उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी एक साल से ज़्यादा का वक़्त बाक़ी है, लेकिन सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए तमाम सहयोगी दल मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं। सबसे ज़्यादा बेचैनी ओबीसी जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाली निषाद पार्टी, अपना दल और राष्ट्रीय लोकदल जैसी पार्टियों में हैं। निषाद पार्टी के मुखिया संजय निषाद तो खुलकर अपनी नाराज़गी का इज़हार कर रहे हैं। हालांकि भाजपा इसे सियासी सौदेबाज़ी का हिस्सा मानकर ज़्यादा भाव देने के मूड में नहीं है।
असल में 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद भले ही केंद्र में भाजपा ने नीतीश कुमार की पार्टी जदयू और एन. चंद्रबाबू नायडु की तेलुगुदेश पार्टी की सहायता से सरकार बना ली है, लेकिन उत्तर प्रदेश के नतीजों ने उसके सहयोगी दलों के दिल में शंका के बीज तो बो ही दिए हैं। वर्ष 2024 में जिस तरह बहुजन वोटरों ने बड़ी तादाद में एनडीए उम्मीदवारों से किनारा कर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का रुख़ किया, यह न सिर्फ भाजपा, बल्कि उसके सहयोगी दलों के लिए भी चिंता की बात है। ख़ासकर, अपना दल और निषाद पार्टी जैसे छोटे दलों के सामने अपना जातिगत आधार और अस्तित्व रखने की चुनौती है।
हालात इस बात से समझे जा सकते हैं कि अपना दल (सोनेलाल पटेल गुट) के नेता अभी से कह रहे हैं कि 2027 का चुनाव वह अपने दम पर अकेले लड़ेंगे। दूसरी तरफ निषाद पार्टी प्रमुख संजय निषाद भी खुलकर गठबंधन तोड़ने की धमकियां दे रहे हैं।
दरअसल, 2017 के विधानसभा चुनाव से ही ओबीसी जातियां उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत का आधार रही हैं। इसमें छोटे दलों के साथ गठबंधन कर चुनाव में जाने की भाजपा की रणनीति भी कारगर साबित हुई है। साथ ही बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के भी कई ओबीसी नेताओं के इस बीच भाजपा का रुख़ कर लेने से ओबीसी वोटरों का झुकाव भगवा दल की तरफ हुआ। लेकिन अब लगता है कि इस रिश्ते की उम्र पूरी हो चली है। ओबीसी जातियों में भाजपा की नीतियों को लेकर नाराज़गी बढ़ रही है। ख़ासकर कुर्मी, जाट, गुर्जर, सैनी और निषाद जैसे महत्वाकांक्षी समूह समुचित हिस्सेदारी न मिलने, सवर्णों के बढ़ते दबदबे, और सामाजिक उत्पीड़न के आरोप लगाने लगे हैं। हालांकि यह सब रातों-रात नहीं हुआ है।

हालांकि मुफ्त राशन, पीएम आवास योजना, डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांस्फर (डीबीटी) जैसी योजनाओं के ज़रिए भाजपा इन वोटरों को चुनाव दर चुनाव अपनी तरफ लुभाने में कामयाब रही है। मगर अब लगता है कि इन योजनाओं से भी वोटरों का मनरेगा और मिड डे मील योजनाओं की ही तरह मोहभंग होने लगा है। वैसे भी उत्तर प्रदेश में यादवों के अलावा कुर्मी, जाट, सैनी, और निषाद सियासी तौर पर अति-महत्वाकांक्षी समूह माने जाते हैं। अर्थात, इनको अब उस सबसे बेहतर डील चाहिए जो भाजपा फिल्हाल उन्हें दे पा रही है। इसका असर 2024 के लोकसभा चुनाव में साफ नज़र आया था। इस चुनाव में एनडीए की वोट हिस्सेदारी में 2019 के मुक़ाबले 9 फीसदी से ज़्यादा की गिरावट आई, जबकि इंडिया गठबंधन को 19 फीसदी से कुछ ज्यादा वोटों का फायदा हुआ।
इंडिया गठबंधन की जीत और भाजपा के सहयोगी दलों की हार में ओबीसी जातियों, ख़ासकर निषाद और कुर्मियों के पाला बदलने की बड़ी भूमिका रही। मसलन, कुर्मी (पटेल) बहुल मानी जाने वाली फूलपुर सीट भले भाजपा ने जैसे-तैसे जीत ली, लेकिन उसकी वोट हिस्सेदारी में पिछले चुनाव के मुक़ाबले 9.08 फीसद वोट की कमी आई। बांदा में भाजपा का वोट प्रतिशत 2019 के मुक़ाबले 14 फीसदी से ज़्यादा घट गया। नतीजा यह हुआ कि पार्टी के उम्मीदवार आर.के. सिंह पटेल को हार का मुंह देखना पड़ा। फतेहपुर में भाजपा की वोट हिस्सेदारी 2019 के मुक़ाबले 12 फीसदी घट गई। नतीजे में निरंजन ज्योति को नरेश उत्तम पटेल के सामने हार का मुंह देखना पड़ा। प्रतापगढ़ में समाजवादी पार्टी के एस.पी. सिंह पटेल ने जीत हासिल की।
इसी तरह संत कबीर नगर में समाजवादी पार्टी उम्मीदवार लक्ष्मीकांत पप्पू निषाद ने भाजपा के प्रवीण कुमार निषाद पर जीत हासिल की। सुल्तानपुर में समाजवादी पार्टी उम्मीदवार रामभुआल निषाद ने मेनका गांधी को हरा दिया। गोरखपुर में भले ही भाजपा के रवि किशन शुक्ला चुनाव जीत गए लेकिन समाजवादी पार्टी उम्मीदवार काजल निषाद ने 41.78 फीसद वोट हासिल किए और मुक़ाबला बेहद क़रीबी बना दिया।
ज़ाहिर तौर पर ये नतीजे अपना दल (सोनेलाल गुट) और निषाद पार्टी के लिए ख़तरे की घंटी हैं। इसके बाद से ही इन पार्टियों को लगने लगा कि उनका वोटर भाजपा से नाराज़ है। तभी से अनुप्रिया पटेल और संजय निषाद के सुर बिगड़े हुए हैं।
मगर सवाल यह है कि अगर ये पार्टियां एनडीए से अलग हो भी जाएं तो फिर जाएं कहां। इसकी एक वजह यह है कि समाजवादी पार्टी इन्हें भाव देने के मूड में बिल्कुल नहीं है। समाजवादी पार्टी के नेतृत्व का मानना है कि अनुप्रिया पटले और संजय निषाद एक तो अपनी जातियों में पहले जैसा सम्मान नहीं पा रहे, दूसरे समाजवादी पार्टी के पास इन जातियों में मज़बूत जनाधार रखने वाले कई चेहरे हैं। ज़ाहिर है कि यह स्थिति भाजपा के लिए राहत भरी है। यही वजह है कि तमाम धमकियों और सार्वजनिक तौर पर नाराज़गी जताने के बावजूद भाजपा के किसी बड़े नेता ने संजय निषाद या अनुप्रिया पटेल को मनाने की कोशिश नहीं की है। भाजपा नेताओं का मानना है कि ये दोनों पार्टियां किसी भी हाल में एनडीए छोड़कर जाने वाली नहीं हैं।
बहरहाल, यह ड्रामा है या हक़ीक़त, मगर यह स्थिति इंडिया गठबंधन के लिए साज़गार है। अगर इसी तरह एनडीए गठबंधन में संजय निषाद और अनुप्रिया पटेल की अनदेखी होती है तो ज़ाहिर है इनके वोटरों में विचलन औऱ ज़्यादा बढ़ेगा। भले ही 2027 का चुनाव अभी दूर है, मगर यह तय है कि इस बार चुनाव मज़ेदार होने जा रहा है।
(संपादन : राजन/नवल/अनिल)
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