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भंवर मेघवंशी की किताब ‘आंबेडकरवाद की रोशनी में आरएसएस का द्विज राष्ट्रवाद’ लोकार्पित

ओमप्रकाश कश्यप ने अपने संक्षिप्त संबोधन में कहा कि संघ का राष्ट्रवाद उसकी अपनी बौद्धिकता पर नहीं, बल्कि दूसरों की अज्ञानता पर टिका है। उन्होंने कहा कि आरएसएस के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विश्लेषण द्विज राष्ट्रवाद के रूप में ही किया जाना चाहिए, क्योंकि उसकी असली मंशा द्विजों के वर्चस्व को बनाए रखने की ही है।

गत 16 जनवरी, 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम (प्रगति मैदान) में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में भंवर मेघवंशी की सद्य प्रकाशित पुस्तक का लोकार्पण किया गया। फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का नाम ‘आंबेडकरवाद की रोशनी में आरएसएस का द्विज राष्ट्रवाद (परत-दर-परत पड़ताल)’ है। लोकार्पण कार्यक्रम मेला परिसर में फारवर्ड प्रेस के स्टॉल (हॉल संख्या 2, स्टॉल संख्या आर-30) पर किया गया। इस मौके पर पुस्तक के लेखक भंवर मेघवंशी, प्रसिद्ध दलित-बहुजन चिंतक व लेखक ओमप्रकाश कश्यप, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रो. राजेश पासवान, लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रो. रविकांत, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. जितेंद्र मीणा, राष्ट्रीय जनता दल की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका भारती, डॉ. हिमांशु पांड्या, प्रज्ञा जोशी, फारवर्ड प्रेस के मुख्य संपादक अनिल वर्गीज, शिव बोधि, अनिकेत गौतम, रूपचंद गौतम, मिहिर, डॉ. सुरेंद्र भद्रवाल और दीपक चारण आदि उपस्थित थे।

लोकार्पण कार्यक्रम के प्रारंभ में दिवंगत समालोचक वीरेंद्र यादव (5 मार्च, 1950 – 16 जनवरी, 2026) का स्मरण किया गया और एक मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

पुस्तक के लेखक भंवर मेघवंशी ने किताब के उद्देश्य की चर्चा करते हुए कहा कि डॉ. आंबेडकर को लेकर आरएसएस के द्वारा अनेक तरह के भ्रम फैलाए जा रहे हैं। इससे पहले कि आरएसएस एआई की सहायता से डॉ. आंबेडकर की कोई तस्वीर लोगों के बीच लेकर आए जिसमें वे गणवेश में हों, हमें उनकी साजिशों को बेनकाब करना होगा। आरएसएस ने डॉ. आंबेडकर की वैचारिकी का हमेशा विरोध किया। लेकिन अब वह उन्हें स्वीकारने का दिखावा कर रहा है। यह पुस्तक हमारी सत्यशोधक परंपरा की हिस्सा है। यह किताब आंबेडकर और आरएसएस के बीच के फर्क व असहमतियों के बारे में बताती है।

वहीं ओमप्रकाश कश्यप ने अपने संक्षिप्त संबोधन में कहा कि संघ का राष्ट्रवाद उसकी अपनी बौद्धिकता पर नहीं, बल्कि दूसरों की अज्ञानता पर टिका है। उन्होंने कहा कि आरएसएस के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विश्लेषण द्विज राष्ट्रवाद के रूप में ही किया जाना चाहिए, क्योंकि उसकी असली मंशा द्विजों के वर्चस्व को बनाए रखने की ही है।

पुस्तक का लोकार्पण करते सभी गणमान्य

डॉ. रविकांत ने अपने संबोधन में कहा कि आरएसएस और हिंदू राष्ट्रवाद के खिलाफ जो बौद्धिक लोगों ने मेहतन की है, यह किताब उसी की एक मजबूत कड़ी है। मुझे विश्वास है कि आरएसएस जो छद्म राजनीति के जरिए बाबासाहब डॉ. आंबेडकर को अपना बनाकर दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के बीच में हिंदुत्व का एजेंडा थाेपने की कोशिश कर रहा है, उसका पर्दाफाश होगा। आज आरएसएस सबसे ज्यादा हमला संविधान और दलित-बहुजनों के हक-हुकूक पर कर रहा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि भंवर जी की यह किताब भी उनकी पूर्व की किताब ‘मैं एक कारसेवक था’ की तरह देश में आरसएस की साजिशों को बेनकाब करेगी।

ओजस्वी वक्ता प्रियंका भारती ने इस मौके पर कहा कि इस किताब में आरएसएस के सौ वर्षों का सफर दर्ज है। संघ समाज में वर्णगत श्रेणी बनाए रखना चाहता है, जबकि बाबा साहेब समानता, बंधुत्व और लोकतंत्र चाहते हैं। बाबा साहेब और आरएसएस के बीच में जो वैचारिक टकराव है, यह किताब इसी पर आधारित है। मेघवंशी जी ने संविधान के संबंध में आरएसएस की आपत्तियों के बारे में हर चीज को पूरे तथ्यों के साथ रखा है। और उन्होंने आंबेडकर को अपना बताने के आरएसएस के एजेंडे को उजागर कर दिया है। आरएसएस आंबेडकर को अपना बताकर दलितों, पिछड़ों में हुई जागृति, सामाजिक-राजनीतिक चेतना को कुंद कर देना चाहता है। इसलिए यह किताब जरूरी है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. जितेंद्र मीणा ने कहा कि भंवर जी आरएसएस की हर तह तक पहुंचे और वहां से उन्होंने आरएसएस के द्वारा फैलाए जा रहे भ्रमों का सच हमारे सामने रखा है। यह किताब यह भी बताती है कि आरएसएस की साजिशों को समझने के लिए हमें आरएसएस में जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हमारा एक आदमी वहां पहले जा चुका है और अब उसने उसके झूठ को उजागर कर दिया है।

लोकार्पण कार्यक्रम का संचालन फारवर्ड प्रेस के हिंदी संपादक नवल किशोर कुमार ने किया।


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एफपी डेस्‍क

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