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क्या बुद्ध पुनर्जन्म के आधार पर राष्ट्राध्यक्ष का चयन करने की सलाह दे सकते हैं?

दलाई लामा प्रकरण में तिब्बत की जनता के साथ पूरी सहानुभूति है। उन पर हुए आक्रमण की अमानवीयता का विरोध आवश्यक है। तिब्बत और तिब्बतियों के हक़ में आवाज़ उठाना बहुत ज़रूरी है। लेकिन यह भी सोचना चाहिए कि पुनर्जन्म को गवर्नेंस का टूल बनाकर आप किसी समाज को किस तरह लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक बना सकते हैं? पढ़ें, संजय श्रमण जोठे का यह आलेख

यह एक काल्पनिक सवाल है। लेकिन बुद्ध का पूरा कैरियर और उनका दर्शन देखें तो वे ऐसी किसी बात का समर्थन करेंगे, यह मुश्किल लगता है। वे ख़ुद अपना धार्मिक/आध्यात्मिक उत्तराधिकारी पुनर्जन्म के आधार पर नहीं बना सकते। असल में वे एक इंसान की एकमुश्त, उसी पहचान के साथ पुनर्जन्म के सिद्धांत के ही ख़िलाफ़ हैं। यह सिद्धांत जैनों का है, जिसे बाद में महायानियों और वैदिकों ने अपना लिया।

भारत में थेरवाद[1] ने इंसान के एकमुश्त उसी पहचान में अगले शरीर में पुनर्जन्म को नकारा है। यह एक वैज्ञानिक बात है। लेकिन महायान ने बाद की शताब्दियों में कलाओं और कल्पना का इस्तेमाल करना शुरू किया। काल्पनिक चरित्रों के माध्यम से काव्य, गीत, मंत्र, नाटक, उत्सव, मिथक आदि का निर्माण किया गया। प्राचीन जातकों में सीधे-सीधे इंसानों और जानवरों की कहानियां हैं। बाद में महाकाव्यों में उनमें स्पेशल इफ़ेक्ट्स आने लगे। ख़ुद अश्वघोष ने अपने दौर में बुद्ध के चरित्र में स्पेशल इफ़ेक्ट्स का प्रक्षेपण करना शुरू कर दिया। चार आर्य सत्यों के अनुकूल बुद्ध के चरित्र में चार इवेंट्स रचे गए – इत्यादि इत्यादि।

यह खेल उस समय शुरू हो चुका था। उसके बाद जो रामायण, महाभारत आदि आए, उनका तो कहना ही क्या। उनमें बौद्ध-जैन बोध कथाओं के चरित्र न केवल देवी-देवता बल्कि ईश्वर बन गए। यह खेल फिर बाबाओं और कथाकारों के हाथ में आ गया और आज जो चल रहा है, वह सहज ही देखा जा सकता है।

फ़िल्मों के विकासक्रम पर गौर कीजिए। पहले श्याम-श्वेत और मूक फ़िल्में आईं। फिर बोलने वाली फ़िल्में आईं और फिर रंगीन फ़िल्में। फिर स्पेशल इफ़ेक्ट्स आए। अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आया है। अब मामला ‘समस्या-समाधान’ से आगे ‘कंप्लीट ट्रांसफॉर्मेशन’ पर आ गया है। यही धार्मिक साहित्य और धर्मों की आंतरिक टेक्नोलॉजी में हुआ है।

पहले दौर में भौतिकवादी दर्शन और धर्म आए। आप हड़प्पा और कीलडी[2] की रिपोर्ट्स उठाकर देखिए। कोई देवी-देवता, देवालय, ईश्वर, मंदिर या राजप्रसाद या महल नहीं मिलेंगे। इन लोगों ने विशुद्ध ध्यान, समाधि, योग एवं तंत्र के आधार पर वैज्ञानिक खोज आरंभ की। शरीरविज्ञान, मनोविज्ञान, कला, रहस्यवाद आदि के अपने आधार रखे। इनके सीधे-साधे सूत्रों में ऐतिहासिक इंसानी चरित्रों के माध्यम से बोध कथाएं रची गईं। ये श्याम-श्वेत और मूक फ़िल्मों की तरह थीं।

फिर आया दूसरा दौर। इन ऐतिहासिक चरित्रों में प्रकृति की शक्तियों को प्रक्षेपित करने का दौर। हवा, आग, पानी, बादल, बिजली, हाथी का बल, गरुड़ की उड़ान इत्यादि को इन ऐतिहासिक इंसानी चरित्रों से जोड़ा जाने लगा। इससे ऐतिहासिक साधकों और सिद्धों के स्थान पर आजकल ज्ञात ‘प्रतापी बुद्धों’ और ‘तीर्थंकरों’ का निर्माण हुआ। उनकी मानवीय गुणों में कल्पना जोड़कर अतिशयोक्तिपूर्ण नैरेटिव बनाए जाने लगे। ये लोगों में उनके प्रति जिज्ञासा और समर्पण पैदा करने के लिए किया गया।

बीते 6 जुलाई को दलाई लामा के 90वें जन्मदिवस के मौके पर आयोजित समारोह में केंद्रीय मंत्री किरेण रिजिजू व राजीव रंजन सिंह तथा हॉलीवुड अभिनेता रिचर्ड गियर

लेकिन अभी भी राजा का प्रमुख कर्तव्य सत्य, करुणा, अहिंसा आदि के आधार पर प्रजा का पालन करना था। इस दौर की बोधकथाएं यानी जैनों और बौद्धों की कथाएं देखिए। इनमें राजा किसी नैतिक या आध्यात्मिक सत्य की तलाश में अंत में राजपाट छोड़कर सब कुछ त्यागकर जंगल की तरफ़ निकल जाता था। फिर ज्ञान प्राप्त करके पूरे समाज को नई नैतिकता, नई जीवनशैली सिखाता था। फिर जब ऐसे बुद्ध और तीर्थंकर ज्ञान प्राप्ति के बाद कुछ सिखाते थे तो वे अपनी शिक्षाएं कहानियों के माध्यम से कहते थे। उनकी कहानियों में बहुत से काल्पनिक चरित्र आने लगे। वे सब जातक कथाओं और जैन ग्रंथों में वर्णित हैं।

इन काल्पनिक चरित्रों की कहानियां पूरे देश में फैलने लगीं। ये कहानियां जहां-जहां पहुंचीं, वहां-वहां स्थानीय समाज ने उन्हें अपने हिसाब से बदलना शुरू कर दिया। इन्हीं कहानियों के हज़ारों संस्करण, सैकड़ों रामायणों और सैकड़ों महाभारतों के रूप में आज सुनाई देते हैं। हालांकि इस दौर की रामायणें और महाभारतें बहुत सरल थीं। इन्हें आज के आदिवासियों के पास जाकर सुनिए। उनमें कोई स्पेशल इफ़ेक्ट्स नहीं हैं। ये हुआ यूरोप की ब्लैक एंड व्हाइट गूंगी फ़िल्मी टेक्नोलॉजी का भारत आना। अब भारत के लोग ब्लैक एंड व्हाइट गूंगी फ़िल्मों को अपनी कहानियों और चरित्रों के हिसाब से बनाने लगे। फ़िल्मों से तुलना करें तो यह हुआ ब्लैक एंड व्हाइट बोलती फ़िल्मों का दौर। अब ऐतिहासिक चरित्रों की कथाएं बोलने लगीं। या कहें कि ऐतिहासिक चरित्रों के ऊपर प्लेबैक सिंगर बैठ गए, जो अब उनके लिए गाने लगे।

इसके बाद आता है तीसरा दौर। ऐतिहासिक बुद्धों और तीर्थंकरों द्वारा सुनाई गई काल्पनिक चरित्रों के सर्वशक्तिमान बनने का दौर। आज के सभी प्रमुख ईश्वरवादी या अवतारवादी धर्म इसी दौर में जन्मे हैं। अब काल्पनिक चरित्रों में प्राकृतिक, चमत्कारिक शक्तियों का प्रक्षेपण और नई-नई कहानियों से जुड़ाव शुरू हुआ। अब दृश्य और ध्वनि से आगे बढ़कर ‘समय की धारणा’ से खेलना शुरू किया गया। अब नए स्तर का खेल शुरू होता है। असल में खेती और उद्योग ने जब बड़ी मात्रा में संपत्ति को जन्म दिया तब राजनीति बहुत शक्तिशाली हो गई। फिर राजा और राज्य बहुत शक्तिशाली हो गए। इस दौर में पुरोहितों और राजाओं का असली गठबंधन शुरू हुआ। अब राजाओं के संरक्षण में राजगुरुओं ने जनता के नए मनोविज्ञान का निर्माण किया।

इस बिंदु तक इनके पास ईश्वर नहीं था। अभी भारत में ईश्वर पैदा नहीं हुआ था, या कहें अभी तक उसका भारत में आगमन नहीं हुआ था। इसलिए नैतिकता और पाप-पुण्य, पुरस्कार दंड आदि सिखाने के लिए पुनर्जन्म की अवधारणा बनाई गई। ये आमलोगों को डराने और नैतिक बनाने के भारतीय हथियार हैं। ईश्वर और स्वर्ग-नर्क सब सदियों बाद भारत में बाहर से आए हैं। भारत ने मौलिक रूप से नैतिकता और पाप-पुण्य की धारणा को जीवन-चक्र से जोड़कर समय की चक्रीय धारणा दी। आजीवकों ने इसे नियति कहा, बौद्धों और जैनों ने धम्म कहा, बाद में यही नियति ‘ऋत’[3] की तरह विकसित होता है। इसी को मेटाफ़ोरिकली या काव्यात्मक अभिव्यक्ति देने के लिए पुनर्जन्म की बात कही गई। बाद के श्रमणों (बौद्धों, जैनों) ने इसे इंसान के पुनर्जन्म से जोड़कर जनता को डराने और नैतिक सीमाओं में रखने के लिए इस्तेमाल किया। यह प्रयोग शुरू में बहुत सफल रहा, लेकिन ईश्वर के जन्म के बाद दिक़्क़तें आने लगीं।

तो इस दौर में कला की पीठ पर बैठकर राजनीति, धार्मिक कहानियों में गहरे घुसने लगी। राजनीति ने कला के माध्यम से समय की धारणा को कंट्रोल करने का प्रोजेक्ट शुरू किया। राजा को सामान्य गणतांत्रिक या कबीलों के प्राक्-लोकतांत्रिक तरीक़ों से आज़ाद कराते हुए डिवाइन लेजिटिमेसी (दैवीय वैधता) देना, इस कला का कुल लक्ष्य बन गया। कबीले या गण में होने वाले चुनाव पीछे छूटने लगे। अब हर राजा को अपना बेटा ही अगला राजा बनाना है। इसके लिए ईश्वर को पैदा किया गया, या कहें कि इस समय तक भारत में ईश्वर का आगमन आर्यों के साथ हो गया था। इस ईश्वर की आज्ञाएं आने लगीं। राजा और पुरोहित मिलकर जो तय करते, वही यह ईश्वर बोलता।

अब इस ईश्वर के लिए नई भाषा खोजी गई। वह राजा या पुरोहित की सामान्य भाषा नहीं बोल सकता। फिर राजनीति और कला ने मिलकर धर्म को पैदा किया। यह धम्म नहीं, धर्म था। यह महायान के शिखर पर पहुंचने का दौर है।

इस समय एक नए धर्म की नई टेक्नोलॉजी सामने आई। अब जिन चमत्कारों का प्रक्षेपण पहले ऐतिहासिक बुद्धों, तीर्थंकरों द्वारा रचे गए काल्पनिक नायकों में होता था, वही प्रक्षेपण अब ख़ुद उन बुद्धों में होने लगा। कम से कम बौद्धों में तो ये सर्वज्ञात है। अब बोधिसत्वों और धम्मपालों का जन्म हुआ। फिर उनकी चमत्कारिक कहानियों का जन्म हुआ।

अब एक तरफ़ ईश्वर और दूसरी तरफ़ बोधिसत्वों की कल्पना शुरू हुई। स्त्री और पुरुष बोधिसत्व आए। वे अत्यंत चमत्कारी बताए गए: दस हाथ, चार सिर, तीन आंखें, और ना जाने क्या-क्या। अब काल्पनिक बोधिसत्व, ऐतिहासिक बुद्धों से ज़्यादा आकर्षक नज़र आने लगे। इन स्त्री-पुरुष बोधिसत्वों के सुंदर चित्र, मूर्तियां और चरित्रों में गूंथकर बहुत कलात्मक ढंग से चीज़ें कही जाने लगीं। जैनों और बौद्धों के साहित्य में जिन काल्पनिक धम्मपालों और कथा-कविता आदि के चरित्रों के आधार पर शिक्षण होता था, अब वे धम्मपाल और चरित्र नायक बनने लगे। हालांकि अब भी ऐतिहासिक बुद्ध और तीर्थंकर इन काल्पनिक बोधिसत्वों और देवी-देवताओं से बड़े माने जाते थे।

उस दौर की मूर्तियां देखिए। उनमें अत्यंत चमत्कारी स्त्री या पुरुष बोधिसत्व के सिर पर सामान्य मानव की तरह बुद्ध बैठे मिलेंगे। जैन साहित्य में अत्यंत शक्तिशाली और चमत्कारी देवी-देवता और राजा आदि अंततः तीर्थंकरों के आगे झुकते दिखाए गए हैं। फ़िल्मों से तुलना करें तो यह रंगीन और बोलती फ़िल्मों का दौर हुआ। अब उनमें नई शक्तियां, नई कहानियां जोड़कर बताया जाने लगा। बोधिसत्वों की कल्पना में जो स्पेशल इफ़ेक्ट्स आए, उन्हें बाद के कवियों ने इस्तेमाल किया।

आज के ज्ञात महाकाव्यों के सर्वशक्तिमान अवतारी नायक वहीं से जन्मे हैं। इस दौर में अभी भी कहानी की नैतिकता और धार्मिकता के सूत्र, ऐतिहासिक चरित्रों की शिक्षाओं से संचालित थे। थोड़ी बहुत ऊंच-नीच शुरू हो चुकी थी। पब्लिक को खुश रखने के लिए कहानी और मैसेज को ट्विस्ट करना शुरू कर दिया गया था। यहीं से बौद्ध धर्म का पतन शुरू होता है। या कहिए कि भारत का पतन शुरू होता है।

फिल्मों की तर्ज पर कहें तो अब स्पेशल इफ़ेक्ट्स ही सबकुछ हो गए। अब कहानी में नैतिकता है या नहीं, यह महत्वपूर्ण नहीं रहा। अब कहानी में लाखों को मूर्ख बनाने की ताक़त है या नहीं, यही मुद्दा प्रमुख बन गया। अब पुनर्जन्म और ईश्वर और देवी-देवता की बाढ़ आ गई। इस नये शिल्प ने संदेश और संदेश देनेवाले की नैतिकता को पछाड़ दिया। अब बोधिसत्वों और धम्मपालों की चमत्कारिक कहानियों की प्रेरणा से जन्मे अत्यंत शक्तिशाली ‘विश्व को चलाने वाले’ नायकों का जन्म हुआ। यह लगभग आज की फ़िल्मों के एनिमेशन के दौर जैसा है। जैसे-जैसे तकनीक आगे बढ़ी, स्पेशल इफ़ेक्ट्स आगे बढ़े। पुराने ज़माने में रौद्र, अतिभयानक या अतिकारुणिक बोधिसत्व आए। उनकी प्रेरणा से वज्रयान, मंत्रयान और सहजयान आदि के चमत्कारी धम्मपाल और अन्य चरित्र आए। उन्हीं में से कुछ चुनिंदा वैदिक और पौराणिक मिथकों में चले गए। इन्हीं में से वे अवतार निकले, जिन्हें आज हम जानते हैं।

फ़िल्मों से तुलना कीजिए तो यह एनिमेशन का दौर है। अब ही-मैन, स्पाइडर मैन, बैटमैन आदि का जन्म हुआ। आज के अवतार और चमत्कारी देवी-देवता सब इसी टेक्नोलॉजी की देन हैं।

फिर आता है चौथा दौर। डिजिटल फ़िल्ममेकिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दौर। अर्थात् चमत्कारों को नए लेवल पर ले जाने की क़ाबिलियत। चमत्कारी कैरेक्टर्स – हल्क़, सुपरमैन, जस्टिस लीग के सारे कैरेक्टर्स आए। इनके सीक्वेल्स लाने ज़रूरी हो गए। जैसे हर चार-पांच साल में सुपर हीरो को ज़्यादा ताकतवर बनाकर उसकी फ़िल्म का सीक्वेल आता है। उसी तरह पुराने जमाने में एक के बाद एक चमत्कारी अवतार आए थे।

लेकिन इन अवतारों के ऊपर एक नियामक बिठाना ज़रूरी था। अब बहुत सारे अवतारों के ऊपर एक कंट्रोलिंग शक्ति के रूप में एक महान शक्ति को बैठा दिया जाता है। यह सृष्टि का संचालक होता है, लेकिन फिर भी सृष्टि, और प्रलय के नियामक ईश्वर से नीचे होता है।

इस तरह दस, बीस या पच्चीस, जितने भी अवतार हैं, उनके ऊपर एक मुख्य शक्ति को बिठा दिया जाता है। यह पूरी तरह काल्पनिक और स्पेशल इफ़ेक्ट्स से बनी हुई सत्ता है जो हर युग में उतने ही काल्पनिक और स्पेशल इफ़ेक्ट्स वाले नायक की तरह धरती पर आती है। यहां तक आते-आते फ़िल्मों के स्पेशल इफ़ेक्ट्स और क्राफ़्ट ने कहानी की नैतिकता और संदेश की शुचिता को पूरी तरह व्यापारिक उद्देश्यों का ग़ुलाम बना दिया। मतलब कि राजनीति और बाज़ार का ग़ुलाम बना दिया। इस दौर को ठीक से पहचानिए।

भारत में इसी समय ईश्वर से विभिन्न श्रेणियों के इंसानों का जन्म हुआ। इसके बहाने वर्ण-व्यवस्था को पीछे से थोप दिया गया और उसे वैधता प्रदान कर दी गई। फिर इससे भी आगे बढ़कर पुनर्जन्म के आधार पर राजा को ईश्वर से जोड़ा जाने लगा।

भारत में वर्ण और जाति सिखाने वाले धर्म विशेष के शास्त्रों को उठाकर देखिए। वहां राजा को ईश्वर से जोड़ा जा रहा है। पाप-पुण्य को पुनर्जन्म से जोड़ा जाने लगा है। मतलब अब स्पेशल इफ़ेक्ट्स समय की धारणा बदलने के लिए फ़िल्म के थियेटर से आगे निकलकर सीधे राजनीति, बाज़ार और लोगों के किचन-बेडरूम तक घुसने लगे हैं। अब राजा क्यों राजा है? क्योंकि वह पूर्वजन्म का प्रतापी और पुण्यात्मा है। वह उसी वर्ण में जन्म लेगा, वह उसी स्वधर्म का पालन करेगा। इस राजा का कर्तव्य क्या है? वह वर्ण और जाति की व्यवस्था का पालन करेगा और करवाएगा। अगर कोई गड़बड़ी होती है तो उसे ठीक करने के लिए फिर कोई अवतार आएगा। यह राजनीति में पुनर्जन्म का प्रयोग है। भारत में इसे सदियों में आने वाले अवतार से जोड़ा गया है।

लेकिन तिब्बत ज़रा दो कदम आगे निकल गया। उसने सदियों बाद आने वाले अवतार की नहीं, बल्कि अगले राजा की कल्पना को ही पुनर्जन्म और एक नियामक आदि चेतना से जोड़ दिया। तिब्बत के लिए अब धर्म प्रमुख ही राज प्रमुख बन गया। वहां अब राजा ही धर्मगुरु है और वह अंतिम रूप से अवलोकितेश्वर बोधिसत्व का अवतार है।

भारत में कम से कम राजा और राजगुरु (धर्म प्रमुख) में एक स्पष्ट बंटवारा था। इसलिए बाद में ही सही लेकिन भारत में लोकतंत्र आ सका। राजा और नेताओं की अकाउंटेबिलिटी तय की जा सकी। लेकिन जो राजा यह कहता है, “मैं पुराने का पुनर्जन्म हूँ”, उसकी अकाउंटेबिलिटी कैसे तय होगी? वह अपनी वैधता पुनर्जन्म से ले रहा है। वह जनता के प्रति जवाबदेह कैसे हो सकता है?

तिब्बत की जनता के साथ पूरी सहानुभूति है। उन पर हुए आक्रमण की अमानवीयता का विरोध आवश्यक है। तिब्बत और तिब्बतियों के हक़ में आवाज़ उठाना बहुत ज़रूरी है। लेकिन यह भी सोचना चाहिए कि पुनर्जन्म को गवर्नेंस का टूल बनाकर आप किसी समाज को किस तरह लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक बना सकते हैं?

[1] बौद्ध धर्म की एक शाखा
[2] तमिलनाडु के शिवगंगा जिले का एक पुरातात्विक स्थल, जहां संगम काल यानी लगभग छठी शताब्दी ईसापूर्व से लेकर तीसरी शताब्दी ईसापूर्व के अवशेष मिले हैं।
[3] वेदों में वर्णित एक अवधारणा, जिसे प्राकृतिक और नैतिक व्यवस्था का सिद्धांत माना गया है।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

संजय श्रमण जोठे

डॉ. संजय श्रमण जोठे एक लेखक, अनुवादक और शोधकर्ता हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीस से अंतरराष्ट्रीय विकास में एमए हैं और मुंबई के टीआईएसएस से पीएचडी हैं। वे जर्मनी के एर्फ़र्ट विश्वविद्यालय में रिसर्चर रहे हैं। सामाजिक व विकास के मुद्दों पर पिछले 20 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं में कार्यरत रहे हैं। साथ ही जोतीराव फुले और रामसामी पेरियार पर आधारित इनकी किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। वर्तमान में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं व वेब-पोर्टलों के लिए लेखन में सक्रिय हैं।

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