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झारखंड : पेसा कानून शीघ्र लागू होने की उम्मीद, लेकिन सवाल शेष

यह बात भी हमें ध्यान में रखना चाहिए कि मूल पेसा कानून के दायरे में ही सरकार नियमावली बना सकेगी। यदि कानून की नियमावली में कोई कमी होगी तो उसे सुधारना बहुत मुश्किल होगा। अभी तो उत्साह का वातावरण है और यह बना भी रहना चाहिए, लेकिन बहुत सारे सवाल अनुत्तरित हैं और उनका जवाब आंदोलनकारियों को ढूंढ़ना होगा। पढ़ें, विनोद कुमार का यह आलेख

झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार ने अपने पिछले कैबिनेट की बैठक में पंचायत उपबंध – अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार नियमावली, 2025 – के गठन की स्वीकृति दे दी है। इस कानून को संक्षेप में पेसा कानून कहा जाता है और अब बस इसकी अधिसूचना गजट में की जानी है। इसकी एक प्रक्रिया है और उसमें थोड़ा वक्त लग सकता है, लेकिन हम मान कर चलें कि यह दशकों से लंबित मांग आखिरकार हेमंत सरकार ने पूरी कर दी है। यह केंद्रीय कानून 1996 में ही बना था। उस वक्त केंद्र में कांग्रेस का शासन था। दूसरे अन्य राज्य, जहां संविधान की पांचवीं अनुसूची से अधिसूचित अनुसूचित क्षेत्र हैं, में यह लागू हो भी चुका था, लेकिन झारखंड में यह अब तक लागू नहीं हो सका था और इसके लिए हेमंत के नेतृत्व वाली ‘अबुआ सरकार’ की बहुत आलोचना भी हो रही थी।

लेकिन विभिन्न सामाजिक संगठनों से बातचीत व विमर्श में तो समय लगता ही है और पिछले कुछ महीनों से यह प्रक्रिया जारी थी। और आखिरकार इस कानून की नियमावली को अंतिम रूप देने में सरकार को सफलता मिली। इसलिए हम कह सकते हैं कि यह कानून सच्चे अर्थों में जमीन पर लागू होगा और सरकार देर मगर दुरुस्त आयी। झारखंड के 24 जिलों में 15 जिले पूर्णतः या आंशिक रूप से अनुसूचित क्षेत्र में आते हैं, जिसके तहत 16022 गांव और करीबन 3 हजार पंचायतें आती हैं। इस कानून के लागू होने से ग्राम सभाएं सशक्त होंगी और जल, जंगल, जमीन जैसे अपने परंपरागत संसाधनों को बचाने के लिए अधिक सचेष्ट होंगी।

मुझे याद है कि जब 1996 में यह कानून बना था, उस समय समाजकर्मी बी.डी. शर्मा सक्रिय थे। उस वक्त विभिन्न गांवों में इस कानून के विभिन्न प्रावधानों और नियमों को बड़े-बड़े चट्टानों पर उकेर कर आदिवासी गांवों के केंद्र, अखड़ा, में और अन्य प्रमुख स्थानों पर पत्थलगड़ी की गई थी। उस समय सभी को लगता था कि पेसा कानून अब लागू हो गया और जिन गांवों में परंपरागत ग्राम सभाएं मौजूद थीं, वहां इस कानून से मिलने वाली शक्तियों का उपयोग भी होने लगा था। वे बड़े उत्साह भरे दिन थे।

लेकिन झारखंड अलग राज्य के गठन के बाद और उसके भाजपा के गिरफ्त में जाने के बाद यह कानून अपनी अर्थवत्ता खोने लगा। बाबूलाल और उसके बाद अर्जुन मुंडा के जमाने में इस कानून को पूरी तरह नजरअंदाज कर औद्योगिक घरानों या कहिए कारपोरेट से सैकड़ों एमओयू किए गए। टाटा की जमींदारी का नवीकरण किया गया। ग्राम सभा की सहमति की जरा भी जरूरत नहीं समझी गई या फिर फर्जी ग्राम सभा बना कर उनसे सहमति लेने की प्रक्रिया पूरी की गई। रघुवर दास के जमाने में राज्य सरकार ने लैंड बैंक बना कर सार्वजनिक उपयोग की तमाम जमीनों को उसमें डाल दिया गया और इसका प्रतिरोध करते आदिवासियों ने पत्थलगड़ी आंदोलन शुरू किया तो ‘पत्थलगड़ी’ को ही राष्ट्रद्रोह की संज्ञा देकर हजारों आदिवासियों पर खूंटी क्षेत्र में देशद्रोह का मुकदमा दायर कर दिया गया। उस वक्त बीस लोगों को अर्बन नक्सल करार दिया गया, जिसमें स्टेन स्वामी, आलोका कुजूर, वाल्टर कंडुलना सहित मुझ पर भी देशद्रोह का मुकदमा दायर कर दिया गया था।

हेमंत सोरेन, मुख्यमंत्री, झारखंड

यह तो लगातार प्रतिरोध और आंदोलन के बाद 2019 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद हेमंत सोरेन के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनी और उसने अपनी पहली ही कैबिनेट बैठक में देशद्रोह के उन तमाम मुकदमों को उठा लेने का निर्णय लिया।

जहिर तौर पर पेसा कानून के बन जाने के बाद अब पत्थलगड़ी को कोई देशद्रोह कहने की धृष्टता नहीं करेगा। पत्थरों पर इस कानून की विभिन्न धाराओं को उकेर कर या लिख कर कही लगाना अपराध नहीं होगा। परंपरागत रूढ़ियों का पालन आदिवासी समाज धार्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में कर सकेगा। लघु वनोत्पाद, खनिज संपदा, जल प्रबंधन, ग्रामीण इलाकों में मद्य निषेध, छोटे-मोटे अपराधों का निष्पादन ग्राम सभाएं कर सकेंगी। लेकिन सब कुछ निर्भर इस बात पर करेगा कि ग्राम सभाएं ग्रामीण इलाकों में कितनी सशक्त, सचेष्ट और सक्रिय होंगी। यह बात भी हमें ध्यान में रखना चाहिए कि मूल पेसा कानून के दायरे में ही सरकार नियमावली बना सकेगी। यदि कानून की नियमावली में कोई कमी होगी तो उसे सुधारना बहुत मुश्किल होगा। अभी तो उत्साह का वातावरण है और यह बना भी रहना चाहिए, लेकिन बहुत सारे सवाल अनुत्तरित हैं और उनका जवाब आंदोलनकारियों को ढूंढ़ना होगा।

मसलन, पेसा कानून के लागू होने के बावजूद छत्तीसगढ़ में अंबानी के कोयला खनन के लिए हसदेव के जंगल को बेरहमी से काटा जा रहा है। इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पर्वतमाला के संदर्भ में हाल में यह शर्मनाक फैसला दे दिया है कि 100 मीटर से उपर के पहांड़ ही पहाड़ की श्रेणी में आएंगे। जाहिर है कि 100 मीटर से नीचे की पहाड़ी क्षेत्र में उत्खनन हो सकता है।

हमारे गांव की सीमा के भीतर के जंगल को सेंचुरी या अभयारण्य बनने से ग्राम सभाएं रोक पायेंगी? क्या ग्रामीण विकास की योजनाएं ग्राम सभाएं बना पाएंगी, या सिर्फ सरकार और ब्यूरोक्रेसी द्वारा बनाई गई योजनाओं के लिए ग्राम सभाओं की स्वीकृति लेना अनिवार्य है? क्या किसी भी योजना के लिए ग्रामसभा की सहमति तो अनिवार्य बताया गया है? लेकिन यह स्पष्ट नहीं कि ग्रामसभाओं को किसी योजना को अस्वीकृत करने का अधिकार होगा या नहीं।

यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि केंद्र सरकार ने बहुत सारे क्षेत्रों को पेसा कानून के दायरे से कानून बना कर बाहर कर रखा है। कोयला के उत्खनन, नेशनल हाईवे, रेलवे लाईन, राष्ट्रीय हित के कल कारखाने, आयुध कारखाने आदि के लिए ग्रामसभाओं की सहमति अनवार्य नहीं। राष्ट्रीय पार्क, बाघ व हाथियों के लिए अभयारण्य आदि कहां बनेगा, यह केंद्र सरकार के अलग-अलग संस्थाएं तय करती हैं। और वे जो निर्णय लेंगी, वे राज्य सरकारों के लिए बाध्यकारी होंगी। अभी सरकार ने मेट्रो परियोजना लाने की बात कही है। खुद राज्य सरकार का यह प्रस्ताव है। महानगरों और उपनगरों को जोड़ने में मेट्रो कारगर हो सकता है, लेकिन रांची जैसे छोटे से शहर के लिए यह कितना जरूरी और प्राथमिक कार्य है? क्या ग्रामसभाएं इस मामले में विचार करने का भी अधिकार रखती हैं?

झारखंड में अभी भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास का वह संशोधित कानून लागू है, जिसमें उद्योग-धंधों के लिए सामाजिक आकलन और ग्राम सभाओं की सहमति अनिवार्य नहीं। सबों को याद होगा कि मोदी सरकार ने कांग्रेस सरकार द्वारा लागू कानून में संशोधन किया था। लेकिन उसके खिलाफ देशव्यापी आंदोलन हुआ और सरकार ने उन संशोधनों को वापस ले लिया, लेकिन राज्यों को यह छूट दे दी गई कि वे चाहें तो उस संशोधित कानून को अपने राज्य में लागू कर दें। इसका उपयोग भाजपा शासित राज्यों ने किया।

झारखंड में भी भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास का मोदी सरकार द्वारा संशोधित वही कानून रघुवर दास की सरकार ने लागू कर दिया था। हेमंत सरकार ने अब तक उस कानून को निरस्त कर कांग्रेस के जमाने में बने भरसक बेहतर कानून को लागू नहीं किया है।

ये कुछ अनुत्तरित सवाल हैं, जिसका जवाब तो आने वाला वक्त ही देगा। अभी तो सभी उत्साहित हैं और इस बात की क्रेडिट लेने की होड़ में हैं कि किसने पेसा कानून को जमीन पर लागू करवाने में महती भूमिका निभाई है। हम उम्मीद करें कि इस उत्साह के वातावरण का सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और नए अधिकारों के आलोक में जल, जंगल, जमीन व पर्यावरण को बचाने की लड़ाई तीव्र होगी।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विनोद कुमार

झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता विनोद कुमार का जुड़ाव ‘प्रभात खबर’ से रहा। बाद में वे रांची से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘देशज स्वर’ के संपादक रहे। पत्रकारिता के साथ उन्होंने कहानियों व उपन्यासों की रचना भी की है। ‘समर शेष है’ और ‘मिशन झारखंड’ उनके प्रकाशित उपन्यास हैं।

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