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आंखन-देखी : कुंभ में दक्खिन टोले के वाशिंदे

कुंभ में ठेके पर काम करने वाले सफ़ाईकर्मियों को चिंता है कि हर साल की तरह इस बार भी उनका आख़िरी एक महीने का पैसा लेकर ठेकेदार भाग न जाएं। गौरतलब है कि हर साल मेला खत्म होने के बाद कई ठेकेदार सफ़ाईकर्मियों का पैसा लेकर भाग जाते हैं। इसे लेकर सफ़ाईकर्मी हर साल मेला खत्म होने के बाद मेला क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन भी करते हैं। पढ़ें, सुशील मानव की यह रपट

डेढ़ महीने से चल रहा महाकुंभ 26 फरवरी, 2025 को संपन्न हो गया। कुंभ में तीन तरह की बस्तियां दिखीं। एक तरफ़ पांच-सितारा होटलों को चुनौती देती आलीशान टेंट सिटी खड़ी थीं। दूसरी तरफ़ आम लोगों के लिए मध्यमवर्गीय घरों जैसी सुविधाओं वाला तंबुओं का शहर। और तीसरी तरफ़ जातीय ढांचे में बसे गांव के दक्खिन टोले की तर्ज़ पर शौचालयों के इर्द-गिर्द काली, पाली, नीली तिरपाल या पतली पन्नियों, बरसातियों और साड़ियों को तानकर 3 से 4 फीट ऊंची सफ़ाईकर्मियों की छोटी-छोटी बस्तियां थीं। ये बस्तियां शौचालयों के इर्द-गिर्द बसाई गई थीं। तीनों बस्तियों को एक साथ रख कर देखने पर नज़र आता था कि दलित-बहुजन सफ़ाईकर्मी कुंभ नगर जिले में अवांछित और दोयम दर्ज़े के नागरिक हैं।

तारीख 3 फरवरी, 2025। बसंत पंचमी की दोपहर है। कुंभ मेला क्षेत्र सेक्टर 10 शिव कोटेश्वर धाम में ब्राह्मण युवकों और किशोरों का सामूहिक उपनयन संस्कार (जनेऊ संस्कार) हो रहा है। उसी के बग़ल में 108 विशालकाय हवन-कुंडों में सामूहिक यज्ञ हो रहा है। इसी विशालकाय आश्रम के मुख्यद्वार के ठीक सामने पचास मीटर की दूरी पर पचासों की संख्या में शौचालय खड़े हैं। इन्हीं से सटे 90 डिग्री के कोण पर दाईं ओर सफ़ाईकर्मियों की 7-8 झुग्गियां हैं। झुग्गी और शौचालय के सामने मिट्टी के चूल्हें पर स्त्रियां खाना बना रही हैं। पुरुष पीठ पर टंकी लादे शौचालयों को साफ़ करके उन्हें सैनिटाइज कर रहे हैं। मेठ कह रहा है कि जल्दी करो, चारो ओर ब्लीचिंग पाउडर भी छिड़कना है। मैं मेठ से पूछता हूं कि इन सफ़ाईकर्मियों के लिए सैनिटेशन कॉलोनी भी तो बसाई गई है। वहां क्यों नहीं रहते ये लोग? इस पर वह तंजपूर्ण तरीक़े से मुस्कुराने लगता है और प्रतिप्रश्न करता है– कहां बसाई गई हैं?

बसंत पंचमी के दिन दोपहर 12 बजे का समय है। रसूलादाबाद से लेकर संगम तक गंगा किनारे बने इंटरलॉकिंग सड़क से लगकर जगह-जगह मेले में शौचालयों का नीला समूह खड़ा है। मेरे दिमाग़ में पहला सवाल यही आता है कि जब मेले में सब कुछ भगवा रंग में रंगा हुआ है तो फिर शौचालयों का रंग नीला ही क्यों है? बाबासाहब डॉ. आंबेडकर भी नीले रंग का सूट पहनते थे। आज जहां भी जितनी भी उनकी मूर्तियां हैं, उनमें उनके कोट का रंग नीला है। उनकी ‘लेबर पार्टी’ के झंडे का रंग भी नीला था और मौजूदा बहुजन समाज पार्टी का झंडा भी नीले रंग का है। नीले रंग को दलित चेतना और अस्मिता का प्रतीक माना जाता है। तो क्या उनकी अस्मिता को शौचालयों तक सीमित करने की यह कोई राजनीतिक साजिश है? मैं शौचालयों के रंग को लेकर कई सफ़ाईकर्मियों से पूछता हूं, लेकिन वे कोई जवाब नहीं देते। अलबत्ता इतना ज़रूर कहते हैं कि कुंभ मेले में केवल यही एक जगह है, जहां मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की तस्वीरें नहीं लगी हैं।

मेले में शौचालय के शेड से सटे आराम करतीं सफाईकर्मी महिलाएं (तस्वीर : सुशील मानव)

इसी इंटरलॉकिंग सड़क से नीचे पांव धरते ही शौचालयों की एक कतार है। शौचालय और सड़क के बीच थोड़ी-सी जगह है। दरअसल दोपहर के समय जब सूरज की रोशनी सामने से आती है तो शौचालयों के शेड से उनके पीछे एक छाया-सी हो जाती है। इसी छाये तले एक बैनर बिछाकर सफ़ाईकर्मियों का एक परिवार बैठा सुस्ता रहा है। तीन बच्चे सो रहे हैं। एक महिला कुर्सी लगाकर बैठी है। उस महिला के पांव ब्लीचिंग पाउडर की सफ़ेदी में रंग गए हैं। वहीं एक अन्य महिला अपनी सास के बालों को काला करने के लिए उस में डाई लगा रही है। जबकि उसकी पीठ से सटे एक अन्य महिला दोपहर का खाना खा रही है। संभवतः वह अपने शिफ्ट की ड्यूटी खत्म करके लौटी है।

आगे एक जगह शौचालय से कुछ क़दम हटकर एक पोल के नीचे एक सफ़ाईकर्मी महिला अपने बच्चे को स्तनपान करा रही है। कपड़े सुखाने के लिए उसने पोल के बग़ल में एक बांस की कइनी गाड़कर उसमें रस्सी बांध रखा है। इसी कइनी पर एक नीली पन्नी टंगी है, जो कुछ-कुछ नीले झंडे जैसा आभास दे रही है।

तारीख 14 फरवरी, 2025। फ़ाल्गुन द्वितीया के दिन दोपहर का समय है। शौचालयों की कतार के पीछे उसकी दीवार से सटे एक महिला बालू पर गमछा बिछाकर सो रही है। मन बार-बार कहता है कि उससे चलकर बतियाया जाए। लेकिन उसकी नींद में खलल डालना भी एक अपराध है। हो सकता है कि उसकी ड्यूटी रात्रि के शिफ्ट में हो। कुंभ में सफ़ाईकर्मियों से तीन शिफ्ट में काम लिया जा रहा है। फिर सुबह-शाम का खाना बनाने की ज़िम्मेदारी भी तो इन्हीं महिलाओं पर होती है। उसी में थोड़ा-सा समय पाकर सोती स्त्री को जगाकर बतियाने का लोभ छोड़कर आगे बढ़ जाता हूं। आगे शौचालयों के दीवार से सटकर लेटे कई परिवार नज़र आते हैं।

गंदे नाले के किनारे बनाई गईं सफाईकर्मियों की एक झुग्गी बस्ती (तस्वीर : सुशील मानव)

शिवरात्रि से एक दिन पहले यानी 25 फरवरी। दोपहर का समय है। सेक्टर 8 में शौच के बाद हाथ धोने के लिए शौचालयों के बाहर लगे नलों के पानी के निकासी के लिए एक नाली बनाई गई है। इसी नाली के आस-पास सफ़ाईकर्मियो के बच्चे खेल रहे हैं। नाली के बग़ल ही उनकी साड़ियों की असगनी तनी हुई है। जानलेवा बीमारियों को फैलाने वाले मच्छरों और दुर्गंधों के बीच पिछले डेढ़ महीने से वे दिन-रात सांस ले रहे हैं।

26 फरवरी को शिवरात्रि स्नान के साथ ही कुंभ मेला खत्म होने वाला है। मेले में ठेके पर काम करने वाले सफ़ाईकर्मियों को चिंता है कि हर साल की तरह इस बार भी उनका आख़िरी एक महीने का पैसा लेकर ठेकेदार भाग न जाएं। गौरतलब है कि हर साल मेला खत्म होने के बाद कई ठेकेदार सफ़ाईकर्मियों का पैसा लेकर भाग जाते हैं। इसे लेकर सफ़ाईकर्मी हर साल मेला खत्म होने के बाद मेला क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन भी करते हैं। यह एक परपंरा-सी बन गई है। इस साल भी कुंभ के लिए बाहर से ठेके पर लाए गए सफ़ाईकर्मी विरोध प्रदर्शन की तैयारी में हैं।

वहीं कुंभ में ड्यूटी कर रहे प्रयागराज नगर निगम के सफ़ाईकर्मियों का आरोप है कि मेला क्षेत्र में निगम के सफ़ाईकर्मियों की ड्यूटी सुबह 7 बजे से लेकर 2 बजे तक है। लेकिन उनसे शाम 5-7 बजे तक अतिरिक्त काम करवाया जाता है। अतिरिक्त काम तो नगर निगम के सफ़ाईकर्मी करते हैं, लेकिन उनके काम को कुंभ मेले के अस्थायी कर्मचारियों का काम दिखाकर पैसा पास करवा लिया जाता है। नगर निगम के सफ़ाईकर्मी अपने इसी अतिरिक्त काम के लिए ओवरटाइम के वेतन की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी मांग मानी नहीं जा रही है।

सफ़ाई मज़दूर एकता मंच के अध्यक्ष बलराम पटेल बताते हैं कि कुंभ मेले में जितने सफ़ाईकर्मियों की ड्यूटी बताई जा रही है, उनकी हाज़िरी लगाई जा रही है, उतने सफ़ाईकर्मी सच में ज़मीन पर नहीं है। इसीलिए नगर निगम के सफ़ाईकर्मियों से अतिरिक्त समय तक काम करवाया जा रहा है। लेकिन उनके इस अतिरिक्त घंटों के काम को कुंभ मेले के ऐसे सफ़ाईकर्मी के हाज़िरी के तौर पर दिखाया जा रहा है, जो हैं ही नहीं। ऐसे काल्पनिक या फ़र्ज़ी सफ़ाईकर्मियों की संख्या सैंकड़ों में नहीं, हज़ारों में है, जिनकी ड्यूटी काग़जों में चल रही है। लोग कहते हैं कि यह ठेकेदार और मेला प्रशासन के अधिकारियों की मिली-भगत से हो रही है। दोनों फ़र्जी सफ़ाईकर्मियों का आंकड़ा तैयार करके मिल बांटकर खा रहे हैं।

सफाई का विश्व रिकार्ड बनाने के लिए बीते 24 फरवरी को मेला प्रशासन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में भागीदारी करते सफाईकर्मी मजदूर (तस्वीर : सुशील मानव)

बलराम पटेल आगे बताते हैं कि 24 फरवरी को विश्व रिकॉर्ड बनाने के लिए मेला विकास प्राधिकरण द्वारा एक साथ 15 हजार से अधिक संख्या में सफ़ाई मज़दूरों को एक जगह बुलाया गया था। मेला के ठेका कर्मचारी सहित नगर निगम के नियमित/संविदा/आउटसोर्स समस्त कर्मचारियों को सुबह अपने-अपने  क्षेत्र में सफ़ाई करने के बाद 11 बजे कुंभ मेला क्षेत्र में सफ़ाई का वर्ल्ड रिकार्ड बनाने के लिए गंगेश्वर घाट बुलाया गया। वहां पर सभी कर्मचारियों को बारकोड प्रिंटेड रिबन बैंड दिया गया तथा मेला विकास प्राधिकरण द्वारा सभी को लंच पैकेट दिए जाने की बात कही गई थी। लेकिन 11 से लगभग 3 बज गए, खाना नहीं मिला।

बलराम पटेल बताते हैं कि चूंकि सभी सफ़ाईकर्मी इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आये थे तो वो अपने छोटे-छोटे बच्चों को कहां और किसके भरोसे छोड़ते। इसलिए वे अपने बच्चों को भी साथ लेते आए। लेकिन सुबह से बगैर कुछ नाश्ता के नगर निगम और मेला सफाई कर्मचारियों के छोटे-छोटे बच्चे भूख और प्यास से तड़पने लगे। करीब साढ़े तीन बजे वापस लौटने के वक्त सफाईकर्मियों को खाने के पैकेट दिये गए। कई कर्मचारियों को खाना नहीं मिला। जिन सफ़ाईकर्मियों को खाना मिला भी था, वह बासी खाना था। खाना महक गया था, खाना खराब हो गया था। मेला विकास प्राधिकरण के अधिकारियों ने कहा कि बच्चों के लिए खाना नहीं है, केवल सफ़ाईकर्मियों को बुलाया गया था। विश्व रिकार्ड कवर करने पहुंची मीडिया के सामने जब बलराम पटेल ने कर्मचारियों को खाना नहीं दिए जाने के संदर्भ में बात रखी तो मेला के नोडल अधिकारी द्वारा – तुम्हारी नेतागीरी यहां नहीं चलेगी – कहकर कार्रवाई करने के धमकी देते हुए मीडियाकर्मी के कैमरे को बंद करा दिया गया।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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