मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में बड़ी-बड़ी इमारतों के बीच झुग्गी-झोपड़ी वाली बस्तियां भी हैं। इन बस्तियों के लोगों की जिंदगी मजदूरी, छोटे-मोटे कामों और रोज-रोज के संघर्षों से चलती रहती है। वंचनाओं के बावजूद वे अपनी दुनिया रोशन करने के लिए जद्दोजहद करते रहते हैं। मगर, जब अचानक झुग्गी वासियों के हाथों में सरकारी बेदखली का आदेश आता है, तब उनकी दुनिया हिल जाती है। रातों की नींद उड़ जाती है और वर्षों के उनके सपने टूट जाते हैं।
यह कहानी एक ऐसी ही बस्ती की है, जो भोपाल में मुख्यमंत्री आवास से करीब 300 मीटर दूर मानस भवन के इर्द-गिर्द बसी है। जिस जमीन पर यह बस्ती है, वह सरकारी दस्तावेज में वन भूमि के रूप में दर्ज है। इस बस्ती के 27 परिवारों को स्थानीय प्रशासन की ओर से बेदखली का आदेश दिया गया है। इनमें आदिवासी और मुस्लिम परिवार शामिल हैं। यह आदेश गत 25 अगस्त, 2025 को जारी किया गया।
आदेश में कहा गया है कि “राजस्व निरीक्षक द्वारा पटवारी हल्का शहर भोपाल की शासकीय भूमि खसरा नंबर 1413/1 रकबा 31.5130 हेक्टेयर म.प्र शासन नोइयत वन में से रकबा 100 वर्गफीट पर आपके द्वारा झुग्गी/झोपड़ी/मकान/टीनशेड बनाकर अवैध कब्जा बावत प्रस्तुत प्रतिवेदन के आधार पर अतिक्रमण किया जाना प्रमाणित होने पर इस न्यायालय के प्रकरण क्रमांक 0001/अ-68/2025-26 में पारित आदेश दिनांक 25/08/2025 द्वारा म.प्र शासन की भू.रा. संहिता 1959 की धारा 248(1) के अंतर्गत आपके विरुद्ध रुपए 1000/- अंकन एक हजार मात्र अर्थदंड आरोपित करते हुए शासकीय भूमि से बेदखल किए जाने के आदेश पारित किए गए हैं।”
इस आदेश के पहले 4 अप्रैल, 2025 को एक कारण बताओ नोटिस भी झुग्गी के वासियों को प्रशासन ने दिया था।
कारण बताओ नोटिस और बेदखली का यह आदेश जब झुग्गी वासियों के हाथों में आया, तब वे चिंता और तनाव से भर गए। इस बेदखली के विरोध में आदिवासी लोगों ने कई नारे और विचार भी लिखे– ‘आदिवासी एकता जिंदाबाद। आवास हमारा अधिकार है, बेदखली नहीं’।

एक आदिवासी परिवार के घर की दीवार पर पोस्टर में यह लिखकर विरोध दर्ज किया गया है कि “घर जिनके उजड़े हों, वे दीपावली नहीं, संघर्ष मनाते हैं।” एक अन्य आदिवासी व्यक्ति के घर की दीवार पर चिपके पोस्टर पर लिखा है कि “इस बार हम दीपावली पर मिठाई नहीं, डर बांट रहे हैं। कल शायद हमारे सिर पर छत न हो।”
सूरत सिंह इसी झुग्गी में रहते हैं। वे आदिवासी हैं और मजदूरी करके अपना और अपने परिजनों का पेट पालते हैं। वे कहते हैं कि “इस वक्त हमारे दिलो-दिमाग में तनाव भरा हुआ है। यह सवाल बार-बार कचोट रहा है कि सरकार ने जो बेदखली का आदेश दिया है, उससे कैसे निपटा जा सकता है?” लेकिन यह आदेश तो अदालत के निर्णय के बाद दिया गया है, अब आप क्या करेंगे? यह पूछने पर सूरत सिंह उदास स्वर में कहते हैं कि “कुछ समझ नहीं आ रहा करें तो क्या करें? बस इतना कहना चाहते हैं कि सरकार ऐसा कदम उठाए जिससे हमारे संसाधन प्रभावित ना हों और सबका भला हो।”
सूरत सिंह के चुप होते ही सिमन भील बोल पड़ते हैं। उनकी जीविका भी मजदूरी से चलती है। वे बतलाते हैं कि “हमारे दादा और पिता यहां रहते थे। इस तरह दो पीढ़ियां गुजर गईं। अब हमारे बच्चों के बच्चे भी हो गए हैं। हम सब मिलकर यहां बने अपने घर में रहते आ रहे हैं।”
इसके आगे सिमन भील कहते हैं कि “अक्सर यहां अधिकारी आते रहते हैं और वे कहते हैं कि तुम लोगों को यहां से जाना पड़ेगा। पर हमारा कहना है कि यदि वाकई सरकार को हमारे मकानों को तोड़कर यहां की जगह चाहिए तो हमें हमारे मकानों का अच्छा मुआवजा व दूसरी जगह आवास के लिए भूमि उपलब्ध करवाए।”
बेदखली के आदेश का असर युवाओं पर भी दिखता है। कल्पना भील एमए की अंतिम वर्ष की छात्रा हैं। वह कहती हैं कि “हमारा काम-काज, स्कूल-कॉलेज, रिश्तेदारियां, आवास सब कुछ यहीं पर है। हमारी दुनिया यहीं बसी है। हम नहीं चाहते कि हमें यहां से बेदखल किया जाए। इसके बाद भी हमें बेदखल किया जाता है तब हमें इतनी सुविधाएं सरकार दे ताकि हमें यह एहसास न हो कि हमें बेदखल किया गया है।”
कल्पना भील कहती हैं कि “हम यहां अपने दादा-दादी के समय से निवास करते आ रहे हैं। मेरे परिवार सहित करीब 30-35 परिवारों को यहां रहते हुए लगभग 70-80 वर्ष हो गए हैं। हमारे पास बिजली-पानी, भोपाल गैस कांड से जुड़े कुछ दस्तावेज भी हैं, जिनसे मालूम किया जा सकता है कि हम कितने वर्ष से यहां रह रहे हैं।”
वह यहीं नहीं रूकती हैं– “जब हम झुग्गियों में रहते थे, तब ही सरकार हमें हटा देती, तो ठीक रहता। अब जब हमारे अच्छे मकान बन गए हैं। हम अच्छे से रह रहे हैं और पढ़-लिखकर जीवन में आगे बढ़ना चाहते हैं तब सरकार हमें हटाने का आदेश दे रही है।”
बेदखली का दुख जतनबाई की डबडबाई आंखों में दिखता है। वह कहती हैं कि “मेरे पति ने बहुत पहले ही इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। मैं लोगों के घरों में खाना बनाने और सफाई का काम करती हूं। यही काम करके मैंने अपने चार बच्चों को पाला-पोषा है। कुछ पैसे रोज जोड़-जोड़ कर अपने परिवार के लिए घर बनवाई। पूरा पैसा घर में समा गया। ऐसे में अचानक से हमें बेदखली का नोटिस देना, हमारे सपनों को उजाड़ने जैसा है।” रूपा बाई भील कहती हैं कि “हमारे पास आधार कार्ड जैसे पहचान पत्र पर यहीं का पता है। जहां हम रहते हैं, उसी जगह के आधार पर हमें सरकारी राशन जैसी अन्य योजनाओं का लाभ दिया जाता है। फिर भी, कई अधिकारी हमारे पास आकर यह कहते हैं कि आपको यहां की जगह छोड़नी पड़ेगी।”
कॉलेज में पढ़ने वाली छाया भील कहती हैं कि “हमें प्रशासन की ओर से अभी यह भी नहीं बताया गया है कि आपकी भूमि किस लिए ली जा रही है। जनता के लिए भूमि का किस तरह उपयोग किया जाना है, यह बताना प्रशासन की नैतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।”
वृद्ध वासु मियां कहते हैं कि “बस्ती में आदिवासी लोगों के साथ 3-4 घर के हम मुस्लिम लोग भी रहते हैं। हमें भी प्रशासन ने बेदखली का नोटिस भेजा है। खुद के घर को बचाने के लिए हम सभी चिंतित हैं।”
(संपादन : नवल/अनिल)
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