[बीते 27 अप्रैल, 2026 ओडिशा के क्योंझर जिले से एक ऐसी घटना सामने आई, जिसने मानवता को शर्मसार किया। यह मामला तब सामने आया जब एक अधेड़ आदिवासी जीतू मुंडा अपनी बहन कलारा मुंडा की कंकाल को कंधे पर लेकर ओडिशा ग्रामीण बैंक की एक शाखा में पहुंचे। बैंक में उनकी बहन के खाते में 19 हजार 402 रुपए जमा थे, जिनका निधन इस वर्ष जनवरी महीने में हो गई थी। वह अपने पति और बेटे के निधन के बाद जीतू मुंडा के साथ ही रहती थीं। अपनी मृत बहन के खाते से पैसे निकालने के लिए जब जीतू मुंडा पहुंचे तब बैंक ने उनसे उनकी बहन का मृत्यु प्रमाण पत्र मांगा। इससे जब सोशल मीडिया यह वीडियो वायरल हुआ तब बैंक ने जीतू मुंडा को रुपए दिये। पढ़ें, अश्विनी कुमार पंकज के शब्दों में इस घटना का निहितार्थ]
जीतू मुंडा से जुड़ी इस घटना को यदि केवल एक अशिक्षित आदिवासी की अकल्पनीय आदिम प्रवृत्ति और प्रशासन की निर्मम कार्रवाई के रूप में देखा जाएगा, तो हम उसकी वास्तविकता को समझने से चूक जाएंगे। यह घटना दरअसल उस लंबे ऐतिहासिक और संरचनात्मक तनाव का वर्तमान रूप है, जिसमें एक ओर राज्य और उसका कागज़ी तंत्र है, और दूसरी ओर आदिवासी समाज का जीवित अनुभव, स्मृति और प्रकृति से जुड़ा संबंध। यह घटना हमें बताती है कि चाहे बैंक का मैनेजर हो या अमृत काल का सुप्रीम मैनेजर, दोनों का व्यवहार आदिवासियों के साथ एक जैसा है। इसलिए इस पूरे संदर्भ को ‘कागज़ बनाम आदिवासी’ के रूप में समझना जरूरी है, जिसकी जड़ें आदिवासियों के ऐतिहासिक संघर्षों में पैवस्त है।
आधुनिक राज्य की पूरी संरचना कागज़ पर टिकी हुई है। जमीन का स्वामित्व, अधिकार, सीमाएं आदि सब कुछ नक्शों, सर्वेक्षणों और दस्तावेज़ों से तय होता है। कागज़ यहां केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि सत्य का निर्णायक आधार है। जो कागज़ पर है, वही मान्य है; जो नहीं है, वह मानो अस्तित्वहीन है। इसके विपरीत, आदिवासी समाज के लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं और नैसर्गिक इंसानी अधिकार मात्र कोई हक-हकूक नहीं, बल्कि जीवन का आधार, पूर्वजों की स्मृति और सामुदायिक अस्तित्व का केंद्र है। उनका संबंध भूमि से स्वामित्व का नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व का है। एक ऐसा रिश्ता जो पीढ़ियों से चलता आया है और जिसे किसी दस्तावेज़ में सीमित नहीं किया जा सकता।
यहीं से टकराव की शुरुआत होती है। जब राज्य यह कहता है कि “आपके पास इस भूमि का कागज़ी प्रमाण नहीं है” तो वह केवल एक कानूनी तथ्य नहीं बता रहा होता, बल्कि अनजाने में एक पूरे जीवन-तंत्र को नकार रहा होता है। और जब आदिवासी समाज इसका प्रतिरोध करता है, तो वह केवल भूमि के लिए नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और अपनी स्मृति के लिए खड़ा होता है। जीतू मुंडा का प्रकरण इसी टकराव का एक सजीव उदाहरण है।

इस संदर्भ को समझने के लिए मुंडा समाज की एक महत्वपूर्ण किंवदंती को याद करना उपयोगी है। औपनिवेशिक काल में, जब अदालतों में भूमि के मुकदमों में मुंडा समुदाय हारने लगा, क्योंकि उनके पास लिखित पट्टे नहीं थे, तब उन्होंने अपने पूर्वजों के ससनदिरी, यानी स्मृति पत्थरों को उखाड़कर कोलकाता ले गए और बड़े लाट के सामने प्रस्तुत कर दिया। ये पत्थर केवल कब्र नहीं थे; वे इतिहास थे, वंशावली थे, और उस सतत उपस्थिति का प्रमाण थे जो पीढ़ियों से उस भूमि पर बनी हुई थी। मुंडाओं ने बड़े लाट से कहा– “यही हमारे पुरखा पट्टे और कागज़ हैं, हमारा इतिहास इसी में लिखा हुआ है।”
यह प्रसंग बताता है कि आदिवासी समाज में अधिकार और इतिहास ‘लिखे’ नहीं जाते, बल्कि ‘स्थापित’ होते हैं जमीन, पत्थर और स्मृति में। औपनिवेशिक कानून इस भाषा को समझ नहीं सके। उनके लिए सत्य वही था जो कागज़ पर दर्ज हो। यही कारण है कि अनेक मुकदमों में आदिवासी समुदायों को हार का सामना करना पड़ा।
औपनिवेशिक काल के दौरान जो भी उपनिवेश-विरोधी युद्ध (हूल, उलगुलान, भूमकाल आदि) विभिन्न आदिवासी समुदायों ने लड़े, वे मूलतः इसी ‘कागज़ के राज’ के खिलाफ थे। यह केवल राजनीतिक नियंत्रण का प्रश्न नहीं था, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ था जो भूमि को नक्शों और दस्तावेज़ों में बांधकर उसे एक वस्तु में बदल देना चाहती थी। आदिवासी समाज के लिए यह स्वीकार करना असंभव था कि उनके जंगल, उनकी नदियां और उनकी धरती केवल किसी कागज़ में दर्ज होकर ही वैध बनें। उनके युद्ध जीवन के पक्ष में थे – कागज़ी सत्ता के विरुद्ध।

आजादी के बाद भी स्थिति पूरी तरह नहीं बदली। भले ही पेसा और वनाधिकार कानून जैसे कानून मौजूद हैं, परंतु उनका क्रियान्वयन अक्सर कागज़ी तर्कों में उलझा रहता है। ग्राम सभा की भूमिका कई बार औपचारिकता बन जाती है, और पारंपरिक अधिकारों को साबित करने के लिए फिर से दस्तावेज़ों की मांग की जाती है। यहीं पर इस पूरे विमर्श का एक और महत्वपूर्ण आयाम सामने आता है, आर्थिक और संस्थागत असमानता का आयाम। ग्रामीण बैंक, जिन्हें विशेष रूप से गांवों और छोटे लोगों की जरूरतों के लिए परिकल्पित किया गया था, अक्सर उन्हीं लोगों के साथ सबसे कठोर व्यवहार करते दिखाई देते हैं। हजार-दस हजार रुपए के छोटे ऋणों के लिए ग्रामीणों से कड़े प्रमाण, गारंटी और औपचारिकताओं की मांग की जाती है। मामूली चूक पर नोटिस, दबाव और कभी-कभी आपराधिक कार्रवाई तक की स्थिति बन जाती है। इसके विपरीत, बड़े पूंजीपति और उद्योगपति, जिनके पास संसाधन, संपर्क और कानूनी ताकत है, बैंकों से अरबों रुपए के ऋण लेकर भी व्यवस्था से बच निकलते हैं। कई मामलों में वे देश छोड़कर चले जाते हैं, और बाद में उन्हीं ऋणों को ‘पुनर्गठन’ या ‘राइट-ऑफ’ के नाम पर माफ कर दिया जाता है। यह विडंबना केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक भी है। एक ओर हजारों ग्रामीण छोटे-छोटे ऋणों के बोझ तले दबे रहते हैं, तो दूसरी ओर बड़े कॉरपोरेट घरानों के लिए नियम लचीले हो जाते हैं।
इस असमानता का एक और क्रूर पहलू न्यायिक प्रक्रिया है। हजारों ऐसे ग्रामीण, विशेषकर आदिवासी इलाकों में वर्षों तक बिना मुकदमे के जेलों में बंद रहते हैं। उनके पास न तो कानूनी सहायता होती है, न ही अपने पक्ष को प्रभावी ढंग से रखने के साधन। यह स्थिति ‘कागज़ बनाम इंसान’ के संघर्ष को और भी गहरा कर देती है, क्योंकि यहां कागज़ केवल जमीन का नहीं, बल्कि न्याय का भी निर्धारक बन जाता है। हालिया उदाहरणों के तौर पर आप सर्वोच्च न्यायालय के कुछ फैसलों को देख सकते हैं जिनमें राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद से लेकर बंगाल चुनाव में 27 लाख नागरिकों को वोट से बेदखल कर देने के मामले शामिल हैं।
जीतू मुंडा के संदर्भ में देखें तो यह प्रश्न और भी तीखा हो जाता है। यदि मामला केवल लगभग 20 हजार रुपए जैसी अपेक्षाकृत छोटी राशि का था, तो क्या यह इतनी बड़ी बात थी कि एक ग्रामीण बैंक उसके शब्दों और सामाजिक विश्वसनीयता पर विश्वास न कर सके? क्या यह वह स्तर था जहां संवाद, समझ और लचीलापन अपनाया जा सकता था? इस संदर्भ में बैंक का कठोर रुख केवल एक संस्थागत प्रक्रिया नहीं, बल्कि उस व्यापक मानसिकता का संकेत है, जिसमें गरीब और वंचित लोगों के प्रति अविश्वास सहज माना जाता है।
यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि गैर-आदिवासी और औपनिवेशक शासन पद्धति पर आधारित शासन व्यवस्था के भीतर भी कागज़ और कानून अपने आपमें समस्या हैं। हालांकि दावा यही किया जाता रहा है कि वे समाज को व्यवस्था और सुरक्षा देने के लिए आवश्यक हैं। लेकिन जब वे जीवन के अनुभव को नकारने लगते हैं, जब वे असमान रूप से लागू होते हैं, और जब वे शक्तिशाली और कमजोर के बीच अलग-अलग व्यवहार करते हैं, तब वे न्याय के साधन नहीं, बल्कि असंतुलन के औजार बन जाते हैं।
पत्थलगड़ी की परंपरा को इसी संदर्भ में समझना चाहिए। यह केवल एक सांस्कृतिक प्रतीक नहीं, बल्कि एक गहरा कथन है कि इतिहास, अधिकार और पहचान केवल दस्तावेज़ों में नहीं, बल्कि जमीन और स्मृति में भी दर्ज होते हैं। यह उस आदिवासी आवाज़ का रूप है जो कहती है– “हम यहां हैं, और हमारा अस्तित्व किसी कागज़ पर निर्भर नहीं है।”
जीतू मुंडा का वर्तमान प्रकरण हमें एक बुनियादी और ऐतिहासिक प्रश्न के सामने खड़ा करता है–
- क्या हमारी व्यवस्था इतनी संवेदनशील और न्यायपूर्ण है कि वह विविध संस्कृतियों के अनुभवों को समझ सके?
- क्या उन आदिवासियों को जान सके जिनके जीवन और शब्दकोश में ‘झूठ’, ‘प्रपंच’, ‘लूट-हत्या’, ‘असमानता’ जैसी अवधारणाएं नहीं हैं?
- या फिर वह केवल उसी को स्वीकार करेगी जो उसके कागज़ी ढांचे में फिट बैठता है?
अफसोस तब और बढ़ जाता है जब जीतू मुंडा को केवल ‘गरीब’ ‘अनपढ़’ या सरकारी प्रक्रिया से अनजान एक मूर्ख व्यक्ति की तरह उद्धृत करते हैं और प्रकारांतर से वही नस्लीय और औपनिवेशिक नैरेटिव को पुष्ट किया जाता है कि देखो ‘बेचारे आदिवासी ऐसे होते हैं’!
परंतु जीतू मुंडा की यह घटना कोई बेचारगी भरी अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। आदिवासी पूर्वजों की वही ऐतिहासिक चेतावनी, जो हमें याद दिलाती है कि यदि हम कागज़ को ही अंतिम सत्य मानते रहेंगे और इंसान के अनुभव को नजरअंदाज करते रहेंगे, तो असमानता और संघर्ष बढ़ते रहेंगे। और, कागज़ बनाम आदिवासी संघर्ष सत्ता के हर ‘अमृत काल’ में भी जीतू मुंडा के रूप में आकर सामने खड़ा होता रहेगा।
(संपादन : नवल/अनिल)
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