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‘सामाजिक न्याय की जमीनी दास्तान’ नई किताब के साथ विश्व पुस्तक मेले में मौजूद रहेगा फारवर्ड प्रेस

हमारी नई किताब ‘सामाजिक न्याय की जमीनी दास्तान : इतिहास का पुनरावलोकन’ पुस्तक मेले में बिक्री के लिए उपलब्ध होगी। यह किताब देश के कई राज्यों यथा– बिहार, उत्तर प्रदेश, असम, केरल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र, में सामाजिक न्याय आंदोलन के अतीत, वर्तमान और इसकी संभावनाओं को समेटे हुए है

विश्व पुस्तक मेले का आयोजन दिल्ली के प्रगति मैदान में आगामी 1 फरवरी से हो रहा है जो 9 फरवरी तक चलेगा। दलित-बहुजन वैचारिकी पर आधारित पुस्तकों के साथ फारवर्ड प्रेस मेले में मौजूद रहेगा। इस बार फारवर्ड प्रेस की नई किताब ‘सामाजिक न्याय की जमीनी दास्तान : इतिहास का पुनरावलोकन’ भी बिक्री के लिए उपलब्ध होगी। 

इसके अलावा पाठक फारवर्ड प्रेस के स्टॉल से संदर्भ-टिप्पणियों से समृद्ध जोतीराव फुले की प्रसिद्ध किताब ‘गुलामगिरी’ और सावित्रीबाई फुले के समग्र साहित्य का मूल मराठी से हिंदी अनुवाद ‘सावित्रीनामा’ खरीद सकेंगे। वहीं डॉ. आंबेडकर के साहित्य पर आधारित ‘जाति का विनाश’, ‘हिंदू धर्म की पहेलियां’ और ‘आंबेडकर की नजर में गांधी और गांधीवाद’ भी बिक्री के लिए उपलब्ध होगी। पाठक बहुप्रशंसित पुस्तकों – ‘दलित पैंथर का आधिकारिक इतिहास’, ‘आरएसएस और बहुजन चिंतन’, ‘कबीर और कबीर पंथ’, ‘सामाजिक न्याय की कहानी : पीएस कृष्णन की जुबानी’ और ‘महिषासुर : मिथक व परंपराएं’ – भी खरीद सकेंगे।

हमारी नई किताब ‘सामाजिक न्याय की जमीनी दास्तान’ पुस्तक मेले में बिक्री के लिए उपलब्ध होगी। यह किताब देश के कई राज्यों यथा– बिहार, उत्तर प्रदेश, असम, केरल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र, में सामाजिक न्याय आंदोलन के अतीत, वर्तमान और इसकी संभावनाओं को समेटे हुए है। इस किताब में मध्य प्रदेश विधानसभा के वर्तमान सदस्य डॉ. हिरालाल अलावा, बिहार विधानसभा के पूर्व सदस्य एन.के. नंदा, उत्तर प्रदेश निवासी व शोषित समाज दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामचंद्र कटियार, महाराष्ट्र के सामाजिक कार्यकर्ता व विचारक श्रावण देवरे, केरल के इतिहासविद् प्रो. पी. सनल मोहन, असम के शिक्षाविद् प्रो. उत्तम बाथारी आदि के अनुभवजनित आलेखों व साक्षात्कारों के जरिए विश्लेषण संकलित हैं। इनके जरिए पाठक संबंधित राज्यों में सामाजिक न्याय आंदोलन की बारीकियों से परिचित होंगे।

‘सामाजिक न्याय की जमीनी दास्तान’ का कवर पृष्ठ

नवल किशोर कुमार व अनिल वर्गीज द्वारा संपादित इस किताब की खासियत यह भी है कि इसके विभिन्न अध्यायों में जितना महत्व पूर्व में दर्ज ऐतिहासिक तथ्यों को दिया गया है, उतना ही महत्व जमीनी अनुभवों को उसी शैली में दिया गया है, जिसे कबीर की भाषा में ‘आंखन-देखी’ कहा जा सकता है।

दरअसल, सामाजिक न्याय के आंदोलन को किसी एक परिप्रेक्ष्य से नहीं देखा जा सकता है। इस किताब में संकलित आलेख व साक्षात्कार संबंधित राज्यों के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परतों को पाठकों के सामने रखती है, और समग्रता में इन राज्यों में हुए बदलावों को अपने मौजूं पाएंगे। इनमें दलित, आदिवासी व ओबीसी विमर्श शामिल हैं।

तो फिर आइए विश्व पुस्तक मेले में और फारवर्ड प्रेस की नवीनतम प्रस्तुति को देखें और खरीदें। साथ ही, जो पाठक इस मेले में नहीं आ पाएंगे, उनके लिए यह किताब शीघ्र ही अमेजन पर उपलब्ध है, जिसके जरिए वे घर बैठे ही इसे खरीद सकेंगे।

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एफपी डेस्‍क

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