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उत्तर प्रदेश : एक-एक बूंद पानी के लिए तरस रहे केल्हड़िया गांव के कोल समुदाय के लोग

चंदौली के केल्हड़िया गांव में जल संकट केवल प्यास का संकट नहीं है। यह गरीबी का संकट है। यह स्वास्थ्य का संकट है। यह सम्मान और अस्तित्व का संकट भी है। यहां बच्चों का बचपन बाकी बच्चों जैसा नहीं। इस गांव में कई बच्चे स्कूल जाने से पहले पानी भरते हैं और कई बच्चे पानी की वजह से स्कूल छोड़ चुके हैं। पढ़ें, विजय विनीत की यह जमीनी रपट

उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के नौगढ़ ब्लॉक की पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच बसा छोटा-सा गांव केल्हड़िया भारत के विकास मॉडल पर एक बड़ा सवाल बनकर खड़ा है। यह ऐसा सवाल है जिसका जवाब न सरकारी विज्ञापनों में मिलता है और न चुनावी भाषणों में। देवकीनंदन खत्री के प्रसिद्ध उपन्यास ‘चंद्रकांता’ के देश नौगढ़ का यह गांव केवल भौगोलिक दूरी में ही नहीं, विकास की मुख्यधारा से भी बहुत दूर छूट गया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से करीब 130 किलोमीटर दूर बसे केल्हड़िया तक पहुंचना आसान नहीं। नौगढ़ बांध की ओर जाती पक्की सड़क के बीच से एक रास्ता पहाड़ियों से घिरे पंडी गांव की तरफ मुड़ता है। वहां तक सड़क साथ निभाती है, लेकिन उसके बाद अचानक खत्म हो जाती है। फिर शुरू होता है जंगलों, पत्थरों और धूल से भरा लंबा रास्ता। रास्ते में एक सूखा पड़ा बांध दिखाई देता है और उसके आगे मिट्टी और खपरैल के छोटे-छोटे घरों का एक समूह। यही है केल्हड़िया गांव।

पहली नजर में यह गांव किसी पुराने दौर की धुंधली तस्वीर जैसा लगता है। यहां न अस्पताल है, न आंगनबाड़ी केंद्र, न माध्यमिक विद्यालय और न ऐसी सड़क जिस पर बरसात में आसानी से चला जा सके। विकास के नाम पर यदि कुछ दिखाई देता है तो वह एक जियो मोबाइल कंपनी का टावर और गांव में जगह-जगह लगे कुछ ऐसे हैंडपंप हैं, जो वर्षों से मुंह बाए खड़े हैं।

गांव की आबादी करीब 95 है। यहां रहने वाले अधिकांश लोग कोल समुदाय से आते हैं। उनका जीवन धान की खेती और पशुपालन पर टिका है। उत्तर प्रदेश में कोल समुदाय की आबादी सात लाख से अधिक मानी जाती है। चंदौली, मिर्जापुर, सोनभद्र, चित्रकूट और बांदा जैसे जिलों में फैला यह समुदाय आज भी पहचान और अधिकार के विचित्र भेदभाव से जूझ रहा है।

मध्य प्रदेश में कोल समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला है, जबकि उत्तर प्रदेश में उन्हें अनुसूचित जाति की श्रेणी में रखा गया है। इसका असर सिर्फ सरकारी कागजों तक सीमित नहीं। इससे सामाजिक पहचान, योजनाओं का लाभ और अधिकारों की पहुंच भी प्रभावित होती है। एक ही परिवार के दो सदस्य यदि अलग-अलग राज्यों में रहते हों तो एक आदिवासी कहलाता है और दूसरा दलित। यह फर्क केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि सामाजिक विडंबना भी है।

केल्हड़िया की असली कहानी इन बुनियादी सुविधाओं के अभाव से भी बड़ी है। यह कहानी पानी की है। उस पानी की, जिसके लिए यहां का हर व्यक्ति अपने जीवन का बड़ा हिस्सा खर्च कर देता है। गांव के पूर्व दिशा में लगभग पांच सौ मीटर दूर पहाड़ियों के बीच एक चट्टानी दरार है। स्थानीय लोग इसे ‘चुआड़’ कहते हैं। इसी दरार से बूंद-बूंद पानी रिसता है और नीचे बने छोटे से गड्ढे में जमा होता रहता है। यही गड्ढा पूरे गांव की जीवनरेखा है।

गर्मी बढ़ते ही इस गांव की बेचैनी और बढ़ जाती है। गांव का इकलौता ‘चुआड़’ और लगभग सभी हैंडपंप सूख चुके हैं। पानी की तलाश यहां रोजमर्रा की नियति बन गई है। सुबह होने से पहले महिलाएं और बच्चे बर्तन लेकर निकल पड़ते हैं ताकि चुआड़ से थोड़ा पानी मिल सके। कई बार घंटों इंतजार के बाद एक बर्तन भर पाता है। बूंद-बूंद टपकते पानी के सामने खड़े लोगों की आंखों में थकान भी दिखती है और एक अजीब-सी आदत भी। जैसे संघर्ष अब उनके जीवन का स्थायी हिस्सा बन चुका हो।

चुआड़ से माथे पर ढोकर पानी लातीं दो बच्चियां (तस्वीर : विजय विनीत)

गांव के बाहर दो कुएं भी हैं, लेकिन उनमें भरा पानी मटमैला और दूषित है। ग्रामीण बताते हैं कि उसे पीना बीमारी को न्योता देना है। टाइफाइड और पेट की दूसरी बीमारियां यहां आम हैं। इसलिए कुएं के पानी का इस्तेमाल केवल कपड़े धोने तक सीमित है। पीने के लिए लोग या तो चुआड़ पर निर्भर हैं या फिर सरकारी टैंकर का इंतजार करते हैं।

गर्मियों में जब टैंकर आता है तो पूरा गांव अचानक सक्रिय हो उठता है। सुबह करीब छह बजे टैंकर की आवाज सुनते ही लोग बाल्टी, डिब्बा और बर्तन लेकर दौड़ पड़ते हैं। टैंकर के आगे लंबी कतार लग जाती है। कई बार पानी कम पड़ जाता है और कई परिवार खाली बर्तन लेकर लौटते हैं। जिन दिनों टैंकर नहीं पहुंचता, उन दिनों लोगों को जंगलों में भटककर पानी खोजना पड़ता है।

केल्हड़िया में पानी केवल जरूरत नहीं रहा। यह यहां के लोगों के धैर्य, संघर्ष और जीवित रहने की जिद का दूसरा नाम बन चुका है। यहां हर बूंद की अपनी कहानी है और हर चेहरे पर प्यास की एक लंबी परछाईं।

प्यास से शुरू होती है सुबह

करीब 67 वर्षीया कुंती देवी की आंखों में उम्र की धुंध है, लेकिन गांव की प्यास का पूरा इतिहास जैसे अब भी साफ दिखाई देता है। वह कहती हैं कि ‘चुआड़’ का पानी साल में कुछ महीनों तक उपलब्ध रहता है और पूरा गांव इसी पर निर्भर रहता है। जैसे-जैसे पानी टपकता है, इंसान और जानवर दोनों अपनी बारी का इंतजार करने लगते हैं।”

कुंती देवी खुद भी रोज इसी इंतजार का हिस्सा बनती हैं। वह कहती हैं, “गर्मियों में कुएं के गंदे पानी से नहाते हैं और बाकी दिनों में रोज चुआड़ पर जाते हैं। वहीं पानी पीते हैं और वहीं नहाते भी हैं। जब गर्मियों में चुआड़ सूख जाता है तब हमारे पास कुछ नहीं बचता। दिन में गाय और भैंसें आती हैं। रात में भालू, हिरण, लंगूर, लोमड़ी और खरगोश जैसे जंगली जानवर भी इसी चुआड़ पर पानी पीने पहुंचते हैं।”

केल्हड़िया के नौजवान राम सिंह बताते हैं, “कुछ वर्ष पहले सरकार ने कठोर चट्टानों को काटकर हैंडपंप लगाने के लिए मशीन भेजी थी। कई दिन तक खुदाई हुई, लेकिन बोरिंग असफल रही। उसके बाद फिर कोई नहीं आया। हर घर जल योजना के तहत पानी पहुंचाने का वादा किया गया था, लेकिन तीन साल बीत गए और गांव तक पानी की एक बूंद भी नहीं पहुंची।”

राम सिंह बताते हैं कि गांव में दो हैंडपंप हैं, लेकिन वे अब केवल शोपीस बनकर रह गए हैं। फरवरी और मार्च आते-आते जब चुआड़ सूखने लगता है तब गांव के अधिकांश परिवार पशुओं के साथ मुसाखंड बांध या कर्मनाशा नदी के किनारे विंध्य पर्वत की तलहटी की ओर चले जाते हैं। वहां अस्थायी झोपड़ियां बनाकर बारिश का इंतजार करते हैं। जब बरसात के बाद चुआड़ फिर भर जाता है तब वे वापस लौट आते हैं। यह पलायन हर साल दोहराया जाता है। जैसे पानी के साथ ही गांव का जीवन भी आता-जाता हो।

प्यास के साथ ही जागता है केल्हड़िया

देश के अधिकांश गांवों में सुबह की शुरुआत चाय की केतली, खेतों की ओर जाते किसानों और बच्चों की स्कूल की तैयारी से होती है। लेकिन केल्हड़िया में सुबह सबसे पहले प्यास जागती है। यहां महिलाएं सूरज निकलने से पहले उठ जाती हैं। उन्हें मालूम है कि यदि देर हुई तो पानी मिलने की संभावना और कम हो जाएगी। कई महिलाएं दिन में आठ-दस बार चुआड़ तक जाती हैं। गांव की पगडंडियों पर सबसे अधिक दिखाई देने वाले दृश्य पानी ढोती महिलाएं और उनके पीछे चलते बच्चे हैं।

करीब 62 वर्षीया नौरंगी देवी घुटनों के दर्द से परेशान हैं, लेकिन उनकी दिनचर्या नहीं बदलती। वह कहती हैं, “जब चुआड़ में पानी निकलता है तब मैं दिन में आठ-दस बार पानी लेने जाती हूं। घुटनों में बहुत दर्द रहता है, लेकिन अगर पानी नहीं लाऊंगी तो बच्चे कैसे जिएंगे। हमारे लिए बीमारी या आराम का कोई मतलब नहीं है। पानी नहीं मिलेगा तो बच्चे भूख और प्यास से मर जाएंगे।”

वह कुछ देर रुकती हैं, फिर धीमी आवाज में कहती हैं, “कभी पानी साफ होता है, कभी गंदला। हम गरीब लोग हैं। दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। काम मिलेगा या नहीं, कुछ पता नहीं रहता। हमें क्या मालूम कि मोदी-योगी सरकार ने हमारे लिए क्या किया या नहीं किया। जब प्यास लगती है तो हम चुआड़ की ओर दौड़ पड़ते हैं। कभी-कभी टैंकर आता है तो हम अपने बर्तनों के साथ कतार में खड़े हो जाते हैं।”

वहीं करीब 60 वर्षीय फूलवंती देवी विधवा हैं। उनके दोनों बेटे संतोष और छोटेलाल रोजगार की तलाश में गांव से बाहर रहते हैं। घर और पानी की पूरी जिम्मेदारी फूलवंती देवी के कंधों पर है। वह कहती हैं, “हम पानी को बहुत बचाकर इस्तेमाल करते हैं। जैसे लोग तेल बचाकर खर्च करते हैं, वैसे ही हम पानी बचाते हैं। जो पैसा कमाते हैं उसका बड़ा हिस्सा पहले पानी पर खर्च होता है। भोजन बाद में आता है। अभी चुआड़ में थोड़ा पानी है, लेकिन कुछ दिनों बाद हमें उस टैंकर का इंतजार करना पड़ेगा जो दो या तीन दिन में एक बार आता है। कई बार गर्मियों में चार-चार दिन तक टैंकर नहीं आता।”

करीब 22 वर्षीय चंद्रमोहन कोल अपने बचपन को याद करते हैं तो उनकी आवाज में गहरी थकान सुनाई देती है। वह कहते हैं, “मैं स्कूल जाता था, लेकिन पानी की समस्या हमेशा बनी रही। एक बार स्कूल जाते समय रास्ते में भालू दिख गया। उसके बाद कई बच्चों ने स्कूल जाना छोड़ दिया। यहां एक बाल्टी पानी भरने में घंटों लग जाते हैं। हमारी मांएं और बहनें पूरा दिन पानी ढोती रहती हैं।”

कुछ देर चुप रहने के बाद वह धीरे से कहते हैं, “चुनाव के समय नेता आते हैं। पानी देने का वादा करते हैं। वोट लेकर चले जाते हैं। फिर पांच साल तक कोई दिखाई नहीं देता।”

चंद्रमोहन की आंखों में केवल नाराजगी नहीं, बल्कि लगातार टूटती उम्मीदों की थकान दिखाई देती है। केल्हड़िया में प्यास सिर्फ शरीर की नहीं है। यह भरोसे, विकास और बराबरी के उस वादे की भी प्यास है जो आज तक इस गांव तक नहीं पहुंच सका।

बचपन और पानी की बाल्टियां

चंदौली जिले के नौगढ़ ब्लॉक में स्थित केल्हड़िया गांव ब्लॉक के अंतिम गांवों में गिना जाता है। विंध्य पर्वतमाला और घने सदाबहार जंगलों के बीच बसा यह गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के इंतजार में है। अधिकांश परिवार खेती, पशुपालन और दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हैं। कुछ लोगों ने किसी तरह जीवनयापन के छोटे-छोटे रास्ते खोज लिए हैं।

विडंबना यह है कि पास का नौगढ़ बांध गांव की प्यास नहीं बुझाता। वहां का पानी दूसरी दिशा में बह जाता है। लिफ्ट सिंचाई को छोड़ दें तो यहां खेती के लिए पानी का कोई स्थायी साधन नहीं है। यह गांव उस विकास मॉडल की तस्वीर बन गया है जिसने शहरों को रोशन किया, लेकिन पहाड़ों और जंगलों में बसे लोगों को पीछे छोड़ दिया।

केल्हड़िया में प्रवेश करना ऐसा लगता है मानो समय किसी पुराने मोड़ पर आकर ठहर गया हो। पुरुष ज्यादातर मजदूरी या दूसरे कामों के लिए बाहर गए रहते हैं। गांव की पगडंडियों पर महिलाएं और बच्चे ही सबसे अधिक दिखाई देते हैं। कोई लकड़ी बटोर रहा है, कोई पशुओं को चारा दे रहा है और कोई पानी के लिए बर्तन लेकर चुआड़ की ओर जा रहा है।

करीब 32 वर्षीया आरती कभी स्कूल नहीं जा सकीं। आज वह घर में दूध उबालकर खोया बनाती हैं। उनके पति राजेश हर सुबह उसे बेचने के लिए नौगढ़ बाजार जाते हैं। गांव के कई परिवार दूध बेचकर किसी तरह जीवन चलाते हैं। इनमें दो परिवार ऐसे हैं जो खोया बनाने का काम करते हैं। आरती कहती हैं, “अगर पानी भरने में इतना समय न लगे तो हम और काम भी कर सकते हैं, लेकिन यहां आधा जीवन पानी में ही बीत जाता है।”

जून, 2020 में उत्तर प्रदेश सरकार ने हर घर जल योजना शुरू की थी। इसके तहत चंदौली जिले के नौगढ़ क्षेत्र के हर घर तक पाइप से पानी पहुंचाने का वादा किया गया। योजना के अनुसार भैसौड़ा बांध से गांवों तक लगभग 600 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई जानी थी। इस परियोजना के लिए करीब 250 करोड़ रुपए मंजूर हुए, लेकिन केल्हड़िया के लोगों के अनुसार आज तक गांव में एक भी पाइप नहीं पहुंची।

भारत में पानी का संकट अक्सर महिलाओं की कहानी बन जाता है और केल्हड़िया इसका सबसे जीवंत उदाहरण है। यहां पानी लाने की जिम्मेदारी लगभग पूरी तरह महिलाओं के कंधों पर है। सुबह, दोपहर और शाम। हर मौसम में। हर उम्र में।

केल्हड़िया का जल संकट केवल प्यास का संकट नहीं है। यह गरीबी का संकट है। यह स्वास्थ्य का संकट है। यह सम्मान और अस्तित्व का संकट भी है। यहां बच्चों का बचपन बाकी बच्चों जैसा नहीं। इस गांव में कई बच्चे स्कूल जाने से पहले पानी भरते हैं और कई बच्चे पानी की वजह से स्कूल छोड़ चुके हैं।

गांव में लगभग 38 बच्चे हैं। इनमें से कई या तो पढ़ाई छोड़ चुके हैं या नियमित रूप से स्कूल नहीं जा पाते। कारण केवल एक है– पानी। करीब 13 वर्षीया रिंकले दिनभर बकरियां चराती है। जब उससे पूछा गया कि वह पढ़ाई क्यों नहीं करती तो उसने बेहद सहज आवाज में कहा, “यहां पढ़ाने कौन आएगा?”

यह सवाल केवल रिंकले का नहीं है। यह पूरे सिस्टम से पूछा गया सवाल है। चार साल की शिवानी अपना नाम भी ठीक से नहीं बोल पाती, लेकिन वह छोटा पात्र लेकर चुआड़ तक जाना सीख चुकी है। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में खिलौने होने चाहिए, उस उम्र में उनके हाथों में पानी के बर्तन हैं।

केल्हड़िया में कोई स्कूल नहीं है। कुछ वर्ष पहले ग्राम्या नामक संस्था ने यहां वीरेंद्र खरवार नाम के युवक को बच्चों को पढ़ाने के लिए नियुक्त किया था। वह गांव के बच्चों को पांचवीं तक पढ़ाते थे। बाद में संस्था पीछे हट गई और बच्चों की पढ़ाई भी छूट गई। पेड़ के नीचे लगने वाली वह छोटी कक्षा अब बंद पड़ी है। वहां अब बच्चों की आवाज नहीं सुनाई देती।

कुछ वर्ष पहले तक गांव के बच्चे पंडी गांव के स्कूल जाते थे जो यहां से करीब सात किलोमीटर दूर है। रास्ता घने जंगल से होकर गुजरता है। एक दिन बच्चों को रास्ते में भालू दिखाई दिया। उसके बाद कई बच्चों ने स्कूल जाना छोड़ दिया। डर और दूरी ने शिक्षा का रास्ता रोक दिया।

उर्मिला नाम की एक बच्ची कहती है, “पढ़ाई से ज्यादा जरूरी पानी लाना है। अगर पानी नहीं होगा तो खाना कैसे बनेगा?” उसका यह छोटा-सा वाक्य किसी भी शिक्षा नीति से बड़ा सच बयान करता है। जब बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होतीं तब शिक्षा जैसे अधिकार सबसे पहले पीछे छूट जाते हैं।

एक समय चंदौली जिले को “पूर्वांचल का दूसरा कालाहांडी” कहा जाता था। दो दशक पहले कुबराडीह और शाहपुर जमसोत जैसे गांवों में भूख से कई मौतें हुई थीं। उस समय इस इलाके ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा था।

केल्हड़िया गांव में चुआड़ जहां जुटते हैं मवेशी और इंसान एक साथ (तस्वीर विजय विनीत)

दशकों तक यह इलाका डकैतों के प्रभाव में रहा। मोहन बिंद, घमड़ी खरवार, रामबचन, धर्मदेव और मिश्री जैसे कुख्यात डकैतों के नाम यहां लंबे समय तक डर की तरह लिए जाते थे। बाद में जब डकैतों का दौर खत्म हुआ तो नक्सलवाद ने यहां अपनी जगह बना ली।

आज भले ही इस क्षेत्र में न डकैत हैं और न नक्सली, लेकिन आदिवासी और वंचित समुदायों का संघर्ष अब भी खत्म नहीं हुआ। फर्क सिर्फ इतना है कि अब यहां बंदूक की आवाज कम सुनाई देती है और पानी के लिए खाली बर्तनों की आवाज ज्यादा।

केल्हड़िया में जल संकट इतना गहरा हो चुका है कि उसने सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है। ग्रामीण बताते हैं कि आसपास के कई परिवार अपनी बेटियों की शादी यहां करने से हिचकते हैं। वजह यह नहीं कि गांव में लोग खराब हैं या यहां अपराध अधिक है। वजह सिर्फ एक है– पानी।

लोग जानते हैं कि यहां की बहुओं का अधिकांश जीवन पानी ढोने में बीतेगा। वे जानते हैं कि यहां सुबह का पहला और रात का अंतिम विचार पानी ही होता है। विवाह जैसे रिश्तों पर भी अब जल संकट की परछाईं पड़ चुकी है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इतने वर्षों तक इस गांव की आवाज किसी ने सुनी क्यों नहीं?

यह सवाल तब और गंभीर हो जाता है जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दस्तावेज सामने आते हैं। वाराणसी के मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. लेनिन रघुवंशी ने केल्हड़िया गांव की स्थिति को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाया। शिकायत में कहा गया कि गांव के लोग वर्षों से गंभीर जल संकट झेल रहे हैं। केवल पानी ही नहीं, बल्कि सड़क, अस्पताल, स्कूल और दूसरी बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। ग्रामीणों को इलाज और शिक्षा के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। कई शिकायतों के बावजूद कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मामले को गंभीर माना। 28 जनवरी, 2026 को आयोग ने चंदौली के जिलाधिकारी को शिकायत की प्रति भेजी और चार सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी। आयोग यह जानना चाहता था कि गांव की वास्तविक स्थिति क्या है और प्रशासन ने अब तक क्या कदम उठाए हैं। सामान्यतः ऐसे मामलों में प्रशासन रिपोर्ट भेज देता है और आयोग आगे की कार्रवाई करता है, लेकिन केल्हड़िया का मामला अलग साबित हुआ।

चार सप्ताह बीत गए। फिर दो महीने बीत गए। फिर तीन महीने गुजर गए। लेकिन आयोग को कोई रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई।

इसके बाद 21 मई, 2026 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मामले की दोबारा समीक्षा की। रिकॉर्ड देखने के बाद आयोग ने पाया कि जनवरी में मांगी गई रिपोर्ट अब तक नहीं भेजी गई है। इसके बाद आयोग की टिप्पणी सामान्य प्रशासनिक भाषा से कहीं अधिक कठोर थी।

आयोग ने कहा कि जिलाधिकारी, चंदौली को चार सप्ताह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। यदि ऐसा नहीं हुआ तो आयोग मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की धारा 13 के तहत बाध्यकारी प्रक्रिया अपनाने को विवश होगा और संबंधित अधिकारी की व्यक्तिगत उपस्थिति सुनिश्चित की जा सकती है।

किसी जिला प्रशासन के लिए यह साधारण टिप्पणी नहीं मानी जाती। इसका अर्थ साफ है कि देश की सर्वोच्च मानवाधिकार संस्था इस मामले को गंभीर मान रही है और प्रशासनिक उदासीनता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। आयोग की नाराजगी केवल रिपोर्ट न मिलने पर नहीं थी। उसके पीछे वह मानवीय संकट भी था जिसकी ओर शिकायत में ध्यान दिलाया गया था।

संकट पानी का या मानवाधिकार का?

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष दायर शिकायत में एक्टिविस्ट डॉ. लेनिन ने कहा कि सुरक्षित पेयजल की अनुपलब्धता भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और गरिमा का अधिकार देता है। जीवन का अधिकार केवल सांस लेने का अधिकार नहीं, बल्कि सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार भी है।

डॉ. लेनिन कहते हैं, “यदि कोई महिला प्रतिदिन कई किलोमीटर चलकर पानी लाने को मजबूर है, यदि कोई बच्चा पानी की वजह से स्कूल नहीं जा पा रहा, यदि कोई परिवार पानी की तलाश में अपना घर छोड़ रहा है, तो यह केवल विकास की समस्या नहीं रह जाती। यह मानवाधिकार का प्रश्न बन जाती है।” वह आगे कहते हैं कि यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा भी स्वच्छ पेयजल को मूलभूत मानवाधिकार मान चुकी है।

ग्रामीण सुरेश कुमार को शिकायत है कि केल्हड़िया गांव में पीने के पानी के लिए पाइपलाइन बिछाने की चर्चा बहुत हुई, लेकिन गांव तक पानी की एक बूंद भी नहीं पहुंची। यह स्थिति इसलिए भी विडंबनापूर्ण है क्योंकि सरकारी योजनाओं के आंकड़ों में सफलता दिखाई देती है, जबकि जमीन पर लोग आज भी चुआड़ और टैंकरों के आगे अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।

राजेश खरवार बताते हैं, “केल्हड़िया में जल संकट दूर करने के लिए कई प्रयास किए गए। सरकार ने मशीनें भेजीं। चट्टानों को काटकर बोरिंग की गई। 350 फीट और 400 फीट तक खुदाई हुई, लेकिन पानी नहीं मिला।”

आज भी गांव के उत्तर दिशा में एक विशाल पीपल के पेड़ के पास बना गहरा बोरहोल उस असफल कोशिश की गवाही देता है। जैसे वह सूखी धरती आज भी किसी सफल प्रयास का इंतजार कर रही हो। गांव की सबसे शिक्षित महिलाओं में शामिल प्रीति का मानना है कि यदि 900 से 1000 फीट तक गहरी बोरिंग कराई जाए तो शायद पानी मिल सकता है। वह कहती हैं कि यह काम ग्रामीण अपने दम पर नहीं कर सकते। इसके लिए सरकारी इच्छाशक्ति, तकनीक और संसाधनों की जरूरत है।

विकास की छूटी हुई बस्ती

केल्हड़िया पहुंचने पर सबसे गहरी अनुभूति यही होती है कि विकास यहां आते-आते कहीं रास्ता भूल गया। गांव में बिजली पहुंची। मोबाइल टावर भी लग गया। कुछ सरकारी योजनाओं के निशान भी दिखाई देते हैं। लेकिन पानी अब तक नहीं पहुंचा। शौचालय बने, पर पानी के अभाव में बेकार हो गए। योजनाएं कागजों पर आगे बढ़ती रहीं, लेकिन गांव की जिंदगी वहीं ठहरी रही।

नौगढ़ के खंड विकास अधिकारी पद का अतिरिक्त प्रभार चकिया के बीडीओ विकास सिंह के पास है। ग्रामीणों की शिकायत है कि वे अक्सर समय से कार्यालय में नहीं मिलते और फील्ड मॉनिटरिंग में भी अपेक्षित रुचि नहीं दिखती। केल्हड़िया समेत पूरे नौगढ़ क्षेत्र के पेयजल संकट पर विकास सिंह कहते हैं, “जल समस्या के समाधान के प्रयास किए जा रहे हैं। टैंकरों से पानी पहुंचाना बहुत महंगा विकल्प है। हम जल निगम के अधिकारियों के साथ लगातार बातचीत कर रहे हैं ताकि पाइपलाइन केल्हड़िया तक पहुंच सके। अभी तक योजना अंतिम रूप नहीं ले सकी है।”

ग्राम प्रधान लाल साहेब खरवार कहते हैं, “साल 2022 में लोगों के जल कार्ड बनाए गए थे। कहा गया था कि प्रति व्यक्ति 45 लीटर पानी मिलेगा। लेकिन असली समस्या वहीं की वहीं है। आजादी के बाद से कोई भी सरकार हमारी पानी की समस्या हल नहीं कर सकी। केवल केल्हड़िया नहीं, पूरा नौगढ़ इसी संकट से जूझ रहा है।”

उनकी बातों में किसी एक सरकार के प्रति गुस्से से ज्यादा पूरे तंत्र के प्रति गहरी निराशा दिखाई देती है। जैसे वर्षों से इंतजार करते-करते लोगों ने उम्मीद और शिकायत दोनों को एक साथ जीना सीख लिया हो।

भोला कोल कहते हैं, “समझ में नहीं आता कि सड़क जंगल में आकर क्यों रूक गई। उसे गांव तक लाया जा सकता था। लेकिन हमने हार नहीं मानी है। हम अपनी आवाज और बुलंद करेंगे।”

राजेश कोल भी इसी विश्वास के साथ कहते हैं, “हमारा गांव जंगल के भीतर है। हमने अपने अस्तित्व के लिए बहुत संघर्ष किया है। आगे भी करेंगे। केल्हड़िया आज केवल पानी नहीं मांग रहा। वह अपने हिस्से का जीवन, सम्मान और अपने हिस्से का भारत मांग रहा है।”

चंदौली के वरिष्ठ पत्रकार राजीव मौर्य कहते हैं, “यदि नौगढ़ की जल समस्या का समाधान हो जाए तो यहां की आधी समस्याएं अपने आप समाप्त हो जाएंगी। यहां के आदिवासी और वंचित लोगों के लिए विकास अभी भी एक सपना है। यह केवल सरकार का प्रश्न नहीं, पूरे समाज का प्रश्न है। क्या नौगढ़ के लोगों को देश के अन्य नागरिकों की तरह सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार नहीं है? क्या वे हमेशा ऐसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करते रहेंगे?”

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

विजय विनीत

लेखक बनारस, उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार हैं। ‘दैनिक जागरण’, ‘अमर उजाला’, ‘हिन्दुस्तान’ और ‘जनसंदेश टाइम्स’, 'न्यूजक्लिक' से संबद्ध रहते हुए वे हाशिए पर पड़े समाज, जल संकट, आदिवासी जीवन और पूर्वांचल के सामाजिक यथार्थ पर लंबे समय से ग्राउंड रिपोर्टिंग करते रहे हैं। इनकी प्रकाशित कृतियों में ‘बनारस लॉकडाउन’, ‘बतकही बनारस की’, ‘बनारसी घाट का जिद्दी इश्क़’, ‘मैं इश्क़ लिखूं, तुम बनारस समझना’, ‘सपनों की पगडंडियां’ और ‘जर्नलिज्म AI’ आदि शामिल हैं।

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