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बिहार में किनकी जमीनों पर है सम्राट सरकार की नजर?

कारपोरेट परस्त राजनीति लंबे समय से ‘विकास’ के नाम पर भूमि को पूंजी में बदलने की राजनीति रही है। गुजरात से लेकर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश तक, हर जगह बड़े कॉरपोरेट प्रोजेक्ट्स के लिए जमीन अधिग्रहण को विकास का नाम दिया गया। बिहार में भी अब वही मॉडल उतारा जा रहा है। पढ़ें, अरुण आनंद की यह रपट

गत 22 अप्रैल, 2026 को बिहार में भाजपा की अगुवाई वाली सम्राट चौधरी सरकार ने अपनी पहली ही कैबिनेट मीटिंग में एक फैसला लिया। यह फैसला 11 प्रस्तावित ग्रीनफील्ड सैटेलाइट टाउनशिप क्षेत्रों के निर्माण से संबंधित था। इस फैसले के आलोक में सरकार ने इन क्षेत्रों में जमीन की खरीद-बिक्री, हस्तांतरण, प्लॉटिंग और नए निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी। ये क्षेत्र जिन जिलों में प्रस्तावित हैं, उनमें पटना, वैशाली, गया, दरभंगा, सहरसा, पूर्णिया, मुंगेर, मुजफ्फरपुर, छपरा, भागलपुर और सीतामढ़ी शामिल हैं।

सरकार ने इसी बहाने नाम बदलने की कवायद भी अघोषित रूप से की है। मसलन, पटना में पाटलिपुत्र, गया में मगध, वैशाली में हरिहर, दरभंगा में मिथिला, सहरसा में कोशी, मुंगेर में अंग, भागलपुर में विक्रमशिला, छपरा में सारण, मुजफ्फरपुर में तिरहुत और सीतामढ़ी में सीतापुरम् नाम से टाउनशिप बनाए जाएंगे। केवल पूर्णिया में प्रस्तावित टाउनशिप का नाम पूर्णिया रखा गया है। साथ ही, सरकार ने साफ कर दिया है कि बिहार भी अब उसी रास्ते पर धकेला जा रहा है जिस रास्ते पर भाजपा शासित राज्यों में जमीन, जल और संसाधनों को धीरे-धीरे कारपोरेट पूंजी के हवाले किया गया।

सम्राट चौधरी की सरकार इसे ‘आधुनिक बिहार’ और ‘योजनाबद्ध शहरीकरण’ का मॉडल बता रही है, लेकिन असल सवाल यह है कि यह विकास किसके लिए है? किसान के लिए या कारपोरेट घरानों के लिए?

अहम सवाल यह है कि उपरोक्त शहरों के आसपास जिन इलाकों को टाउनशिप के लिए चिह्नित किया गया है, वहां सबसे ज्यादा प्रभावित वही समुदाय होंगे जिन्हें भाजपा अपना ‘कोर वोटर’ मानती रही है – कुर्मी, कोइरी और भूमिहार। विडंबना यह है कि जिन सामाजिक समूहों ने भाजपा-जदयू राजनीति को जमीन दी, अब उसी जमीन पर सबसे पहला हमला उन्हीं के अस्तित्व पर हो रहा है।

गत 22 अप्रैल, 2026 को पहली कैबिनेट की बैठक में दो उपमुख्यमंत्रियों – विजय कुमार चौधरी और विजेंद्र यादव – के साथ ग्रीनफील्ड सेटेलाइट सिटी का प्रोजेक्ट मॉडल देखते मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी

कारपोरेट परस्त राजनीति लंबे समय से ‘विकास’ के नाम पर भूमि को पूंजी में बदलने की राजनीति रही है। गुजरात से लेकर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश तक, हर जगह बड़े कॉरपोरेट प्रोजेक्ट्स के लिए जमीन अधिग्रहण को विकास का नाम दिया गया। बिहार में भी अब वही मॉडल उतारा जा रहा है। यानी गांवों को रियल एस्टेट में बदलने का मॉडल।

विदित है कि गांवों में विषम परिस्थितियों में छोटे किसान अपनी थोड़ी-बहुत जमीन बेचकर इलाज कराते हैं, बेटी की शादी करते हैं, बच्चों को पढ़ाते हैं या कर्ज चुकाते हैं। लेकिन अब सरकार ने जमीन की बिक्री और रजिस्ट्री पर रोक लगाकर किसान के सबसे बड़े आर्थिक सहारे को ही जकड़ दिया है। जमीन उसकी है, लेकिन उस पर उसका आर्थिक अधिकार सीमित कर दिया गया है। यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा नियंत्रण है।

सरकार कह रही है कि किसानों को विकसित जमीन का 55 प्रतिशत हिस्सा वापस मिलेगा। लेकिन बिहार के गांवों में कौन किसान वर्षों तक इंतजार करने की क्षमता रखता है? किस छोटे किसान के पास इतने लंबे कानूनी संघर्ष और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से गुजरने की ताकत है? विकसित जमीन का असली लाभ वही उठाएगा जिसके पास पूंजी, राजनीतिक पहुंच और कानूनी समझ होगी। गरीब किसान अंततः वही विकसित प्लॉट औने-पौने दाम में बेचने को मजबूर होगा।

सबसे खतरनाक बात यह है कि बिहार के स्थानीय रियल एस्टेट कारोबारियों और छोटे निवेशकों को भी इस प्रक्रिया से बाहर किया जा रहा है। बाजार में यह चर्चा तेज है कि इन परियोजनाओं के निर्माण और विकास का बड़ा हिस्सा बड़े कॉरपोरेट घरानों को सौंपा जाएगा। यदि ऐसा होता है, तो बिहार की जमीन पर नियंत्रण स्थानीय समाज से निकलकर सीधे कॉरपोरेट पूंजी के हाथों में चला जाएगा।

बिहार में जमीन का वास्तविक बाजार मूल्य हमेशा सरकारी सर्किल रेट से अधिक होता है। यदि कल अधिग्रहण या मुआवजा सरकारी दरों पर तय हुआ, तो किसानों को उनकी जमीन की वास्तविक कीमत कभी नहीं मिलेगी। यह वही पुराना खेल है जिसमें किसान जमीन खोता है और कारपोरेट भविष्य का मुनाफा खरीद लेता है।

इतिहास गवाह है कि ऐसी परियोजनाओं की सूचना सबसे पहले सत्ता, अफसरशाही और बड़े निवेशकों के गंठजोड़ तक पहुंचती है। वे पहले से सस्ते में जमीन खरीद लेते हैं, फिर अधिसूचना के बाद वही जमीन कई गुना कीमत पर बिकती है। किसान को केवल विस्थापन मिलता है, जबकि बिचौलिया और पूंजीपति मालामाल हो जाते हैं।

जब सरकार बिक्री पर रोक लगाती है, तब आर्थिक संकट में फंसे किसान ‘अनौपचारिक समझौतों’ की तरफ धकेले जाते हैं। पावर ऑफ अटॉर्नी, एग्रीमेंट और बेनामी कब्जे का खेल शुरू होता है। ऊपर से कानून का नियंत्रण और नीचे से बिचौलियों का जाल – किसान दोनों तरफ से घिर जाता है।

नोएडा, गुरुग्राम और नई रायपुर जैसे मॉडल सामने हैं। वहां आरंभिक लाभ बिल्डरों, ठेकेदारों, अफसरों और राजनीतिक गंठजोड़ ने उठाया। मूल ग्रामीण समाज धीरे-धीरे हाशिए पर चला गया। खेती खत्म हुई, गांव खत्म हुए, लेकिन स्थायी रोजगार और सामाजिक सुरक्षा कभी नहीं आई। बिहार में भी वही प्रयोग दोहराया जा रहा है।

यह केवल शहरीकरण नहीं है। यह कृषि भूमि का वित्तीयकरण है। यह गांवों का रियल एस्टेटीकरण है। यह जमीन आधारित पूंजी निर्माण की ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसान अपनी पुश्तैनी जमीन से कट जाता है और उसकी जगह कॉरपोरेट पूंजी ले लेती है।

भाजपा और उसके सहयोगी इसे विकास कह सकते हैं, लेकिन बिहार के ग्रामीण समाज के लिए यह गहरी असुरक्षा का दौर है। खासकर उन जातीय समूहों के लिए, जिन्होंने दशकों तक जमीन को अपनी सामाजिक ताकत, सम्मान और अस्तित्व का आधार माना। आज वही जमीन सरकारी मास्टर प्लान और कॉरपोरेट निवेश की भाषा में ‘एसेट’ बनाकर देखी जा रही है।

यदि इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता, किसान की स्पष्ट सहमति, वास्तविक बाजार मूल्य पर मुआवजा और पुनर्वास की गारंटी नहीं दी गई, तो आने वाले वर्षों में बिहार का किसान अपनी ही जमीन पर मजदूर बनकर रह जाएगा, जबकि नई शहरी संपत्तियों पर कब्जा कारपोरेट, बिचौलियों और सत्ता-प्रशासनिक गठजोड़ का होगा।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अरुण आनंद

लेखक पटना में स्वतंत्र पत्रकार हैं

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