना चाहती थी, तो उसे अपनी संपत्ति पर अपना अधिकार छोड़ना पड़ता था। लेकिन एक पत्नी अपने पति के दुश्चरित्र होने पर उसे छोड़ सकती थी। कौटिल्य के समय में, आंबेडकर के अनुसार, तलाकशुदा स्त्री को भरणपोषण भत्ता पाने का भी अधिकार था। यही नहीं, उस काल में किसी भी स्त्री अथवा विधवा के पुनर्विवाह पर भी कोई प्रतिबंध नहीं था। कौटिल्य के अनुसार, “अपने पति की मृत्यु पर, एक पवित्र जीवन जीने की इच्छुक महिला को न केवल उसको दान और आभूषण (स्थाप्यभरणम) प्राप्त होते थे, बल्कि उसे देय शुल्क की शेष राशि भी अदा की जाती थी। इन दोनों चीजों को पाने के बाद, वह दूसरा विवाह कर सकती थी। यहां तक कि यदि कोई स्त्री पुनर्विवाह के बाद, अपने पूर्व पति से उत्पन्न अपने पुत्र के लालन-पालन के लिए अपनी स्वयं की संपत्ति पर अधिकार चाहती थी, तो वह भी उसे दिया जाता था।” आंबेडकर के अनुसार, कौटिल्य के समय में एक विवाहित स्त्री आर्थिक रूप से स्वाधीन थी।[5]

लेकिन उत्तर-कौटिल्य-काल में स्त्री का पतन हो गया। आंबेडकर लिखते हैं कि स्त्री की स्वाधीनता और उसके शैक्षिक-आर्थिक सारे अधिकारों पर मनु ने प्रतिबंध लगा दिया। अत: भारतीय स्त्री के पतन की कहानी मनु के समय से आरंभ होती है।

आंबेडकर कहते हैं कि मनु ने स्त्री के विरुद्ध प्रतिक्रांति का काम किया। उन्होंने कहा कि मनु ने शूद्रों को तो मनुष्य ही नहीं माना, पर वह स्त्रियों के प्रति भी अपनी बहुत-ही नीच सोच रखता था। स्त्रियों के विरुद्ध मनु की प्रतिक्रांति इस सिद्धांत पर आधारित है कि वह स्त्रियों को किसी भी परिस्थिति में स्वतंत्र देखना नहीं चाहता था। मनु ने विवाह को एक संस्कार माना था, इसलिए उसने तलाक की अनुमति नहीं दी। तलाक के खिलाफ उसके कानून का मकसद बिल्कुल अलग था। उसका मकसद एक पुरुष को एक स्त्री से बांधने के लिए नहीं था, बल्कि एक स्त्री को एक पुरुष से बांधने और पुरुष को स्वतंत्र छोड़ने के लिए था। लेकिन मनु किसी पुरुष को अपनी पत्नी का परित्याग करने से नहीं रोकता है। वास्तव में वह उसे न केवल अपनी पत्नी को छोड़ने की अनुमति देता है, बल्कि उसे बेचने की भी अनुमति देता है।[6] और यह सब उसने स्त्री को किसी भी स्थिति में आज़ाद होने से रोकने के मकसद से किया था।

आंबेडकर ने लिखा है कि वास्तव में मनु अपनी समाज-व्यवस्था में स्त्री की स्वतंत्रता छीनकर बौद्धधर्म के विस्तार को रोकना चाहता था। वह अपने कानून में न्याय अथवा अन्याय के विचार से चिंतित नहीं था, बल्कि स्त्रियों को बौद्ध शासन के तहत मिली स्वतंत्रता से चिंतित था। बौद्धधर्म के प्रति मनु की घृणा को उसके निम्न कानूनों से समझा जा सकता है—

  1. वेद-निंदक को राजा नगर से निकाल दे। (9/225)
  2. जिन्होंने अपने धर्म को छोड़ दिया है, और जो प्रतिलोम वर्णसंकर तथा विधर्मी पंथों के सन्यासी हैं, उनको जल नहीं देना चाहिए। (5/89)
  3. शास्त्रों में जिनकी श्रद्धा न हो, जो वेद के विरुद्ध तर्क करता हो, और जो नीचे दृष्टि रखकर चलते हों, उनका सम्मान न करें। (4/30)

मनु बौद्धधर्म के तहत मिली स्वतंत्रता में स्त्रियों द्वारा अपनी इच्छा से किए जा रहे अंतर-वर्णीय विवाह से चिंतित था, जिसके कारण वर्णों के श्रेणीकरण की व्यवस्था ध्वस्त हो रही थी। स्त्रियों की इसी स्वछंदता को रोकने के लिए उसने उनकी स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाया। यथा—

  1. पुरुषों को अपनी स्त्रियों को कभी स्वतंत्रता नहीं देनी चाहिए। (9/2)
  2. स्त्रियों की बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्र रक्षा करे। स्त्री कभी स्वतंत्रता के योग्य नहीं। (5/148, 9/3)
  3. यदि पति दुर्बल है, तो भी उसे अपनी स्त्री की रक्षा में प्रयत्नशील होना चाहिए। इस तरह पुरुष अपनी स्त्री की रक्षा करके अपनी संतान, अपने कुल और अपने धर्म की रक्षा करता है। (9/6-7)

मनु ने स्त्री को दास के समकक्ष रखते हुए कहा कि स्त्री, दास और पुत्र तीनों का संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है। (8/416) साथ ही मनु ने स्त्री के साथ घरेलु हिंसा को भी अनुमति देते हुए कहा कि यदि स्त्री और दास अपराध करे, तो उसे रस्सी से बांधकर छड़ी से मारना चाहिए। (8/299)

डॉ. बी.आर. आंबेडकर (14 अप्रैल, 1891 – 6 दिसंबर, 1956) महिलाओं की एक सभा को संबोधित करने के बाद

मनु का काल वही है, जो पुष्यमित्र शुंग के शासन का है। और यही वह शासन है, जिसने भारी संख्या में बौद्धों के कत्लेआम के लिए राज्याज्ञा जारी की थी। सुंग शासन ने ही बौद्ध मठों और विहारों को नष्ट करवा कर उनके स्थान पर हिंदू मंदिरों का निर्माण कराया था, और भारत में ब्राह्मण-राज्य की नींव डाली थी। यहां यह उल्लेखनीय है कि हिंदू धर्म में मंदिर-निर्माण की परंपरा इसी काल से आरंभ हुई, इससे पूर्व, वैदिक और उत्तर-वैदिक काल में मूर्ति-पूजा और हिंदू मंदिरों का अस्तित्व नहीं मिलता है। हिंदू मंदिरों में शूद्रों का प्रवेश भी इसी काल में निषिद्ध किया गया था, क्योंकि यदि वे ऐसा नहीं करते, तो शूद्र उनके मंदिरों में हिंदू देवता के रूप में स्थापित किए गए बुद्ध को पहचान सकते थे, जिससे एक उपद्रव हो सकता था। असल में ब्राह्मण, स्त्री-शूद्रों और अन्य निम्न वर्गों में बौद्धधर्म के तेजी से बढ़ रहे प्रभाव से चिंतित थे, क्योंकि उसने ब्राह्मण-वर्चस्व को लगभग खत्म कर दिया था। इस वर्चस्व को वे स्त्री-शूद्रों पर कठोर प्रतिबंध लगाकर ही पुन: स्थापित कर सकते थे।

मनुस्मृति पुष्यमित्र शुंग शासन का कानून है। इस कानून ने हजारों वर्ष तक हिंदू समाज पर शासन किया। ब्राह्मणों और हिंदू राजतंत्रों ने इसे सख्ती से लागू किया, जिसके परिणामस्वरूप भारत में न केवल स्त्रियों का विकास रुका, बल्कि मनु-पूर्व काल में जो स्वतंत्रता उसे प्राप्त थीं, उससे वह हमेशा के लिए वंचित हो गईं। इसलिए हम मनु काल से लेकर अंग्रेजों के आने तक एक भी शिक्षित हिंदू स्त्री नहीं पाते हैं। स्थिति यह थी कि शिक्षा और मानवाधिकारों से वंचित स्त्री एक बेबस वस्तु भर थी, जिसका अपना कोई अस्तित्व नहीं था। आठ-नौ साल की उम्र में वह ब्याह दी जाती थी, पति की उम्र कुछ भी हो सकती थी, आठ साल से लेकर साठ साल तक। पति की मृत्यु होने पर वह विधवा हो जाती थी, और पूरे घर के लिए अमंगल मान ली जाती थी। वह पुनर्विवाह नहीं कर सकती थी। कहीं-कहीं उसे पति की चिता के साथ ज़िंदा भी जला दिया जाता था, जिसे सती कहा जाता था। इब्नबतूता ने अपने यात्रा-वृतांत में एक सती की गई स्त्री का आंखों-देखा हाल लिखा है, जो रोंगटे खड़े कर देता है। पंद्रहवीं सदी में कबीर ने अपने एक पद में ऐसी ही एक स्त्री का वर्णन किया है, जो गौने के बाद ससुराल आयी है, और जिसने अपने पति का मुंह तक नहीं देखा है। वह कह रही है, मेरा पीव (पति) गौना कराने आ रहा था। (वह मर गया) मेरा यौवन सपने की तरह खत्म हो गया। (घर के रीति-रिवाज के मुताबिक उसे सती होने के लिए मजबूर किया जा रहा है।) वह अपने विवाह को याद करती है कि कैसे पांच आदमियों ने मंडप बनाया और तीन लोगों ने लगन लिखी। हल्दी चढ़ी, और पति के साथ गांठ जोड़कर भांवरें पड़ीं और आज बिना पति के सारा सुहाग खत्म हो गया। अब सगा भाई ही उसे सती होने के लिये मजबूर कर रहा है। जिस ब्याहता ने अपने पति का मुंह तक नहीं देखा, उसे समझा-बुझाकर सती करने के लिए ले जाया जा रहा है। यथा—

मैं सामने पीव गौंहनि आई।
सांईं संगि साध नहीं पूगी, गयौ जोबन सुपिनां की नांई।।
पंच जना मिलि मंडप छायौ, तीन जनां मिलि लगन लिखाई।
सखी सहेली मंगल गावैं सुख-दुख माथै हलद चढ़ाई।।
नांनां रंगैं भांवरि फेरी, गांठि जोरि बावै पति ताई।
पूरि सुहाग भयो बिन दूलह, चैक कै रंगि धरयो सगौ भाई।।
अपने पुरिष मुख कबहूं न देख्यौ, सती होत समझी समझाई।
कहै कबीर हूं सर रचि मरिहूं, तिरौ कंत ले तूर बजाई।।[7]

हजारों वर्ष के इस लंबे कालखंड में हिंदू स्त्री की क्या दशा थी, यह हमें भारत में मुसलमानों और अंग्रेजों के आने के बाद ही पता चलता है, क्योंकि भारत में यात्रा-वृत्तांत और इतिहास-लेखन की परंपरा उनके साथ ही आई। उनके लेखन में हमें हिंदू स्त्रियों की ह्रदय-विदारक स्थिति का वर्णन मिलता है, जो उन्होंने स्वयं अपनी आंखों से देखा था। अंग्रेजों के आने के बाद ही कुछ संभ्रांत परिवारों की स्त्रियों को, वह भी कुछ ही को, पढ़ने-लिखने का अवसर मिला। उस दौर की हिंदी पत्रिकाएं उठाकर देख लीजिए, अगर संभ्रांत घर की कोई स्त्री माध्यमिक या स्नातक शिक्षा पास कर लेती थी, तो पत्रिकाओं में उसका चित्र और परिचय छपता था। पंडिता रमाबाई, सरोजिनी नायडू, महादेवी वर्मा, इंदिरा गांधी, सुचेता कृपलानी ऐसी तमाम स्त्रियां अंग्रेजी-राज की उपलब्धियां हैं। इससे पूर्व ऐसी किसी विदुषी स्त्री के पैदा होने की कल्पना नहीं की जा सकती थी। उससे पूर्व वह शिक्षित ही नहीं थी, क्योंकि मनु द्वारा हिंदू स्त्री को पहनाई गई परतंत्रता की बेड़ियों को तोड़ने के लिए सुधार-आंदोलनों का जन्म अंग्रेजी राज में ही हुआ था।

लेकिन ये सुधार आंदोलन कुछ संभ्रांत परिवारों तक ही सीमित रहे। वे आम हिंदू स्त्रियों का जीवन बदलने में सफल नहीं हो सके। इसका कारण था, सुधार-आंदोलनों की क्रांति के विरुद्ध रूढ़िवादी सनातनी ब्राह्मणों की प्रतिक्रांति का आंदोलन ज्यादा तीव्र था। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जब 1818 में पेशवा राज का पतन हुआ, तो ब्राह्मणों के सिवा, प्रजा का एक भी आंसू नहीं बहा था। और सबसे ज्यादा खुशी औरतों को हुई थी।[8] 1875 में स्थापित आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने जब छोटी बच्चियों का विवाह न करने, विधवा-विवाह कराने, और लड़कियों की शिक्षा पर जोर देते हुए, जबरन वैधव्य का विरोध किया, और ब्राह्मणों को अपनी बेटियों का हत्यारा कहा, तो पूना के सनातनी ब्राह्मणों ने दयानंद सरस्वती के विरोध में जुलूस निकाला था, जिसमें एक गधे को सजाकर तैयार किया, और उसका नाम ‘गर्दभानंद’ रखा था।[9] इसी तरह जब पंडिता रमाबाई ने बंबई में लड़कियों की शिक्षा के लिए एक हाई स्कूल खोलने की योजना बनाई और उसके लिए सरकार से आर्थिक सहायता की मांग की, तो महाराष्ट्र भर में सनातनी ब्राह्मणों ने उसका व्यापक विरोध किया था, जिसका नेतृत्व तिलक कर रहे थे। इसी तरह उन्होंने ‘महिला विश्वविद्यालय’ का विरोध किया। तिलक ने ‘महारट्ट’ में 20 फ़रवरी, 1916 को ‘इंडियन विमन्स यूनिवर्सिटी’ नाम से अपने लेख में लिखा, कि “हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि एक औसत हिंदू लड़की एक बहू भी होती है, जिसे अपने पति के परिवार के लोगों के प्रति विशेष कर्तव्य निभाने होते हैं। इस विशेष संबंध की दृष्टि से हिंदू लड़की को एक अच्छी बहू, एक अच्छी पत्नी और एक अच्छी मां के रूप में शिक्षित किया जाना चाहिए। इसलिए उसकी शिक्षा हमारे पुराण आदि पारंपरिक धार्मिक साहित्य को पढ़ाकर की जानी चाहिए, जिसमें घर की देखभाल, बच्चों की देखभाल, खाना बनाना, और सीना-पिरोना आदि सिखाया जाना चाहिए।”[10] यह विडंबना थी कि तिलक स्वयं तो अंग्रेजी पढ़े थे, पर हिदू स्त्रियों की अंग्रेजी शिक्षा के विरुद्ध थे। इसका कारण था कि उन्हें अपनी स्त्रियों पर विश्वास नहीं था। उन्हें भय था कि वे शिक्षित होकर ईसाई बन सकती थीं। मनु-काल के ब्राह्मणों को अपनी स्त्रियों के बौद्ध हो जाने का भय था, और उन्नीसवीं सदी के सनातनी ब्राह्मणों को ईसाई बन जाने का। इसलिए उन्होंने अपनी स्त्रियों को घर की चौखट नहीं लांघने दी, और कठोर प्रतिबंधों में रखा। कैथरीन मेयो की ‘मदर इंडिया’ और ‘स्लेव्स ऑफ दी गॉड्स’ पढ़िए, जिनमें हिंदू स्त्रियों की दिल दहला देने वाले विवरण दर्ज हैं। भारतीय मूल की अमेरिकन लेखिका गाइत्रा बहादुर ने अपनी पुस्तक ‘कुली वुमैन: दी ओडिस्से ऑफ इंडेंचर’ में लिखा है कि मथुरा, वृंदावन से बड़ी संख्या में विधवाओं ने कुली के रूप में फिजी, मारिशस, और गुयाना जैसे उपनिवेशों के लिए पलायन किया था, क्योंकि वे सड़कों पर भीख मांगकर या वेश्यावृत्ति करके जीविका चलाने से कुली बनना बेहतर समझती थीं।[11] कैथरीन मेयो ने लिखा है कि पंडिता रमाबाई पहली ब्राह्मण स्त्री थी, जिसने विधवा स्त्रियों की मुक्ति के लिए काम किया था, पर भारतीयों ने उसकी मदद करने से इंकार कर दिया था। अंतत: उसे अमरीका की संभ्रांत महिलाओं से मार्मिक अपील करनी पड़ी थी। उसने अपनी अपील में कहा था, “मेरे देश के लोगों की एक विशाल आबादी स्त्रियों की शिक्षा की अत्यंत कटु विरोधी है। उनसे मुझे सहानुभूति और सहायता की थोड़ी-सी भी उम्मीद नहीं है।”[12]

इससे समझा जा सकता ही कि हिंदू स्त्रियों के सामाजिक जीवन को नर्क बनाने में मनु के प्रतिबंधों का कितना व्यापक प्रभाव पड़ा था।

कठोर प्रतिबंधों का अर्थ है, स्त्रियों के अस्तित्व और भविष्य के प्रति किसी संवेदना का न होना। संवेदना के बिना न किसी के दर्द को महसूस किया जा सकता है और न अपने दायित्व को। संवेदनशील होना समाज-सुधार की पहली शर्त है। जिन लोगों ने भी स्त्रियों और निम्न वर्गों के प्रति अपनी संवेदना अनुभव की, वे संवेदनशील महामानव थे। इसीलिए उन्होंने उनके लिए आवाज उठाई, उनके उत्थान के रास्ते बनाए और एक नए राष्ट्र का निर्माण किया। उन्होंने इतिहास बनाया और विश्व के इतिहास में हमेशा के लिए अपना नाम दर्ज करा गए। डॉ. आंबेडकर ऐसे ही महामानव थे।

आंबेडकर ने समाज-सुधार का कार्य 1920 में ही प्रारंभ कर दिया था, जब वह विद्यार्थी थे। उन्हें सबसे बड़ा दुख दलित वर्गों की स्त्रियों की स्थिति को देखकर होता था। वह उनकी दयनीय दशा को देखकर रोते थे। एक बार वह मालाबार गए। वहां वह परिया/परया समुदाय की स्त्रियों का हाल देखकर बहुत द्रवित हुए, जो लगभग अधनंगी रहती थीं। उन्होंने वहां केवल परिया/परया स्त्रियों की सभा आयोजित की, जिसमें उन्होंने बहुत-ही गुस्से में उन्हें अधनंगी रहने पर फटकार लगाईं और कहा, कि “तुम अपनी जांघों को क्यों नहीं ढांकती? अपने शरीर को नंगा क्यों रखती हो? इस तरह तुम अपने सतीत्व की रक्षा कैसे करोगी? यह बहुत लज्जा की बात है। अपनी इज्जत बनाओ। अपना कपड़ा पहनने का तरीका बदलो। तुम्हें अपने एड़ी से गर्दन तक के अंग कपड़े से ढंककर रहना चाहिए। तभी तुम इज्जतदार कहलाओगी।” इसका यह असर हुआ कि सवेरे बहुत-सी परिया/परया महिलाएं पूरे कपड़े पहनकर बाबासाहेब से मिलने आईं।[13] उन स्त्रियों ने महसूस किया कि इस तरह की नसीहत आज तक उन्हें किसी ने नहीं दी थी। हालांकि और भी नेता तब उनकी बस्ती में आते थे, पर आंबेडकर पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने उन्हें मानवीय गरिमा से रहने की सलाह दी थी।

यह वह समाज था, जिसकी कोख से भावी समाज का सृजन और सेवा से उसका विकास होता था। लेकिन जो स्वयं बंधनों में हो, और अपने अस्तित्व तक से बेखबर हो, वह एक उन्नत समाज का सृजन और विकास कैसे कर सकता था? लेकिन एक समाज-सुधारक की सीमाएं होती हैं। वह बुराई को बता तो सकता है, बुराई को मिटा नहीं सकता। किसी बुराई को मिटाने की जो शक्ति कानून में होती है, वह समाजसुधारक के पास नहीं होती। इसलिए डॉ. आंबेडकर ने महसूस किया कि वंचित वर्गों के उत्थान के लिए उनके पास राजनीतिक शक्ति का होना बहुत आवश्यक है। अत: उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत वह राजनीति में आए।

वर्ष 1927 में वह बंबई विधान परिषद के सदस्य चुने गए। पांच साल बाद 1932 में वह पुन: निर्वाचित हुए। 1937 के आम चुनावों में वह बंबई विधानसभा के लिए चुने गए। अब वह वंचित वर्गों के हित में कुछ कर सकने की स्थिति में थे। इन बारह वर्षों में उन्होंने देश के सार्वजनिक जीवन में विविध भूमिकाएं निभाईं। बंबई विधान परिषद के सदस्य के रूप में उन्होंने अनेक राष्ट्र-हित के मुद्दों पर अपने महत्वपूर्ण विचार रखे और न्यायसंगत हस्तक्षेप किया। इनमें मातृत्व-लाभ विधेयक भी था, जो जुलाई, 1928 में बंबई विधान परिषद में प्रस्तुत किया गया। यह विधेयक कामगार क्षतिपूर्ति अधिनियम के अंतर्गत था। सदन के सामान्य सदस्य इस विधेयक के विरोध में थे। उनका कहना था कि प्रसूति कोई दुर्घटना नहीं है, इसलिए कामगार क्षतिपूर्ति अधिनियम उन महिलाओं पर लागू नहीं किया जा सकता, जो इसके तहत मातृत्व का लाभ लेना चाहती हैं। लेकिन डॉ. आंबेडकर ने महिलाओं का पक्ष लेते हुए कहा कि इसका मतलब यह नहीं है कि महिलाओं को लाभ नहीं मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि विधेयक जिस सिद्धांत पर आधारित है, वह यह है कि जच्चा महिलाओं को प्रसूति से पूर्व और प्रसूति के पश्चात कुछ दिनों का अवकाश दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह राष्ट्र-हित में होगा कि नियोक्ता को प्रसूति की अवस्था में महिला के आर्थिक हितों की रक्षा करनी चाहिए। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि इस विधेयक को केवल बंबई प्रेसीडेंसी में ही लागू करना महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसे संपूर्ण भारत में लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने गरीब महिलाओं की वकालत करते हुए कहा कि वे हमारे कारखानों में कठिन परिश्रम करती हैं, इसलिए विधेयक के माध्यम से सुझाए गए लाभ विधान-मंडल द्वारा उन गरीब महिलाओं को जरूर दिए जाने चाहिए।[14]

डॉ. आंबेडकर ने 1942 से 1946 तक वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम सदस्य के रूप में काम किया था। श्रम विभाग का दायित्व संभालते हुए उन्होंने श्रमिकों के हित में एक बेहतर चार्टर बनाया, जो स्वतंत्र भारत में भी अपनाया गया। उस दौरान उन्होंने केंद्रीय विधान सभा में श्रमिकों के हित में बहुत से बिलों को प्रस्तुत किया, और उन पर हुई बहसों में श्रमिकों का प्रतिनिधित्व किया।

केंद्रीय असेम्बली में जुलाई, 1943 में डॉ. आंबेडकर ने खदान प्रसूति लाभ अधिनियम 1941 संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया। इसमें संशोधन यह किया गया था कि गर्भवती महिला कामगार को प्रसूति की अवस्था में ‘काम से अनुपस्थित’ शब्द के स्थान पर ‘काम पर उपस्थित’ माने जाने का शब्द रखा गया था। इस विधेयक के अनुसार एक महिला कामगार आठ हफ़्तों का लाभ आठ आना प्रतिदिन की दर से ले सकती थी। यह अवकाश वह चार हफ्ते प्रसव से पहले और चार हफ्ते प्रसव के बाद ले सकती थी। आंबेडकर ने अपनी चर्चा में कहा था कि प्रसूति के बाद का चार हफ्ते का समय आवश्यक आराम का समय है, जिसमें किसी महिला का काम करना गैर-कानूनी और आपराधिक है। सदन ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था।[15]

फरवरी, 1944 में असेम्बली में भूमिगत कोयला खदानों में महिलाओं के काम करने पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव रखा गया था। इस संबंध में आंबेडकर के समक्ष विचार के दो मुद्दे थे, एक महिला कामगारों की आर्थिक सुरक्षा का और दूसरा मानवीय आधार पर उनके जीवन की सुरक्षा का। अधिकांश सदस्य मानवीय आधार पर कोयले की सुरंगों में महिलाओं के काम पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में थे। आंबेडकर ने मानवीय और आर्थिक दोनों हितों को अपनी चिंता में रखा और सरकार को ऐसी व्यवस्था करने के लिए जोर दिया कि महिला कामगारों से साढ़े पांच फीट से कम की गैलरी में काम नहीं कराया जाएगा। उन्होंने सदन को इस तथ्य से भी अवगत कराया कि कोयले की खदानों में सिर्फ़ वे ही श्रमिक काम करने के लिए तैयार होते हैं, जिन्हें अन्यत्र सुरक्षित काम नहीं मिलता है।[16] मार्च, 1945 में आंबेडकर ने कोयला सुरंगों में काम करने वाली महिलाओं के लिए अलग से प्रसूति लाभ का बिल प्रस्तुत किया। इसके अनुसार सतह के नीचे काम करने वाली महिलाओं को प्रसव से दस सप्ताह पूर्व से और प्रसव के बाद चार सप्ताह तक काम पर न आने का प्रावधान किया गया था। यह अवधि चौदह सप्ताह की थी, जिसके लिए उन्हें बारह आना प्रतिदिन की दर से भुगतान किए जाने का प्रावधान किया गया था।[17] यही नहीं, डॉ. आंबेडकर ने एक ‘कोयला-खदान कल्याण कोष’ की भी स्थापना की थी, जिससे कामगार महिलाओं के शिशुओं तथा बच्चों की देखभाल की जाती थी।[18]

वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में श्रम मंत्री (सदस्य) के रूप में डॉ. आंबेडकर ने महिला श्रमिकों के हित में जितना संभव था, बेहतर कार्य किया। श्रमिक के रूप में काम करने वाली महिलाएं दलित वर्गों से थीं। इसलिए उनके सामाजिक और आर्थिक हितों का संरक्षण करना उनका सामाजिक दायित्व भी था, जिसका निर्वाह उन्होंने महत्वपूर्ण ढंग से किया।

आज़ादी के बाद भारत की बागडोर कांग्रेस के हाथों में आई। कांग्रेस ने अपने पहले मंत्रिमंडल में कुछ विपक्षी दलों के नेताओं को भी शामिल किया, जिनमें श्यामाप्रसाद मुखर्जी और डॉ. आंबेडकर प्रमुख थे। डॉ. आंबेडकर को कानून मंत्री बनाया गया, और भारत के संविधान के निर्माण का दायित्व दिया गया। क़ानून मंत्री के रूप में संविधान का मसौदा तैयार करने के अलावा उनका सबसे महत्वपूर्ण कार्य ‘हिंदू कोड बिल’ था, जो हिंदू स्त्रियों की मुक्ति की दिशा में भारत का पहला क्रांतिकारी कानून था। यह बिल उन्होंने 11 अप्रैल, 1947 को संसद में प्रस्तुत किया। बिल प्रस्तुत करते ही सनातनी हिंदू सामज में, ख़ास तौर से, ब्राह्मणों में भूकंप आ गया। यह बिल क्यों आवश्यक था, और किस तरह इसका देशव्यापी विरोध किया गया, जिसके कारण यह बिल पारित न हो सका, और डॉ. आंबेडकर को केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा, उसका बहुत ही रोचक वर्णन कानून मंत्रालय में हिंदू-उर्दू अनुवादक तथा पच्चीस वर्षों तक डॉ. आंबेडकर के साथ रहे, सोहनलाल शास्त्री ने किया है। आगे का विवरण मैं उनके हवाले से ही यहां रख रहा हूं।

सोहनलाल शास्त्री के अनुसार, डॉ. आंबेडकर का हिंदू कोड बिल बनाने का विचार वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के समय से ही था, क्योंकि हिंदुओं का पर्सनल कानून मुसलमानों, ईसाइयों और पारसियों की तरह एक समान रूप से नहीं था। कानून की दृष्टि से हिंदू बिल्कुल अलग-अलग बिखरे हुए थे। उनका कोई भी विवाह, उत्तराधिकार, दत्तक, निर्भरता या गुजारा आदि का समान कानून नहीं था। कहीं याज्ञवल्क्य स्मृति मिताक्षरा का प्रचलन था, तो कहीं रूढ़ियां और रिवाज़ ही कानून थे। केरल में जायदाद या उत्तराधिकार प्राप्त करने वाली संतान लड़का न होकर लड़की ही थी। बंगाल में पिता ही सब कुछ था। पंजाब और उत्तर भारत में हिंदुओं की अलग-अलग जातियों के अलग-अलग रिवाज़ थे। कहीं-कहीं मामा भांजी से विवाह कर सकता था, और फिर भी पक्का हिंदू था। जहां मुसलमानों के पर्सनल कानून में पुरुष चार शादियां कर सकता था, वहां एक हिंदू पर सौ स्त्रियों से विवाह करने पर भी कोई कानूनी बंदिश नहीं थी। विधवा को मृत पति की संपत्ति में कोई अधिकार प्राप्त नहीं था। दत्तक या गोद लेने के लिए अपने बंधुओं में से अथवा अपनी पुत्री के पुत्र को ही गोद लिया जा सकता था। कहीं-कहीं एक व्यक्ति अपनी उम्र से भी बड़ी उम्र वाले व्यक्ति को दत्तक बना सकता था। इस तरह हिंदुओं का सामाजिक ढांचा एक हास्यास्पद प्रणाली पर बना हुआ था। विधवा विवाह सवर्ण जातियों में प्रचलित नहीं था। यदि विधवा विवाह कर ले तो उसकी संतान अवैध मानी जाती थी। इस तरह हिंदू समाज एक ऐसा झाड़-झंकाड़ था, जिसे किसी माली ने काट-छांट कर उद्यान नहीं बनाया था।[19]

हिंदू कोड बिल बनने से दलित और शूद्र जातियों का कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं था। दलित जातियों में विधवा विवाह पर रोक नहीं थी। पर वे छोटी-छोटी बातों पर झटपट पंचायत बुलाकर अपने पत्नियों को त्याग देते थे, यह समाप्त हो सकता था। यह वास्तव में सवर्ण महिलाओं की मुक्ति का कानून था। हिंदू कोड बिल का पहला विरोध ब्राह्मणों की ओर से इस कारण से था कि उसे एक अछूत द्वारा बनाया गया था, जिसे उनके धर्म में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। संपत्ति में लड़की को हिस्सा देना पड़ेगा, यह जानकार मारवाड़ी सेठ चीख़ उठे। सनातन धर्म के नेता स्वामी करपात्री, माधवाचार्य और निरंजन देव तीर्थ थे, जो बाद में पुरी के शंकराचार्य बने। वे लोग मारवाड़ी सेठों के धन के बल पर सारे हिंदू जगत में विरोध की आग भड़काने में लग गए। प्रतिदिन संसद के सामने नेहरू और आंबेडकर को गालियां दी जाने लगीं और हिंदू कोड मुर्दाबाद के नारे लगाए जाने लगे। एक उत्तेजित जुलूस आंबेडकर के हार्डिंग एवेन्यू स्थित आवास में भी घुस गया, जिसे सुरक्षा कर्मियों ने बहुत मुश्किल से बाहर निकाला। कुछ मुस्लिम नेताओं को भी विरोध के लिए इस आधार पर तैयार कर लिया गया कि आज हिंदू धर्म में सरकार हस्तक्षेप कर रही है, कल वह मुसलमानों के भी धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप कर सकती है। अजीजुद्दीन अहमद हिंदू कोड बिल के ऐसे ही विरोधी सांसद थे। स्वामी करपात्री ने यह दुष्प्रचार करना शुरू कर दिया कि हिंदू कोड बिल में सगे बहन-भाई का परस्पर विवाह करने का प्रावधान है। आंबेडकर ने हिंदू कोड बिल का हिंदी अनुवाद करवा कर स्वामी करपात्री को भिजवाया। पर करपात्री को तो विरोध ही करना था। तब आंबेडकर ने एक आर्यसमाजी विद्वान पंडित धर्मदेव विद्या वाचस्पति से संपर्क किया। उन्होंने हिंदू स्मृतियों से नपुंसक पति से तलाक, एकमात्र संतान कन्या को पिता की संपत्ति में मालिक होने वाले श्लोक खोजकर ‘वीर अर्जुन’ में प्रकाशित कराए और कहा कि विधवा-विवाह के लिए आर्यसमाजी पहले से सहमत थे। गीता प्रेस गोरखपुर की पत्रिका ‘कल्याण’ के संपादक (हनुमान प्रसाद) पोद्दार कह रहे थे कि “अगर यह बिल पास हो गया तो हमारा सत्यानाश हो जायेगा। हमारे कारोबार और हमारी संपत्ति में हमारी लड़कियां भी हिस्सेदार बनेंगी। तब हमारे दामाद हमारी पुत्रियों को भड़काकर हमारे कारोबार में हिस्सा मांगेंगे। अंधेर हो गया! इस देश में मुसलमानों का राज रहा, उन्होंने ऐसे कानून नहीं बनाए। अंग्रेजों ने दो सौ वर्ष राज किया, तब भी ऐसा कानून नहीं बनाया गया।”[20]

डॉ. आंबेडकर ने हिंदू कोड बिल पर विरोधियों का भ्रम दूर करने के लिए संसद के सेंट्रल हॉल में भारत के चोटी के विद्वानों और नेताओं की सभा का आयोजन किया, जिसमें बख्शी टेक चंद, अल्लादी कृष्णस्वामी, दुर्गा बाई, पी.वी. काणे, रघुनाथ शास्त्री, माधवाचार्य और देवनायकाचार्य शामिल थे। उन सभी ने हिंदू कोड बिल पर अपने-अपने विचार प्रकट किए। बख्शी टेक चंद ने, जो कट्टर आर्यसमाजी थे, और एक समय पंजाब हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रह चुके थे, यह कहकर विरोध किया कि अगर पिता की संपत्ति में पुत्री को अधिकार दिया गया, तो हरियाणा के जाट अपनी कन्याओं को पैदा होते ही मार देंगे। कई नेताओं ने इस कानून से भाई-बहन के प्रेम और आपसी स्नेह का रिश्ता खत्म हो जाने की बात कही। पी.वी. काणे और अल्लादी कृष्णस्वामी ने हिंदू कोड बिल का समर्थन किया। श्रीमती दुर्गा बाई ने तो हिंदू स्त्रियों का ऐसा करुणामय दृश्य खींचा कि गोष्ठी का प्रत्येक सदस्य उनसे प्रभावित हो गया।[21]

इसके बावजूद हिंदू कोड बिल का विरोध कम नहीं हुआ। स्वयं राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद बिल के विरोधी थे। प्रधानमंत्री पंडित नेहरू सुधारवादी थे, पर वह भी दबाव में थे, क्योंकि उनके मंत्रिमंडल के अधिकांश हिंदू सदस्य, जिनमें सरदार पटेल भी थे, बिल के पक्ष में नहीं थे। सांसद गोपालस्वामी अय्यंगर ने तो यहां तक कह दिया था कि अगर नेहरू ने बिल पर अपनी जिद नहीं छोड़ी तो उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है। सोहन लाल शास्त्री ने लिखा है कि हिंदू कोड बिल की जो चार धाराएं पारित हो चुकी थीं, राजेंद्र प्रसाद ने इस्तीफे की धमकी देकर उन्हें भी रद्द करा दिया। और अगले चुनावों के पश्चात नई संसद में उस पर विचार करने का निश्चय किया गया। इससे डॉ. आंबेडकर ने क्षुब्ध होकर मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया[22], जो तुरंत स्वीकार भी कर लिया गया।[23]

बाद में हिंदू कोड बिल चार टुकड़ों में कुछ ‘किंतु-परंतु’ के साथ कुछ जोड़कर और कुछ हटाकर, अलग-अलग नामों से अलग-अलग सत्रों में पास हुए। जिनके नाम हैं : हिंदू विवाह अधिनियम 1955, हिंदू अवयस्कता और संरक्षण अधिनियम 1956, हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम 1956 और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956। लेकिन इन अधिनियमों में वह क्रांतिकारी सुधार नहीं था, जो डॉ. आंबेडकर के मूल विधेयक में था। पंडित नेहरू ने 6 दिसंबर, 1956 को डा. आंबेडकर के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए यह स्वीकार किया कि “हिंदू कानून में सुधार उस ऐतिहासिक तथा यादगार ढंग से तो नहीं हो सके, जिस तरह डॉ. आंबेडकर ने हिंदू कानूनों के मसौदे तैयार किए थे, लेकिन फिर भी मुझे ख़ुशी है कि डॉ. आंबेडकर अपने जीवन में हिंदू कानूनों में कुछ सुधार देख सके।”[24]

लेकिन हिंदू कोड बिल में किए गए ये सुधार, जो चार कानूनों में पारित हुए, स्त्रियों को वे स्वतंत्रता नहीं देते, जो डॉ. आंबेडकर ने कोड बिल में दी थी। उन्होंने विवाह को पवित्र संस्कार नहीं माना था, बल्कि करार माना था। लेकिन संसद के हिंदू सदस्य हिंदू विवाह अधिनियम 1955 पारित कर हिंदू विवाह को पवित्र संस्कार ही बनाकर रहे। तलाक को भी कठिन बना दिया गया। अगर एक पक्ष तलाक नहीं चाहता है, तो दूसरा पक्ष तलाक लेने में सफल नहीं हो सकता। डॉ. आंबेडकर ऐसा नहीं चाहते थे। तथापि, यह स्वीकार करना होगा कि स्त्रियों को तलाक, दत्तक, पिता की संपत्ति में अधिकार (भले ही नेहरू सरकार ने उसमें यह जोड़ दिया है कि यह पुत्री के मांगने पर लागू होगा), और घरेलू हिंसा के खिलाफ कार्यवाही के अधिकार डॉ. आंबेडकर के कारण ही प्राप्त हुए हैं।

संदर्भ :

[1] डा. बाबासाहेब आंबेडकर : राइटिंग्स एंड स्पीचेस, वाल्यूम 5, पृष्ठ 438-39
[2] धनंजय कीर, महात्मा जोतीराव फूले : फादर ऑफ दि इंडियन सोशल रिवोल्यूशन, पापुलर प्रकाशन, बंबई, संस्क रण 1974, पृ. 24-25
[3] डा. बाबासाहेब आंबेडकर..वाल्यूम 3, पृ. 429-437
[4] वही, पृ. 432
[5] वही, पृ. 436-37
[6] मनुस्मृति, 9/46
[7] कबीर ग्रंथावली, संपादक : श्याम सुंदर दास, नागरी प्राचारिणी सभा, काशी, संस्करण, संवत 2034, सन 1977, पद 226, पृ.122-123
[8] धनंजय कीर, उपरोक्त, पृ. 4
[9] वही, पृ. 139
[10] परिमाला वी. राव, फाउंडेशन ऑफ तिलकस नेशालिज्म, ओरिएंट ब्लैकस्वान, नई दिल्ली, 2011, पृ. 262
[11] गाइत्रा बहादुर, कुली वूमन दि ओडीस इंडेंचर, हाशेट इंडिया, 2015, पृ. 36-37
[12] कैथरीन मेयो, स्लेव्स ऑफ दि गाड्स, हरकोर्ट, ब्रास एंड कंपनी, न्यूयॉर्क, 1929, पृ. 240-41
[13] चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु, बाबासाहेब का जीवन संघर्ष, 1961, बहुजन कल्याण प्रकाशन, लखनऊ, पृ. 72-73
[14] डा. बाबासाहेब आंबेडकर….वाल्यूम 2, पृ. 166-167
[15] डा. बाबासाहेब आंबेडकर…., वाल्यूम 10, पृ. 87-88
[16] वही, पृ. 139-144
[17] वही, पृ. 264-265
[18] वही, पृ. 800
[19] सोहनलाल शास्त्री, बाबासाहेब डा. आंबेडकर के संपर्क में पच्चीस वर्ष, भारतीय बौद्ध महासभा, आंबेडकर भवन, नई दिल्ली, पांचवा संस्करण 2000, पृ. 80-81
[20] वही, पृ. 81-89
[21] वही, पृ. 90-94
[22] डा. बाबासाहेब आंबेडकर….,वाल्यूम 15, पूर्ण विवरण के लिए देखिए पृ. 821 से 830
[23] सोहनलाल शास्त्री, उपरोक्त, पृ. 102
[24] एल.आर. बाली, आंबेडकर बनाम गांधी, आनंद साहित्य सदन, अलीगढ़, संस्करण 1994, पृ. 124

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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