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झारखंड : सरना-सनातन एकता का नारा झूठा

आदिवासी समुदाय के लोगों का कहना है कि सरना धर्म कोड की मांग सिर्फ जनगणना कोड की नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण, भूमि अधिकार, जल, जंगल, जमीन पर नियंत्रण और पहचान की है। बता रहे हैं विशद कुमार

‎हाल के दिनों में झारखंड की एक आईआरएस अधिकारी निशा उरांव चर्चा में है। उनके बयान को आरएसएस के समर्थकों द्वारा हवा दी जा रही है। निशा उरांव का बयान है कि सरना और सनातन दोनों एक ही मां की संतानें हैं। उनके इस बयान का झारखंड में तीखा विरोध किया जा रहा है।

निशा उरांव के उपरोक्त कथन पर आदिवासी मामलों के जानकार और सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मीनारायण मुंडा कहते हैं कि “यह बयान, मात्र व्यक्तिगत राय नहीं है, बल्कि आदिवासी समुदाय की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान, रीति-रिवाज, प्रथा, परंपरा और स्वतंत्र धार्मिक दावेदारी पर सुनियोजित हमला है। निशा उरांव तर्क-कुतर्क की आड़ में जो कुछ पेश कर रही हैं, वह सरना धर्म की स्वायत्तता और स्वतंत्र दावेदारी, पहचान को मिटाने का हिस्सा है। यह आरएसएस विचारधारा का विस्तार है जो आदिवासियों को ‘वनवासी हिंदू’ बताकर उनकी प्रकृति-पूजक विरासत को हिंदू फोल्ड में समाहित करने की पुरानी चाल को नया रूप दे रही है।”

मुंडा कहते हैं कि “प्रकृति पूजक आदिवासी समुदाय संविधान को मानने वाले हैं और धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों और सभी धर्मों का सम्मान करते हैं। लेकिन सरना धर्म और सनातन धर्म एक हैं, यह अव्यावहारिक और स्वीकार्य योग्य नहीं है। ऐसा है तो संपूर्ण मानवजाति एक हैं, सभी भारतीय एक हैं। हम विभिन्नताओं में एकता की समावेशी विचारों का समर्थन करते हैं।”

सरना स्थल पर प्रकृति पूजा करते आदिवासी

ध्यातव्य है कि प्रकृति पूजक सरना धर्म के प्रति आदिवासी समुदायों – खासकर उरांव, मुंडा, हो, संथाल, खड़िया आदि जनजाति समूहों – की मूलभूत आस्था है। यह प्रकृति-पूजा का जीवंत उदाहरण है। सरना स्थल वह है जहां गांव के देवता का निवास माना जाता है। सरना स्थल में मूर्ति या कोई मंदिर नहीं होता। यहां जल, जंगल और जमीन की पूजा होती है। आदिवासी का मुख्य देवता सिंगबोंगा और धरती है।

सिंगबोंगा को झारखंड और आसपास के क्षेत्रों (बिहार, ओड़िशा, बंगाल) के आदिवासी समूहों मुंडा, हो, संथाल और असुर का सर्वोच्च देवता माना जाता है। ‘सिंग’ का अर्थ ‘सूर्य’ और ‘बोंग’ का अर्थ ‘देवता’ या ‘आत्मा’ होता है, जिन्हें सृष्टि का रचयिता और पालनकर्ता माना जाता है। इसके अलावा आदिवासी समुदायों की पूजा-पद्धति सामुदायिक है, जिसमें पाहन और पुजार गांव के लोग होते हैं। वे ब्राह्मण पुरोहित नहीं होते। आदिवासियों के त्योहार जैसे कि सरहुल, करम, माघे, फागु आदि प्रकृति चक्र से जुड़े हैं। इसके अलावा जन्म से मृत्यु तक के इनके संस्कार ब्राह्मणों के जैसे नहीं हैं। सरना धर्म में कोई वर्ण-व्यवस्था नहीं है। इसमें मूर्ति-पूजा नहीं होती है।

सरना धर्म को ही आदि धर्म कहा जाता है, जो ब्रिटिश काल से ही जनगणना में ‘अन्य धर्म’ के रूप में दर्ज होता आया है। 2011 की जनगणना में झारखंड में 49 लाख से ज्यादा लोगों ने सरना को अपना धर्म बताया है। सनातन धर्म (हिंदू धर्म) से इसका मूलभूत अंतर स्पष्ट है।

इतिहासकार और विख्यात मानवशास्त्री शरतचंद्र राय ने स्पष्ट कर दिया है कि सरना वैदिक-पूर्व मूलनिवासी धर्म है। यह आर्यों के वैदिक संस्कृति का हिस्सा नहीं है। बिरसा मुंडा सहित अन्य आदिवासी क्रांतिकारियों ने इसकी स्वतंत्र पहचान के लिए संघर्ष किया था।

निशा उरांव ने आरएसएस के हिंदू सम्मेलन में कहा कि “सनातन के अनुसार मानव शरीर पांच तत्वों से बना है, ये प्रकृति के अंग हैं। हर प्राचीन संस्कृति में पांच तत्वों का उल्लेख है, यहां तक ग्रीक, चीनी, मिस्र संस्कृति सभ्यता के दौर में भी यह माना गया है।”

इस पर लक्ष्मीनारायण मुंडा सवाल करते हैं कि क्या इससे सब एक हो गए? जबकि आरएसएस और उसकी अनुषंगी ईकाई वनवासी कल्याण केंद्र लंबे समय से आदिवासियों को ‘वनवासी हिंदू’ बताते आ रहे हैं।

वहीं 2015 में केंद्रीय मंत्री जुएल उरांव ने भी आदिवासी को हिंदू बताया था, जिसका काफी विरोध हुआ था। सनद रहे कि 2020 में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने जनगणना में सरना धर्म के लिए अलग धर्म कोड की मांग की और झारखंड सरकार द्वारा आदिवासियों के लिए अलग सरना धर्म कोड दिए जाने के प्रस्ताव को दिनांक 11 नवंबर, 2020 को झारखंड विधानसभा के विशेष सत्र में सर्वसम्मति से पारित कर केंद्र सरकार को भेजा गया। आरएसएस इसे हिंदू समाज को तोड़ने की साजिश बताता आया है।

‎निशा उरांव के बयानों को आदिवासी समुदाय की रीति-रिवाजों पर सीधा प्रहार माना जा रहा है। आदिवासी समुदाय के लोगों का कहना है कि सरना धर्म कोड की मांग सिर्फ जनगणना कोड की नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण, भूमि अधिकार, जल, जंगल, जमीन पर नियंत्रण और पहचान की है। अलग धर्म कोड मिलने से आदिवासी समुदाय अपनी जनसंख्या, अपनी संस्कृति और अपने अधिकारों का अलग लेखा-जोखा और मूल्यांकन कर सकेगा। वर्तमान में ‘अन्य धर्म’ श्रेणी में गिने जाने से इनकी संख्या स्पष्ट नहीं हो पाती है। दूसरी तरफ आरएसएस इसे हिंदू वोट बैंक के नुकसान के रूप में देखता है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विशद कुमार

विशद कुमार साहित्यिक विधाओं सहित चित्रकला और फोटोग्राफी में हस्तक्षेप एवं आवाज, प्रभात खबर, बिहार आब्जर्बर, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, सीनियर इंडिया, इतवार समेत अनेक पत्र-पत्रिकाओं के लिए रिपोर्टिंग की तथा अमर उजाला, दैनिक भास्कर, नवभारत टाईम्स आदि के लिए लेख लिखे। इन दिनों स्वतंत्र पत्रकारिता के माध्यम से सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तन के लिए काम कर रहे हैं

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