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लोकसभा चुनाव : आरएसएस की संविधान बदलने की नीयत के कारण बदल रहा नॅरेटिव

क्या यह चेतना अचानक दलित-बहुजनों के मन में घर कर गई? ऐसा कतई नहीं है। पिछले 5 साल से लगातार सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों और गोष्ठियों में इसकी चर्चा होती रही है कि भाजपा और आरएसएस का छुपा हुआ एजेंडा डॉ. आंबेडकर के संविधान को बदलना तथा मनु का विधान लागू करना है। बता रहे हैं प्रो. रविकांत

2024 के लोकसभा चुनाव के चार चरणों में दो-तिहाई से अधिक यानी 381 सीटों पर मतदान हो चुका है। ज्यादातर चुनाव विश्लेषकों और पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस चुनाव में मतदाता बहुत शांत हैं। यहां तक कि पार्टियों के कार्यकर्ता और समर्थक भी मुखर नहीं दिखाई दे रहे हैं। जबकि आमतौर पर भाजपा के समर्थक मुखर ही नहीं, बल्कि विपक्षियों पर आक्रामक भी रहते हैं। यही कारण है कि जमीन पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार भी हैरान हैं। पत्रकारों का कहना है कि उन्होंने इतना खामोश चुनाव पहले कभी नहीं देखा। लेकिन उनका मानना है कि अंदर ही अंदर एक धारा है जो चुनाव को निर्णायक बना रही है। लेकिन यह धारा क्या है? क्या इस धारा ने चुनाव को बदल दिया है?

प्रारंभ इस साल के जनवरी महीने में राम मंदिर के उद्घाटन अथवा तथाकथित राम की प्रतिमा में प्राण-प्रतिष्ठा से करते हैं । इसके बाद जननायक कर्पूरी ठाकुर (बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री) और चौधरी चरण सिंह (भूतपूर्व प्रधानमंत्री) जैसे अतिपिछड़ा और किसान समाज के राजनेताओं को मोदी सरकार द्वारा भारत रत्न दिया गया। उस समय भाजपा और नरेंद्र मोदी के पक्ष में माहौल बन रहा था। विपक्षी गठबंधन की एकता बिखरने लगी थी। नीतीश कुमार ने फिर से पाला बदल लिया और ममता बनर्जी ने ऐलान कर दिया कि पश्चिम बंगाल में उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा नहीं होगी। इससे विपक्षी एकता को झटका लगा। कांग्रेस ने जो क्राउड फंडिंग (जन सहयोग) के जरिए जो चंदा इकट्ठा किया था, उस पर भी केंद्र सरकार द्वारा तकनीक का उपयोग कर ताला लगवाने की कोशिश की गई। कांग्रेस के खाते सील कर दिए गए। इन सबसे ऐसा लगने लगा कि एक तरफ भाजपा के पास संसाधनों की भरमार है तो विपक्ष लगभग खाली हाथ है।

विपक्षी नेताओं पर ईडी व सीबीआई की एक के बाद एक छापेमारी शुरू हो गई। कांग्रेस सहित विपक्ष के तमाम नेताओं को डरा-धमकाकर भाजपा में शामिल कराया जाने लगा। इतना ही नहीं, हेमंत सोरेन जैसे चुने हुए आदिवासी मुख्यमंत्री को ईडी की विशेष अदालत ने जेल भेज दिया। इसके बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भी तिहाड़ भेज दिया गया। विपक्ष को निपटाने के लिए एक तरह का गुरिल्ला वार चल रहा था। 

इन तमाम वजहों से विपक्ष में कोई खास उम्मीद नहीं दिख रही थी। जबकि मोदी और सत्ता पक्ष का उत्साह चरम पर था। इसलिए नरेंद्र मोदी ने “अबकी बार 400 पार” का नारा दिया। लेकिन जब यह सवाल उठा कि इतना बड़ा बहुमत क्यों चाहिए तो भाजपा के कई सांसदों और प्रत्याशियों ने ऐलान कर दिया कि संविधान बदलने के लिए दो-तिहाई से ज्यादा बहुमत की जरूरत है। 

कांग्रेस के नेता राहुल गांधी व भाजपा के नेता सह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

“भाजपा संविधान बदलना चाहती है” – इस ऐलान का तेजाबी असर दलित, आदिवासी और ओबीसी समाज में हुआ है। डॉ. आंबेडकर द्वारा लिखित संविधान ने दलित और आदिवासियों को राजनीतिक और सरकारी महकमों में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण का अधिकार दिया और ओबीसी की पहचान कर भविष्य में उनके लिए आरक्षण के प्रावधान भी रखा। बाबासाहब ने दलितों की गुलामी और वंचना मिटाने के लिए आजीवन संघर्ष किया। स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस के साथ तमाम असहमतियों के बावजूद डॉ. आंबेडकर गांधी और नेहरू के आमंत्रण पर संविधान सभा में पहुंचे। डॉ. आंबेडकर ने स्वीकार किया कि दलितों के हितों की रक्षा हेतु वे संविधान सभा में आना चाहते थे। लेकिन सभा ने उन्हें प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाकर सबसे बड़ी जिम्मेदारी सौंपी। इस तरह वे संविधान निर्माता बने और संविधान में दलितों, अल्पसंख्यकों और पिछड़ों के लिए तमाम मौलिक और कानूनी प्रावधान सुनिश्चित किया। 

जाहिर तौर पर भाजपा के संविधान बदलने के ऐलान के बाद देश का जागरूक दलित और आदिवासी समाज संगठित होकर उसके खिलाफ खड़ा हो गया। तमाम पत्रकारों को यह बात समझ में नहीं आ रही है कि अचानक खासकर दलित-बहुजन समाज मुखर होकर भाजपा का विरोध क्यों करने लगा? दरअसल, उसके लिए संविधान बदलने का मामला केवल आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि सदियों बाद मनुष्य होने का जो एहसास उसे प्राप्त हुआ है, उसे वह खोना नहीं चाहता। संविधान और डॉ. आंबेडकर के प्रति उसका भावनात्मक लगाव है, जिसके कारण वह किसी भी कीमत पर संविधान पर आंच नहीं आने दे सकता। वंचितों-शोषितों का यह समाज अपनी आने वाली पीढ़ियों को स्मृतिकाल और पेशवाई दौर की तरह गुलाम नहीं देख सकता। 

क्या यह चेतना अचानक दलित-बहुजनों के मन में घर कर गई? ऐसा कतई नहीं है। पिछले 5 साल से लगातार सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों और गोष्ठियों में इसकी चर्चा होती रही है कि भाजपा और आरएसएस का छुपा हुआ एजेंडा डॉ. आंबेडकर के संविधान को बदलना तथा मनु का विधान लागू करना है। संघ से जुड़े तमाम हिंदुत्ववादी संगठन लगातार भारत को हिंदूराष्ट्र बनाने और मनुस्मृति के आधार पर संविधान लागू करने की बात करते रहे हैं। इसीलिए बहुजन नायकों पर होने वाली गोष्ठियों में संविधान बचाने की शपथ ली जाती रही। जिन लोगों को लगता है कि अचानक संविधान कैसे मुद्दा बन गया, वे दरअसल, इस चेतना की प्रक्रिया से अनजान हैं। यही कारण है कि देशभर का करीब 70 फ़ीसदी दलित-बहुजन समाज आज विपक्ष यानी ‘इंडिया’ गठबंधन के साथ खड़ा है। वे संविधान बदलने वालों को ही बदलने के लिए विपक्ष साथ आ गए हैं। 

संविधान बचाने के मुद्दे के अतिरिक्त इस चुनाव का दूसरा मोड़ कांग्रेस पार्टी का घोषणापत्र साबित हुआ, जिसके प्रारंभ में ही सामाजिक न्याय को स्थान दिया गया। दरअसल, नरेंद्र मोदी के 10 साल के शासन में देश के शीर्षस्थ चुनिंदा अमीरों और पूंजीपतियों को छोड़कर प्रत्येक वर्ग की आर्थिक क्षति हुई है। पहले नोटबंदी ने छोटे दुकानदारों और गरीब परिवारों को उजाड़ दिया। काला धन समाप्त करने के नाम पर की गई नोटबंदी ने देश की अर्थव्यवस्था को मानो ठप्प कर दिया गया। इसके बाद गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) ने मंझौले कारोबारियों को तबाह कर दिया। रही सही कसर कोरोना महामारी के समय पूरी हो गई। तालाबंदी के कारण सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग-धंधे बंद हो गए। असंगठित क्षेत्र में लगे तमाम मजदूर अपने गांव वापस आ गए। उन्हें 5 किलो राशन देकर भिखमंगा बना दिया गया। लेकिन उन्हें रोजगार नहीं मिला। इससे इन मजदूरों का स्वाभिमान ही नहीं छलनी हुआ, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और परवरिश पर भी विपरीत असर पड़ा। डीजल, खाद और बीज के दामों की बढ़ोतरी ने किसानों को कंगाल कर दिया। आवारा पशुओं ने उनकी रात की नींद छीन ली। कर्ज के बोझ तले दबा किसान आत्महत्या के लिए मजबूर होने लगे। जब उसने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की मांग की तो उस पर केंद्र सरकार ने लाठियां बरसाईं। किसानों की जमीनों पर अडाणी जैसे पूंजीपतियों की नजर गड़ी हुई है। मोदी का मकसद किसानों को जमीनों से बेदखल करके अडाणी का साम्राज्य स्थापित करना है तथा इस कारण वे अपने पूंजीपति मित्रों के लिए किसानों को खेतिहर मजदूर मात्र बनाना चाहते हैं।

आज किसान-मजदूर ही नहीं, देश का नौजवान भी मोदी सरकार से बेहद नाराज है। पिछले दस सालों में नहीं के बराबर सरकारी नौकरियां दी गयीं। ‘अग्निवीर’ जैसी चार वर्षीय योजना लाकर नरेंद्र मोदी ने नौजवानों का सैनिक बनने का भी सपना छीन लिया। सरकारी भर्तियों की राह देखते-देखते नौजवानों की आंखें पथरा गईं। उनके हौसले टूटते गए। इस दरम्यान सैकड़ों नौजवानों ने आत्महत्या कर ली। इसकी पुष्टि राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो द्वारा जारी ‘क्राइम इन इंडिया-2022’ के मुताबिक वर्ष 2022 में कुल 1 लाख 71 हजार लोगों ने खुदकुशी की। इनमें 26 प्रतिशत दिहाड़ी मजदूर थे। सनद यह भी रहे कि पांच वर्षों के दौरान दिहाड़ी मजदूरों द्वारा खुदकुशी के मामलों में हर साल वृद्धि दर्ज की गई। 

दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी ने अपने घोषणापत्र में पांच न्याय का ऐलान किया। युवाओं को 30 लाख सरकारी नौकरियां छह माह के भीतर देने का वादा बहुत आकर्षक बना है। ‘अग्निवीर’ योजना को समाप्त करने के वादे ने खासकर ग्रामीण पृष्ठभूमि के नौजवानों को आकर्षित किया है। कर्जमाफी से लेकर एमएसपी का वादा देश के किसानों के लिए, महिलाओं के लिए प्रतिवर्ष 1 लाख रुपए की नगदी देने की योजना, बेरोजगार नौजवानों के कौशल विकास हेतु प्रतिवर्ष 1 लाख की सहायता; ऐसी योजनाएं हैं, जिनसे लोगों की आत्मनिर्भरता ही नहीं बढ़ेगी, बल्कि रुका हुआ आर्थिक पहिया भी चल निकलेगा। लोग अब यह उम्मीद कर रहे हैं कि उनके पास जो नगदी पहुंचेगी, वह बाजार में आएगी, खरीदारी बढ़ेगी, और उत्पादन बढ़ेगा। और जब उत्पादन बढ़ेगा तो रोजगार भी सृजित होगा। राहुल गांधी इस आर्थिक प्रक्रिया को आसान शब्दों में लगातार लोगों को समझा रहे हैं।

‘भारत जोड़ो यात्रा’ और ‘न्याय यात्रा’ के दौरान राहुल गांधी जाति जनगणना और दलित, आदिवासियों और पिछड़ों के मुद्दों पर मुखर रहे हैं। कांग्रेस के मेनिफेस्टो पर इन मुद्दों की स्पष्ट छाप दिखाई दे रही है। खासकर 50 फ़ीसदी की आरक्षण की सीमा हटाने यानी दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को आबादी के अनुपात में आरक्षण देने के वादे ने इन वर्गों को प्रभावित किया है। बैकलॉग की भर्ती, निजी क्षेत्र और न्यायपालिका में आरक्षण का वादा सामाजिक न्याय की ओर बढ़ता एक जरूरी कदम है। सामाजिक और आर्थिक न्याय का दस्तावेज बने कांग्रेस के मेनिफेस्टो ने इस चुनाव में निर्णायक भूमिका अदा की है। 

इस तरह यह प्रतीत होता है कि जमीन पर महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ लोगों का गुस्सा और संविधान बदलने के ऐलान ने भाजपा के खिलाफ पूरा माहौल पैदा कर दिया है। भाजपा और हिंदुत्ववादियों ने दस सालों में एक डर पैदा किया। इस वजह से लोग खामोश हैं। लेकिन वे बदलाव के लिए वोट करने के लिए निकल रहे हैं। जबकि भाजपा का आधार मतदाता महंगाई और बेरोजगारी से इतना पीड़ित है कि मोदी द्वारा बार-बार मुसलमानों से डराने के बावजूद वह निष्क्रिय और खामोश बना हुआ है। इसलिए चुनाव बेहद शांत दिख रहा है। लेकिन क्या इस आंतरिक विरोधी हवा से भाजपा सत्ता से बाहर जाती हुई दिखाई दे रही है, यह तो चुनाव परिणाम ही बताएगा।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

रविकांत

उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के दलित परिवार में जन्मे रविकांत ने जेएनयू से एम.ए., एम.फिल और लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की डिग्री हासिल की है। इनकी प्रकाशित पुस्तकों में 'समाज और आलोचना', 'आजादी और राष्ट्रवाद' , 'आज के आईने में राष्ट्रवाद' और 'आधागाँव में मुस्लिम अस्मिता' शामिल हैं। साथ ही ये 'अदहन' पत्रिका का संपादक भी रहे हैं। संप्रति लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

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