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गए थे जोतीराव को मारने, बन गए महान सत्यशोधक पंडित धोंडीराम नामदेव कुंभार

संस्कृत तथा धर्म-शास्त्रों में प्रवीण होने के बावजूद धोंडीराम अपने सत्यशोधक होने के लक्ष्य से भटके नहीं थे। सन् 1896 में उनकी एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी, जिसका शीर्षक उन्होंने ‘वेदाचार’ रखा था। उनकी यह किताब जोतीराव फुले की पुस्तक ‘गुलामगिरी’ से प्रेरित, उसी की तरह संवाद-शैली में थी। पढ़ें, ओमप्रकाश कश्यप का यह आलेख

अंगुलिमाल, वाल्मीकि, कालिदास के हृदय परिवर्तन की घटनाएं मिथ हैं या इतिहास, इसका दावा करना मुश्किल है। लेकिन धोंडीराम नामदेव कुंभार तथा धोंडीबा रोडे की कहानी हमारे करीबी इतिहास का हिस्सा है। कहानी महाराष्ट्र के पुणे से आरंभ होती है। महामना जोतीराव फुले और सावित्रीबाई अछूत कहे जाने वाले बच्चों के लिए स्कूल चलाते थे, पुरोहितवाद का विरोध करते थे, इस कारण ब्राह्मण उनसे चिढ़ते थे। जोतीराव के प्रति दुर्भावना के साथ उन्होंने दो युवाओं को तैयार किया। उन्हें भड़काया। यह कहकर बरगलाया कि जोतीराव धर्म और संस्कृति को नुकसान पहुंचा रहे हैं। ऐसे लोगों को दंड देना भी ईश्वर की सेवा है। बेचारे अनपढ़-गंवार लोग सदियों से आंख मूंदकर हुक्म बजाते आए थे। व्यवस्था से इतने अनुकूलित थे कि स्वतंत्र दिमाग से सोचना भी भूल चुके थे। ब्राह्मणों के उकसावे पर वे रात के अंधेरे में हथियार लिये जोतीराव के घर में जा घुसे। आहट सुनकर जोतीराव की नींद उचट गई। आंखें खोलीं तो दीपक की धुंधली रोशनी में दो छायाएं नजर आईं–

‘कौन… कौन हो तुम?’ जोतीराव ने दीपक की लौ तेज की। आवाज सुनकर सावित्रीबाई भी जाग गईं। दोनों हैरान थे।

‘हम तुम्हें खत्म करने आए हैं।’ उनमें से एक ने कहा।

‘हमें तुम्हें मौत के घाट उतारने के लिए भेजा गया है।’ दूसरा बोला।

‘किसलिए? मैंने तुम्हारा क्या बुरा किया है, जो तुम दूसरे के कहने पर मारने चले आए?’ जोतीराव ने बिना विचलित हुए धैर्य के साथ पूछा। दोनों घुसपैठिए चुप रहे। कहने को उनके पास कुछ था ही नहीं। उन्हें मौन देख जोतीराव ने ऊंचे स्वर में पूछा–

‘क्या मैंने तुम्हारे या तुम्हारे किसी प्रियजन के साथ अन्याय किया है?’

‘कहा न, हम कुछ लोगों को कहने पर आए हैं।’ जवाब मिला। रात्रि का तीसरा पहर, नीरव सन्नाटा, मद्धिम रोशनी, विषम स्थिति में भी जोतीराव के होठों के बीच मुस्कान झलक उठी।

‘इससे तुम्हें कुछ लाभ होगा?’ अपना जीवन लोककल्याण को समर्पित कर चुके महामना ने शांत स्वर में पूछा। दोनों अनुभवहीन युवा थे। थे तो जोतीराव भी युवा ही…अठाइस वर्ष के, लेकिन बीते सात-आठ वर्षों में उन्होंने जो कार्य किए थे, उससे उनका व्यक्तित्व बरगद जैसा विशाल रूप ले चुका था। ऐसे व्यक्तित्व के आगे चुप रहने की हिम्मत कहां से लाते।

‘हमें एक-एक हज़ार रुपए देने का वादा किया गया है।’ एक ने बताया।

‘फिर ठीक है। तुम्हें मेरी मौत से लाभ होना है तो मेरा शरीर तुम्हारे सामने है! मेरे लिए तो गर्व की बात है कि जिन शूद्रों तथा अतिशूद्रों की भलाई के लिए मैंने अपना जीवन समर्पित किया है और जिनकी सेवा करने में मुझे आनंद आता है, अंततः मैं उन्हीं के काम आ रहा हूं। मैं बैठा हूं, तुम जल्दी से अपना काम पूरा करके यहां से निकल जाओ।’

उस समय जोतीराव के चेहरे पर शांति थी, तेज था। उनका आत्मविश्वास सघन था। सावित्री हाथों में धारदार हथियार से लैस और जोतीराव की हत्या का संकल्प लेकर आए दोनों युवकों को देख रहीं थीं। दूसरी कोई औरत होती तो घबरा जाती। लेकिन वे पति के हौसले और विश्वास पर विश्वास करती थीं। समझती थीं कि बलिष्ठ शरीर वाले जोतीराव मन से और भी ज्यादा मजबूत हैं। पति-पत्नी दोनों को निडर-अविचल देख अपराधियों के पैर कांपने लगे। उनका अंतर्मन उन्हें कचोटने लगा। जो महामना अपनी मृत्यु से भी दूसरों का भला करना चाहता है, उसका जीवन गरीबों के लिए कितना कीमती होगा, सोचते-सोचते दोनों जोतीराव के पैरों पर गिर पड़े और बोले–

‘हमसे चूक हुई… हमें माफ करें। अनुमति दें कि हम आपके दुश्मनों को मौत के घाट उतार दें।’

जोतीराव सच्चे महामानव थे, उदार और परोपकारी। कभी किसी का बुरा न चाहने वाले। उन्होंने कहा– ‘मेरे मन में किसी के प्रति कोई दुर्भावना नहीं है। न मैं किसी से बदला लेना चाहता हूं। जिन्होंने तुम्हें यह काम सौंपा था वे नासमझ हैं… वे नहीं जानते कि क्या करने जा रहे थे। उन्हें जीने दो! क्षमा कर दो उन्हें।’[1]

यह 1856 की घटना है। जोतीराव की हत्या का इरादा लेकर आने वाले युवकों में एक का नाम था– धोंडीबा रोडे और दूसरे थे धोंडीराम नामदेव कुंभार। धोंडीबा रोडे आपराधिक कही जाने वाली जाति रामोशी से आते थे। धोंडीराम कुंभार को कम उम्र में ही अपराधों की दुनिया में धकेल दिया गया था।[2] उस रात तीन व्यक्तियों को नवजीवन मिला था। एक जोतीराव फुले को जिन्हें मारने के लिए ब्राह्मणों ने दो हत्यारों को भेजा था; तथा धोंडीराम कुंभार और धोंडीबा रोडे को जिनके आपराधिक जीवन ने उस रात अंतिम सांस ली थी।

धोंडीराम कुंभार जोतीराव के व्यक्तित्व से अभिभूत थे। उन्होंने जो किया उसके लिए प्रायश्चित की तीव्र भावना उनके मन में थी। अचानक उन्हें ख्याल आया कि जोतीराव के जीवन को खतरा है। जिन ब्राह्मणों ने उन्हें हत्यारा बनाकर भेजा था, वे किसी और को भी तैयार कर सकते हैं। दोनों जोतीराव की सुरक्षा का संकल्प लेकर उनके अंगरक्षक बन गए। जोतीराव किसानों और मजदूरों के लिए रात्रि-पाठशाला चलाते थे। उनके आग्रह पर दोनों उनकी रात्रिकालीन कक्षाओं में भी आने लगे। कुछ ही दिनों में वे उनके प्रमुख शिष्यों और वैचारिक उत्तराधिकारियों की सूची में शामिल हो गए। आगे चलकर धोंडीराम की लगन और सीखने की क्षमता देख जोतीराव ने उनसे संस्कृत का विशेष अध्ययन करने के लिए काशी जाने को कहा। धोंडीराम अपने मार्गदर्शक की सलाह मानकर काशी के लिए प्रस्थान कर गए।

यह एक किराये के अपराधी के महामानव बनने के सच्चे और प्रेरणादायी वृतांत का पहला हिस्सा है। अगला हिस्सा और भी प्रेरक एवं महाकाव्यीन गाथा है।

उपरोक्त घटना का जिक्र फुले के सभी प्रमुख जीवनी लेखकों ने किया है। दुख की बात है कि हमें न तो पंडित धोंडीराम नामदेव कुंभार के बारे में पर्याप्त जानकारी है, न ही धोंडिबा रोडे के बारे में। धोंडीराम कुंभार के बारे में कुछ जानकारी सत्यशोधक समाज के दस्तावेज, ‘दीनबंधु’ जैसे तत्कालीन अखबारों तथा उनकी पुस्तकों से प्राप्त होती है। तदनुसार उनका जन्म 1838 में, सतारा जिले के दहिवडि गांव में हुआ था। उनकी मृत्यु लगभग 66-67 वर्ष की अवस्था में 1905 में या उससे कुछ पहले हुई थी।[3] 1856 में जब वे जोतीराव पर हमला करने का संकल्प लेकर उनके घर में घुसे थे, उनकी उम्र करीब 18 वर्ष रही होगी। परिस्थितियों ने उन्हें अपराधी जीवन की ओर धकेल दिया था। वे कौन-सी परिस्थितियां थीं, हम नहीं जानते। लेकिन उन परिस्थितियों से निकलना और एक आदर्श सत्यशोधक बनना ही उनकी कहानी को विलक्षण बनाता है। कहावत है कि कुंदन-सा निखरने के लिए व्यक्ति को पहले तपना पड़ता है। धोंडीराम कुंभार भी तपे और खूब तपे। तप-साधना में धोंडिबा रोडे भी पीछे न थे। अपने परिवार के साथ वे भी सत्यशोधक समाज के प्रचार-प्रसार को समर्पित थे। जोतीराव से प्रेरणा लेकर धोंडिबा रोडे पहले उनके अंगरक्षक बने। फिर 24 सितंबर, 1873 को जब जोतीराव फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की तो धोंडिबा रोडे भी अपने बेटे तात्यासाहेब और बहू विद्यादेवी सावित्रीबाई रोडे के साथ मिलकर उसके प्रचार-प्रसार में जुट गए।

महानता आखिर महानता की ही खेती करती है।

स्वाध्याय के बल पर धोंडीराम कुंभार ने मराठी का ज्ञान प्राप्त किया। जोतीराव उनकी लगन देखकर प्रसन्न थे। उन्हीं के निर्देश पर धोंडीराम आगे के अध्ययन के लिए काशी गए। वहां पहुंचने के बाद संस्कृत सीखने, वेद-वेदांग सहित धर्मशास्त्रों में प्रवीणता हासिल करने के लिए उन्हें क्या करना पड़ा था, इसकी कोई जानकारी नहीं मिलती। यह भी पता नहीं चलता कि वह उदारमना विद्वान कौन था, जिसने उन्हें उनके शूद्र होने के बावजूद विभिन्न धर्मशास्त्रों की शिक्षा दी थी। हम यह भी नहीं जानते कि धोंडीराम के काशी प्रवास से लौटने के मात्र तीन दशक बाद, जिस धार्मिक नगरी ने संन्यासी वेश में होने के बावजूद, जेब खाली होने के कारण पेरियार को अपनी सड़कों पर भूखे पेट भटकने को मजबूर कर दिया था, वही काशी उनपर क्यों तथा कैसे मेहरबान हुई थी? बस कुछ अनुमान लगा सकते हैं।

उन्नीसवीं सदी के आरंभ में ब्राह्मण धर्म पर जबरदस्त दबाव था। कई सुधारवादी आंदोलन चल रहे थे। ब्राह्मणों के सामने एक ही विकल्प था– मिथ्या जातीय अभिमान को भुलाकर पूरे समाज को साथ लेकर चलें; अथवा अपनी खोखली अहमन्यता को बचाकर धार्मिक अल्पसंख्यक का जीवन जीने को विवश हों। सुख-सुविधाओं के जीवन के अभ्यस्त हो चुके ज्यादातर ब्राह्मणों के लिए पहले विकल्प को अपनाना अनैच्छिक और कष्टकारी विवशता थी। उसी दौर में प्रार्थना समाज और आर्य समाज जैसे कई सुधारवादी आंदोलन उभरे थे, जो जाति प्रथा का विरोध करते तथा वेदाध्ययन और वैदिक कर्मकांडों पर ब्राह्मणों के एकाधिकार को नकारते थे। हो सकता है धोंडीराम को ऐसी ही किसी उदारपंथी संस्था अथवा व्यक्ति का सान्निध्य मिला हो।

काशी प्रवास के दौरान धोंडीराम ने विलक्षण प्रतिभा का परिचय दिया था। धर्मशास्त्रों तथा धार्मिक अनुष्ठानों संबंधी उनके ज्ञान से सभी अचंभित थे। धीरे-धीरे उनके पांडित्य, संस्कृत तथा ब्राह्मण धर्मशास्त्रों के अनूठे ज्ञान तथा यज्ञादि अनुष्ठानों में उनकी दक्षता की कीर्ति चतुर्दिक फैलने लगी। कस्तूरी गंध से सुवासित बयार-सी उनकी ख्याति कुडलगी मठ शृंगेरी के ज्येष्ठ शंकराचार्य[4] (नारायण शास्त्री बालकृष्ण करंदीकर) तक पहुंची तो वे भी प्रभावित हुए बिना न रह सके। एक बार वे दक्षिणी महाराष्ट्र के सतारा जिले के गोंडविले गांव की यात्रा पर थे। तब उन्होंने धोंडीराम से मिलकर उनकी प्रतिभा को परखने का निश्चय किया। इसके लिए उन्होंने धोंडीराम के नाम पत्र लिखकर, उनसे जल्दी से जल्दी मिलने का आग्रह किया। तदनंतर 25 नवंबर, 1884 को दोनों के बीच संवाद हुआ। शंकराचार्य धोंडीराम के धर्मशास्त्र संबंधी ज्ञान तथा वैदिक अनुष्ठानों में निपुणता से अत्यंत प्रभावित थे। उन्होंने धोंडीराम को प्रशंसा पत्र दिया, जिसमें उनकी निर्दोष प्रशंसा के साथ-साथ ब्राह्मणों को सलाह दी गई थी कि उन्हें रोजमर्रा के अनुष्ठानों में धोंडीराम से परामर्श कर, उनका अनुसरण करना चाहिए। वे सही मायने में बुद्धिमत्ता का पर्याय, अथाह ज्ञान के स्रोत हैं। उनके आते ही वातावरण अनोखी दीप्ति तथा उल्लास से भर जाता है। वे सत्य का साक्षात स्वरूप हैं। शंकराचार्य का कहना था–

धोंडीराम का आदर करो और उनकी स्मृति को सहेजकर रखो; सत्य के इस साधक का मार्गदर्शन प्राप्त करने हेतु शीघ्रता करो! अपने जीवन का संचालन ठीक उसी प्रकार करो, जैसा धोंडीराम तुम्हें निर्देश देते हैं।[5]

इस निर्देश को शृंगेरी-कुडलगी के धर्माधिकारी द्वारा औपचारिक रूप से जारी कर, राजमुद्रा द्वारा विधिवत अनुशंसित किया गया। लेकिन सबकुछ इतना आसान नहीं था। रूढ़िवादी ब्राह्मण जो शंकराचार्य को अपना मार्गदर्शक तथा आदि शंकराचार्य का उत्तराधिकारी मानते थे, इस सलाह से उखड़ से गए। फैसले को चुनौती देते हुए उन्होंने शंकराचार्य से तुरंत एक सभा बुलाने का आग्रह किया। साथ में यह शर्त लगा दी कि उस सभा में 17 जातियों-वर्णों के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहने चाहिए। आखिरकार 2 दिसंबर, 1894 को 17 गैर-ब्राह्मण जातियों-वर्णों के प्रतिनिधि के तौर पर, कुडलगी (कुडाली, कूडली) मठ के ज्येष्ठ शंकराचार्य (नारायण शास्त्री बालकृष्ण करंदीकर) के आमंत्रण पर शृंगेरी आमंत्रित किया गया। निर्धारित समय पर धोंडीराम कुडलगी पहुंचे। वहां वेदज्ञ ब्राह्मणों का प्रतिनिधि मंडल उनके सामने था। सभा में सभी जातियों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया था। आमंत्रण में लिखा था कि सभा में पंडित धोंडीराम नामदेव जी विभिन्न जातियों-वर्णों के गुण-दोषों तथा उनसे मुक्ति के बारे में बताएंगे। सभा में मुसलमान एवं ब्राह्मणों सहित सभी जातियों-वर्णों के लोग शामिल थे। आयोजन माणदेश (मुख्यतः सतारा जिले का माण तालुका, खटाव तालुका और सांगली-सोलापुर का कुछ हिस्सा) के गोंदवले गांव में था।

शंकराचार्य की अध्यक्षता में आयोजित उस प्रतियोगिता में धोंडीराम ने ब्राह्मण अनुष्ठानों तथा तत्संबंधी दक्षता के मामले में अद्वितीय प्रतिभा का प्रदर्शन किया। वहां उनकी ब्राह्मण-पंडितों के धर्म-दर्शन से जुड़े धार्मिक संबंधी विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई। करीब पांच घंटों तक चलने वाली प्रतियोगिता के दौरान धोंडीराम नामदेव ने अपनी प्रतिभा तथा ज्ञान से शंकराचार्य को प्रभावित करने में सफल हुए। उन्होंने शास्त्रोक्त विधि से सभी अनुष्ठानों को सफलतापूर्वक सम्पन्न किया, जिससे उनके विरोधी पस्त हो गये। धोंडीराम की विद्वता की सराहना करते हुए शंकराचार्य ने उन्हें ताम्रपत्र के साथ ‘सरसुभा’ (मुख्य कार्यवाहक) की उपाधि से अलंकृत किया। उन्हें बैठक की अध्यक्षता सौंपी गई। गैर-ब्राह्मण द्वारा ब्राह्मण पीठ की अध्यक्षता करने की सम्भवतः वह पहली घटना थी। कार्यक्रम के समापन से पहले शंकराचार्य ने सत्यशोधक समाज के सिद्धांतों की प्रशंसा की थी। धोंडीराम के समकालीन सत्यशोधक कवि और लोकगायक भीमराव महामुनि ने इस अग्रणी सत्यशोधक की महानता का वर्णन इस प्रकार किया है–

पंडित धोंडीराम नामदेव कुम्हार, जिन्होंने शंकराचार्य को भी बौद्धिक स्पर्धा में सीधी चुनौती दी, शास्त्र-सम्मत आधार पर उन्होंने विद्वत्तापूर्ण शास्त्रार्थ में भाग लिया। अपनी प्रतिभा के बल पर उन्होंने जीत हासिल कर, प्रमाणपत्र प्राप्त किया। आधिकारिक प्रशस्तिपत्र भी लिया और ‘सरसुभा’ के पद तक पहुंचे।[6]

फुले साहित्य की अध्येता डॉ. श्रद्धा कुंभोजकर के अनुसार धोंडीराम ने सभा में सत्यशोधक लोगों के अपने खुद के धार्मिक अनुष्ठान स्वयं संपन्न करने का आह्वान किया था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि नए अनुभवों, जरूरतों तथा ज्ञान-विज्ञान के आधार पर पुरानी प्रथाओं, परंपराओं तथा रीति-रिवाजों की पड़ताल होती रहनी चाहिए। शंकराचार्य से भेंट के बाद से ही विरोध करते आ रहे ब्राह्मण भटों को सीधे संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था– “यह हंगामा किसलिए है, बताओ? आखिर आप किस भगवान और मूर्तियों की बात कर रहे हैं? यदि तुम्हारे भीतर शाप देने की शक्ति है, तो हे धर्म भक्षको, संकोच मत करो। कभी रहे होंगे चारों वर्णों में श्रेष्ठ, आज सभी ब्राह्मण भ्रष्ट हो चुके हैं।”

दूरदर्शन द्वारा प्रसारित धारावाहिक ‘भारत एक खोज’ के एक दृश्य में जोतीराव फुले, सावित्रीबाई फुले और जोतीराव की हत्या करने आए धोंडीराम नामदेव कुंभार व धोंडीबा रोडे की भूमिका निभाते कलाकार

सभा में महार प्रतिनिधि ने पूछा था– “हमारी जाति की दुर्दशा क्यों हुई? इसमें सुधार के लिए हमें क्या करना चाहिए?” धोंडीराम ने कहा था– “ब्राह्मणों ने हमसे धर्मशास्त्र छुपाए। और धर्म के नाम पर मनमाने कर्मकांड थोपते चले गये। अंग्रेजों के आने के बाद जब हमें हकीकत पता चली तब हमनें उनके चंगुल से बाहर निकलना शुरू किया। हमारी दुर्व्यवस्था के लिए ब्राह्मण ही जिम्मेदार हैं।”

सभा में आए एक ब्राह्मण ने पूछा था, “जो जिसका काम है, वह उसी को शोभा देता है। फिर आप लोग अपने धार्मिक कर्मकांड खुद क्यों करने लगे?” इसका उत्तर अंदूजी पोल पाटील नामक सत्यशोधक ने दिया– “इसलिए कि धर्मसत्ता तथा राजसत्ता दोनों पर ब्राह्मणों का अधिकार था। दोनों ही तरफ से हमारा शोषण होता था। अतएव सत्यशोधक समाज के नियमों और पंडित धोंडीराम के उपदेश के अनुसार हम अपने अनुष्ठान स्वयं करने लगे।” इस बीच किसी ने ब्राह्मणों से चुनौती-भरे स्वर में कहा– “यदि आप स्वयं को असली ब्राह्मण मानते हैं तो शास्त्रोक्त विधि के अनुसार स्नान, संध्या-वंदन, नैमित्तिक कर्म आदि करके दिखाइए।”

ब्राह्मणों को मानो सांप सूंघ गया। खीझ से बचने के लिए वे सभा का बहिष्कार करके वहां से प्रस्थान कर गए। उसके बाद सभा-स्थल पर धोंडीराम तथा सत्यशोधक समाज की जय के नारे गूंजने लगे। उस सभा की रिपोर्ट ‘दीनबंधु’ (जनवरी, फरवरी 1895) में प्रकाशित हुई थी।[7]

प्रशस्तिपत्र के जरिए शंकराचार्य ने उन्हें पंडितराव की उपाधि प्रदान की थी। इसे लेकर व्यापक प्रतिक्रिया हुई थी। रूढ़िवादियों को एक गैर-ब्राह्मण द्वारा ऐसा करना नापसंद था। दूसरी ओर गैर-ब्राह्मण बुद्धिजीवी इसे धोंडीराम जैसे विलक्षण प्रतिभाशाली को ब्राह्मण खेमे द्वारा हथियाये जाने के रूप में देख रहे थे। लगभग उन्हीं दिनों धोंडीराम के मित्र और महाराष्ट्र मजदूर आंदोलन के जनक नारायण मेघाजी लोखंडे को सरकार की ओर से रायबहादुर की पदवी प्रदान की गई थी। लोखंडे का मानना था कि पंडितराव की उपाधि धोंडीराम कुंभार के ब्राह्मणीकरण का षड्यंत्र है। उनका कहना था कि ठीक ऐसा ही आठवीं शताब्दी में प्रथम शंकराचार्य ने गौतम बुद्ध को विष्णु का दसवां अवतार घोषित करके किया था।[8]

सच यह भी है कि इस घटना ने उन ब्राह्मणों की बोलती बंद कर दी थी, जो संस्कृत तथा संस्कृत ग्रंथों पर अपना विशेषाधिकार मानते थे। मानते थे कि विलक्षण प्रतिभा तथा तथाकथित दैवी अनुकंपा के कारण केवल वही धर्मशास्त्रों तथा तत्संबंधी कर्मकांडों में दक्षता प्राप्त कर सकते हैं। बड़ी बात यह कि संस्कृत तथा ब्राह्मण शास्त्रों में प्रवीणता हासिल करने के बावजूद धोंडीराम ब्राह्मणत्व की अहमन्यता से परे थे। वे यह भी जानते थे कि रूढ़िवादी ब्राह्मण एक गैर-ब्राह्मण को धार्मिक अनुष्ठान करते कभी सहन नहीं करेंगे। एक तरह से यह भी अच्छा ही था। यदि ब्राह्मण उन्हें मान्यता दे देते तो संभवत: वे, चाहे-अनचाहे स्थापित ब्राह्मणी व्यवस्था का हिस्सा बन जाते। उस समय सत्यशोधक समाज से उसका समर्पित प्रचारक, मुखर वक्ता तथा उत्कट विद्वान छिन जाता।

इस बात के साक्ष्य भी हैं कि संस्कृत तथा धर्म-शास्त्रों में प्रवीण होने के बावजूद धोंडीराम अपने सत्यशोधक होने के लक्ष्य से भटके नहीं थे। सन् 1896 में उनकी एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी, जिसका शीर्षक उन्होंने ‘वेदाचार’ रखा था। उनकी यह किताब जोतीराव फुले की पुस्तक गुलामगिरी’ से प्रेरित, उसी की तरह संवाद-शैली में थी। पुस्तक में शिवराम गोपालराव सावंत तथा पंडित धोंडीराम नामदेव कुंभार के बीच संवाद है। इससे उनके विशद अध्ययन का अनुमान लगाया जा सकता है–

सावंत : पंडित, यदि वेद ईश्वरीय हैं, तो उनमें मौजूद देवताओं में भी दिव्य गुण होने चाहिए। यदि पवित्रता, न्याय, प्रेम, दया और सत्य ईश्वर के गुण हैं, तो ये गुण क्या वैदिक देवताओं में भी मौजूद हैं?

पंडित धोंडीराम : क्या बताऊं? वैदिक देवताओं के लक्षण ये नहीं हैं। उल्टे उनमें तो अपवित्रता, अन्याय, क्रूरता, व्यभिचार, हिंसा, मद्यपान आदि सब भरा पड़ा है।

सावंत : वैदिक ग्रंथों में व्यभिचार कैसे हो सकता है? देवता व्यभिचारी कैसे हो सकते हैं?

पंडित धोंडीराम : बिलकुल होते थे। वैदिक काल में चोर, व्यभिचारी, गपोड़ी और वितंडावादी भी होते थे। इंद्र ने सगर राजा का घोड़ा चुरा लिया था। कृष्ण की गाएं चुराई गई थीं। ‘रामायण’ के बालकांड के 38-39वें अध्याय में देखिये, उनमें लिखा है कि इंद्र ने अपने गुरु गौतम की स्त्री अहिल्या के साथ व्यभिचार किया था। दंडस्वरूप उसकी देह पर एक हजार फफोले उभर आए थे। फिर शापवश उसके लिंग का भी पतन हुआ था। तब ऋषि ने उसे बकरे का लिंग लगाया था। सूर्य ने कुंती नामक कन्या के साथ, उसके विवाह से भी पहले, ज़बरदस्ती यौन संबंध बनाए थे। चंद्रमा ने बृहस्पति की पत्नी को अपने घर बिठा लिया था, जिससे बुध का जन्म हुआ था। वायु कृष्ण की 100 पुत्रियों पर फिसल गए थे। उसने केसरी नामक वानर स्त्री के साथ कुकर्म किया था। वरुण ने उर्वशी के साथ संभोग किया था, जिससे अगस्त्य का जन्म हुआ था। यम ने अपनी मां की हत्या कर, अपनी ही सगी बहन यमुना पर कामुक दृष्टि डाली थी। महाभारत में भी ऐसे अनेक किस्से हैं। अग्नि की नज़र ऋषियों की छह पुत्रियों पर थी; किंतु अपनी पत्नी के भय से वह अपनी इस इच्छा को पूरा न कर सका। बृहस्पति ने अपने बड़े भाई उतथ्य की पत्नी के साथ, उसके गर्भधारण योग्य अवस्था में पहुंचने से पूर्व ही, संभोग किया था। उनके कुकर्मों के बारे में और कितना कहूं। अगर देवता स्वयं खुद इस तरह से व्यभिचार करते हैं, तो उनके भक्तों से नैतिकता की उम्मीद कैसे की जा सकती है! श्रोताओं को इस पर स्वयं विचार करना चाहिए।

सावंत : यह तो देवताओं की बात कही। क्या वैदिक ग्रंथों में भी अन्याय दिखता है? यदि हां, तो कैसा अन्याय?

पंडित धोंडीराम : वेदांत का ऐसा कोई भाग नहीं है जिसमें बलि या हिंसा न हो।[9]

धर्मशास्त्रों के अध्ययन के लिए धोंडीराम काशी में कब तक रहे, इसकी जानकारी तो नहीं मिलती। उनका उल्लेख सत्यशोधक समाज की वार्षिक रिपोर्टों में मिलता है। 1875 की रिपोर्ट में लिखा है कि धोंडीराम नामदेव कुंभार, पंडरीनाथ आबाजी चव्हाण के साथ मिलकर जगह-जगह जाते थे। लोगों को धूर्त्त ‘भट’ (ब्राह्मण पुरोहित) से सावधान करते। बताते थे कि वे लोग अज्ञानी शूद्र जनता को कैसे लूटते हैं। लोगों से संवाद करते समय पंडित धोंडीराम की भाषा कवित्तमय होती। पंडरीनाथ आबाजी संवादकला में कुशल थे। वे लोकवार्ता (व्याख्यान) की सहायता से सत्यशोधक समाज के आदर्शों का प्रचार करते थे।[10] 13 नवंबर, 1875 को प्रिंस ऑफ वेल्स एडवर्ड का पुणे शहर में आगमन हुआ। उस अवसर पर पंडित धोंडीराम ने प्रिंस एडवर्ड से भेंट की थी। युवराज के स्वागत में उन्होंने कृष्णराव भालेकर के साथ मिलकर, उनकी प्रशस्ति और सत्यशोधक समाज के पदों का गायन किया था।[11]

पंडित धोंडीराम ने शंकराचार्य के समक्ष आनुष्ठनिक आयोजनों में ब्राह्मणों को पराजित कर अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित कर दी थी, इसलिए उन्हें आनुष्ठानिक आयोजनों के लिए बुलाया जाने लगा था। शंकराचार्य से मुलाकात के तुरंत बाद धोंडीराम ने पुणे जिले के गांवों की यात्रा की। वे सत्यशोधक समाज के सदस्य तथा उसके समर्पित प्रचारक थे, इसलिए जोतीराव तथा उनके आंदोलन से प्रभावित लोग सत्यशोधक समाज के बारे में जानने के साथ-साथ धार्मिक अनुष्ठानों के लिए भी आमंत्रित करने लगे थे। उनमें सभी जाति-वर्ण के लोग शामिल होते थे। जोतीराव शूद्रातिशूद्रों की एकता के समर्थक थे। उनका कहना था कि पेशों की अनेकता समाज की जरूरत है, वह जातियों में बंटकर समाज की फूट और उसकी कमजोरी का कारण नहीं बननी चाहिए। पंडित धोंडीराम सत्यशोधक के आदर्शों को सरल भाषा में लोगों तक पहुंचाते। उनकी बातें असरकारी होती थीं।

लोगों की बदलती मानसिकता को दर्शाने वाला एक पत्र 6 जनवरी, 1895 के ‘दीनबंधु’ में छपा था, जिसे पुणे जिले के महालुंगे गांव के तुकाराम शिंदे ने लिखा था। 28 दिसंबर, 1894 के पत्र में बताया गया था कि जब से पंडित धोंडीराम कुंभार ने पुरोहिताई का काम संभाला है, लोगों ने नकली पुरोहितों से कर्मकांड कराना छोड़ दिया है। पत्र के माध्यम से पंडित धोंडीराम से महालुंगे गांव आने की अपील की गई थी, लिखा था–

वर्ष 1894 तक सभी धार्मिक अनुष्ठान, ‘अनुष्ठानिक कार्यों में अदक्ष’ पुरोहित के माध्यम से संपन्न किए जाते थे। यह समझने के बाद, आसपास के अधिकांश गांव अब बड़े ही उत्साह के साथ प्रतिष्ठित सत्यशोधक पंडित धोंडीराम के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यदि आप कृपापूर्वक पंडित जी को वहां भेज दें तो ये गांव भी उन ब्रह्मराक्षसों के चंगुल से मुक्त हो जाएंगे।[12]

पत्र में ब्राह्मण पुरोहितों को ‘विटाळशा भट’ शब्दों से संबोधित किया गया था। इसका अर्थ अशुद्ध ब्राह्मण होता है। अपने नाटकों, पोवाड़ों के माध्यम से जोतीराव ने ब्राह्मणों की शोषणकारी प्रवृत्ति को उजागर किया था। बताया था कि धर्म और धर्मशास्त्रों के ज्ञान का दिखावा करने वाले ये पुरोहित वास्तव में कुछ नहीं जानते। शंकराचार्य के समक्ष हुई प्रतियोगिता में ब्राह्मणों के दल को पराजित कर धोंडीराम ने इसे सिद्ध भी कर दिया था। इससे लोगों के मन में ब्राह्मण-पुरोहितों की छवि धूमिल हुई थी।

बारहवीं शताब्दी में दक्षिण के लिंगायत समुदाय ने महाराष्ट्र की भूमि पर पांव पसारने आरंभ कर दिए थे। इस संप्रदाय के सदस्य धार्मिक अनुष्ठानों में ब्राह्मणों की अनिवार्य उपस्थिति को अनावश्यक मानते थे। उनके रीति-रिवाज, अनुष्ठान यहां तक कि पुजारी भी अलग थे। उस समय द्विजों के घरों में होने वाले अनुष्ठानों में बोली जाने वाली संस्कृत, गैर-द्विजों के घरों में होने वाले अनुष्ठानों में प्रयुक्त संस्कृत से अलग होती थी। द्विजों के घरों में बोली जाने वाली संस्कृत तथा उसके मंत्र वैदिक हुआ करते थे। बाकी घरों में पौराणिक संस्कृत का इस्तेमाल होता था। लिंगायतों के प्रभाव में कुछ मराठा परिवारों ने वैदिक संस्कृत का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था।[13] जब ब्राह्मण पुरोहितों ने ऐसा करने से इंकार किया तो उन्होंने स्वजातीय पुरोहित नियुक्त करने आरंभ कर दिया। धीरे-धीरे यह चलन दूसरी जातियों में भी फैलने लगा था।

सत्यशोधक समाज के माध्यम से जोतीराव ने इसे शूद्रातिशूद्र जातियों में लोकप्रिय बनाया था। इस अभियान में पांडित्य के धनी धोंडीराम की भूमिका सराहनीय थी। उन्होंने इस मिथ को तार-तार कर दिया था कि वैदिक पांडित्य केवल ब्राह्मण ही हासिल कर सकता है। उनकी मदद से सत्यशोधक न केवल आम लोगों के जीवन से ब्राह्मणों की दखल कम करने में कामयाब हुए थे, बल्कि उन्होंने ब्राह्मणवाद के शुद्धता तथा पवित्रता के आभामंडल को भी मलिन कर दिया था, जिसपर ब्राह्मणों को गर्व था। लोग धार्मिक अनुष्ठानों को गैर-ब्राह्मण पुरोहितों से कराने लगे थे। शादियों और सत्यनारायण पूजा जैसे अनुष्ठान आमतौर पर गैर-ब्राह्मणों द्वारा ही संपन्न कराए जाते थे। यह जोतीराव तथा सत्यशोधक समाज के कार्यकर्ताओं की बड़ी उपलब्धि थी।

एक ओर धोंडीराम कुंभार दूसरे सत्यशोधकों के साथ, भाषणों तथा गीतों की मदद से गैर-ब्राह्मणों को जागरूक करने के लिए अभियान चला रहे थे। पवाडों, तमाशों के माध्यम से उनकी रचनाएं जन-जन तक पहुंचकर लोकचेतना का निर्माण कर रही थीं। दूसरी ओर रूढ़िवादी भी यथास्थिति बनाए रखने के लिए नई-नई चालें चल रहे थे। उनका नेतृत्व तिलक जैसे कट्टरपंथी ब्राह्मण नेताओं के हाथों में था। अपने ही जैसे रूढ़िवादियों के साथ मिलकर उन्होंने शिवाजी का सांप्रदायिकरण करने की चाल चली थी। जोतीराव ने ‘छत्रपति शिवाजी राजा का पवाड़ा’ (1869) लिखकर मराठा-महानायक शिवा की याद को ताजा करने का काम किया था। इस पोवाड़े में उन्होंने शिवाजी को किसान (क्षेत्री, क्षेत्रवासी, क्षत्रिय) तथा कुलबाडी-भूषण (कुनबियों, किसानों के भूषण) कहकर संबोधित किया था। गंगाभट पंडित को उन्होंने ‘काशी से आकर पाखंड रचाने और मदारी का तमाशा दिखाने वाला’ बताया था।[14] जाहिर है जोतीराव की क्षत्रिय संबंधी अवधारणा ब्राह्मणों की तत्संबंधी वर्णभेदकारी संकल्पना से पूरी तरह अलग थी। उनके अनुसार शिवाजी क्षेत्रवासी (खेतों में रहने वाले, किसान) होने से क्षत्रिय कहलाए थे।[15]

इससे प्रभावित होकर सत्यशोधक समाज ने महाराष्ट्र में ‘श्रीछत्रपति शिवाजी महाराज उत्सव’ मनाने की शुरुआत की थी। 4 मई, 1895 के ‘दीनबंधु’ में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया था कि “26 अप्रैल, 1895 को बेलगाम के कपालनाथ मंदिर में मराठों की शान बनाने वाले श्री छत्रपति शिवाजी महाराज भोंसले की जयंती बड़ी धूमधाम से मनाई गई थी। उस समारोह में लगभग तीन-चार सौ व्यक्ति शामिल हुए थे। जुलूस का भी अच्छा-खासा इंतज़ाम था।”[16] रिपोर्ट को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि शिवाजी जयंती मनाने का चलन उससे पहले ही आरंभ हो चुका था। अपने पोवाड़े में जोतीराव ने शिवाजी को महाराष्ट्र के किसानों, मजदूरों के उद्धारक के रूप में पेश किया था। जबकि तिलक के शिवाजी इस्लामिक राज्य का दमन करने वाले ‘हिंदू सम्राट’ थे।

शिवाजी उत्सव के बहाने मराठा विरासत पर ब्राह्मणों के कब्ज़े की कोशिश से मराठा, कुनबी आदि नेता नाराज थे। वे लगातार उसके विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे। ‘दीनबंधु’ निरंतर उनके समर्थन में लिख रहा था। शिवाजी के ब्राह्मणीकरण के विरोध में पंडित धोंडीराम के तर्क सबसे तीखे और आकर्षक थे। उनका कहना था कि ब्राह्मण, जो निचली जातियों के चिरस्थायी शोषक रहे हैं, अब महान शिवाजी के प्रतीक का उपयोग करके शूद्रातिशूद्रों को ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध, जिस पर निचली जातियों की आशाएं टिकी हैं, षड्यंत्र और देशद्रोह के लिए उकसा रहे हैं। तिलक ने शिवाजी के सांप्रदायिकरण हेतु अभियान का सूत्रपात पुणे के हीराबाग में आयोजित बैठक में किया था। उसे केंद्र में रखकर धोंडीराम ने एक पोवाड़े की रचना की थी, जो 23 जून, 1895 को ‘दीनबंधु’ में प्रकाशित हुआ था। धोंडीराम का मानना था कि ब्राह्मण तथा गैर-ब्राह्मण दोनों अलग-अलग संस्कृतियां हैं। उनके बीच सम्मानजनक मेल-मिलाप असंभव है। उनका कहना था कि जो ब्राह्मण गैर-ब्राह्मणों को शिक्षा देने से कतराते हैं, उनके प्रति असम्मान तथा दुर्भावना रखते हैं, उनसे न्याय की अपेक्षा कैसे की जा सकती है–

वे धोखेबाज लोग (पेशवा) छत्रपति के प्रति सम्मान कैसे रख सकते हैं?

वे विद्या का दान भी दूसरों को देने से कतराते हैं

उन्होंने छत्रपति को भी अज्ञानता के अंधेरे में रखा था…

किया था बर्बाद उनके वंशजों को…

हीराबाग में उन्होंने शिवाजी के मान-सम्मान को आहत किया था

केवल क्षत्रियों (गैरब्राह्मण कृषक जातियों) को शिवाजी के प्रति गर्व महसूस करने का हक है

ब्राह्मणों को तो चाहिए कि वे पेशवाओं की विरुदावलियां गाएं।

‘दीनबंधु’ को भेजे अपने पत्र का समापन उन्होंने इस प्रकार किया था– “गैर-ब्राह्मण भाइयो! मैं आपसे विनम्र प्रार्थना करता हूं कि विरोधियों के उकसावे में आकर गलत कदम उठाने से बचें। देशद्रोह के विचार से दूर रहें (अंग्रेजों का शासन फिलहाल हमारे हक में हैं)। ऐसी सरकार हमें दोबारा नहीं मिलने वाली।”[17] साफ है कि काशी के पंडितों का पांडित्य, उनका वाक्-चातुर्य पंडित धोंडीराम को, समाज के प्रति उनके कर्तव्यों से दूर नहीं कर पाया था। धर्मशास्त्र विषयक अपने ज्ञान पर गुमान करने के बजाय उनकी कोशिश धार्मिक विकृतियों तथा समाज को ब्राह्मणवाद के चंगुल से बाहर लाने की रहती, जिसकी शुरुआत जोतीराव ‘तृतीय रत्न’ लिखकर वर्षों पहले कर चुके थे।

ब्राह्मण कदम-कदम पर तथाकथित धर्मशास्त्रों तथा वेदों का नाम लेते थे, किंतु धर्मशास्त्रों के बारे में उनकी बातें अकसर सुने-सुनाए किस्सों पर आधारित होती थीं। उन्हें पढ़ने की वास्तविक कोशिश उनमें से कोई विरला ही करता था। दूसरों के मुंह से सुने शास्त्र प्रसंगों को भी वे अपने स्वार्थ के अनुसार तोड़-मरोड़कर पेश करते थे, जिससे उनका कथन आधारहीन वितंडा बन जाता था। दूसरी ओर धोंडीराम का धर्मशास्त्रों के प्रति नजरिया आलोचनात्मक था। उनके तर्क मंजे हुए और शास्त्र-सम्मत होते थे। उसके बल पर कुछ ही महीनों में वे ब्राह्मणवादी वर्चस्व के प्रतिरोध के प्रतीक बन चुके थे। लोग उन्हें सुनने को लालायित रहते थे।

सत्यशोधक समाज की कोंकण शाखा की अप्रैल, 1895 की रिपोर्ट से पता चलता है कि उस क्षेत्र के मराठे तथा मध्यम जाति के लोग सामाजिक चेतना के लिए काम करना चाहते थे। मार्गदर्शक की जरूरत महसूस करते हुए उन्होंने पंडित धोंडीराम को लिखा। लोकजागरण के लिए सदैव तत्पर रहने वाले धोंडीराम ने पुणे सत्यशोधक समाज से अनुमति मिलने की शर्त पर, थाणे जिले के वांगणी गांव से प्रचार कार्य आरंभ करने की सहमति दे दी। इस बीच उन्हें गणपत बालपाटिल शेलार नामक सत्यशोधक के बारे में पता चला। वे आसपास के गांवों में प्रचार अभियान चला रहे थे। धोंडीराम भी उनके साथ प्रचार अभियान में जुट गए। उसके बाद तो वे जहां भी जाते, लोग उन्हें सुनने के लिए उमड़ पड़ते। उनके भाषण तथ्यपरक तथा ओजपूर्ण होते थे। इससे उनकी सभाओं में श्रोताओं की संख्या कभी-कभी तो हजारों में पहुंच जाती थी। इस बीच शेलार ने पंडित धोंडीराम से ऐसा नाटक लिखने का आग्रह किया था, जिसका जनसभाओं में मंचन किया जा सके। उसके फलस्वरूप धोंडीराम ने ‘तमाशा’ की रचना की, जिसका प्रकाशन 1897 में हुआ। उसकी एक प्रति की कीमत मात्र छह आना थी। इस नाटिका को प्रकाशित करने में भी शेलार ने काफी मदद की थी।

धोंडीराम की ख्याति आसमान छूने लगी थी। ब्राह्मणों के लिए यह असहनीय था। उनकी कुंठा और ईर्ष्या की झलक 1909 में प्रकाशित प्रहसन ‘ढेरपोट्याचा फजिता’ में देखी जा सकती हैं–

शमराव : कुछ मत पूछो। (महार या मांग के स्पर्श से) अपवित्र होने पर शुद्धीकरण हेतु स्नान नहीं करना चाहिए।

गुंडूबोवा : (चिलम का कश लेते हुए) हमें स्नान क्यों नहीं करना चाहिए? अरे! क्या सरकार ने कोई नया कानून निकाला है?

शमराव : नहीं, कोई कानून नहीं बना। हमारे जगद्गुरु (विश्व के शिक्षक) शंकराचार्य कल्पना के पंखों पर उड़ान भर रहे थे। मात्र चार घंटों में उन्होंने पूरे आर्यावर्त का चक्कर लगाया। उस यात्रा में उन्होंने सभी जातियों को मुक्ति दिलाने के लिए उनका बारीकी से निरीक्षण किया। फिर उन्होंने तय किया कि ब्राह्मणों और उच्च वर्ण के अन्य लोगों को इन जातियों के साथ एक ही मंच पर बैठना चाहिए और उनसे मेलजोल बढाना चाहिए!

दत्तोपंत : ऐसा कैसे भाई? ये किस मठ के शंकराचार्य हैं?

साहमराव : चाहे जिस मठ के हों, क्या वह हमारे धर्म के नेता नहीं हैं?[18]

उपर्युक्त पाठ से पता चलता है कि रूढ़िवादी ब्राह्मणों के लिए जातीय अभिमान सर्वोपरि था। इसके लिए वे ब्राह्मणों के सर्वोच्च गुरु कहे जाने शंकराचार्य के निर्देश की अवहेलना करने को भी तैयार थे। इस सत्य को धोंडीराम नामदेव तथा दूसरे सत्यशोधक भली-भांति जानते थे। इसलिए आलोचना की परवाह न करते हुए वे अपने प्रचार कर्म में जुटे रहे। धोंडीराम अच्छे कवि थे, यह बात उनकी पुस्तकों से भी साफ हो जाती है। उनकी भाषा-शैली सहज, प्रवाहमय तथा चुटीली थी, जो श्रोताओं को बड़ी आसानी से अपने काबू में कर लेती थी। ऊपर से धोंडीराम का निर्मल पांडित्य, जिससे लोग बरबस उनकी ओर खिंचे चले आते थे। लगभग पांच दशकों तक वे सत्यशोधक समाज के प्रचार-प्रसार में जुटकर सत्यशोधक कार्यकर्ता के रूप में कार्य करते रहे। सन् 1890 में जोतीराव फुले के निधन के बाद, सत्यशोधक समाज के आंदोलन को जिन नेताओं और कार्यकर्ताओं ने आगे बढ़ाया, धोंडीराम उनमें प्रमुखतम थे।

जोतीराव के चले जाने के बाद पंडित धोंडीराम ने सत्यान्वेषी विचारों को फैलाने के लिए पुणे, सातारा, अहमदनगर जिलों का कार्यभार संभाला। सत्यशोधक समाज के प्रचार के लिए लोग जहां बुलाते वहां चले जाते। सामाजिक कार्यों के लिए निष्पृह भाव से सदैव आगे रहते थे। 1893 में हिंदू-मुस्लिम दंगों के बाद उन्होंने मुंबई के कन्याकोपरा में नारायण मेघाजी लोखंडे के साथ बैठक की और दंगों को रोका। उन्होंने इस पर 1893 में ‘सत्यदर्शन’ शीर्षक से पुस्तक लिखी। पुणे के गणपति उत्सव के दौरान मुस्लिम भाइयों के सामने आए संकट को दूर करने के लिए वे बहादुरी से आगे आए। जनसाधारण को अपने चंगुल में फंसाए रखने के लिये ब्राह्मण उन दिनों गोरक्षा जैसे प्रतिक्रियावादी आंदोलन चला रहे थे। आर्य समाज के स्वामी दयानंद उसके मुख्य अभिकर्ता थे। पंडित धोंडीराम ने गोरक्षा आंदोलन पर जोरदार हमला किया है। उन्होंने बताया था कि लात मारकर गाय का अपमान करने, बूढ़ा होने पर निर्दयी की तरह कसाई को बेच देने वाले ब्राह्मण भट्ट गोरक्षा के नाम पर किसानों को किस तरह लूटते हैं–

गौमाता के ये भगवत गौ को नित रोज देते लाथा,

उसके चमड़े का जुता पैनकर करते शेखिके बाता।

गौके नाम पर पैसे मांगकर पगार अपना निकालें,

ये हिकमत समझेना किसी को फंस रहे भोले-भाले।[19]

लोग उनकी बात को ध्यान से सुनते थे। यहां से वहां प्रचार करते हुए उन्होंने कई कृतियों की रचना की, उनमें ‘वेदाचार’ (1896), ‘सत्यदर्पण’ (1893, अनुपलब्ध), ‘तमाशा’ (नवंबर, 1897), ‘सत्यांजन’ (अनुपलब्ध), ‘फुटकर पद’ (1905), ‘पेशवा के द्वारा उत्पीड़न का पोवाड़ा’ (चारपानी) आदि शामिल हैं।[20] ये कृतियां सत्यशोधक समाज के आदर्शों के प्रति उनकी एकनिष्ठता का प्रमाण है।

वेदाचार

वेद ब्राह्मण धर्म की पवित्र पुस्तक हैं। हालांकि इन दिनों वेदों का ब्राह्मणों के रोजमर्रा के कर्मकांडों से कोई संबंध नहीं है, लेकिन एक समय था जब ये आश्रम संस्कृति का पर्याय कहे जाते थे। समय के साथ वेदों की सामग्री अप्रासंगिक हुई, बावजूद इसके वेद ब्राह्मण के लिए आदर्श बने रहे, तो इसलिए कि अधिकांश ब्राह्मणों के लिए वेद अध्ययन-मनन की वस्तु न होकर पूजा की वस्तु रहे हैं। नब्बे प्रतिशत ब्राह्मण उन्हें जीवन-भर देख भी नहीं पाते। इसके बावजूद वेद का नाम सुनते ही उनका मन श्रद्धा से आकंठ भर जाता है। जिनके यहां वेद हैं उनके लिए उनका महत्त्व लाल-कपड़े में बंधी, आले में रखी पूजा-सामग्री से ज्यादा कुछ नहीं है। सच तो यह है कि वेदों के संबंध में ब्राह्मणों की स्थिति उस बुढ़िया जैसी रही है जो गांठ में चंद पुराने सिक्के दबाए रखती है। न खुद देखती है, न दूसरों को देखने देती है। वेद संख्या में चार बताए जाते हैं, लेकिन सातवीं-आठवी शताब्दी तक वेदों की संख्या केवल तीन थी। चौथे अथर्ववेद की रचना उसके बाद की है। चारों वेदों के रचनाकाल के बीच काफी लंबा अंतर रहा है। कौन-सी कृति वेद कही जाएगी, वेद होने की कसौटी क्या है, इसका उल्लेख वेद या वेदोत्तर ग्रंथों में नहीं है। इसके बावजूद ब्राह्मणों का बड़ा वर्ग है जो वेदों को अपौरुषेय मानता है। आश्चर्य की बात है कि सबसे पुराने तथा प्रमुख ऋग्वेद में जातिवाद का नामोनिशां तक नहीं है, सिवाय दसवें मंडल में शामिल पुरुषसूक्त के; और अधिकांश विद्वान पहले तथा दसवें मंडल को प्रक्षेपित मानते हैं।

‘वेदाचार’ पुस्तक का पहला पृष्ठ

ब्राह्मणों ने शूद्रातिशूद्रों के लिए वेदों के अध्ययन-श्रवण-स्पर्शादि को निषिद्ध किया था। स्वयं आदि शंकराचार्य ने अपने भाष्यों में इस प्रतिबंध की संस्तुति की थी। ऐसे में धोंडीराम कुंभार का वेदों का अध्ययन कर, ‘वेदाचार’ जैसी पुस्तक लिखना ब्राह्मण धर्म के इतिहास की एक विलक्षण घटना ही कही जाएगी। शृंगेरी पीठ के तत्कालीन शंकराचार्य द्वारा धोंडीराम को पंडितराव तथा सरसुभे उपाधि दिए जाने के लगभग बारह वर्ष बाद, 1896 में ‘वेदाचार’ का प्रकाशन हुआ था। कह सकते हैं कि ‘वेदाचार’ लिखने से पहले धोंडीराम वेदों का विधिवत अध्ययन कर चुके थे। ‘वेदाचार’ के पहले संस्करण का मूल्य आठ आना था; प्रकाशक थे– लक्ष्मणराव गोपालराव सावंत देसाई। गोपालराव सावंत खुद भी सत्यशोधक समाज के सदस्य थे।

‘गुलामगिरी’ की तरह ‘वेदाचार’ भी संवाद शैली में रची गई थी। ‘गुलामगिरी’ में जोतीराव तथा धोंडीराम के बीच संवाद है। अधिकांश विद्वानों का विचार है कि पंडित धोंडीराम नामदेव ही ‘गुलामगिरी’ के धोंडीराम हैं। जिस तरह ‘गुलामगिरी’ में जोतीराव ने धोंडीराम को संवादक का दर्जा दिया था, वैसे ही पंडित धोंडीराम नामदेव कुंभार ने ‘वेदाचार’ में गोपालराव सावंत को संपादक की भूमिका में रखा था। गोपालराव ने पुस्तक की छोटी-सी प्रस्तावना भी लिखी थी, जिसमें उन्होंने कहा था– “अनादि काल से लेकर आज तक, सभी धर्मों में बलि की रस्में निभाई जाती रही हैं। हालांकि, हिंदू धर्म के व्यापक दायरे के भीतर, तीन विशिष्ट संप्रदाय – बौद्ध, जैन और लिंगायत – इन रस्मों का पालन नहीं करते हैं… इस पुस्तक में, यह पता लगाने कोशिश की गई है कि इनमें से किस धर्म में सबसे अधिक संख्या में पशुओं की बलि दी जाती है।” उन्होंने आगे लिखा था–

ब्राह्मणों द्वारा किए जाने वाले यज्ञों (बलि-अनुष्ठानों) में ही विभिन्न प्रकार के पशुओं, पक्षियों और अन्य जीवित प्राणियों की बलि दी जाती है। और यह केवल पशुओं और पक्षियों तक सीमित नहीं है; उनके ‘पुरुषमेध’ (मानव बलि) नामक अनुष्ठान में, पहले स्वयं मनुष्यों की भी बलि दी जाती थी। वास्तव में, उनके धार्मिक ग्रंथों में ऐसे अनगिनत उदाहरण प्रचुर मात्रा में मिलते हैं, जिनमें मनुष्यों ने स्वयं को बलि के रूप में अर्पित किया है। अतः, इस हिंसक वैदिक धर्म के वास्तविक स्वरूप को हमारे उन बंधुओं के समक्ष उजागर करके – जो अभी भी अज्ञान की स्थिति में हैं – हमारा उद्देश्य उन्हें इसकी वास्तविकता से अवगत कराना और इन अनुष्ठानों को संपन्न कराने वाले ब्राह्मणों के असली चरित्र को बेनकाब करना है।[21]

जैसा गोपालराव सावंत ने भूमिका में लिखा है, वेदाचार का प्रमुख विषय ब्राह्मणों के यज्ञादि कर्मकांड हैं। ब्राह्मण परंपरा में वेदों की इससे ज्यादा कोई भूमिका भी नहीं रही। इनकी तुलना में यदि इस्लाम, ईसाई, सिक्ख आदि धर्मों को देखा जाए तो उनके धर्म-ग्रंथों में अध्यात्म संबंधी दृष्टिकोण के अलावा, सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन तथा सुस्पष्ट अर्थनीति मिलेगी। इस दृष्टि से वेदादि ग्रंथ निराश करते हैं। उनमें मुख्यतः कर्मकांड, यज्ञ-बलियां तथा तत्संबंधी प्रविधियों का विवरण है। ‘ऋग्वेद’ लगभग इसी का लेखा है। इसके बावजूद ब्राह्मण अपनी खोज के प्रति इतने सम्मोहित थे कि बाद के दोनों वेद, ऋग्वैदिक ऋचाओं के गायन तथा उसमें बताये गये यज्ञ कर्मकांडों के विवेचन पर आधारित थे।

यज्ञों में पशु बलि, यहां तक कि मानव-बलि भी दी जाती थी। पंडित धोंडीराम ने बताया था कि जिसे वेद-आचार (वैदिक प्रथाएं) कहा गया है, असल में वह यज्ञ के नाम पर ब्राह्मणों का अतिचार था। जिन दिनों उन्हें सरसुभा घोषित किया गया था, उन दिनों कुछ बुद्धिजीवियों को लगा था कि ब्राह्मणों ने उन्हें खेमे में खींच लिया है। ‘वेदाचार’ ने उनकी आशंकाओं को निर्मूल सिद्ध कर दिया था। उसके आरंभ में दिए गए अभंग की पंक्तियों से पंडित धोंडीराम के सरोकारों तथा लक्ष्य के प्रति निष्ठा का अनुमान लगाया जा सकता है–

पहले(!) वेद आए, फिर वैदिक धर्म। सत्य का अनुसंधान करते हुए, मुझे इसका असली मतलब समझ में आया। गहन पड़ताल के बाद मैंने जाना कि असल में सब कुछ अस्त-व्यस्त, भारी गड़बड़झाला था– कर्मकांडियों का मकड़जाल। ये कर्मकांड करने वाले, सब के सब, भ्रष्ट और पेटू हैं। घिनौने और बेचारे, जो सिर्फ़ हड्डियां कुतरते हैं। ये लोग यूं तो वैदिक धर्म का प्रतीक होने का दावा करते हैं, लेकिन असल में हैं पूरी तरह घटिया। ये कसाई से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। हे युवा जिज्ञासु, मुझे बस इतना ही कहना है।[22]

‘वेदाचार’ के आरंभिक पृष्ठों में धोंडीराम ने यज्ञ-स्थल पर पशु बलि के लिए की जाने वाली हिंसा का वर्णन किया है। उन्होंने बताया था कि धर्म के नाम पर किए जाने वाले पशुबलि जैसे कर्मकाण्ड तो इतने वीभत्स और जुगुप्सा पैदा करने वाले हैं कि वे किसी भी संवेदनशील पाठक को बेचैन कर सकते हैं। सभ्य समाज का हिस्सा तो वे हो ही नहीं सकते। उन्होंने लिखा था कि यज्ञ में बलि के पश्चात पशु-अवशेषों का बंटवारा किया जाता है। किस पुरोहित को बलि-पशु का कौन-सा और कितना हिस्सा मिलना चाहिए, यह धर्म-ग्रंथों में पहले से ही निर्धारित है। कहावत है कि “दाने-दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है”। वेद-शास्त्रों के अनुसार बलि-पशु के अंग-अंग पर, उसके अधिकारी देवता का नाम लिखा होता है। इसपर धोंडीराम की टिप्पणी थी–

जब ये ब्राह्मण बलि की रस्म के दौरान बांटे जा रहे हिस्से को बैठकर चाटते हैं – ठीक वैसे ही जैसे हमारे अपने महार और मांग करते हैं – तो क्या उस समय उनका स्तर महार और मांग से अलग होता है? और क्या यह दृश्य उन क्षत्रियों को दिखाई नहीं पड़ता, जो उस यज्ञ और पशु-बलि के लिए पशु तथा अन्य समिधा का इंतजाम करते हैं? शर्म आनी चाहिए उन लोगों पर जो सिर्फ इन पेटू लोगों की उदर-पूर्ति हेतु ऐसे अनुष्ठानों को प्रायोजित करते हैं![23]

‘वेदाचार’ पृष्ठ संख्या की दृष्टि से बहुत बड़ी रचना नहीं है। तथापि उसके सरोकार बहुत बड़े थे। धोंडीराम ने उसमें समाज की सभी प्रमुख समस्याओं पर चिंता व्यक्त की थी। प्रमुखतम समस्या अछूत कही जाने वाली जातियों की थी। महार-मांग आदि को उनकी जाति के कारण समाज में जिस उपेक्षा और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, इसकी चर्चा उन्होंने एक पद के माध्यम से की थी। उन्होंने ‘मनुस्मृति’ (10.52-53) का उल्लेख किया था, जिसमें महार मांग जैसी अछूत जातियों के बारे में कहा गया है कि चांडाल तथा श्वपच जातिवालों को गांव के बाहर रहना चाहिए। वे गाय, भैंस आदि नहीं पाल सकते। केवल कुत्ता, गधा आदि उनका धन होंगे, मृत शरीरों के वस्त्र उनका पहनावा। उन्हें टूटे-फूटे बर्तनों में भोजन करना चाहिए, लोहे के आभूषण पहनने चाहिए। उनके लिए एक स्थान पर टिककर रहना वर्जित है। उन्हें धार्मिक अनुष्ठानों से दूर रहना चाहिए तथा उनका विवाह समान जातिवालों में होना चाहिए। उन्होंने बताया था कि अछूतों को सिर्फ खास जाति में जन्म लेने के कारण तीन हज़ार वर्षों से ऐसी कष्टकारी स्थितियों में रहना पड़ा है। फिलहाल अंग्रेज़ी राज में वे कुछ हद तक आज़ादी का अनुभव करते हैं; ब्राह्मण राज का युग अब समाप्त होने जा रहा है।[24]

सावंत ने पूछा था कि ‘ऋग्वेद’ में यज्ञ-हिंसा की जैसी अनुमति है, वैसी हिंसा ‘यजुर्वेद’ में शायद नहीं है? इसपर पंडित धोंडीराम ने ‘यजुर्वेद’ के ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ का जिक्र किया था, जिसमें यज्ञ-विधा तथा बलि-प्रविधियों का सविस्तार विवरण है–

सायणाचार्य कहते हैं– पशु-वध यद्यपि क्रूर कृत्य है। तथापि इसकी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। सृष्टिकर्ता ने ही पशुओं की रचना की है…यजुर्वेद ब्राह्मणों की अनुक्रमणिका की जांच करने पर पता चलता है कि इसमें विभिन्न प्रकार के अनुष्ठान शामिल हैं; इनमें से, सौत्रामणी (मदिरा का सेवन), सुराग्रह मंत्र (मदिरापान के लिए मंत्र), ऐन्द्र पशु (देवता इंद्र को समर्पित बकरे का वध और सेवन), गोसव (गाय का वध करके यज्ञ अनुष्ठान करना)… पुरुष यज्ञ (यज्ञ के दौरान मनुष्य की बलि देना), वैष्णव पशु (यज्ञ के दौरान विष्णु के लिए बकरों की बलि देना)… रोहितादि पशुवलम्भ (लाल मेढ़े या अन्य लाल रंग के पशुओं की बलि)… गव्य पशु विधान (यज्ञ के दौरान गाय का विधिपूर्वक वध और सेवन)…वृषभालंभन विधान (बैल के बध की विधि) जैसे यज्ञों, मद्यपान आदि के बारे में बताया गया है।[25]

पंडित धोंडीराम ने ‘वेदाचार’ में वेद-वेदांग तथा यज्ञ प्रविधियों का संक्षिप्त गहन विश्लेषण किया है, जिससे उनकी अध्ययनशीलता का पता चलता है। यह भी कह सकते हैं कि कुछ लोगों की उदारतावश उन्हें संस्कृत तथा संस्कृत ग्रंथ पढ़ने का जो अवसर मिला था, उसका उन्होंने पूरा-पूरा सदुपयोग किया था। गैर-ब्राह्मण पृष्ठभूमि से आए व्यक्ति के लिए यह कतई आसान न था। ब्राह्मणों को सबकुछ बड़ी आसानी से, जाति के आधार पर मिल जाता था। इस कारण वे अध्ययन से कतराते थे। यदि किसी विरले को वेदाध्ययन का अवसर उपलब्ध हो तो भी वह वेद-मंत्रों के रटने से ज्यादा कुछ नहीं कर पाता था। गिने-चुने ऐसे होते थे जो वैदिक ऋचाओं का अर्थ समझ पाते थे। उन्हें आलोचकीय दृष्टि से पढ़ना तो घोर पाप था।

इस डर से कि वेद सार्वजनिक होंगे तो उनके प्रति निष्ठा को नियंत्रित नहीं किया जा सकेगा, न ही मनमाने विवेचन पर रोक लगाना संभव होगा, वेदों को आश्रम की चारदीवारी के भीतर पवित्र ज्ञान के रूप में सहेजा जाता था। बिना यह जाने-समझे कि जैसे ही ज्ञान से पवित्रता का मिथ जुड़ता है, उसकी विकास यात्रा तत्क्षण अवरुद्ध हो जाती है। धोंडीराम अपने ज्ञान को न तो खुद तक सीमित रखने के पक्ष में थे, न ही वे उसे जड़ बनाए रखना चाहते थे। शंकराचार्य द्वारा सरसुभा घोषित करने के बावजूद ब्राह्मणों की उनके प्रति ईर्ष्या और आक्रोश का यही कारण था।

ईस्ट इंडिया कंपनी की शिक्षा-नीति के चलते समाज के सभी वर्गों को पढ़ने-लिखने का अवसर मिला था। ब्राह्मण उसे हिंदू धर्म पर हमले के रूप में देख रहे थे। उसके बाद समान दंड-संहिता, शासन-प्रशासन में सभी की भागीदारी से जुड़े कानून ने ‘मनुस्मृति’ के कानून को किनारे कर दिया था। उसकी पहली प्रतिक्रिया 1857 के सैन्य विद्रोह के रूप में हुई थी। युद्ध से ब्राह्मणों को जो अपेक्षा थी, वह तो नहीं मिल पाया था, लेकिन निजी मामलो में दखल न देने की अंग्रेजी सरकार की घोषणा से, ब्राह्मणों ने काफी कुछ प्राप्त कर लिया था। उस समय तक शूद्रातिशूद्रों की दूसरी-तीसरी पढ़ी-लिखी पीढ़ी सामने आ रही थी। जोतीराव ने ‘तृतीय रत्न’ जैसी रचनाओं के माध्यम से ब्राह्मणवाद के प्रतिरोध का शंखनाद किया था। उसके बाद ‘गुलामगिरी’ और किसान का कोड़ा’ लिखकर बता दिया था कि भारत में दो अलग-अलग संस्कृतियां हैं। पहली और मूल संस्कृति उन शूद्रातिशूद्रों की है, जो इस देश के मूल बाशिंदे थे। दूसरी वायवी देवताओं के सहारे टिकी ब्राह्मण संस्कृति। सत्यशोधक समाज की स्थापना के बाद तो उन्होंने सीधी विभाजन रेखा खींच दी थी। वह शूद्रातिशूद्रों में व्याप्त रूढ़िवाद, अशिक्षा, गरीबी जैसी समस्याओं के लिए ब्राह्मणों को जिम्मेदार मानकर सामाजिक-धार्मिक अनुष्ठानों से उनके बहिष्कार के लिए आंदोलन चला रहा था।

शूद्रातिशूद्रों के अस्मितावादी आंदोलनों की प्रतिक्रिया में यथास्थितिवादियों ने कई संस्थाओं का गठन किया, उनमें एक स्वामी दयानंद स्वामी का आर्यसमाज भी था। 1857 के सैन्य विद्रोह में हिंदू तथा मुस्लिम साथ-साथ थे, लेकिन उसके असफल होते ही, दोनों समुदायों के बीच वैमनस्य बढ़ने लगा था। इसके लिए दोनों ओर के कट्टरपंथी सक्रिय थे। 1880 ईस्वी में स्वामी दयानंद ने ‘गोकृष्यादिरक्षिणीसभा’ का गठन किया था। संस्था का उद्देश्य गाय तथा कृषिकर्म में काम आने वाले अन्य पशुओं की रक्षा करना था। उस अवसर पर उन्होंने ‘गोकरुणानिधिः’ शीर्षक से एक पुस्तिका का प्रकाशन किया था। पुस्तिका के आरंभ में शाकाहार का गुणगान था, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से किसी मांसाहारी को संस्था का सदस्य न बनाया जाएगा; अथवा सभा के सदस्य शाकाहार का प्रचार करेंगे, ऐसा कोई प्रावधान ‘गोकृष्यादिरक्षिणीसभा’ की नियमावली में नहीं था। संस्था का कार्य गौशालाओं के निर्माण तक सीमित था।[26] यही कारण है कि गौरक्षा के नाम पर चलाया गया वह आंदोलन देश में सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ाने वाला सिद्ध हुआ था। जीन थर्सबी ने 1883 की एक घटना का उल्लेख किया है, उसके अनुसार–

एक ब्राह्मण ने दान में मिली गाय एक मौलवी को बलि देने के लिए बेच दी। जैसे ही हिंदू संगठनों को इसका पता चला, वे मौलवी के पास पहुंचे और गाय को ऊंचे दामों में वापस करने को कहा। मौलवी ने गाय वापस लौटाने से इंकार कर दिया। इससे दोनों संप्रदायों में तनाव बढ़ने लगा। स्थानीय मजिस्ट्रेट के संज्ञान में मामला आया तो दंगे की आशंका से उसने गाय की कुर्बानी पर रोक लगा दी। मामला लाहौर की मुख्य अदालत में पहुंचा। दिसंबर में अदालत ने मौलवी के पक्ष में फैसला दिया और गाय बलि के लिए भेज दी गई।[27]

इस घटना से दो बातें साफ हैं। पहली, बूढी गाय को कसाई को बेच देने का चलन ब्राह्मणों में आम था। दूसरी, गोरक्षा आंदोलन सांप्रदायिक वैमनस्य और राजनीति को बढ़ावा देने वाला सिद्ध हुआ था। इसका अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 1883 तक दिल्ली में ईद के अवसर पर दी जाने वाली कुर्बानी मात्र 25-30 गायों तक सीमित थी, जबकि 1884 में 170 गायों की बलि दी गई थी। अगले दो वर्षों में 1886 ईस्वी में अकेले दिल्ली में ईद के अवसर पर 400-450 गायों की कुर्बानी दी गई थी। 1884 की गोपनीय रिपोर्ट के अनुसार ब्राह्मण ने दान में मिली गाय जान-बूझकर मौलवी को काटने के लिए बेची थी, इस कारण कुछ हिंदू संगठन यह कहकर कि दान में दी गई गाय को ब्राह्मण कसाई को बेच सकते हैं, ब्राह्मण को गौदान किए जाने का विरोध कर रहे थे।[28] गौ-रक्षा आंदोलन, वस्तुतः तिलक के शिवाजी उत्सव जैसा ही प्रतिक्रियावादी आंदोलन था। उसका उद्देश्य शूद्रातिशूद्रों में बढ़ रहे अस्मिताबोध को रोककर उन्हें ब्राह्मणवादी व्यवस्था के ढर्रे में बनाए रखना था। इसलिये ब्राह्मण को गौदान का विरोध करने वाले केवल शूद्रातिशूद्र ही हो सकते थे।

जोतीराव 1855 से ही गौदान के औचित्य तथा उसके माध्यम से शूद्रातिशूद्रों के शोषण के बारे में लिखते आए थे। ‘ब्राह्मणों की चालाकी’ पोवाड़े में एक घटना का विवरण है। उसमें बताया गया है कि ब्राह्मण-पुरोहित गरीब-निरक्षर शूद्रों का कितनी धूर्त्तता से शोषण करते थे। उसके अनुसार जर्जरकाय और बीमार शूद्र की स्त्री, पति के उपचार के लिए वैद्य को बुलाया, वह महंगी दवा देकर लौट गया। उसके बाद जैसे ही ब्राह्मण को शूद्र के मरणासन्न होने का समाचार मिला, वह तुरत-फुरत शूद्र के घर पहुंचा। मंत्र-जप का हवाला करते हुए उसने गौदान की मांग की। गरीब स्त्री दान के लिए गाय कहां से लाती। निराश ब्राह्मण घर लौट गया। थोड़ी देर बाद उसे शूद्र के मरने की खबर मिली दौड़ा-दौड़ा श्मशान पहुंचा। वहां चावल का पुतला बनवाकर, पैसे ऐंठकर घर लौट आया। ‘तृतीय रत्न’ में जोशी और कसाई को एक ही गली में रहने वाला बताकर, ब्राह्मण की तुलना कसाई से की गई है।

धोंडीराम ने ज़ोर देकर कहा कि वेदों में बताए गए रीति-रिवाज़ों में कोई सच्चाई नहीं है। जब भी सच्चाई की खोज करने वालों का सामना वेदों से होता है, वे पूरी तरह से निराश करने वाले सिद्ध होते हैं। वेदों से वास्तविक ज्ञान की अपेक्षा करना वृथा(व्यर्थ) है। उन पर गर्व करना महज भ्रम। यहां तक कि यज्ञ और बलि-प्रथा से जुड़े संस्कार वायवी सत्य के अलावा कुछ भी नहीं हैं। असलियत में यह सब ढोंग; और ब्राह्मणों की ठग-विद्या का हिस्सा है। गौ-संरक्षण के मुद्दे पर वे सत्यशोधक समाज के दृष्टिकोण पर दृढ़ थे। यह पूछने पर कि गौरक्षा के नाम पर ब्राह्मणों ने जो उथल-पुथल मचाई हुई है, उसके बारे में उनके क्या विचार हैं, धोंडीराम ने ‘वेदाचार’ के अंतिम हिस्से में स्वरचित पद शामिल किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि–

बाघ जैसे स्वभाव वाले ये पंडित वास्तविक गौ-पालकों के दुश्मन हैं। भूख से पीड़ित, गरीब ढेड़ों को मरे पशुओं पर गुजारा करना पड़ता है। इस कारण ब्राह्मण खुद को उनकी छाया से भी दूर रखते हैं। भोजन के लिए गायों की बलि अंग्रेज देते हैं, जबकि ब्राह्मण मुसलमानों से झगड़ते रहते हैं। खुद को गाय का भक्त बताने वाले ये लोग उसे रोज लात से मारते हैं, उसके चमड़े से बना जूता पहनकार शेखी बघारते हैं। कसाई हर रोज गाय का गला तराशते हैं, लेकिन इन कलम-कसाइयों का हमला किसानों और गोपालकों पर होता है।[29]

ब्राह्मण खुद को पढ़ा-लिखा कहते थे। ज्ञान-विज्ञान की सहस्रों वर्ष पुरानी परंपरा पर दावेदारी करते थे, लेकिन उनका ज्ञान, उनकी शिक्षा स्वार्थ-सिद्धि से आगे नहीं बढ़ पायी थी। ‘गुलामगिरी’ में जोतीराव के जैसे ही उनको कलम-कसाई कहकर धोंडीराम ने उनकी इसी स्वार्थपरता पर तंज किया था। सत्यशोधक समाज के प्रचार के लिए उन्होंने नाटक भी लिखे थे। ‘तमाशा’ शीर्षक से लिखा गया उनका नाटक सत्यशोधक समाज की सभाओं में अकसर प्रदर्शित किया जाता था।

धोंडीराम की लोकप्रियता में उनके संस्कृत ज्ञान का काफी योगदान था। सवाल खड़ा हो सकता है कि ब्राह्मणों ने तो उन्हें उदारतापूर्वक संस्कृत तथा धर्मशास्त्रों का ज्ञान कराया था! इसके बावजूद धोंडीराम धर्मशास्त्रों तथा ब्राह्मणवाद की आलोचना में लगे रहे। क्या यह गुरु परंपरा के विपरीत आचरण नहीं था? उत्तर है, हरगिज नहीं। दरअसल ब्राह्मणवादी गुरु-शिष्य परंपरा में ज्ञान की यात्रा उर्ध्वमुखी न होकर क्षैतिज होती है। शिष्य पर प्रतिबंध होता है कि वह गुरु की परंपरा का उसी दिशा में प्रचार-प्रसार करे, जो पहले से निर्धारित है। लीक छोड़ने की अनुमति उसमें नहीं होती। यहां तक कि बिना गुरु की अनुमति के दूसरे धर्म की पुस्तकों को पढ़ना या उसकी शिक्षा ग्रहण करना भी निषिद्ध माना जाता है। कोई करे तो उसके लिए प्रायश्चित का विधान है। कुमारिल भट्ट इसके सटीक उदाहरण हैं। मीमांसक कुमारिल भट्ट ने बौद्ध आचार्यों को शास्त्रार्थ में पराजित करने के लिए उन्हीं के धर्म का अध्ययन करने का निश्चय किया। बौद्ध धर्म के अध्ययन के लिए उन्होंने उत्तर भारत की शीर्षस्थ संस्था, नालंदा विश्वविद्यालय में गुप-चुप तरीके से प्रवेश भी ले लिया। वहां से वे बौद्ध धर्म का ज्ञान लेकर निकले तथा शास्त्रार्थ में बौद्ध आचार्य को पराजित करने में भी सफल रहे। लेकिन बौद्ध धर्म का अध्ययन उन्होंने बिना गुरु की अनुमति के किया था। इसे गुरुद्रोह माना गया। इसका प्रायश्चित था, खुद को धीमी आंच के सुपुर्द कर आत्मदाह कर देना। दिग्विजय की कामना के साथ बनारस की ओर निकले शंकराचार्य, मीमांसक कुमारिल भट्ट से ही शास्त्रार्थ करना चाहते थे। लेकिन कुमारिल भट्ट ने प्रायश्चित की अवस्था में रहने के कारण शास्त्रार्थ से इन्कार करते हुए मंडन मिश्र के पास जाने का आग्रह किया था।

ग्रीक में गुरु-शिष्य परंपरा उर्ध्वमुखी थी। प्लेटो ने सुकरात को अपना गुरु माना लेकिन उनसे बंधकर नहीं रहे। इसी तरह अरस्तु के मन में अपने गुरु प्लेटो के प्रति गहरा सम्मान था। इसके बावजूद वह स्वतंत्र विचारक रहा। कह सकते हैं कि धोंडीराम गुरु-शिष्य की ब्राह्मणी परंपरा से सहमत नहीं थे। ‘वेदाचार’ में वे जिस तरह धर्मग्रंथों की अन्वीक्षा करते हैं, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि इतना प्रखर विश्लेषण किसी ब्राह्मण गुरु के सान्निध्य से संभव ही नहीं था। संभावना यह भी है कि उन्होंने संस्कृत का ज्ञान चाहे जिस माध्यम से प्राप्त किया हो, धर्मशास्त्रों का ज्ञान उनके अपने स्वाध्याय का फल था। इसके बावजूद यदि ब्राह्मण उनके स्वाध्याय और ज्ञान का सम्मान करते तो वे शायद उनके खेमे में बने भी रह सकते थे।

लेकिन महाराष्ट्र तो क्या देश के किसी भी हिस्से के ब्राह्मणों को किसी गैर-ब्राह्मण का उनके स्वयं-घोषित अधिकारक्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति नहीं था। वे तो संस्कृत को देवभाषा मानकर, उसे गैर-ब्राह्मणों के पढ़ने के भी विरोधी थे। फिर धोंडीराम को संस्कृत ज्ञान कैसे संभव हुआ था? गेल ऑम्वेट लिखती हैं कि ब्राह्मण अपने आलोचकों को अपने स्वर्णिम अतीत यानी वैदिक आर्यों के बारे में बताना चाहते थे। इसी के चलते कुछ सत्यशोधकों को वैदिक पढ़ाई करने का अवसर मिला था। लेकिन ब्राह्मण वेदों पर अपने एकाधिकार या उनके स्तर से समझौता करने को तैयार नहीं थे। इसकी परवाह न करते हुए धोंडीराम ने वेद-वेदांग संबंधी अपने ज्ञान का उपयोग ब्राह्मणों के श्रेष्ठत्व को चुनौती देने के लिए किया था।[30] यदि ऐसा है तो इससे धोंडीराम की अपने गुरु-मार्गदर्शक जोतीराव तथा सत्यशोधक समाज के सिद्धांतों के प्रति उनकी अनन्य निष्ठा की ही पुष्टि होती है।

ऐसे महामानव ही समय-शिला पर अपने पद-चिह्नों की छाप छोड़ पाते हैं।

संदर्भ

[1] धनञ्जय कीर, महात्मा जोतिराव फुले [1960; 75-76], पोपुलर प्रकाशन, मुंबई

[2] प्रो. श्रद्धा कुंभोजकर, पण्डित धोंडीराम नामदेव कुंभार, ए स्टडी इन पॉवर ऑफ लैग्वेज, जनवरी 2017

[3] जी.ए. उगले, सत्यशोधक चलवलीचा समग्र इतिहास [2022 : 325]

[4] 15वीं या 16वीं शताब्दी में एक बार, शृंगेरी के मुख्य स्वामी तीर्थयात्रा पर गए थे, संभवतः काशी के लिए। वे लंबे समय तक नहीं लौटे, जिसके कारण स्थानीय प्रमुखों ने उप प्रमुख से प्रमुख का पद संभालने के लिए कहा। लेकिन प्रमुख जीवित थे और इसलिए उन्होंने इनकार कर दिया। वह कूडली के पुराने मठ में चले गए। प्रमुख शंकराचार्य लंबे समय के बाद लौटे, तो वह अपने शिष्य से कूडली में मिले और घटनाओं के बारे में सुना। वह कूडली में ही रहे और तब से कुडली से गुरु परंपरा जारी रही। अब 1900 के दशक की शुरुआत में, मुख्य स्वामी का पद संभालने वाले स्वामी पहले मैसूर के महाराजा, कृष्णराज वोडेयार चतुर्थ के शिक्षक थे। अभिनव शंकर भारती स्वामी कूडली (कुडलगी) के 72वें पीठाधिपति हैं।

[5] पंडित धोंडीराम नामदेव, आहे ही सत्य ज्ञानाची पेव, येतां महाराजांना अनुभव, उतरला चेहरा॥ सत्यवादी मिळाला म्हणे आम्हां आज पुरा॥ ब्रह्मवृंदात आनंदाने, दिली मग द्वाही फिरवुनी॥ राहा धोंडीराम वंदुनी, आठवण धरा॥ सत्यशोधकांचा अनुभव घ्या करा त्वरा॥ धोंडीराम सांगतील त्यावत्, राहाटी चालवा समस्त, शिक्कामोर्तबासहित, सुचविते झाले॥ धर्माधिकारी शृंगेरी कुडलगीवाले। पंडित धोंडीराम नामदेव, तमाशा (1897) से श्रद्धा कुंभोजकर द्वारा उद्धृत (2017)

[6] पंडित धोंडीराम नामदेव कुंभार। शंकराचार्यसी मारूर टक्कर
केला वाद शास्त्राधार। घेतले जतपत्र मिलविला मोर्तवसिका
झाले सुभेसर। भीमराव महामुनि, जी.ए. उगले, सत्यशोधकांचे अंतरंग [2017 : 70]

[7] श्रद्धा कुंभोजकर, फारवर्ड प्रेस, सत्यशोधक पंडित धोंडीराम नामदेव कुंभार का धर्मचिंतन, 25 अगस्त 2025

[8] माधव सदाशिव गोरे, नॉन ब्राह्मण मूवमेन्ट इन महाराष्ट्र [1989 : 35]

[9] पंडित धोंडीराम नामदेव कुंभार, वेदाचार, पुरोगामी सत्यशोधक, अप्रैल-जून [1987 : 8], नाना पेठ, पुणे

[10] रा. धोंडीराम नामदेव व पंढरीनाथ आबाजी चव्हाण या उभयतांनी धूर्त लोक, अज्ञानी शूद्र जनांस कसे लुटतात याजवर आपले शक्त्यनुसार उपदेश केले. पैकी पहिले गृहस्थानी कविताद्वारे आणि दुसरे गृहस्थानी निबंधाद्वारे अज्ञानी जनास उपदेश करीत आहेत. सत्यशोधक समाज के पहले दो वर्षों की रिपोर्ट, महात्मा फुले समग्र वाङ्मय [2006 : 216], महाराष्ट्र राज्य साहित्य और संस्कृति मंडल, मुंबई.

[11] जी.ए. उगले, सत्यशोधकांचे अंतरंग [2017 : 68]

[12] ह्या 1894 साली धर्म-संबंधी कामें विटाळशा भटांशिवाय करण्यांत आली। हें पाहुन आसपासचे बहुतेक गावे रा रा सत्यशोधक पंडित धोंडिरामांची वाट पाहुन आहेत, यास्तव आपण कृपा करून पंडितास पाठविल्यास तीं हीं गांवे ब्रह्मराक्षेसांच्या दाढेंतून मुक्त होतील। श्रद्धा कुंभोजकर, सत्यशोधक पंडित धोंडिराम नामदेव कुंभार यांचे धर्मचिंतन द्वारा उद्धृत, परामर्श, अप्रैल [2023 : 227]

[13] लेविस सिडनी स्टीवार्ड ओ’मैली, पोपुलर हिन्दुइज्म [1935 : 221-222]

[14] काशीकर गंगाभट घाली डौल धर्माचा / केला खेल गारूड्याचा। छत्रपति शिवाजी राजा का पवाडा (1869)

[15] क्षेत्रवासी ह्मणोन नांव क्षत्रिय धरले/ क्षेत्री सुखी राहिले। छत्रपति शिवाजी राजा का पवाडा (1869)

[16] दीनबन्धु, 5 मई, 1895, सौजन्य से डॉ श्रद्धा कुंभोजकर, सावित्रीबाई फुले यूनीवर्सिटी, पुणे

[17] रोसलिंड ओ’हेनलॉन, कास्ट, कन्फलिक्ट, एंड आइडियोलॉजी [1985 : 296]

[18] श्रद्धा कुंभोजकर, मॉडर्निटी एण्ड पॉपुलर कल्चर इन महाराष्ट्र इन लेट 19’टीथ सेन्चुरी विद स्पेशल रेफरेंस टू मराठी थियेटर [2016 : 20 ]

[19] वेदाचार [1987 : 37]

[20] जी.ए. उगले, सत्यशोधक चलवलीचा समग्र इतिहास [2022 : 325]

[21] आमचे भूदेव ब्राह्मण लोक यांचेच यज्ञात अनेक तन्हेचे पशु-पक्षादी जीवजंतू बधले जातात। पशुपक्षीच काय परंतु यांचे पुरुषमेध नामे यज्ञात पूर्वी पुरुषदेखील बधीत होते व मनुष्यांनी कित्येक बेला बली अर्पण केलेली उदाहरणे यांच्या धर्म-ग्रंथांत पुष्कल सापडतात। तर असा जो हिंसक वैदिक धर्म त्याचे स्वरूप आमच्या अज्ञानावस्थेतील बांधवांच्या पुढे टेवून त्यांना याचा व सोहले करणाच्या ब्राह्मणांची ओलख करून। गोपालराव सावंत, वेदाचार [1987, प्रस्तावना]

[22] पहिले हे वेद, आणि वेद धर्म, कळूं आले वर्म, शोधिताना
शोधिताना सर्व, हा ब्रह्म घोटाळा, आला हा कसला, याज्ञिकांचा
याज्ञिक ते सर्व, भ्रष्ट व खादाडे, फोडिताती हाडें घाणेरडे
घाणेरडें लोक, वेद धर्मी सारें, कसाब तें पुरे, ऋषी बाळें। वेदाचार [1987 : 7 ]

[23] यज्ञात वाटे घालते वेळी हे ब्राह्मण लोक त्या वाट्याभोवती आमच्या महारमांगा प्रमाणे मिटक्या मारीत बसत असतील तेव्हा त्यांची स्थिती महार-मांगाप्रमाणे त्या वेलेस होत नसेल काय। आणि ती स्थिती यज्ञ करविणाज्या क्षत्रियांच्या दृष्टीस पडत नसेल काय? धिक्कार असो त्या यज्ञ करवून या खादाडांचे खळगे भरणारावर। वेदाचार [1987 :17]

[24] वेदाचार [1987 : 19]

[25] वेदाचार [1987 : 23-24]

[26] स्वामी दयानन्द, गोकरुणानिधिः [1998 : 8]

[27] जीन रॉबर्ट थर्सबी, हिन्दू मुस्लिम रिलेशन्स इन ब्रिटिश इण्डिया [1975 : 78-79]

[28] जीन रॉबर्ट थर्सबी, हिन्दू मुस्लिम रिलेशन्स इन ब्रिटिश इण्डिया [1975 : 78(फुटनोट)-79 ]

[29] बाग के पंडे प्यारे हुये, हय गोपालन हारे,
धेड़ बिचारे पेट के मारे, गौ मुये पर साते,
इसलिये ये पंडे उनके छांव से दूर रहते।
अंग्रेज सरकार गौं वधते हम लिये खाने के भाई,
उन्पे प्यार मुसलमिनों से नाहक करते लड़ाई,
गौमाता के ये भगवत गौ को नित रोज देते लाथा
उसके चमड़े का जुता पैनकर करते शेखिके बाता।

छुरी हात ले कसाई करते गौपे एकदम सल्ला
पन ये कलम कसायों का गौपालों पर नित रोज हल्ला। वेदाचार [1987 : 37]

[30] गेल ओमवेट, कल्चरल रिवोल्ट इन ए कोलोनियल सोसाइटी [1976 : 155]

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

ओमप्रकाश कश्यप

साहित्यकार एवं विचारक ओमप्रकाश कश्यप की विविध विधाओं की तैतीस पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। बाल साहित्य के भी सशक्त रचनाकार ओमप्रकाश कश्यप को 2002 में हिन्दी अकादमी दिल्ली के द्वारा और 2015 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के द्वारा समानित किया जा चुका है। विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में नियमित लेखन

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