हाल में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अंडमान-निकोबार की यात्रा की। वहां के जंगलों में विचरण किया और वहां 80 हजार करोड़ की लागत से शुरू हुए ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से होने वाले विनाश की भयावह तस्वीरें खींची। उन्होंने वहां के मूल आदिवासी-निवासियों के अलावा सेटलर्स (बहिरागतों) का सवाल भी उठाया है। उनके द्वारा पर्यावरणीय संकट की बात कहना ठीक ही है, लेकिन मूल आदिवासी-निवासियों के लिहाज से इसे प्राथमिकता के तौर पर देखा जाना चाहिए।
मानव सभ्यता के लंबे दौर में वहां कई ऐसे आदिवासी समूह रहते आए हैं, जो दुनिया के लिए विलक्षण हैं। उनकी सभ्यता और हमारी सभ्यता के मध्य मूलभूत अंतर को देखा जाना चाहिए। हमारी सभ्यता तब से शुरू होती है, जब हमने खेती करनी शुरू की। इस क्रम में स्थाई गांव बने। श्रम का विभाजन हुआ और तरह-तरह की कलाओं का विकास हुआ। जबकि वहां के मूल आदिवासी आज भी खेती नहीं करते। जंगल, जंगल को घेरे समुद्र, समुद्री जीव, बनैले सूअर, मधु आदि उनके खाद्य पदार्थ हैं। अभी वहां व्यापक रूप से नारियल और सुपारी के पेड़ मिलने लगे हैं। ये पेड़ भी बाहर से आयातित पेड़ ही हैं। अंडमान निकाेबार के मूल आदिवासी अब भी हिरणों, बारहसिंघों व पक्षियों का शिकार नहीं करते। वे कपड़ों का प्रयोग भी नहीं करते हैं।
जबकि वहां बसे सेटलर्स हमारी दुनिया से ही गए लोग हैं। उनमें झारखंड से गए मुंडा, खड़िया, उरांव आदिवासी आदि हैं। लेकिन वे वहां के मूल आदिवासियों से भिन्न हैं और बदल गए हैं। इसके अलावा अंडमान निकोबार में रहनेवालों में बड़ी आबादी बंगालियों की है और दक्षिण भारत के विभिन्न राज्यों से आए तमिल, तेलुगु और कन्नड़ समुदाय के लोग भी।
गौरतलब है कि वहां बसे बहिरागतों में बहुत सारे लोगों को तो प्रारंभ में कैदियों की तरह ले जाया गया। कुछ को जबरिया तो कुछ को बहला-फुसला कर काम कराने ले गये, लेकिन बंगालियों में बड़ी आबादी भारत विभाजन के समय बंगाल से आए शरणार्थियों की है जिन्हें तत्कालीन बंगाल सरकार या अन्य राज्यों की सरकारों ने अपने यहां बसने की अनुमति नहीं दी तो उन्हें अंडमान में बसा दिया गया। हालांकि, शरणार्थी के रूप में बाहर से आए अभिजात वर्ग और साधन संपन्न लोग तो बंगाल में ही जमीन खरीद कर बस गए, लेकिन जो उतने साधन संपन्न नहीं थे, वे अंडमान में केंद्र सरकार द्वारा बसा दिए गए। वे मेहनतकश लोग ही हैं। जाहिर है, वहां के मूल आदिवासी और बाहर से वहां गए या बसाए गए लोगों के हितों में अंतर है। राहुल गांधी की मजबूरी यह है कि वे राजनेता हैं, इसलिए वहां के मूल आदिवासी और सेटलरों की समस्याओं को एक तरह से देखते हैं। जबकि कठोर वास्तविकता है कि वहां बसे सेटलरों का इस प्रोजेक्ट से कुछ खास बिगड़ने वाला नहीं, लेकिन बचे-खुचे मूल आदिवासियों का इस प्रोजेक्ट से विलुप्त हो जाने का खतरा है।

पहले हम यह जानें कि केंद्र सरकार का वह ग्रेट अंडमान निकोबार प्रोजेक्ट है क्या। इसके पहले यह जानकारी दे दूं कि इसी वर्ष जनवरी माह में मैंने भी अंडमान की यात्रा की थी। अंडमान-निकोबार की यात्रा के दौरान समुद्र तट से हमने चंद शंख, सीपियां चुने थे। लेकिन हम उन्हें ला नहीं पाए। अंडमान के हवाई अड्डे पर हमें अगाह किया गया कि यदि आपके पास यहां समुद्र तट से चुनी गयी सीपियां, शंख आदि हैं तो यहीं छोड़ जाएं। यहां से बस आप वह कुछ ही ले जा सकते हैं, जिन्हें आपने खरीदी हो और उसकी आपके पास रसीद हो। वरना आपकी यात्रा तो रद्द हो ही सकती है, आपको सजा भी हो सकती है। वहां बताया गया कि यहां का पूरा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह आदिवासियों के लिए सुरक्षित है। यहां से आप कुछ भी नहीं ले जा सकते।
विडंबना देखिये कि उसी निकोबार द्वीप में करीबन 90,000 करोड़ का ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट शुरू हो चुका है और वहां के समुद्र तट, भौगोलिकी, लाखों की संख्या में आदिम वृक्ष, समुद्री जीव, हजारों हजार वर्षों से वहां निवास करने वाले आदिवासी समुदाय मिटने के कगार पर हैं। यह परियोजना महज दो-तीन वर्ष पहले शुरू हुई थी और करीबन 72 हजार करोड़ की थी। महज तीन वर्षों में 90 हजार करोड़ की हो चुकी है। नोडल एजेंसी तो भले अंडमान-निकोबार द्वीप समूह एकीकृत विकास निगम है, लेकिन जाहिर तौर पर कारपोरेट कंपनियां निर्माण कार्य करेंगी। इन कंपनियों में अग्रणी है अडाणी की कंपनी। टाटा ग्रुप भी पीछे नहीं है। वह वहां ताज होटल बनाएगी।
पर्यावरणवादियों के विरोध की वजह से परियोजना का काम रूका हुआ था, लेकिन कुछ दिन पहले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने परियोजना की स्वीकृति दे दी है। बस उसने हिदायत दी है कि वहां पर्यावरण और आदिवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के बाद ही काम किया जाए। लेकिन क्या यह संभव है? केंद्र सरकार ने ही निकोबार द्वीप में दो बड़े-बड़े नेशनल पार्क बना रखें हैं– कैंपवेल नेशनल पार्क और गलेथिया नेशनल पार्क, जो करीबन 920 वर्ग किलोमीटर में अवस्थित है। अब उसी के 130 वर्ग किमी में इस परियोजना के तहत काम होना है, जिसके तहत वहां एक बंदरगाह, एक सैन्य व नागरिक एयरपोर्ट, उर्जा संयत्र और एक नगर बसाना है, जिसमें तीन से चार लाख की आबादी निवास कर सके।
अब आप कल्पना करें कि जिस द्वीप पर वर्तमान में महज 1000 के करीब मूल आदिवासी और 7000 मेन लैंड से गए लोग रहते हों, उस द्वीप पर चार लाख की आबादी को बसा दिया जाए, तो उसकी क्या गति होगी? क्या वे 130 वर्ग किलोमीटर में सिमट कर रह सकते हैं? बंदरगाह जहां बनेगा, वह लेदरबैक कछुओं का सबसे बड़ा प्रजनन केंद्र है। वहां चंद विलक्षण पक्षी बसते हैं, जिनमें से एक मेगापौंड पक्षी है जो समुद्र तटीय जंगल में मिट्टी का टीला बना कर अंडे देता है।
सबसे महत्वपूर्ण यह कि वह क्षेत्र दुनियां में वही बचे रह गये शौम्पेन आदिवासियों का निवास स्थल है। हमारी सभ्यता से दूर वे हजारों वर्षों से उस द्वीप में बसे हुए हैं। जैसे अंडमान द्वीप पर जारवा है। न हम उनकी भाषा जानते हैं, न हमारा उनसे किसी तरह का जीवंत संपर्क है। हम उनका पक्ष जानने-समझने की जरूरत भी नहीं समझते हैं। हमारे लिए उनका कोई मोल नहीं।
अब बंदरबाह की बात तो समझ में आती है, लेकिन उस द्वीप पर पांच लाख की आबादी के लिए टाउनशिप का निर्माण तो यही संकेत देता है कि सुरक्षा आदि की बातें तो महज बहाना है।
गैर-आदिवासी समाज से अंडमान के आदिवासियों का संघर्ष पुराना है। ईसा पूर्व छह सौ वर्ष के करीब भारत में सम्राट अशोक का शासन था और उस जमाने में व्यापारियों के दल ने अशोक से शिकायत की थी कि अंडमान के आदिवासी उनको परेशान करते हैं। दरअसल दक्षिण के व्यापारी उसी समुद्री मार्ग से आते-जाते थे और अंडमान द्वीप में अपने जहाजों का लंगर डालते थे। वे उनके इलाके में जाते थे। मान कर चलते थे कि वे जंगली लोग हैं और वे वहां कुछ भी कर सकते हैं।
इतिहास में दर्ज है कि मुगल काल में भारत में व्यापार करने आई ईस्ट इंडिया कंपनी को महज दक्षिण भारत के किसी बंदरगाह पर लंगर डालने के लिए कितनी गुहारें राजदरबार में करनी पड़ी थीं। तो आप यदि आदिवासी क्षेत्र में जाते हैं तो किसी तरह का प्रतिरोध कैसे नहीं होगा। इस वजह से बहिरागतों और वहां के मूल निवासियों के बीच के रिश्ते हमेशा से तनावपूर्ण रहे हैं। झारखंड से वहां जाकर बसे आदिवासी समूहों से उनके रिश्ते भरसक अब सहज हैं, लेकिन शुरुआती दौर में संबंध टकरावपूर्ण ही थे, क्योंकि वे अंग्रेजों के कारिंदे या सैनिक बन कर वहां गए थे।
जो भी हो, विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया है, इसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं। संसदीय प्रणाली में विरोध का यह भी एक कारगर तरीका हो सकता है, यदि वे इस सवाल को सतत उठाते रहते हैं।
(संपादन : नवल/अनिल)
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