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रांची में स्टेन स्वामी की जयंती पर एसआईआर और परिसीमन का विरोध

अपने संबोधन में डॉ. परकला प्रभाकर ने कहा कि असम में जहां केवल स्पेशल रिवीजन (एसआर) हुआ, वहां सीमित स्तर पर नाम हटे, लेकिन जिन राज्यों में एसआईआर लागू हुआ, वहां बड़े पैमाने पर मतदाताओं को हटाया गया है। एसआईआर का निशाना सबसे ज्यादा मुस्लिम, दलित, आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर लोग बनाए जा रहे हैं, जो हिंदुत्ववादी राणनीति का एक हिस्सा है। पढ़ें, विशद कुमार की यह खबर

बीते 25-26 अप्रैल को स्टेन स्वामी (26 अप्रैल,1937 – 5 जुलाई, 2021) को उनकी जयंती के मौके पर याद किया गया। हर बार की तरह ही रांची के बगइचा (नामकुम) में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें इस बार भी सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों, पत्रकारों और आम लोगों ने उनके संघर्ष को याद किया। इस बार चर्चा के केंद्र में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और परिसीमन का मुद्दा रहा।

बताते चलें कि फादर स्टेन स्वामी मानवाधिकार कार्यकर्ता थे, जिन्होंने अपना अधिकांश जीवन झारखंड में आदिवासियों व दलित समुदायों के अधिकारों के लिए समर्पित कर दिया। स्टेन स्वामी ने ‘विस्थापन विरोधी जनविकास आंदोलन’ की स्थापना की, जो आदिवासियों को उनकी भूमि से विस्थापित किए जाने के खिलाफ लड़ने वाला एक मंच है। उन्होंने खनन परियोजनाओं के कारण विस्थापित होने वाले समुदायों के लिए सतत विकास मॉडल की वकालत की। इसके अलावा उन्होंने 1996 में ‘झारखंड ऑर्गनाइजेशन अगेंस्ट यूरेनियम रेडिएशन’ के माध्यम से यूरेनियम कॉर्पोरेशन के खिलाफ अभियान चलाया, जिससे चाईबासा में बांध का निर्माण रुक सका और आदिवासियों का विस्थापन बचा।

लेकिन अक्टूबर, 2020 में, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने उन्हें 2018 की भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में कथित संलिप्तता और माओवादियों से संबंधों के आरोप में गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किया था। वे 84 वर्ष की उम्र में पार्किंसंस रोग और कोविड-19 जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे। बार-बार जमानत याचिकाएं खारिज होने के बाद, 5 जुलाई, 2021 को न्यायिक हिरासत के दौरान ही मुंबई के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया।

खैर, उनकी जयंती के अवसर पर झारखंड जनाधिकार महासभा और बगाईचा सोशल सेंटर द्वारा 25-26 अप्रैल को दो-दिवसीय जन कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस दो दिवसीय कार्यक्रम के तहत स्टेन स्वामी को पुष्पांजलि और स्मरण गीत के साथ शुरू हुए दोनों सत्र में प्रख्यात अर्थशास्त्री और राजनीतिक सामाजिक आलोचक डॉ. परकला प्रभाकर का व्याख्यान हुआ। अपने व्याख्यान में उन्होंने झारखंड में प्रस्तावित एसआईआर के विरोध और उसके दुष्प्रभावों से बचने के लिए रणनीति एवं कार्ययोजना पर विस्तृत चर्चा की। डॉ. प्रभाकर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति हैं।

उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि एसआईआर मतदाता सूची के ‘शुद्धिकरण’ का साधन नहीं, बल्कि एक योजनाबद्ध तरीके से मतदाताओं को हटाने की प्रक्रिया है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मुख्य चुनाव आयुक्त के स्तर पर यह कहा जा रहा है कि एसआईआर पर कोई निर्णय नहीं हुआ है, तो यह प्रक्रिया किस आधार पर चल रही है? वर्ष 2002-03 में भी मतदाता सूची का पुनरीक्षण हुआ था, लेकिन उस समय लोगों से इस तरह के दस्तावेज़ नहीं मांगे गए थे। आज अचानक दस्तावेज़ आधारित सत्यापन की शर्त क्यों?

मंचासीन डॉ. परकला प्रभाकर (मध्य में) व अन्य

उन्होंने बताया कि असम में जहां केवल स्पेशल रिवीजन (एसआर) हुआ, वहां सीमित स्तर पर नाम हटे, लेकिन जिन राज्यों में एसआईआर लागू हुआ, वहां बड़े पैमाने पर मतदाताओं को हटाया गया है। एसआईआर का निशाना सबसे ज्यादा मुस्लिम, दलित, आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर लोग बनाए जा रहे हैं, जो हिंदुत्ववादी राणनीति का एक हिस्सा है।

पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए डाॅ. परकला प्रभाकर ने बताया कि जब दस्तावेज़ के आधार पर नाम हटाना मुश्किल हुआ, तो ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ (नाम, उम्र आदि में अंतर) के आधार पर लाखों लोगों को सूची से बाहर कर दिया गया, जिनका समाधान अब तक नहीं हुआ और वे लोग मतदान से वंचित रह गए। उन्होंने जोर देकर कहा कि हमारी भूमिका एसआईआर को स्वीकार करने की नहीं, बल्कि इसका विरोध करने की होनी चाहिए। यदि इसे पूरी तरह रोकना संभव न हो, तब भी इसके दुष्प्रभाव कम करने और इसकी मंशा को उजागर करने के लिए सक्रिय हस्तक्षेप जरूरी है। उन्होंने चुनाव आयोग के मैनुअल का हवाला देते हुए कहा कि मतदाता सूची का सत्यापन ग्राम सभा और वार्ड सभा के माध्यम से होना चाहिए।

इस कार्यक्रम दौरान कर्नाटक से आए तारा राव (एड्डेलु, कर्नाटक) और पश्चिम बंगाल से आई कस्तूरी ने अपने-अपने राज्यों के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि एसआईआर जैसी प्रक्रियाओं को जमीनी स्तर पर कैसे चुनौती दी जा सकती है और उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अभी से संगठित होकर तैयारी करें क्योंकि ‘हमारा हक है जानना’ के सिद्धांत पर सार्वजनिक जवाबदेही तय करें और हर स्तर पर प्रक्रिया की निगरानी रखें।

इस कार्यक्रम में चर्चा के दौरान यह बात मुख्य रूप से उभरी कि वोट अधिकार और नागरिकता बचाने की लड़ाई राजनीतिक दलों के भरोसे नहीं, नागरिकों की एकजुट पहल से ही आगे बढ़ सकती है। चर्चा में परिसीमन के खतरों को भी पहचाना गया। परिसीमन से ऐसी परिस्थिति भी आ सकती है कि दक्षिण और कुछ अन्य प्रांतों में एक भी सीट नहीं आने पर भी, दो-तीन राज्यों के बहुमत से भी पूरे भारत की सरकार बन सकती है। तब कुछ प्रांत विशेष सुविधा पाएंगे और कुछ राज्य हमेशा वंचित रह जाएंगे।

कार्यक्रम के अंत में जनघोषणा सर्वसम्मति से पारित हुई जिसमें एसआईआर को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे वोट के बुनियादी अधिकार पर हमला बताया गया। मांग की गई कि मतदाता सूची का सत्यापन केवल ग्राम सभा/वार्ड सभा से हो, खतियान व वंशावली को वैध दस्तावेज़ माना जाए और एक भी योग्य मतदाता का नाम न हटे।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

विशद कुमार

विशद कुमार साहित्यिक विधाओं सहित चित्रकला और फोटोग्राफी में हस्तक्षेप एवं आवाज, प्रभात खबर, बिहार आब्जर्बर, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, सीनियर इंडिया, इतवार समेत अनेक पत्र-पत्रिकाओं के लिए रिपोर्टिंग की तथा अमर उजाला, दैनिक भास्कर, नवभारत टाईम्स आदि के लिए लेख लिखे। इन दिनों स्वतंत्र पत्रकारिता के माध्यम से सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तन के लिए काम कर रहे हैं

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