h n

द्विशताब्दी जयंती वर्ष के आगाज के मौके पर महाराष्ट्र में ‘घर-घर फुले’ अभियान

कपिल पाटिल ने बताया कि महात्मा फुले के कारण आज बेटियां शिक्षित हो पा रही हैं। इस भावना को ध्यान में रखते हुए फुले जयंती को घर-घर उत्सव के रूप में मनाने की अपील की गई है। घरों के द्वार पर फूलों की मालाएं सजाई जाएं, मित्रों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों को फूल देकर आनंद साझा किया जाए। पढ़ें, यह खबर

आगामी 11 अप्रैल को जोतीराव फुले की द्विशताब्दी जयंती वर्ष का आगाज हो रहा है। इसे लेकर महाराष्ट्र में ‘घर-घर फुले’ अभियान चलाया जाएगा। इस आशय की जानकारी महाराष्ट्र विधान परिषद के पूर्व सदस्य व समाजवादी नेता कपिल पाटिल ने दी। उन्होंने कहा कि इस ऐतिहासिक अवसर को पूरे देश में उत्सव के रूप में मनाने की अपील ‘राष्ट्र पितामह महात्मा जोतीराव फुले जन्म द्विशताब्दी महोत्सव समिति’ की ओर से की गई है। इसके लिए महोत्सव समिति का गठन किया गया है, जिसका नेतृत्व कपिल पाटिल स्वयं व वरिष्ठ नाटककार व पत्रकार ज्ञानेश महाराव करेंगे।

कपिल पाटिल ने कहा कि महात्मा जोतीराव फुले ने सामाजिक न्याय, स्त्री शिक्षा, किसान अधिकार और समानता की सुदृढ़ नींव रखी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उन्हें ‘महात्माओं के महात्मा’ कहा, जबकि भारतरत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने अपने तीन गुरुओं में बुद्ध और कबीर के पश्चात फुले को स्थान दिया। राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज ने सत्यशोधक आंदोलन को समर्थन देकर उनके कार्य को और सशक्त बनाया। महात्मा फुले ने पहली शिवजयंती की शुरुआत की, विधवा ब्राह्मण महिलाओं के केशवपन के विरोध में संघर्ष किया, अस्पृश्यों के लिए पानी के स्रोत खोल दिए, तथा ‘शेतकऱ्यांचा आसूड’ और ‘गुलामगिरी’ जैसे ग्रंथों के माध्यम से सामाजिक अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई। स्त्री शिक्षा का मार्ग प्रशस्त कर उन्होंने आधुनिक भारत की नींव रखी।

कपिल पाटिल ने कहा कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत ने राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की, इसलिए वे राष्ट्रपिता कहलाते हैं। उसी प्रकार सामाजिक स्वतंत्रता के संघर्ष का प्रारंभ महात्मा फुले ने किया, इसलिए वे राष्ट्र पितामह हैं।

कपिल पाटिल ने बताया कि महात्मा फुले के कारण आज बेटियां शिक्षित हो पा रही हैं। इस भावना को ध्यान में रखते हुए फुले जयंती को घर-घर उत्सव के रूप में मनाने की अपील की गई है। घरों के द्वार पर फूलों की मालाएं सजाई जाएं, मित्रों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों को फूल देकर आनंद साझा किया जाए, तथा इसके माध्यम से समाज में प्रेम, बंधुत्व और समानता का संदेश फैलाया जाए।

कपिल पाटिल, पूर्व सदस्य, महाराष्ट्र विधान परिषद

उन्होंने कहा कि मकर संक्रांति पर तिल व गुड़ और दशहरे पर आप्टे के पत्ते बांटने की परंपरा की तरह, फुले जयंती के अवसर पर फूल बांटने की परंपरा स्थापित करने का संकल्प हाल ही में फुले विचारधारा से जुड़े सामाजिक संगठनों की बैठक में लिया गया था। उन्होंने कहा कि महात्मा फुले के विचारों के अनुरूप राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले व्यक्तियों एवं संस्थाओं को सम्मानित करने की योजना भी समिति द्वारा तैयार की गई है। इस संबंध में सुझाव आमंत्रित किए गए हैं।

इसके अलावा पूरे वर्ष विविध कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा, जिनमें व्याख्यानमाला, लेखन प्रतियोगिताएं, पुस्तिका प्रकाशन, सांस्कृतिक कार्यक्रम, नाट्य प्रस्तुतियां तथा विभिन्न समाजोपयोगी उपक्रम शामिल होंगे। समाज के सभी घटकों से इन कार्यक्रमों में सक्रिय सहभागिता की अपील की गई है।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

एफपी डेस्‍क

संबंधित आलेख

बिहार में मंडलवादी राजनीति के अस्तित्व पर सवाल
मंडल राजनीति का मूल उद्देश्य केवल सत्ता में भागीदारी नहीं था, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संरचना में बुनियादी बदलाव लाना था। यह केवल जातीय...
लखनऊ में समता अधिकार सम्मेलन में जुटे बहुजन आंदोलन के प्रतिनिधि
वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि इस सरकार में सबसे बड़ा हमला बहुजन समाज की नई पीढ़ी पर...
राजा राममोहन राय नहीं, फुले थे नवजागरण के अग्रदूत
राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, रानाडे, भंडारकर, आगरकर आदि के कार्य उतना सामाजिक परिवर्तन के लिए वांछित नहीं थे, जितना महात्मा फुले के कार्य।...
रूपम मिश्रा की कविता को लेकर विवाद की परतें
इस मामले के दो सिरे हैं। पहला सिरा सीपीआईएमएल से जुड़ा है। सीपीआईएमएल के इलाहाबाद क्षेत्र में रामजी राय और कमल उसरी का अपना-अपना...
मुस्लिम नेतृत्व की तीसरी पीढ़ी : उम्मीदें और विडंबनाएं
1980 के दशक में हिंदू पिछड़ों की राजनीतिक उभार भी नई परिघटना थी, इसलिए उसके अधिकतर नेता भी नई पीढ़ी के थे। लेकिन हिंदुओं...