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मनहीन, तनहीन और धनहीन के जननायक

कर्पूरी ठाकुर जिन वर्गों को ‘मनहीन, तनहीन और धनहीन’ कहकर संबोधित करते थे, शायद वे जानते थे कि इन वर्गों की पहली और सबसे बड़ी समस्या उनकी ‘मनहीनता’ है। अर्थात् आत्मविश्वास और सामाजिक चेतना का अभाव है, जिसके कारण वे अपनी मनोदशा को खुलकर अभिव्यक्त नहीं कर पाते। बता रहे हैं पंकज कुमार

लगभग तीन वर्ष पूर्व, जब मैं जननायक कर्पूरी ठाकुर (24 जनवरी, 1924 – 17 फरवरी, 1988) की जीवनी लेखन पर काम कर रहा था, उसी दौरान मैं पटना, दिल्ली तथा अन्य शहरों में उनके जीवन और विचारों से जुड़े व्यक्तियों के साक्षात्कार कर रहा था ताकि उनके जीवन को बेहतर तरीके से समझा जा सके और उनका सही मूल्यांकन दर्ज हो सके। इसी दौरान एक सज्जन ने बताया कि कर्पूरी ठाकुर, जिन्हें बिहार की जनता ‘जननायक’ कहकर सम्मानित करती है, वे भारतीय समाज की संरचना को तीन व्यापक वर्गों में देखते थे। ये वर्ग ‘पुरस्कृत’, ‘तिरस्कृत’ और ‘बहिष्कृत’ थे। साथ ही, वे अतिपिछड़ी जातियों को ‘मनहीन, तनहीन और धनहीन’ कहकर संबोधित करते थे।

मेरे लिए ये सारे शब्द एकदम नए थे। मैं इन शब्दों के बारे में विस्तृत जानना चाहता था जो उनके द्वारा लिखा या बोला गया हो। इस संदर्भ में कर्पूरी ठाकुर के लिखित या मौखिक वक्तव्यों को खोजने का प्रयास किया, तो अंततः उनका एक महत्वपूर्ण भाषण मिल गया, जो उन्होंने अपने निधन से लगभग ग्यारह महीने पूर्व, 11 अप्रैल, 1987 को डॉ. राम मनोहर लोहिया स्मारक महाविद्यालय, मुजफ्फरपुर में आयोजित एक विचार गोष्ठी में दिया था। इस गोष्ठी का विषय था– ‘लोहिया के समाजवादी चिंतन के आलोक में बिहार के पिछड़ेपन को दूर करने में विपक्ष की भूमिका’। यह भाषण न केवल ऐतिहासिक महत्व रखता है, बल्कि बिहार के सामाजिक पिछड़ेपन को समझने की वैचारिक दृष्टि भी प्रदान करता है। इसी भाषण में कर्पूरी ठाकुर ने बिहार के पिछड़ेपन, लोहिया के समाजवादी विचारों तथा इस संरचनात्मक पिछड़ेपन को दूर करने में विपक्ष की भूमिका पर विस्तृत चर्चा की है।

विशेष रूप से जाति के संदर्भ में बोलते हुए उन्होंने ‘पुरस्कृत’, ‘तिरस्कृत’ और ‘बहिष्कृत’ वर्गों की विस्तृत व्याख्या की। इन शब्दों के माध्यम से उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत वर्चस्व, वर्गीय असमानता और हाशिए पर धकेले गए समुदायों की ऐतिहासिक तथा समकालीन स्थिति को स्पष्ट किया था। हालांकि मुझे ‘मनहीन, तनहीन और धनहीन’ के संबंध में कोई लिखित दस्तावेज नहीं मिला। लेकिन कर्पूरी ठाकुर से जुड़े कई नेताओं, जिनमें बिहार विधान परिषद के पूर्व सदस्य दिवंगत उदयकांत चौधरी, के.सी. त्यागी तथा रमाशंकर सिंह जैसे अनेक राजनीतिक-सामाजिक व्यक्तित्वों ने इन शब्दों पर विस्तृत चर्चा की थी। इन संवादों और कर्पूरी ठाकुर के विचारों के अध्ययन के दौरान मुझे यह स्पष्ट हुआ कि ‘मनहीन, तनहीन और धनहीन’ अनायास नहीं हैं, बल्कि ये तीनों शब्द सामाजिक, राजनीतिक और दार्शनिक दृष्टि देते हैं, जो अतिपिछड़ी जातियों की सामूहिक मनोस्थिति, उनके सामाजिक बहिष्करण और सत्ता से दूरी को समझने में सहायक हैं। इनकी चर्चा करना आवश्यक है।

ये शब्द कर्पूरी ठाकुर के समाजवादी चिंतन का सार प्रस्तुत करते हैं और उनके विचारों के साथ-साथ समाज की सामाजिक तथा मानसिक गढ़न को समझने का ठोस आधार प्रदान करते हैं। कर्पूरी ठाकुर का सामाजिक व राजनीतिक चिंतन कबीर, फुले दंपति, महात्मा गांधी, डॉ. राम मनोहर लोहिया और डॉ. बी.आर. आंबेडकर जैसे विचारकों से गहराई से प्रभावित था। इन सभी ने जाति-व्यवस्था और उसके विनाश पर गंभीर विमर्श किया, जिसका प्रभाव कर्पूरी ठाकुर के राजनीतिक जीवन में दिखाई देता है।

जननायक कर्पूरी ठाकुर (24 जनवरी, 1924 – 17 फरवरी, 1988)

इस वर्ष भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर को उनके 102वें जन्मदिवस पर हम सब स्मरण कर रहे हैं। आज वे उत्तर भारत में डॉ. राम मनोहर लोहिया के बाद सामाजिक न्याय के दूसरे सबसे बड़े नेता के रूप में स्थापित हो चुके हैं। उनका प्रभाव अब बिहार की राजनीति तक सीमित न रहकर अन्य राज्यों में भी तेज़ी से विस्तार करता दिखाई देता है। लगभग चार दशकों तक वे बिहार की राजनीति के केंद्र में बने रहे। कर्पूरी ठाकुर की राजनीति का मूल उद्देश्य जाति और वर्ग से जुड़े सवालों पर सामाजिक चेतना विकसित करना और वंचित समुदायों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना था, जिसमें उन्हें कई स्तरों पर उल्लेखनीय सफलता मिली। चाहे दलित समुदायों की सुरक्षा के लिए विशेष पुलिस थानों की स्थापना हो, पुलिस उड़नदस्ता बनाकर उस दौर के चोरों, गुंडों और बदमाशों पर कठोर कार्रवाई करना हो, या फिर पिछड़े, अतिपिछड़े और महिलाओं के प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण लागू करना हो। उन्होंने हर स्तर पर सामाजिक सुरक्षा को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया।

शायद उनकी यह सोच रही हो कि जब तक समाज के सबसे कमजोर वर्ग सुरक्षित नहीं होंगे, तब तक लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं रह जाता। यही कारण है कि जनता उन्हें आज भी ‘जननायक’ के रूप में याद करती है।

कर्पूरी ठाकुर का जीवन अपने आप में एक असाधारण कहानी है। एक ऐसे व्यक्ति की यात्रा, जो समाज के हाशिये से उठकर एक व्यापक सामाजिक आंदोलन का चेहरा बना और जिसका दृष्टिकोण आज पुनः एक वैचारिक आंदोलन का रूप ले रहा है। अतिपिछड़े वर्ग की नाई जाति में जन्मे कर्पूरी ठाकुर पहली विधान सभा चुनाव में ही ताजपुर विधानसभा से निर्वाचित होकर विधानसभा पहुंचे। वर्ष 1967 में वे बिहार के उपमुख्यमंत्री बने और महज़ तीन वर्ष बाद मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे। मुख्यमंत्री के रूप में, 1 जून, 1971 को उन्होंने बीस सदस्यीय समिति का गठन किया, जिसका उद्देश्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था करना था। लेकिन दुखद यह कि अगले ही दिन, 2 जून, 1971 को उनकी सरकार गिर गई। इसके बाद भोला पासवान शास्त्री मुख्यमंत्री बने और इस समिति को निरस्त कर मुंगेरी लाल की अध्यक्षता में एक नई समिति का गठन किया गया। छह वर्ष बाद कर्पूरी ठाकुर पुनः बिहार के मुख्यमंत्री बने और 10 नवंबर, 1978 को उन्होंने पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण नीति को दो उपवर्गों में विभाजित कर लागू किया।

उनका यह निर्णय आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय की दिशा में सबसे साहसिक और ऐतिहासिक कदमों में से एक माना जाता है। यह फैसला जितना निर्णायक था, उतना ही विवादास्पद भी था, जिसके कारण अगड़ी जातियों के लोगों ने तीव्र विरोध किया, लेकिन इसके बावजूद वे अडिग रहे और लाखों पिछड़े और अत्यंत पिछड़े वर्गों के लिए सम्मान, अवसर और हिस्सेदारी के नए द्वार खोल दिए। इस निर्णय का एक बड़ा असर यह रहा कि इसके चलते इसके बाद कर्पूरी ठाकुर सत्ता से लगभग स्थायी रूप से दूर हो गए। उनके राजनीतिक जीवन के अगले दस वर्ष उथल-पुथल और नेपथ्य में संघर्ष से भरे रहे। हालांकि, एक विचारक के रूप में यह समय अत्यंत महत्वपूर्ण था, जब वे विभिन्न सेमिनारों और विमर्शों के माध्यम से वंचित वर्गों के उत्थान और बिहार के संरचनात्मक पिछड़ेपन को दूर करने से जुड़े अपने विचार सामने रखते रहे। उनके जीवन के अंतिम वर्षों पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई है। इसके संभावित कारणों में एक उनकी जातिगत पृष्ठभूमि और दूसरा उनके विचारों का लिखित रूप में उपलब्ध न होना माना जा सकता है। इसके बावजूद, उनके विचार आज भी उनके निर्णयों, संघर्षों और सामाजिक न्याय के प्रति उनकी अडिग प्रतिबद्धता के माध्यम से जीवित हैं।

अब मैं पुनः ‘मनहीन, तनहीन और धनहीन’ की ओर लौटता हूं। पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में एक स्पष्ट बदलाव आया है जिसके केंद्र में अतिपिछड़ी जातियां हैं, जिन्हें लंबे समय तक संख्यात्मक रूप से बड़ी जातियों की तुलना में राजनीतिक रूप से नज़रअंदाज़ किया गया है। यह वर्ग कारीगर, बुनकर, श्रमिक, मछली पालन, नृत्य-गायन और बागवानी जैसी सेवाओं से जुड़ी जातियों का व्यापक समूह है, जिनका भूमि स्वामित्व न्यूनतम है और जिनकी समस्याएं अन्य सामाजिक समूहों से भिन्न हैं। ये सभी जातियां मुख्यतः व्यक्तिगत या सामुदायिक सेवाएं प्रदान करने वाली हैं और प्रायः न्यूनतम भूमि स्वामित्व तक सीमित हैं। यही कारण है कि इनकी समस्याएं अन्य सामाजिक समूहों से भिन्न और कहीं अधिक संरचनात्मक हैं। अब ये जाति-समूह अपने प्रश्नों को लेकर खुलकर सामने ला रहे हैं और बदलते सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में जाति की भूमिका तथा नए राजनीतिक सवालों को जन्म दे रहे हैं। इनकी प्रमुख मांगें सामाजिक सुरक्षा, आरक्षण के भीतर उपवर्गीकरण और पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी हुई हैं।

गौरतलब है कि इन समुदायों को अपने मुद्दों पर इस तरह मुखर होने में लगभग पांच दशकों से अधिक का समय लग गया जबकि कर्पूरी ठाकुर ने इन्हीं सवालों को आज से लगभग 46 वर्ष पहले ही पहचान लिया था और समाधान के रूप में उपाय भी लागू कर दिए थे। कर्पूरी ठाकुर जिन वर्गों को ‘मनहीन, तनहीन और धनहीन’ कहकर संबोधित करते थे, शायद वे जानते थे कि इन वर्गों की पहली और सबसे बड़ी समस्या उनकी ‘मनहीनता’ है। अर्थात् आत्मविश्वास और सामाजिक चेतना का अभाव है, जिसके कारण वे अपनी मनोदशा को खुलकर अभिव्यक्त नहीं कर पाते। दूसरी ओर, वे शारीरिक रूप से भी अपेक्षाकृत कमज़ोर हैं और तीसरी बात यह कि वे आर्थिक रूप से अत्यंत पिछड़े हुए हैं। यही वजह है कि वे अपने अधिकारों और हक़ की मांग उस तीव्रता और दबाव के साथ नहीं रख पाते, जैसी क्षमता समाज के अन्य सशक्त वर्गों में दिखाई देती है। कर्पूरी ठाकुर ने अपने कार्यकाल में इन वर्गों को तीनों स्तरों पर सशक्त करने के उद्देश्य से आरक्षण में उपवर्गीकरण और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े ठोस उपाय किए। वे अपने समय से आगे इन समुदायों के बारे में इसलिए सोच पाए, क्योंकि वे स्वयं अतिपिछड़े वर्ग से आते थे और इस यथार्थ को जीवन के स्तर पर समझते थे।

आज परिस्थितियां बदल रही हैं। अब ये समुदाय राष्ट्रीय स्तर पर अपनी समस्याओं और उनके समाधान को लेकर मुखर हो रहे हैं। सामाजिक सुरक्षा और आरक्षण के भीतर उपवर्गीकरण के प्रश्न पर इनका संघर्ष तेज़ हो रहा है। कर्पूरी ठाकुर के 102वें जन्मदिवस के अवसर पर यह आवश्यक है कि सरकार उनकी विरासत को आगे बढ़ाते हुए अतिपिछड़ों की सुरक्षा, भागीदारी, शिक्षा और आर्थिकी से जुड़ी ठोस नीतियां अपनाए, ताकि ‘मनहीन, तनहीन और धनहीन’ वर्गों की लोकतंत्र में वास्तविक बहाली संभव हो सके।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

पंकज कुमार

पंकज कुमार जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली के पीएचडी शोधार्थी व 'जननायक कर्पूरी ठाकुर एक समाजशास्त्रीय अध्ययन की प्रस्तावना' किताब के लेखक हैं। उनके शोध का विषय 'ग्लोबलाइजेशन ऑफ कास्ट एंड डेमोक्रेसी' है।

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