समाज में प्रतीकों का महत्व हमेशा से रहा है तथा समाज की पहचान और प्रतिष्ठा को बढ़ाने में प्रतीक अहम रोल निभाते हैं। प्रतीक समाज की दिशा भी तय करते हैं। चूंकि राजनीतिक पार्टियों को भी समाज की जरूरत होती है इसलिए पार्टियां भी इन प्रतीकों का उपयोग सधे हुए तरीके से समाज को स्वयं से जोड़ने के लिए प्रयोग करती हैं। इसे राजनीतिक लाभ उठाना भी कहते हैं। उत्तर प्रदेश में भी मूर्तियों को लेकर राजनीति जारी है तथा इन्हीं मूर्तियों के बहाने आगामी विधानसभा के चुनाव को साधने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि यह कोई नई बात नहीं है। ऐसा पहले भी हुआ है।
हाल ही में गत 29 मार्च, 2026 को समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश के नोएडा के दादरी स्थित गुर्जर नरेश महाराजा मिहिर भोज कॉलेज में ‘समाजवादी भाईचारा रैली’ आयोजित की। इस रैली के संयोजक समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजकुमार भाटी थे। रैली में भारी भीड़ जुटी और पूरे परिसर के साथ आसपास के गांव भी समाजवादी पार्टी के लाल झंडों से पटे नजर आए। माना जा रहा है कि यह रैली 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी के अभियान की शुरुआत थी।
हालांकि, रैली के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा उस घटना की हुई, जिसमें अखिलेश यादव ने राजा मिहिर भोज की प्रतिमा का एक खास तरीके से शुद्धिकरण कराया। राजकुमार भाटी के मुताबिक, प्रतिमा को अनूपशहर स्थित रुक्मणी कुंड के जल से पवित्र किया गया। इस स्थान को छोटी गंगा कहा जाता है और मान्यता है कि यहां कृष्ण और रुक्मिणी का विवाह हुआ था। दावा किया गया कि इससे पहले प्रतिमा को अपवित्र किया गया था। यहां कृष्ण और रुक्मिणी की कथा का जिक्र इसलिए भी अहम था, क्योंकि यादव समुदाय खुद को भगवान कृष्ण का वंशज मानता है। इस तरह राजकुमार भाटी ने यादव और गुर्जर समुदाय के बीच भाईचारे का संदेश देने की कोशिश की। इस रैली के जरिए अखिलेश यादव ने गुर्जर समाज को संदेश दिया और वादा किया कि अगर उनकी सरकार बनी तो लखनऊ में राजा मिहिर भोज की प्रतिमा लगाई जाएगी।
दरअसल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लंबे समय से यह विवाद चलता रहा है कि राजा मिहिर भोज राजपूत थे या गुर्जर। यह विवाद 2021 में ज्यादा तेज हुआ, जब दादरी में सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा का अनावरण स्वयं मुख्यमंत्री के हाथों से होना था। आरोप है कि उद्घाटन से पहले प्रतिमा पर लगे नाम से गुर्जर शब्द हटा दिया गया। इसके बाद अखिल भारतीय वीर गुर्जर महासभा ने विरोध किया और कहा कि 9वीं सदी के राजा मिहिर भोज गुर्जर थे। दूसरी ओर, राजपूत समाज से जुड़ी करणी सेना ने दावा किया कि वे राजपूत थे। इससे दोनों जातियों के बीच तनाव बढ़ गया।

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर विपक्ष लगातार उनके राजपूत होने को लेकर हमला करता रहा है। उनके ऊपर यह आरोप भी लगता रहा है कि वे खास तौर पर अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई जैसे मामलों में राजपूत समाज का पक्ष लेते हैं। यही वजह है कि विपक्ष, खासकर समाजवादी पार्टी, इस विवाद को उभारना चाहती है, ताकि उसे गुर्जर समाज का समर्थन मिल सके। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर मतदाता बड़ी संख्या में हैं, खासकर जाट जाति के जयंत चौधरी के भाजपा के साथ जाने के बाद उनकी राजनीतिक अहमियत और बढ़ गई है। योगी सरकार को अपने ही कुछ सहयोगियों से भी असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। उदाहरण के तौर पर, केशव प्रसाद मौर्य ने मिहिर भोज जयंती पर लोगों को ‘गुर्जर सम्राट मिहिर भोज’ कहकर शुभकामनाएं दीं, जबकि योगी आदित्यनाथ ने केवल ‘राजा मिहिर भोज’ कहा।
एक और घटना मेरठ जिले के सिकोही गांव में हुई, जहां जाट पंचायत का आयोजन किया गया। इसमें हनुमान बेनीवाल, संजीव बालियान और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान जैसे नेता शामिल हुए। यहां पंचायत के कार्यक्रम में महाराजा सूरजमल की प्रतिमा का अनावरण भी होना था। महाराजा सूरजमल 17वीं सदी के जाट शासक थे, जिन्होंने भरतपुर रियासत पर शासन किया और मुगलों को चुनौती दी थी। लेकिन यहां भी विवाद खड़ा हो गया, क्योंकि प्रतिमा के शिलालेख से ‘जाट’ शब्द हटाने पर सभा में आए लोगों में नाराजगी पैदा हो गई तथा उन्होंने इसका विरोध किया। भगवंत मान ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरा तथा हनुमान बेनीवाल ने तो योगी सरकार को हटाने की धमकी दे डाली। बाद में प्रशासन ने आश्वासन दिया कि दस दिन के भीतर संशोधित शिलालेख फिर से लगा दिया जाएगा। विपक्ष को यहां भी योगी सरकार पर जाट समाज की भावनाओं और इतिहास से खिलवाड़ का आरोप लगाने का मौका मिल गया।
असल में इस इलाके में जाट और राजपूत राजनीति में पहले से ही टकराव चल रही है। संजीव बालियान और संगीत सोम के बीच निजी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता भी है। संगीत सोम, जो राजपूत समुदाय से आते हैं, उन्होंने आरोप लगाया था कि 2022 के विधानसभा चुनाव में सरधना सीट से उनकी हार के पीछे संजीव बालियान की भूमिका थी। वहीं संजीव बालियान ने 2024 के लोकसभा चुनाव में मुजफ्फरनगर सीट से अपनी हार के लिए संगीत सोम को जिम्मेदार ठहराया। बताया जाता है कि इस कार्यक्रम में संजीव बालियान ने अपने समर्थकों से आगामी चुनाव में हार का बदला लेने की बात भी कही।
भाजपा ने भी लखनऊ के राष्ट्र प्रेरणा स्थल पर तीन प्रतिमाएं स्थापित की हैं– अटल बिहारी वाजपेयी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय की। इनका अनावरण 25 दिसंबर, 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। ये तीनों नेता ब्राह्मण समाज से थे, जिसे लेकर विपक्ष और आम लोगों के बीच राजनीतिक बहस छिड़ गई। इसके जवाब में योगी सरकार ने बजट सत्र के दौरान 500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया, ताकि संत रविदास, महर्षि वाल्मीकि और बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की नई प्रतिमाएं लगाई जा सकें और उनसे जुड़े स्थानों का विकास व जीर्णोद्धार किया जा सके। इसे उन समाजों को साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, जो इन संतों और महापुरुषों को श्रद्धा से मानते हैं।
उत्तर भारत में अलग-अलग जातियों और समुदायों से जुड़े संतों और समाज सुधारकों की लंबी परंपरा रही है लेकिन जब राजनीतिक दल इन महापुरुषों का नाम लेते हैं, तो अक्सर उसके पीछे जातीय पहचान और उस जाति की राजनीतिक जागरूकता का हिसाब-किताब भी छिपा होता है। जाटव समुदाय, जो दलितों में सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली समुदायों में गिना जाता है, संत रविदास से गहरा जुड़ाव महसूस करता है। इसी तरह वाल्मीकि समाज का उत्तर प्रदेश की कई विधानसभा और लोकसभा सीटों पर असर है, खासकर कानपुर, आगरा और हाथरस जैसे इलाकों में। पहले इन जातियों का बड़ा हिस्सा कांशीराम के नेतृत्व में राजनीतिक रूप से संगठित हुआ और बहुजन समाज पार्टी का वोटर बना। लेकिन बसपा के लगातार कमजोर होने के बाद अब दूसरे दल भी इन वोटरों को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रहे हैं। हाल ही में योगी आदित्यनाथ ने सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में बाबासाहेब की प्रतिमाओं पर छत्र लगाने के लिए 403 करोड़ रुपए जारी किए। इसे विधानसभा चुनाव से पहले अनुसूचित जाति के वोटरों को खुश करने की कोशिश माना जा रहा है।

मूर्तियों की राजनीति में बसपा का अपना अलग इतिहास रहा है। कांशीराम और बसपा ने उत्तर प्रदेश में प्रतिमाओं की राजनीति को आत्मसम्मान और सामाजिक पहचान के प्रतीक के रूप में खड़ा किया। पार्टी ने पूरे प्रदेश के कई गांवों में डॉ. आंबेडकर के साथ-साथ अनेक बहुजन महापुरुषों की प्रतिमाएं लगवाकर बहुजन समाज को एकजुट करने की कोशिश की। अपने शासनकाल में बसपा ने राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल और ग्रीन गार्डन का निर्माण कराया, जिसे कई लोग आंबेडकर पार्क के नाम से भी जानते हैं। इसे बहुजन समाज के समाज सुधारकों को समर्पित किया गया था, जहां डॉ. आंबेडकर, कांशीराम सहित अनेक नायकों की प्रतिमाएं लगाई गईं।
इसी परिसर में मायावती की प्रतिमा भी लगाई गई, जो बाद में बड़े विवाद का कारण बनी। विपक्ष ने मायावती पर आरोप लगाया कि उन्होंने जनता के टैक्स के पैसे से अपनी मूर्तियां बनवाईं। माना जाता है कि इससे बसपा की छवि को नुकसान पहुंचा और बाद के विधानसभा चुनाव में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा, जिससे वह आज तक नहीं उबर सकी है। आज भी डॉ. आंबेडकर की प्रतिमाओं से छेड़छाड़ या उन्हें नुकसान पहुंचाना संवेदनशील मुद्दा बना रहता है, क्योंकि जहां एक वर्ग उन्हें मुक्ति दिलाने वाले एक महान नेता और गर्व के प्रतीक के रूप में पूजता है, तो वहीं कुछ लोग मानते हैं कि उन्होंने उनके सामाजिक वर्चस्व और जन्म के आधार पर बनी ऊंच-नीच की व्यवस्था को चुनौती दी तथा उनके विशेषाधिकार को खत्म कर दिया।
पिछले एक साल में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भी लखनऊ, खासकर गोमती रिवर फ्रंट के आसपास, कई ऐतिहासिक और सांस्कृतिक व्यक्तित्वों की प्रतिमाएं लगाने के सार्वजनिक वादे किए हैं। इनमें महाराजा सुहेलदेव, निषादराज गुह्य, भगवान विश्वकर्मा और कांशीराम की प्रतिमाएं शामिल हैं। हाल में उन्होंने मिहिर भोज की प्रतिमा लगाने की भी बात कही है। वहीं वाराणसी में रानी अहिल्याबाई हाेलकर की प्रतिमा टूटने का मामला उठा, तो अखिलेश यादव ने इसे भी मुद्दा बनाया। रानी अहिल्याबाई को गड़ेरिया समाज में श्रद्धा से देखा जाता है। अगर इन सभी वादों को ध्यान से देखा जाए तो इनके पीछे साफ जातीय समीकरण नजर आता है, जो समाजवादी पार्टी के पीडीए फॉर्मूले के अनुरूप बैठता है।
दरअसल, मूर्तियां खासकर समाज के वंचित और हाशिए पर रहे तबकों के लिए काफी अहम रही हैं। सामाजिक वैज्ञानिक बद्रीनारायण का कहना है कि दलित, पिछड़े और क्षेत्रीय नायकों की मूर्तियां समाज में गर्व की भाषा बनाती हैं। इससे वे इतिहास, जो लंबे समय तक सार्वजनिक जगहों से बाहर रहे, सामने आते हैं और समुदायों को यह एहसास होता है कि उनके नायक भी इस देश के हैं। उनके मुताबिक, ये मूर्तियां सिर्फ स्मारक नहीं होतीं, बल्कि सम्मान, स्मृति और पहचान का दावा भी होती हैं। उत्तर भारत में मूर्तियों और स्मारकों का प्रतीकात्मक इस्तेमाल 20वीं सदी में तेजी से बढ़ा, लेकिन उनका असरदार राजनीतिक उपयोग तब सामने आया जब जाति-विरोधी आंदोलनों, पिछड़ी जातियों की लामबंदी और चुनावी लोकतंत्र का विस्तार हुआ। जाति आधारित राजनीतिक दलों ने मूर्तियों के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई, और अब लगभग सभी दल – चाहे इच्छा से या मजबूरी में – इसी राह पर चलते दिखाई दे रहे हैं।
(संपादन : नवल/अनिल)
फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्त बहुजन मुद्दों की पुस्तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्य, संस्कृति व सामाजिक-राजनीति की व्यापक समस्याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in