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अयोध्या में राम : क्या सोचते हैं प्रयागराज के दलित-बहुजन?

बाबरी मस्जिद ढहाने और राम मंदिर आंदोलन में दलित-बहुजनों की भी भागीदारी रही है। राम मंदिर से इन लोगों को क्या मिला? राम मंदिर बनने के बाद इनके जीवन में क्या अमूल-चूल परिवर्तन हुआ? इस संबंध में सुशील मानव ने उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में दलित-बहुजनों से उनका विचार जाना

उत्तर प्रदेश के अयोध्या में नवनिर्मित मंदिर में राम की प्रतिमा की स्थापना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों तथाकथित प्राण-प्रतिष्ठा हुए एक महीने का वक़्त बीत चुका है। बाबरी मस्जिद ढहाने और राम मंदिर आंदोलन में दलित-बहुजनों की भी भागीदारी रही है। राम मंदिर से इन लोगों को क्या मिला? राम मंदिर बनने के बाद इनके जीवन में क्या अमूल-चूल परिवर्तन हुआ? क्या राम के आने से इनके जीवन की तमाम बुनियादी समस्याएं खत्म हो गईं? आखिर इनके जीवन के लिए क्या ज़रूरी है राम या रोटी? इऩ्ही सवालों को लेकर हम दलित-बहुजन समाज के लोगों के पास गए। 

एक प्राइवेट स्कूल में चार सालों तक शिक्षण कार्य करने के बाद प्रयागराज के बहादुरपुर ब्लॉक के मदारपुर गांव के निवासी दिनेश पाल भेड़-पालन का अपना पुश्तैनी काम करते हैं। उन्होंने कहा कि “उत्तर प्रदेश में पिछले महीने एक साथ दो विरोधाभासी घटनाएं घटित हुईं। एक ओर अयोध्या में बीते 22 जनवरी को राम मंदिर उद्घाटन का गाज़े-बाज़े और पटाखे के साथ भव्य आयोजन हो रहा था ताे दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के सभी मंडलों में युद्ध जैसे जोखिम के हालात में इजराइल में काम करने के लिए सरकार द्वारा कामगारों की भर्ती की जा रही थी। एक ओर कहा जा रहा था कि राम दूसरा वनवास खत्म करके घर वापिस आ रहे हैं और दूसरी ओर दलित-बहुजन समाज के कामगारों को घर-परिवार से दूर वनवास पर भेजा जा रहा था। एक ओर तमाम चौक-चौराहों पर राम के नाम के गीत बजाए जा रहे थे तो दूसरी ओर दलित-बहुजनों को अपने जिंदगी का दुख दूर करने के लिए अपनी जिंदगी को जोखिम में डालकर इजरायल जाना पड़ रहा था। यह विरोधाभास है। वर्ना कुटिया में समाज का कौन-सा वर्ग रहता है, सबको पता है। ग़रीब बहुजनों की कुटिया में विस्थापन आता है। राम तो करोड़ों-अरबों रुपए के वारे-न्यारे करने वालों के महलों में आते हैं। दलित बहुजनों के पास तो वह तभी जाते हैं जब उन्हें ब्राह्मणवाद की स्थापना के लिए किसी दलित शंबूक का सिर चाहिए होता है। राम और मंदिर दरअसल भाववादी फरेब का चरमोत्कर्ष है और रोटी-रोजी के लिए इजरायल भेजा जाना भौतिक यथार्थ का सबसे कुरूप चेहरा है, जो बताता है कि इस देश में बेरोज़गारी की स्थिति कितनी भयावह है। उसे ढंकने के लिए ही राम नाम का आडंबर रचा गया है, लेकिन यह आडंबर आंखों को धोखा दे सकता है, पेट को नहीं।” 

युवाओं की नियुक्ति के पहले दस्तावेजों की जांच करते उत्तर प्रदेश के अधिकारी

अंग्रेजी दैनिक ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ द्वारा प्रकाशित खबर के मुताबिक, इजरायल-हमास संघर्ष के बीच इजरायल में जनशक्ति आवश्यकताओं के लिए केंद्र सरकार के आह्वान पर उत्तर प्रदेश सरकार ने बीते 23 जनवरी को औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्र, अलीगंज में एक सप्ताह का भर्ती अभियान चलाया। इस दौरान इजरायल सरकार की टीम द्वारा बार बेल्डिंग करनेवाले, टाइल्स लगानेवाले, लोहा का काम करनेवाले और फर्नीचर आदि का काम करनेवाले बढ़ई आदि के लिए 4600 उम्मीदवारों की भर्ती किया। जनसंख्या, आप्रवासन और सीमा प्राधिकरण (पीआईबीए) द्वारा 23 जनवरी को चयनित कामगारों में आगरा, कानपुर और लखनऊ से 629, फिर 24 जनवरी को आजमगढ़-बांदा मंडल से 585 कामगार, 25 जनवरी को बरेली, झांसी, नोएडा, मुरादाबाद और देवीपाटन मंडल से 563 मज़दूर, 27 जनवरी को वाराणसी, मिर्ज़ापुर, मेरठ और ग़ाज़ियाबाद से 656 मज़दूर, 28 जनवरी को गोरखपुर से 877 मज़दूर, 29 जनवरी को अयोध्या व सहारनपुर मंडल से 739 मज़दूर, 30 जनवरी को अलीगढ़, बस्ती, प्रयागराज मंडल से 603 मज़दूरों को नयुक्त किया गया। 

एक दृश्य देखें। बीते 18 फरवरी को प्रयागराज में कई कार्यक्रम आयोजित थे। यूपी पुलिस भर्ती परीक्षा भी थी, जिसके चलते वाहन कम पड़ गए। इस कारण जहां का किराया 20 रुपए होता है, वहां के लिए 40 रुपए वसूला जाने लगा। दोगुना किराये को लेकर एक मज़दूर से कंडक्टर झगड़ा कर लेता है और बीच रास्ते बस रुकवाकर उसे बस से बाहर निकलने को कहता है। लोगों के बहुत समझाने पर ड्राइवरर बस को आगे बढ़ाता है। अपनी खीझ निकालते हुए वह मज़दूर कहता है रोज़ भाई-बाबू कहकर बुलाते हैं और पांच रुपए कम भी दो तो चुपचाप ले लेते हैं। आज गाड़ी नहीं मिल रही तो लूट मचा रखे हैं। इस पर एक पलंबर का काम करने वाला एक मज़दूर कहता है कि मोदी जी कहे हैं ना कि आपदा को अवसर बनाओ तो यह आपदा को अवसर बना रहा है। सवाल फिर राम मंदिर बन जाने का उठा तो दूसरा मज़दूर हालात पर तंज करते हुए कबीर के दोहे को बिगाड़कर अपनी ज़बान में बोला ‘राम नाम की लूट मची है लूट सके तू जितना लूट’। उसके इस तंज पर साथी मज़दूर हंस पड़े। 

सिकंदरा ब्लॉक के निवासी टाइल्स लगानेवाले मजदूर जीतलाल व उनके साथी (तस्वीर : सुशील मानव)

चिलौड़ा गांव निवासी महेश कुमार शहर के लेबर चौक पर रोज़ दिहाड़ी का काम ढ़ूंढ़ने जाते हैं और हर रोज़ देर शाम बस के धक्के खाते, कंडक्टर से लड़ते-झगड़ते, गाली खाते घर लौटते हैं। चिरौड़ा से अलोपीबाग़ चुंगी का बस का किराया 20 रुपया है। ऑटो वाले 25 रुपए लेते हैं। महेश कुमार कहते हैं कि “राम और शिव शंकर हरे तौ और आफ़त मचाये हैं। इस साल सावन में पूरे दो महीने बसों का रास्ता घुमाये (रूट डायवर्जन) रखे। और बस वाले दो महीना दोगुना&तिगुना किराया वसूले हैं। दो महीने की पूरी कमाई किराये भाड़े में ही चला गया है।” 

एक और दृश्य देखें। टाइल्स लगाने का काम करने वाले दो कामगार दोपहर में सुस्ताते हुए बीड़ी पी रहे हैं। बातचीत के क्रम में हमने उनसे भी राम और रोटी का सवाल पूछा। सिकंदरा ब्लॉक के जीतलाल जवाब में कहते हैं कि “हमारे यहां एक कहावत है – ‘भूखे भजन न होहिं गोपाला, लई लो अपनी कंठीमाला’। धर्म भरे पेट वाले धनाढ्यों का धंधा है। बैठोलों का ढकोसला है। यहां तो रोज़ कुंआ खोदना है और रोज़ पानी पीना है। न हमारे पास खेती-बारी है, न दुकान-दौरी और न ही बाबू साहेब वाली सरकारी नौकरी। रामौं हरे ओनही के सुनत हैं जेकर घर बार धन दौलत रुपिया पैसा ज़मीन जायदाद सब पहले से भरा है। अपने राम तो अपना हाथ-पैर होता है। जब तक पौरुख रहता है (देह में ताकत रहती है) तब तक जियते हैं और जब पौरुख घट जाता है तो मर जाते हैं। कितने तो जवानी में ही बीमारी से मर जाते हैं। सारा अत्याचार, सारा शोषण ग़रीबी, बीमारी, महंगाई सब हमी लोग झेलते हैं। कहां किसी राम के यहां अपनी सुनवाई होती है।” 

मिथकीय राम के जीवन का सबसे बदनाम पात्र है– धोबी। सीता के चरित्र पर शक़ करने वाले राम के स्त्रीविरोधी चरित्र को छुपाने के लिए उनकी सारी दुबर्लता धोबी पर आरोपित कर दी गई। धोबी समाज से आऩेवाले लाला चौधरी नरई गांव के निवासी हैं। वे बाबूगंज बाज़ार में दुकान लगाते हैं और अपना पारंपरिक काम कपड़ों पर इस्त्री करना और कपड़े धुलने का काम करते हैं। हमारे सवालों के जवाब में वह कहते हैं– “भैय्या दिन भर हाथ गोड़ चलाउब तबहिं रात में रोटी मिले। राम के तमाशा एक दिन दुई दिन चल सकत है ये भैय्या। रोज-रोज उनही के घिसबा तौ पेटराम न सुनहीं।” लाला चौधरी कोरोना काल को याद करते हुए कहते हैं कि कोरोना महामारी ने भी बता दिया कि दवाई और वैक्सीन न हो तो कोई राम नहीं काम आएगा। दवाई और वैक्सीन यूनिवर्सिटी में पढ़कर निकले वैज्ञानिकों डाक्टरो ने बनाया था, किसी मंदिर के पुजारी और संत-महंत ने नहीं।” 

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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