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लोग क्यों कह रहे 230 करोड़ रुपए का ‘ब्राह्मण प्रेरणा स्थल’?

दलित महापुरुषों की मूर्तियों का विरोध और जनसंघ के ब्राह्मण नेताओं की जय-जयकार जनता को सहज नहीं लग रही। अतीत में बोया गया विरोध का बीज अब पेड़ बनकर भाजपा के सामने खड़ा है। 2027 के यूपी चुनावों से पहले दलित और पिछड़े वर्ग की राजनीति करने वालों के हाथ में भाजपा ने खुद एक बड़ा मुद्दा थमा दिया है। बता रहे हैं सैयद जै़ग़म मुर्तजा

बीते 25 दिसंबर, 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लखनऊ पहुंचे, जहां उन्होंने 230 करोड़ रुपए की लागत से बने राष्ट्र प्रेरणा स्थल का उद्घाटन किया। हालांकि 65 एकड़ में फैले इस पार्क में जनसंघ के नेताओं की स्थापित तीन विशाल प्रतिमाएं विवाद का कारण बन गईं हैं। इन प्रतिमाओं को लेकर लोग मायावती के शासनकाल में हुए मूर्ति विवाद की यादें ताज़ा कर रहे हैं। वहीं कुछ राष्ट्र प्रेरणा स्थल को ‘ब्राह्मण प्रेरणा स्थल’ की संज्ञा दे रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लखनऊ दौरे को लेकर सूबे की सरकार ने व्यापक तैयारियां की थी। राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल पर डेढ़ लाख लोगों को जुटाने का दावा किया गया, लेकिन ठंड ने लक्ष्य को अधूरा कर दिया। बावजूद इसके भाजपा के लिए यह मायने नहीं रखता, क्योंकि मीडिया कवरेज अभूतपूर्व रहा। राष्ट्रीय चैनलों पर कई दिन पहले से पार्क की विशेषताओं पर कार्यक्रम प्रसारित हुए, रैली का सीधा प्रसारण हुआ और जनता को बताया गया कि यह स्थल किस तरह राष्ट्रीय चेतना और राष्ट्रवाद का संदेश देगा।

राष्ट्र प्रेरणा स्थल में जनसंघ के आदर्श नेताओं अटल बिहारी वाजपेयी, पंडित दीन दयाल उपाध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विशाल प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। कांसे से बनी तीनों प्रतिमाएं 65 फीट ऊंचाई की हैं। पार्क में इन नेताओं के जीवन से जुड़ा संग्रहालय, ध्यान केंद्र, योग केंद्र, विश्राम स्थल और कैफेटेरिया भी मौजूद है। इसे जनसंघ से भाजपा तक की यात्रा को आमजन तक पहुंचाने का प्रयास माना जा रहा है। सवाल यह है कि इसकी सबसे खास बात क्या है?

आम जनता के टैक्स के पैसे से सत्ता पक्ष द्वारा राजनीतिक संदेश देना कोई नई बात नहीं है। सत्ता में आने के बाद हर दल ने अपने नेताओं की मूर्तियां और पार्क बनवाए हैं। इस मामले में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बसपा तक कोई भी अछूता नहीं है। मगर फर्क़ बस इतना रहा कि पहले की सरकारों में जिन नेताओं को सम्मान दिया गया, उनके योगदान और सामाजिक चेतना में भूमिका को ध्यान में रखा गया। लेकिन राष्ट्र प्रेरणा स्थल में लगी मूर्तियों के चयन पर विवाद है। साथ ही, जिस तरह भाजपा ने मायावती शासनकाल में मूर्तियों की राजनीति पर सवाल उठाए थे, वही बहस अब उसके सामने खड़ी है।

लखनऊ में स्थापित श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय व अटल बिहारी वाजपेयी की प्रतिमाएं

दरअसल, उत्तर प्रदेश में मूर्तियों और पार्कों की सियासत हमेशा से सत्ता का प्रतीक रही है। हर दल ने इसे अपनी विचारधारा और जनाधार से जोड़ने की कोशिश की है। लेकिन राष्ट्र प्रेरणा स्थल को लेकर उठे सवाल इसलिए अहम हैं, क्योंकि भाजपा ने अतीत में इसी मुद्दे पर विरोध की राजनीति की थी। अब वही पार्टी अपने महापुरुषों की प्रतिमाओं के जरिए राष्ट्रवाद का संदेश देने की कोशिश कर रही है।

आलोचकों का कहना है कि यह दोहरी राजनीति है। हालांकि भाजपा समर्थकों का तर्क है कि इन नेताओं का योगदान राष्ट्रीय चेतना को दिशा देने वाला रहा है। बहरहाल, मौजूदा विवाद सिर्फ मूर्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की सियासत में प्रतीकों के चयन को एक बार फिर से बहस के केंद्र में ले आया है।

विवाद को समझना है तो हमें अतीत में जाना होगा जब उत्तर प्रदेश में मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी। 2007 से 2012 के बीच मायावती ने लखनऊ और नोएडा में कई भव्य पार्क और स्मारक बनवाए। इनमें डॉ. आंबेडकर स्मारक, कांशीराम स्मारक और हाथी पार्क जैसे निर्माण उनके शासन की पहचान बन गए। ज़ाहिर है इनके निर्माण पर हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च हुए। लेकिन ये मूर्तियां सिर्फ सजावट के लिए नहीं थीं, बल्कि बहुजन समाज पार्टी की विचारधारा का स्थायी प्रतीक थीं।

दलित चेतना और आंबेडकरवादी आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि ये प्रतिमाएं दलित आंदोलन की वैचारिक नींव को मजबूत करती हैं और पहली बार समाज के नायकों को उचित सम्मान दिलाती हैं। मायावती ने जगह-जगह हाथी की मूर्तियां भी स्थापित कराईं, जो बसपा का चुनाव चिह्न है, ताकि पार्टी की मौजूदगी स्थायी रूप से दर्ज हो सके। लेकिन भाजपा ने इसका कड़ा विरोध किया। आरएसएस और भाजपा से जुड़े संगठनों ने इन मूर्तियों और पार्कों पर हुए खर्च को मुद्दा बनाकर जनहित याचिकाएं दाखिल कीं। सुप्रीम कोर्ट ने लंबी सुनवाई के बाद 2025 में इस मामले को खारिज कर दिया। हालांकि भाजपा का तर्क यही रहा कि यह धन शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च होना चाहिए था।

इधर आलोचकों का कहना है कि यह दिखाता है कि राजनीति में प्रतीक कितने प्रभावशाली होते हैं और सत्ताधारी दल किस तरह करदाताओं का पैसा राजनीतिक संदेश देने में लगाते हैं। लेकिन मुद्दा सिर्फ धन का नहीं है। दलित राजनीति से जुड़े लोग प्रेरणा स्थल में लगी तीन मूर्तियों के चयन पर भी सवाल उठा रहे हैं। दलित चिंतक श्रीराम मौर्य इसे ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना की चिर-परिचित शैली बताते हैं। उनका कहना है कि वाजपेयी जीवित होते तो शायद दीन दयाल उपाध्याय की प्रतिमा अपने बराबर में लगने नहीं देते। वहीं अमरोहा के महेंद्र सिंह जाटव का मानना है कि मायावती के दौर में विरोध का कारण पार्क नहीं था, बल्कि दलित नेताओं की मूर्तियां थीं, जो सवर्ण श्रेष्ठता की मानसिकता रखने वालों ने अपने लिए चुनौती मान ली थीं।

बहरहाल, अब जब भाजपा राज्य और केंद्र दोनों में सत्ता में है, तो ऐसे खर्चों पर विवाद स्वाभाविक है। अगर उसने अतीत में महज़ विरोध की राजनीति न की होती, तो राष्ट्र प्रेरणा स्थल का मामला यूं ही गुज़र जाता। लेकिन दलित महापुरुषों की मूर्तियों का विरोध और जनसंघ के ब्राह्मण नेताओं की जय-जयकार जनता को सहज नहीं लग रही। अतीत में बोया गया विरोध का बीज अब पेड़ बनकर भाजपा के सामने खड़ा है। 2027 के यूपी चुनावों से पहले दलित और पिछड़े वर्ग की राजनीति करने वालों के हाथ में भाजपा ने खुद एक बड़ा मुद्दा थमा दिया है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सैयद ज़ैग़म मुर्तज़ा

उत्तर प्रदेश के अमरोहा ज़िले में जन्मे सैयद ज़ैग़़म मुर्तज़ा ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से लोक प्रशासन और मॉस कम्यूनिकेशन में परास्नातक किया है। वे फिल्हाल दिल्ली में बतौर स्वतंत्र पत्रकार कार्य कर रहे हैं। उनके लेख विभिन्न समाचार पत्र, पत्रिका और न्यूज़ पोर्टलों पर प्रकाशित होते रहे हैं।

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