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बिहार चुनाव जीत कर भी हार गए नीतीश कुमार

शपथ समारोह में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों, उप-मुख्यमंत्रियों, छोटे-बड़े नेताओं के भारी जुटान के बीच नीतीश तो अलग-थलग पड़े थे। प्रधानमंत्री गमछा लहरा रहे थे। और नीतीश टुकूर-टुकूर उनका मुंह निहार रहे थे। बता रहे हैं राजू

नीतीश कुमार बिहार का चुनाव जीत कर भी हार गए! चुनाव तो भाजपा जीती है। संघ परिवार और भाजपा जश्न में डूबी है। वहां उत्सव और उल्लास का माहौल है। नीतीश के खेमे में अनकही खामोशी और उदासी है। यह खामोशी और उदासी चीख-चीख कर नीतीश की लाचारी बयां कर रही है। लग रहा है जैसे भाजपा ने नीतीश की शक्ति निचोड़ ली। उन्हें पुतला बनाकर छोड़ दिया है। नई सरकार के शपथ समारोह के साथ शुरू भाजपा का ‘शक्ति प्रदर्शन’ जारी है। शपथ समारोह में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों, उप-मुख्यमंत्रियों, छोटे-बड़े नेताओं के भारी जुटान के बीच नीतीश तो अलग-थलग पड़े थे। प्रधानमंत्री गमछा लहरा रहे थे। और नीतीश टुकूर-टुकूर उनका मुंह निहार रहे थे। मंच के आगे जो भीड़ थी, उसमें भगवा ही भगवा नजर आ रहा था। नीतीश की पार्टी का रंग कहीं दिख नहीं रहा था। तभी तो नारा लग रहा था– “बिहार में बहार है, आई इस बार सनातन सरकार है!”

बिहार में सरकार का पता-ठिकाना भले ही आज भी 1, अणे मार्ग ही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही हैं। लेकिन ‘पावर सेंटर’ शिफ्ट हो चुका है। भाजपा बिहार का ‘पावर हाउस’ बन चुकी है और उसके उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सत्ता का नया केंद्र बन चुके हैं। सम्राट गृह मंत्री बन गये हैं। उपमुख्यमंत्री तो वह पहले भी थे। सम्राट के गृह मंत्री बनने की खुशी नीतीश के दसवीं बार मुख्यमंत्री बनने पर भारी है। सवर्ण मीडिया यों ही नहीं चहक-चहक कर कह रहा है कि बीते बीस सालों में पहली बार नीतीश को गृह विभाग छोड़ना पड़ा है। लग रहा है कि नीतीश की बांह मरोड़ कर गृह विभाग छीन लिया गया है। सम्राट के गृह मंत्री बनने से भाजपा के नेताओं, कार्यकर्ताओं, सवर्ण बिरादरी और समर्थकों की खुशी का ठिकाना नहीं है। भाजपाइयों की तो छोड़िए। जदयू के नेता भी गुलदस्ता लेकर सम्राट के दरबार में हाजिरी लगा रहे हैं। उन पर फूलों की बारिश हो रही है। उन्हें देखने और उनसे मिलने के लिए लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है। तारापुर, जो उनका निर्वाचन क्षेत्र और जन्मभूमि है, वहां उनके स्वागत में जबरदस्त भीड़ उमड़ी। माहौल कुछ ऐसा बनाया जा रहा है कि गृह विभाग छिन जाने से नीतीश ‘पावरलेस’ हो गये हैं। अब भाजपा अपने मन मुताबिक सरकार चलाएगी, क्योंकि ‘पुलिस पावर’ उसके हाथ में है।

दूसरी ओर जदयू के उत्साही नेता जिस नीतीश को ताकतवर बताने के लिए ‘टाइगर अभी जिंदा है’ का पोस्टर लगाए थे, उन्हें भाजपा बिना दांत और बिना नाखून वाला टाइगर साबित करने पर आमादा है। सम्राट रोज-रोज नई चेतावनी जारी कर रहे हैं। कह रहे हैं कि माफियाओं की लिस्ट बन गयी है। अपराधियों को बिहार छोड़ना पड़ेगा। सोशल मीडिया पर ‘गाली’ देने वालों को जेल जाना पड़ेगा। सम्राट के इन बयानों पर काउंटर सवाल पूछने के बदले सवर्ण समाज लहालोट हो रहा है। सत्तापरस्त अखबारों, न्यूज चैनलों और सोशल मीडिया के जरिए खबरें गढ़ी जा रही हैं– “अब होगा बुलडोजर न्याय”। सम्राट के बयानों में सत्ता का अहंकार और विपक्ष तथा आलोचकों के प्रति अघोषित तिरस्कार दिख रहा है। लेकिन वे बड़ी चालाकी से अपने बयान के आगे-पीछे नीतीश कुमार का नाम जोड़ ले रहे हैं। बता रहे हैं कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में काम करने का ‘सौभाग्य’ प्राप्त हुआ है।

सम्राट चौधरी अब ‘सीएम इन वेटिंग’ बताये जा रहे हैं। उनका भव्य स्वागत हो रहा है। टीवी और अखबारों में खूब गुणगान हो रहा है। सत्ता समर्थक सवर्ण मीडिया बिहार में यूपी का योगी मॉडल पुलिस प्रशासन और ‘बुलडोजर न्याय’ लागू करने की बात कर रहा है। यह जो दृश्य रचा जा रहा है, वह सम्राट की बदौलत नहीं बल्कि भाजपा के दम पर हो रहा है। संघ परिवार और भाजपा पूरी ताकत लगा रही है। खूब शोर मचा रही है ताकि नीतीश की हैसियत और शख्सियत तिरोहित होती चली जाए। ताज नीतीश के माथे पर जरूर दिखे लेकिन राज भाजपा का चले।

गत 20 नवंबर, पटना के गांधी मैदान में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में गमछा लहराते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उन्हें देखते मुख्यमंत्री नीतीश कुमार

नीतीश कुमार को इस हाल में पहुंचाने की ‘परियोजना’ तो लंबे समय से चल रही थी। इस परियोजना में चिराग पासवान, जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा बराबर के साझीदार थे। तभी तो चुनाव के नतीजे ऐसे आये कि ‘माइनस नीतीश’ भाजपा ‘पावर हाउस’ बन गयी। जिन लालू यादव के ‘भूत’ का भय दिखाकर नीतीश भाजपा को डराते रहते थे, उनकी पार्टी की करारी हार ने नीतीश से उनकी ‘ओझा’ वाली हैसियत ही छीन ली। अब ‘भूत’ नहीं रहा तो ओझाई किस पर चलेगी। बिहार विधानसभा चुनाव के टिकट बंटवारे के समय सियासत के जानकारों ने कहा था, भाजपा 101 नहीं बल्कि 142 सीटों (101 भाजपा, 29 लोजपा, 6 रालोमो और 6 हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा) पर चुनाव लड़ रही है। चुनाव के नतीजों ने इसकी पुष्टि कर दी। भाजपा ‘पावरफुल’ होकर ‘किंगमेकर’ बनकर लौटी। थोड़ी-सी कसर रह गई। इसलिए उसने नीतीश को फिर ‘किंग’ बनाया। लेकिन हैसियत ‘जोकर’ जैसी बना दी है, जिसकी अदाएं हंसाती और रूलाती हैं। तरस खाने को बाध्य करती हैं।

नीतीश कुमार 14 नवंबर को जब 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तो पटना की मुख्य सड़क बेली रोड के किनारे जगह-जगह लगे एक बैनर पर आते-जाते लोगों की निगाहें टिक जा रही थीं। विश्वामित्र सेना की ओर से लगाये गये उस बैनर पर लिखा था– ‘बिहार में बहार है! आई इस बार सनातन सरकार है!’ बैनर पर विश्वामित्र सेना के चौबे टाइटलधारी एक नेता का नाम भी छपा था।

नीतीश के नेतृत्व में सरकार बनने के ठीक दस दिन बाद सवेरे-सवेरे एक खबर आई। खबर का शीर्षक था– “बिहार सरकार सनातन धर्म का करेगी प्रचार, सत्यनारायण कथा के लिए नियुक्त होंगे संयोजक”। कुछ न्यूज वेबसाइट पर तो ललाट पर टीका लगाये नीतीश की तस्वीर के साथ यह खबर चलाई जा रही थी। गोया फैसला नीतीश ने लिया है, जबकि यह खबर बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद के अध्यक्ष और भाजपा नेता के हवाले से थी। इससे पता चलता है कि नीतीश की ओट में भाजपा कैसे हिंदूवादी एजेंडा चला रही है।

करीब साढ़े तीन साल (नवंबर, 2015 से जुलाई, 2017 और अगस्त, 2022 से जनवरी 2024) की छोटी अवधि जब नीतीश की राजद के साथ सरकार थी और 20 मई, 2014 से लेकर 22 फरवरी, 2015 तक जीतनराम मांझी की सरकार को छोड़ दें तो बिहार में 2005 से भाजपा संग नीतीश कुमार की सरकार चल रही है। सरकार किसी भी गठबंधन की बनी लेकिन उसके मुखिया नीतीश ही रहे। मुख्यमंत्री बनने के बाद से नीतीश के समर्थक उन्हें ‘सुशासन बाबू’ बताते रहे हैं। खुद नीतीश कहते रहे हैं कि हमारी सरकार न्याय के साथ विकास की नीति पर काम करती है। लेकिन अब न्याय गायब है। विकास की ओट में कॉरपोरेटी लूट का खेल शुरू है। दलितों, पिछड़ों, अतिपिछड़ों और पसमांदा समाज की बस्तियों पर बुलडोजर चलने शुरू हो गये हैं। हत्याएं हो रही हैं। अपराधी नहीं, बल्कि आम आदमी खौफजदा है।

भाजपा की हाहाकारी विजय के आगे विपक्षी खेमा हताश और निराश है। मुख्य विपक्षी दल राजद और उसके नेता शोक संतप्त नजर आ रहे हैं। उनमें इतना भर कहने की सलाहियत नहीं है कि हम चुनाव हारे हैं, लेकिन हमारी लड़ाई जारी है। अन्याय के खिलाफ न्याय की लड़ाई में अंततः जीत न्याय की होती है। दरअसल इस हालत के लिए विपक्ष कम जिम्मेदार नहीं है। सत्तापक्ष जब चुनाव आयोग और प्रशासनिक मशीनरी के सहारे बिहार जीतने को अग्रसर था तब विपक्ष टिकट बंटवारे के झगड़े में फंसा था। उसने नया सहयोगी बनाने के बदले सहयोग के लिए बढ़े हाथ झटक दिये। राजद के इस अहंकार ने उसके मुस्लिम जनाधार को इस कदर निराश किया कि उसने दूरी बना ली। कांग्रेस तो मानो हार का तमाशा देखने चुनाव में उतरी थी। उसका रवैया ऐसा था मानो वह भाजपा से कम और राजद से अधिक लड़ रही थी। लगता है, कांग्रेस राजद मुक्त बिहार बनाना चाहती है। अब राजद को नए सिरे से दोस्त और दुश्मन की शिनाख्त करनी होगी। राजनीति का एक सामान्य फार्मूला है – जब कुछ समझ में नहीं आये तो जनता के बीच जाओ। सदन के भीतर विपक्ष की ताकत भले ही कम हुई है, लेकिन जनता आज भी भगवा झंडे के तले गोलबंद सवर्ण वर्चस्ववादी, जातिवादी, सांप्रदायिक सत्ता के खिलाफ है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

राजू

लेखक बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं

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