तथाकथित ‘जनजाति सुरक्षा मंच’ द्वारा आगामी 24 मई को दिल्ली में जनजाति सांस्कृतिक समागम का आयोजन किया जा रहा है। आयोजक कट्टर हिंदूवादी संगठन और धर्मनिरपेक्ष भारत की कल्पना हिंदू राष्ट्र के रूप में करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी कोख से उत्पन्न वनवासी कल्याण आश्रम से संबद्ध लोग हैं। चूंकि आरएसएस के राजनीतिक संगठन भाजपा का ही केंद्र और उत्तर भारत के अधिकतर राज्यों पर कब्जा है, इसलिए इस आयोजन के सफल होने में तो कोई आशंका नहीं, लेकिन यह कौतूहल जरूर होता है कि हिंदुओं के संपूर्ण पौराणिक वाङ्मय में जिन्हें अनार्य, राक्षस, असुर, दस्यु, दास, यहां तक कि मानवेतर वानर शब्द से नवाजा गया और जिन्हें आज भी उनके मूल नाम ‘आदिवासी’ कहने से गुरेज है, उन लोगों के ‘समागम’ की जरूरत इस कट्टर हिंदू संगठन को क्यों पड़ी?
सवाल यह भी है कि जिनके तमाम प्रमुख पर्व-त्योहारों में चाहे वह होली हो या दीवाली या दशहरा, हर पर्व किसी आदिवासी का वधोत्सव हो, उन्हें आदिवासियों के सांस्कृतिक समागम का आयोजन करने की मजबूरी क्या है? कहीं उनके देवता नरसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपू का वध करते हैं, कहीं अनार्य रावण का वध करते हैं, कहीं दुर्गा अवतरित हो महिषासुर का वध करती दिखती हैं, तो कहीं विष्णु मोहिनी रूप धारण कर भस्मासुर का विनाश करते हैं, ऐसे में उन्हीं आदिवासियों के सांस्कृतिक समागम का उद्देश्य क्या है?
हम सभी जानते हैं कि हिंदू धर्म का मेरुदंड मनुवादी वर्ण-व्यवस्था है। इस मनुवादी वर्ण-व्यवस्था में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। इसमें आदिवासी कहीं नहीं है। अब इसकी दो ही वजहें हो सकती हैं। एक तो आदिवासी इसमें शामिल नहीं होना चाहता था या फिर हिंदू धर्म के पुरोहित पंडित आदिवासियों को हिंदू वर्ण-व्यवस्था में शामिल नहीं करना चाहते थे। फिर आजादी के बाद से आदिवासियों के लिए जो हिंदूवादी संगठन का प्रेम उमड़ा है, उसकी वजह क्या है? इतना पाखंड कि आरएसएस की विचारधारा से निकली द्रौपदी मुर्मू को वे देश का राष्ट्रपति तो बना देते हैं, लेकिन राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा या नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह में आमंत्रित नहीं करते। अब वही लोग आदिवासियों के सांस्कृतिक समागम का आयोजन करने जा रहे हैं। यह ढोंग नहीं तो और क्या है?
इसकी वजह समझने के लिए बहुत ज्यादा माथापच्ची की जरूरत नहीं है। आदिवासी देश की कुल आबादी का आठ से दस फीसदी हिस्सा और वे पश्चिमोत्तर लद्दाख से लेकर पूर्वोतर मणिपुर, मिजोरम और सुदूर दक्षिण तक में फैले हैं। लेकिन मध्य भारत में वे सघन रूप से संकेंद्रित हैं और मतदान पर टिकी संसदीय राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। इसलिए आजादी के बाद से ही आदिवासी समाज को बहलाने-फुसलाने और दिग्भ्रमित करने का प्रयास वनवासी कल्याण आश्रम के लोग करते रहे हैं। पहले उनका एक प्रिय नारा था– ‘हम राम के वंशज हैं, तुम सेवक हनुमान’ और पिछले एक दशक से वे ‘सरना-सनातन एक हैं’ का नारा लगाने लगे हैं।
भारतीय संविधान में आदिवासी शब्द का प्रयोग तक करने से उन्हें परहेज रहा है और उनके लिए जनजाति शब्द का इस्तेमाल किया गया। वजह यह कि आदिवासी कहते ही भारत के मूलवासी होने का यथार्थ प्रकट होने लगता है, इसलिए उन्हें वनवासी कहा, और अब उन्हें सिर्फ वोट की राजनीति के लिए बरगलाने का यह प्रयास है। हालांकि, आदिवासी बहुल इलाकों में राजनीतिक सफलता हाल के वर्षों में मिलनी शुरू हुई। आप कह सकते हैं कि 1999 में वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने में बिहार का हिस्सा रहे झारखंड के सभी 14 संसदीय सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों को मिली जीत की बड़ी भूमिका रही। दूसरी तरफ 2024 में हुए पिछले लोकसभा चुनाव में वे अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा नहीं जुटा पाए तो इसकी एक प्रमुख वजह यह रही कि एससी और एसटी सीटों पर भाजपा के उम्मीदवारों का कम संख्या में जीतना। भाजपा ने इस चुनाव में 19 एससी सीटें और 10 एसटी सीटें गंवाई। इसलिए वे इस बार अभी से ही सचेष्ट हैं। आदिवासी इलाकों में ‘सरना-सनातन’ एक होने का नैरेटिव जोर-शोर से चलाया जा रहा है।

आदिवासी इलाकों की महत्ता उनके लिए इसलिए भी बढ़ गई है कि उनके कारपोरेट मित्रों को आदिवासी इलाकों की खनिज संपदा चाहिए। छत्तीसगढ़ के हसदेव के जंगल काटने में आसानी उन्हें तब हुई जब उन्होंने छत्तीसगढ़ पर राजनीतिक प्रभुत्व कायम कर लिया। इसी तरह ओडिशा पर काबिज होने के बाद ही वे नियमगिरि पर्वत शृंखला में बसे कंध आदिवासियों का विनाश कर बाक्साइट खदानों को हड़पने की दिशा में बढ़ रहे हैं। इसलिए आदिवासियों को बरगलाने और उन्हें हिंदू धर्म में विलोपित करने की प्रक्रिया वे चलाएंगे ही।
खैर, आदिवासी और गैर आदिवासी/ हिंदू दर्शन के मूलभूत अंतर को देखा जाना चाहिए। ये अंतर हैं–
- ईश्वर की कल्पना किसी-न-किसी रूप में सभी धर्मावलंबी करते हैं। गैर-आदिवासी समाज ईश्वर की कल्पना सगुण रूप में एक पुरूष के रूप में करता है। उनके ग्रंथों में राम, कृष्ण या विष्णु आदि अलौकिक शक्तियों से संपन्न पुरूष हैं। ईश्वर का निर्गुण रूप भी मानवीय गुणों से ही संपन्न है। जबकि आदिवासी प्रकृति पूजक होते हैं। वे पहाड़, जंगल, जंगल के किसी वृक्ष मात्र को पूजते हैं। किसी आदिवासी गांव में मंदिर नहीं होता। उनके देवता जंगल, पहाड़ों में निवास करते हैं और उनका पूजा स्थल भी वहीं होता है।
- पूरी हिंदू सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था वर्णाश्रम धर्म पर टिकी हुई है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, उसके चार भाग हैं। ब्राह्मण पुजारी-पुरोहित और शिक्षक होता है, क्षत्रिय के हाथ में शासन व्यवस्था, वैश्य के जिम्मे वानिकी और व्यापार तथा शूद्र के जिम्मे सबों की सेवा करना होता है। सभी तरह का मानवीय श्रम करना। हिंदू धर्मावलंबी और विद्वान इस व्यवस्था को उचित ठहराते हुए यह सफाई देते हैं कि यह मूल रूप में जड़-व्यवस्था नहीं थी। लेकिन वास्तविकता यह है कि दलित घर में जन्म लेने वाला पीढ़ी-दर-पीढ़ी दलित और अछूत ही माना जाता है। लेकिन आदिवासियों में यह वर्ण-व्यवस्था नहीं है।
- आदिवासी समाज श्रम-आधारित समाज है और गैर-आदिवासी समाज दूसरे के श्रम के शोषण पर टिका समाज और सामाजिक व्यवस्था। खुद रिक्शा खींच कर जीवनयापन करना श्रम आधारित समाज की रचना करता है। जब कोई दो-चार या दस रिक्शा दूसरे से खिंचवा कर यही काम करता है तो कहा जाएगा कि वह दूसरे के श्रम के शोषण पर टिका है। गैर-आदिवासी समाज का भी एक बड़ा हिस्सा कृषि व्यवस्था पर टिका है, लेकिन वहां जमीन का मालिक वैसा व्यक्ति भी हो सकता है जो खुद खेती नहीं करता हो। पूरे उत्तर भारत में कृषि व्यवस्था दिहाड़ी मजदूरों पर टिकी हुई है। आदिवासी समाज में ऐसी कल्पना ही नहीं की जा सकती।
- पूरी गैर-आदिवासी व्यवस्था अतिरिक्त उत्पादन और अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांतों पर टिका है। विकास के लिए जरूरी है अतिरिक्त उत्पादन और मुनाफा। कुछ लोगों के श्रम से उनकी जरूरत से अधिक कृषि क्षेत्र में उत्पादन हुआ तभी मानव जाति के विकास का रास्ता खुला। कुछ लोग अन्य कार्यों में लगे, जिससे विभिन्न पेशों और सभ्यता संस्कृति का विकास हुआ। अब कुछ लोग पठन-पाठन का कार्य कर सकते थे, शोध का कार्य कर सकते थे। कुछ लोगों ने लड़ने-भिड़ने में ही महारत हासिल की। कुछ लोग नृत्य और गीत में ही प्रवीण हुए। कुछ लोग सिर्फ दलाली कर के जी सकते हैं। इस व्यवस्था की विडंबना यह हुई कि इसमें शारीरिक श्रम की कीमत सबसे कम आंकी गई और इसलिए श्रम करने वाले को निकृष्ट माना गया। खेत में काम करने वाला, चमड़े का सामान बनाने वाला, कपड़े बुनने वाला – ये सभी दलित हैं और आर्थिक दृष्टि से भी सबसे अधिक विपन्न। जबकि आदिवासी समाज के आर्थिक व्यवस्था में अतिरिक्त उत्पादन और अतिरिक्त मूल्य/मुनाफा के सिद्धांत का पूरी तरह निषेध है। वह उतना ही उत्पादन करता है जितनी उसकी आवश्यकता होती है। वह आने वाले कल की चिंता नहीं करता है और इसलिए प्रकृति का उतना ही दोहन करता है, जिससे प्रकृति का नुकसान न हो। परिवार के सदस्य अपने हाथ से खेती करते हैं। कुछ ऐसे काम जो अपने बलबूते नहीं हो सकता, मसलन रोपनी का काम, तो इस काम में एक-दूसरे की मदद करते हैं। लेकिन यह कल्पना करना कि कोई अपनी पूरी जमीन बटाई पर दे रखी हो, इस समाज में हाल तक कठिन था। और चूंकि अतिरिक्त उत्पादन की गुंजाइश नहीं है, इसलिए सभी को श्रम करना होता है। आदिवासी समाज में कोई पाहन, पुजार, भूमका हो सकता है, लेकिन इस वजह से उसे मुफ्त में खाने का अवसर नहीं मिल जाता।
- गैर-आदिवासी समाज में सभी में थोड़ी बहुत बनिया बुद्धि होती है। यानी जोड़-तोड़, हिसाब-किताब करना। इसलिए गैर-आदिवासी समाज का कोई भी सदस्य धंधा कर सकता है। यह अलग बात है कि कोई ज्यादा प्रवीण होता है तो कोई कम। लेकिन आदिवासी समाज का संपन्न से संपन्न व्यक्ति भी शायद ही धंधा करता है। संपन्न होने के बावजूद वह महाजनी नही कर सकता।
- सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के उपरोक्त अंतरों का प्रतिफलन कलाओं के क्षेत्र में भी हुआ है। गैर आदिवासी समाज में रंगमंच होता है और दर्शक दीर्घा / प्रेक्षागृह, कलाकार और दर्शक। लेकिन आदिवासी समाज में इस तरह का विभाजन नहीं। पीड़ा और उल्लास के क्षणों की भी सामूहिक अभिव्यक्ति होती है, जिसमें सभी भागीदार होते हैं। फसल कटने के बाद चांदनी से भरपूर रात्रि में नाचते वक्त आदिवासी समाज का हर औरत-मर्द कलाकार बन जाता है। दूसरी तरफ यदि कोई अच्छा बांसुरी बजाता है तो वह उसका अतिरिक्त गुण है, लेकिन इस वजह से उसे इस बात की छूट नहीं है कि वह अपने खेत में काम न करे।
बहरहाल, आदिवासी समाज और आरएसएस का ब्राह्मणवादी समाज एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। इसके बावजूद यदि वे जनजाति सांस्कृतिक समागम करते हैं तो यह बस आदिवासियों को बरगलाने की चेष्टा मात्र है। आदिवासी समाज को इससे सावधान रहना चाहिए।
(संपादन : नवल/अनिल)