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मोदी राज में ऐसे बदला है लोकतंत्र

2014 से देश की प्रमुख लोकतांत्रिक संस्थाएं औपचारिक रूप से अपनी जगह पर बनी हुई तो हैं, लेकिन लोकतंत्र को कायम रखने वाले मानदंड और प्रथाएं काफी हद तक कमजोर हुई हैं। इस स्थिति को देखते हुए लोकतंत्र पर नजर रखने वाले संगठन आज भारत को एक ऐसे “हाइब्रिड शासन” के रूप में वर्गीकृत करते हैं जहां ना तो पूरी तरह से लोकतंत्र है ना ही निरंकुशता। बता रहे हैं जावेद अनीस

पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई पहली हिंदुत्ववादी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के एक दशक पूरे हो चुके हैं। निस्संदेह इस दौरान नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रही सरकार अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे को लागू करने में बहुत ईमानदार साबित हुई है और साथ ही उसने यह संदेश देने का कोई मौका नहीं गंवाया है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक नये भारत का निर्माण हो रहा है, जो 1947 में विश्व के नक्शे पर नजर आए स्वतंत्र भारत से बिलकुल अलग है। लेकिन दूसरी तरफ भारत एक विकेंद्रीकृत, उदारवादी और समावेशी लोकतंत्र के तौर पर लगातार कमजोर हुआ है। 

एक दशक के बाद ऊपरी तौर पर तो भारत वही ही दिखलाई पड़ता है, लेकिन भारतीयता के मायने को बहुत ही बारीकी से बदल दिया है। विभाजक और एकांगी विचार जो कभी वर्जित थे, आज मुख्यधारा बन चुके हैं, भारतीय लोकतंत्र को रेखांकित करने वाले मूल्यों और संस्थानों पर लगातार हमले हुए हैं, जिससे लोकतंत्र के स्तंभ कमजोर हो चुके हैं। नागरिकों के बीच असामनताएं बढ़ी हैं और नागरिक समाज सिकुड़ता गया है।

देश, सिविल सोसाइटी और मीडिया की स्थिति 

आज भारत पूरी तरह से बदल चूका है। वर्ष 2014 से 2024 के बीच देश का बुनियादी चरित्र बदल चूका है। आजादी के बाद जवाहर लाल नेहरू द्वारा दिए गये प्रसिद्ध भाषण “ट्रिस्ट विद डेस्टिनी” में पुराने से बाहर निकल नए युग में कदम रखने का वादा किया गया था, लेकिन अब देश के पहले प्रधानमंत्री द्वारा देशवासियों से किये गए वायदे को तोड़ दिया गया है। आज भारत भविष्य के रास्ते से भटककर अतीत के रास्ते पर चल पड़ा है। सबसे चिंताजनक स्थिति उस धर्मनिरपेक्षता के रास्ते से हटना है, जिसे आजादी के बाद से हमारे राष्ट्रीय नीति का एक मूलभूत सिद्धांत माना जाता रहा है। उसकी जगह हिंदू राष्ट्रवाद को स्थापित करने की साजिशें रची जा रही हैं। 

पिछले दस सालों खासकर 2019 के बाद अपने दूसरे कार्यकाल में मोदी सरकार ने अपने वैचारिक एजेंडे को जोरदार गति से क्रियान्वित किया है, जिसमें अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाना, तीन तलाक पर कानून, नागरिकता संशोधन कानून-2019 प्रमुख रूप से शामिल हैं। धर्मनिरपेक्ष संविधान वाले भारत में असंवैधानिक यह कि राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह के बाद केंद्र सरकार के कैबिनेट बैठक में एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें कहा गया कि “1947 में इस देश का शरीर स्वतंत्र हुआ था और अब इसमें आत्मा की प्राण-प्रतिष्ठा हुई है”।

किसान आंदोलन के दौरान लाठीचार्ज करती पुलिस

किसी लोकतंत्र में सिविल सोसाइटी (नागरिक समाज) की भूमिका उसके अंतरात्मा के आवाज की तरह होती है। यह राज्य और बाजार से स्वतंत्र ईकाई होती है और किसी भी जिंदादिल लोकतंत्र के लिए प्रभावी सिविल सोसाइटी का वजूद बहुत जरूरी है। नागिरकों के हितों की वकालत, लोकतांत्रिक सहभागिता और मानव अधिकारों की रक्षा जैसे काम इसकी प्रमुख भूमिकाओं में शामिल है। पिछले एक दशक के दौरान भारत में सिविल सोसाइटी की आवाज कमजोर हुई है। सिविल सोसाइटी और नागरिक अधिकारों पर नजर रखने वाले वैश्विक संगठन ‘सिविकस’ ने अपने 2022 के रिपोर्ट में भारत को ‘दमित’ की श्रेणी में रखा है। गौरतलब है कि 2019 से भारत लगातार इसी श्रेणी में है। रिपोर्ट में कहा गया है कि “जो लोग और संगठन सरकार से सहमत नहीं होते हैं, उनके खिलाफ यूएपीए और एफसीआरए जैसे कानूनों का इस्तेमाल किया जाता है।”

रही बात मीडिया की तो यह कहना अतिरेक बिल्कुल नहीं है कि इसका हाल बेहाल है। देश के प्रमुख मीडिया संस्थानों की विश्वसनीयता लगातार कम होती गई है। आमलोगों की नजर में वे पक्षपाती नजर आने लगे हैं। मुख्यधारा की मीडिया मोदी सरकार की आलोचना करने में स्वतंत्र महसूस नहीं करती है। इन सबके चलते एक स्वंतत्र संस्थान के तौर पर मीडिया बहुत कमजोर हुई है। यही कारण रहा है कि 2014 के बाद से भारत विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 180 देशों में से 161वें स्थान पर आ गया है, जो अफगानिस्तान, बेलारूस, हांगकांग, लीबिया, पाकिस्तान और तुर्की से नीचे है। इधर सोशल मीडिया के उदय ने संचार सामग्री के निर्माण और प्रसार को विकेंद्रीकृत तो कर दिया है, लेकिन उसकी प्राथमिकता मूल्य गुणवत्ता के बजाय वायरल होना (तेजी से फैलना) है।

लोकतंत्र के उखड़ते पांव 

2014 से देश की प्रमुख लोकतांत्रिक संस्थाएं औपचारिक रूप से अपनी जगह पर बनी हुई तो हैं, लेकिन लोकतंत्र को कायम रखने वाले मानदंड और प्रथाएं काफी हद तक कमजोर हुई हैं। इस स्थिति को देखते हुए लोकतंत्र पर नजर रखने वाले संगठन आज भारत को एक ऐसे “हाइब्रिड शासन” के रूप में वर्गीकृत करते हैं जहां ना तो पूरी तरह से लोकतंत्र है ना ही निरंकुशता।

लेकिन अंतरराष्ट्रीय संस्था वी-डेम इंस्टीट्यूट की ‘डेमोक्रेसी रिपोर्ट-2024’ में कहा गया है कि “2023 में भारत ऐसे 10 शीर्ष के देशों में शामिल रहा, जहां पूरी तरह से तानाशाही अथवा निरंकुश शासन व्यवस्था है।” वी-डेम द्वारा भारत को 2018 में चुनावी तानाशाही की श्रेणी में रख दिया गया था, उसके बाद से वी-डेम के सूचकांक में भारत का दर्जा सुधरने के बजाय लगातार गिरा ही है। यह अकारण नहीं है, क्योंकि इलेक्टोरल बॉन्ड से मिली भारी दानराशि, विपक्ष पर केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई के चलते चल रहा लोकसभा चुनाव भी एकतरफा सा लगने लगा है। ऐसे में विपक्ष और जागरूक नागरिकों द्वारा चुनावों के स्वतंत्र और निष्पक्ष होने को लेकर चिंताएं वाजिब हैं।

सनद रहे कि एक लोकतंत्र में राजनीतिक प्रक्रिया का मतलब सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि रचनात्मक सहयोग को बढ़ावा देना है। एक प्रकार से देखा जाए तो एक लोकतंत्र में राजनीति का अर्थ आम सहमति और सामूहिक कार्रवाई के लिए मंच प्रदान करना है, लेकिन भारत में आज दोनों चीजें दुर्लभ हो चुकी हैं। भारतीय लोकतंत्र में सत्ता संतुलन की स्थिति बिगड़ चुकी है। पिछले दस वर्षों से हमारे लोकतंत्र के साथ ऐसा कुछ हो रहा है, जो इसके मूल ढांचे यानी संविधान को ख़त्म कर रहा है और एक देश के रूप में हम गुस्से से उबलते, आपस में भिड़ते, छोटे दिल-दिमाग और संकीर्ण सोच रखने वाले एक राष्ट्र के रूप में तब्दील होते जा रहे हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

जावेद अनीस

भोपाल निवासी जावेद अनीस मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं तथा सामाजिक व राजनीतिक विषयों पर नियमित रूप से लेखन करते हैं

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