जम्मू-कश्मीर के मशहूर पर्यटन स्थल पहलगाम में 22 अप्रैल, 2025 को एक आतंकवादी हमला हुआ। इस हमले में 26 लोग मारे गए थे। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। आतंकी घटना से सबसे ज्यादा पर्यटन व्यवसाय प्रभावित हुआ। 2019 के बाद जम्मू-कश्मीर में साल-दर-साल हालात तेजी से सुधरते चले आ रहे थे। राज्य की मौजूदा जीडीपी औसत 8.5 प्रतिशत दर से बढ़ी। पिछले 5 सालों में 84 हजार करोड़ का निवेश प्रस्ताव आया। वहीं 2024 में राज्य को पर्यटन से 18 हजार करोड़ रुपए का रेवेन्यू मिला।
खैर, पहलगाम हमले के लगभग 7 माह बीत जाने के बाद आज भी पर्यटन से जुड़े स्थानीय लोग पर्यटकों के आने की बाट देख रहे हैं।
श्रीनगर में और उसके आस-पास डल झील, निशात बाग, शालीमार बाग, चश्मे शाही, परी महल, हजरतबल दरगाह, पहलगाम, सोनमर्ग और मानसबल झील जैसे कई पर्यटन स्थल है, जहां पर्यटक घूमने आते हैं और यहां के लोगों को काम-धंधा दे जाते हैं। इससे लोगों की आजीविका चलती है। लेकिन वर्तमान में ये पर्यटन स्थल वीरान पड़े हैं। ज्यादातर दुकानें खाली नजर आती हैं। दुकानदारों और काम-धंधे से जुड़े लोगों के चेहरे पर उदासी छायी दिखती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ कश्मीर के पास नाश्ते की दुकान चलाने वाले अधेड़ मुहम्मद रफीक कहते हैं कि हमले के बाद काम-धंधा डाउन हो गया है। जो लोग पहले पांच दूसरे लोगों को काम देते थे, अब एक व्यक्ति को काम दे पाते हैं। खाने-पीने की दुकानों से लेकर, घोड़ों की सवारी, कपड़ों, सामानों की खरीददारी जैसे अन्य काम बहुत प्रभावित हुए हैं।

रफीक कहते हैं कि “पहलगाम में मेरा एक अच्छा होटल था, जो मैं करीब 4 सालों से चलाता आ रहा था। हमले के बाद बिजनेस लड़खड़ा गया। तब मुझे होटल बंद करना पड़ा। श्रीनगर में भी मैं कई सालों से पकोड़ा, भटूरा, हलवा जैसे नाश्ते की दुकान लगा रहा हूं। पहले दुकान में मैं 4 लोगों को काम पर रखता था। आज मेरी दुकान पर केवल 2 लोग काम करते हैं।”
इसके आगे मुहम्मद रफीक अपनी कमाई को लेकर बताते हैं कि “पहले रोजाना की कमाई 10 हजार रूपए से ज्यादा थी। आज मुश्किल से 1000 से 2000 रुपए तक की कमाई हो पाती है। अपने नाश्ते की दुकान को पहले के जैसा बनाने के लिए मैंने 5 लाख रुपए का लोन लिया था। सब दुकान में लगा दिया, मगर इतना मुनाफा नहीं हो रहा कि लोन की किश्तें भी भर सकूं। मेरी 4 किश्तें बाकी पड़ी हैं। इन्हें भरने के लिए पैसा ही नहीं है।”
खिलौने बेचनेवाले एक दुकानदार ने कहा कि “खिलौनों जैसे बहुत से सामानों की बिक्री डाउन हुई है। इससे आमदनी पहले की अपेक्षा आधी रह गई है।”
डल झील से सटी हुई कुछ दुकानें और उनके दुकानदार फुर्सत में दिख जाते हैं। लकड़ी से बने सामान बेचने वाले अब्दुल रहमान कहते हैं कि “मैं लकड़ी के सामान बेचता हूं। जिनमें शिकारा, पेन, लॉकेट जैसे कई सामान शामिल हैं। पहले मैं एक दिन में 4-5 हजार रुपए कमाता था। आज हालत यह है कि मुश्किल से 1000-1500 रुपए की बिक्री हो पाती है। हमले के पहले मैंने अपने काम को बढ़ाने के लिए 50 हजार रुपए का सामान खरीदा था, मगर, तब से अब तक कुछ ही सामान बिका है। ज्यादातर सामान रखा हुआ है।”
आगे अब्दुल कहते हैं कि “मन तो करता है यह सब काम बंद कर दें। मगर, सोचता हूं फिर, करेंगे क्या? इस बेरोजगारी के दौर में। एक उम्मीद है कि सब पहले के जैसे ठीक हो जाए। इस वक्त 5-10 पर्यटक भी एक साथ दिख जाते हैं तब हम दुकानदारों का चेहरा खिल जाता है।”
वे कहते हैं कि “श्रीनगर में ज़्यादातर काम-धंधे पर्यटकों से चलते हैं। लेकिन, पर्यटक अब यहां आने के लिए ज्यादा उत्सुक नहीं हैं। आज शिकारा (नाव), टैक्सी, हाउस बोट्स, होटल सबका रोजगार मंदा पड़ा है। आज कश्मीर के हालातों को यहां के लोगों से ज्यादा कोई नहीं समझ सकता। हम कश्मीरी बहुत कुछ जानते हैं। लेकिन, किसी भी मुद्दे पर अपनी जुबान खोलना नहीं चाहते।”
अब्दुल रहमान की दुकान के पास ही शॉल, कोट, जैकेट आदि कपड़े बेचने वाले आसिफ कहते हैं, “यहां का कपड़ा बाहरी लोगों को बहुत पसंद आता है। यहां के स्थानीय लोग भी अच्छा कपड़ा पहनते हैं। जब पर्यटक यह देखते हैं तब उन्हें लगता है कि यहां से कपड़ा जरूर खरीद कर ले जाना चाहिए। लेकिन, पहलगाम अटैक के बाद डर और असुरक्षा के भाव ने पर्यटकों को कश्मीर आने से रोक दिया है।”

इन दुकानों के निकट ही है हज़रतबल दरगाह, जहां खाने-पीने और फलों की भी दुकानें हैं। यहां आटो चालक भी पर्यटकों, यात्रियों की बाट देखते मिल जाते हैं। दरगाह के बाहर ही चौराहे के कुछ दुकानदार कुछ भी नहीं कहना चाहते। लेकिन खौफ और मंदी की मार उनके चेहरे पर अनायास दिख जाती है।
अपनी ऑटो में बैठकर यात्रियों की बाट जोहते ऑटो चालक बशीर अहमद कहते हैं कि “पहले मैं एक दिन में 1200 से 1500 रुपए तक की कमाई कर लेता था। आज हालत यह है कि एक दिन में 400 से 700 रुपए तक की कमाई हो पा रही है। पहले यात्रियों की कमी नहीं होती थी और अब उन्हें अपनी ऑटो में चलने के लिए बहुत मनाना पड़ता है। यहां तक कि कम पैसों में भी यात्रियों को ढोना पड़ रहा है।”
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता इर्तिजा कहती हैं कि “पहलगाम हमले के बाद मैं बहुत दुखी हुई, क्योंकि यह कश्मीर के लोगों का किया हुआ नहीं था, फिर भी यहां सभी को इसका नुकसान झेलना पड़ा। इस घटना से पर्यटकों में डर पैदा हो गया और उन्होंने यहां आना बंद कर दिया। इसके कारण दुकानदारों को बहुत नुकसान हुआ। उनकी दुकानें सूनी पड़ गईं और उनकी रोज़ की आमदनी घट गई।”
इर्तिजा आगे कहती हैं कि “अब बहुत से लोग खर्चे पूरे करने और अपने परिवार का पालन-पोषण करने में मुश्किल महसूस कर रहे हैं। इस घटना ने पहलगाम के शांत माहौल को पूरी तरह बदल दिया है। स्थानीय लोग सिर्फ शांति, सुरक्षा और पर्यटकों की वापसी की कामना कर रहे हैं।”
वहीं सामाजिक कार्यकर्ता शौकिया कहती हैं कि “कश्मीर की पहचान इस बात में छिपी है कि वहां के लोग पर्यटकों का स्वागत अपने मेहमानों की तरह करते हैं। पर्यटन अनेक कश्मीरी परिवारों की आजीविका की रीढ़ है। लेकिन पहलगाम हमले ने कश्मीरी व्यापारी समुदाय को आसमान से ज़मीन पर ला दिया।” शौकिया कहती हैं कि “सरकार को पर्यटन को बढ़ावा देने और उस पर निर्भर आजीविकाओं को फिर से जीवित करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।”
बहरहाल, जब हम जम्मू-कश्मीर में पहलगाम अटैक के बाद प्रभावित पर्यटन और हिंसा की स्थिति को आंकड़ों के जरिए समझने की कोशिश करते हैं तब ज्ञात होता है कि कश्मीर जैसे पर्यटन क्षेत्र में दो दशकों में जारी अशांति के कारण भारी गिरावट दर्ज हुई। सन् 1989 से कश्मीर घाटी हिंसक परिस्थितियों में घिरी हुई है, जिसने पर्यटन उद्योग की स्थिरता को खतरे में डाल दिया है। राजनीतिक अस्थिरता ने पर्यटकों के प्रवाह, दिशा, पैटर्न और उनकी संख्या को बहुत प्रभावित किया है।
वहीं, इस वर्ष हुए पहलगाम आतंकी से काफ़ी-कुछ प्रभावित हुआ। पहलगाम हमले से क्या-क्या प्रभावित हुआ? इस तरफ गौर फरमाएं तब मालूम होता है कि हमले के 24 घंटे के भीतर ही 20 हजार होटल में 90 प्रतिशत से ज्यादा कमरे खाली हो गए।
हमले के बाद लगभग 10 लाख से ज़्यादा बुकिंग कैंसिल हो गईं। पर्यटन को 1,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा का नुकसान हुआ है जबकि, 1.69 लाख करोड़ रुपए का निवेश अधर में लटक गया है।
हालांकि, पहलगाम हमले के बाद राज्य सरकार ने विकास के लिए नौ नए पर्यटन स्थलों की पहचान की है। सरकार इन स्थलों के लिए 5,500 करोड़ रुपए की रकम के इंतजाम में जुट गई है। लेकिन, सवाल यही बना हुआ है कि, जो पहले के पर्यटन स्थल हैं उनकी स्थिति कैसे संभाली जाए? पर्यटकों की आवाजाही कश्मीर तरफ कैसे बढ़ाई जाए और लोगों के काम-धंधों को कैसे रफ्तार दी जाए, जिससे प्रभावित हुए पर्यटन क्षेत्र को पहले जैसा समृद्ध किया जा सके।
(संपादन : नवल/अनिल)
फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्त बहुजन मुद्दों की पुस्तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्य, संस्कृति व सामाजिक-राजनीति की व्यापक समस्याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in