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मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के नजरिए का नया संस्करण

यह मानने में हिचक नहीं होनी चाहिए कि मौजूदा मुख्य न्यायाधीश की पृष्ठभूमि भी संस्थागत है। यह उनकी सीमा है। इसीलिए उनमें वह व्यापक सामाजिक नजरिया विकसित नहीं हो सका है जो कि लोकतंत्र के विचारों और संविधान की संस्कृति के विस्तार के लिए आवश्यक है। बता रहे हैं अनिल चमड़िया

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद पर विराजमान न्यायाधीश सूर्यकांत ने भरी अदालत में अपनी एक टिप्पणी में नागरिकों के एक हिस्से की तुलना काकरोच से की है। उन्होंने अपनी टिप्पणी को दोबारा संशोधित करने के बाद भी इसे दोहराया है। पहले उन्होंने कहा कि बेरोजगारों के संबंध में उनकी टिप्पणी नहीं थी। मीडिया के लोगों ने उसे गलत समझा था। उन्होंने अपनी टिप्पणी में संशोधन कर बताया कि उनकी टिप्पणी उनके बारे में थी जो कि फर्जी डिग्रीधारी आदर्श माने जाने वाले विभिन्न कामों में घुस गए हैं। लेकिन उन्होंने इससे इंकार नहीं किया कि इंसानों की तुलना काकरोच से की है।

मुख्य न्यायाधीश द्वारा लोगों की काकरोच के साथ तुलना और सुप्रीम कोर्ट का दबे-कुचले और राजनीतिक-सामाजिक और आर्थिक ढांचे के शिकार लोगों की जानवरों या शरीर के अंगों की कमी वाले इंसानों से तुलना करने का एक इतिहास है। तुलना का पैमाना वास्तव में किसी के आंतरिक वैचारिक स्तर का परिचायक होता है।

भारतीय समाज और संस्थाओं का लोकतांत्रिक रूपांतरण नहीं हो सका है। न्यायालय समानता आधारित संविधान की संस्था के रूप में अभी तक आकार नहीं पा सकी है। न्यायाधीश अपने तमाम तरह के पूर्वाग्रहों के साथ न्यायालयों में फैसले करते हैं। टिप्पणियां तो इस तरह करते हैं जैसे वे बेलगाम हैं। न्यायाधीश खुद को न्यायालय मानने की मानसिकता से संचालित होते हैं। यह क्यों बना हुआ है, इसे समझना लोकतंत्र की विचारधारा और उसके उद्देश्यों के साथ खुद को जोड़ने की एक कवायद मानी जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट में भी दबी कुचली जातियों की ‘जानवरों और विकलांगताओं’ के साथ तुलना करने का एक लंबा इतिहास है। सुप्रीम कोर्ट में शोध करने वालों की टीम ने इस पर बाकायदा एक अध्ययन किया है। 1964 में जस्टिस के. सुब्बा राव ने टी. देवदासन बनाम भारतीय संघ के मामले में अपनी असहमति जताते हुए लिखा कि “मेरी बात साफ़ करने के लिए, घोड़े की दौड़ का उदाहरण लीजिए। दो घोड़ों को दौड़ने के लिए उतारा जाता है—एक तो अव्वल दर्जे का रेस का घोड़ा है और दूसरा एक साधारण घोड़ा।” वर्ष 1992 में न्यायमूर्ति बी.पी. जीवन रेड्डी ने इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) मामले में मुख्य राय देते हुए कहा कि “किसी व्यक्ति के पूरे करियर के दौरान उसे ‘बैसाखियां’ नहीं दी जा सकतीं।”

जस्टिस सूर्यकांत, मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट

इन हिस्सों में इस्तेमाल किए गए कुछ उदाहरणों में उस समय की आम सामाजिक शब्दावली को दिखाते हैं। खासकर ‘फर्स्ट-क्लास घोड़े’ और ‘आम घोड़े’ की दिमाग में चलने वाली छवि और आरक्षण को ‘विकलांगता’ या ‘बैसाखी’ के तौर पर दिखाना है।

ये सब संविधान में अपेक्षित गरिमा की ज़रूरत के साथ मेल नहीं खाते है। शोध में कहा गया है कि बैसाखी का उदाहरण जाति, वर्ग या समुदाय से पैदा होने वाले व्यवस्थागत सामाजिक बहिष्कार को विकलांगता से जोड़ता है। ऐसा करते हुए, न्यायालय में बैठे समाज के सदस्य विकलांग लोगों और पीड़ित जातियों के खास अनुभवों और संघर्षों को पहचानने में नाकाम रहते हैं। 

यह लोगों के बीच एक नजरिया है कि सुप्रीम कोर्ट अभिजात्य संस्कृति के बोझ तले दबी दिखती है। सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति का पूरा ढांचा एक ऐसे चक्र की तरह बना रहा है जिसमे एक ही तरह के डिग्रीधारक भारतीय समाज के लिए न्याय के ढांचे पर काबिज है। उन्हें यहां तक अधिकार हासिल है कि वे संविधान की भी अपने नजरिए से व्याख्या कर सकते हैं जो संविधान गुलामी के खिलाफ आजादी के आंदोलन का हासिल है। पूर्व के राजनीतिक हालात में जहां न्यायाधीशों पर यह एक दबाव होता था कि वह संविधान की समानता और धर्मनिरपेक्षवादी भावनाओं व उद्देश्यों के अनुरूप नजरिए से उसकी व्याख्या करें। लेकिन हाल के दौर में संविधान के भावनाओं को सिर के बल खड़े कर व्याख्या की जाती है। यह उलट स्थिति ही काकरोच से इंसानों की तुलना का एक उदाहऱण है।

पहली बात तो यह स्पष्ट है कि न्यायाधीशों की टिप्पणियों व आदेश-निर्देश की दिशा क्या होगी, इसका राजनीतिक हालात के साथ रिश्ता होता है। न्यायाधीशों के साथ न्याय के लिए सुनवाई करते वक्त उसके अपने व्यक्तिगत राजनीतिक-सामाजिक पूर्वाग्रह सक्रिय रहते हैं। यदि राजनीतिक स्थितियां समतामूलक विचारों की तरफ झुकी होती है तो राजनीतिक-सामाजिक वर्चस्व की पृष्ठभूमि वाले न्यायाधीश भी एक सीमा तक उसका प्रभाव महसूस करते हैं। लेकिन जब राजनीतिक स्थितियां गैर-बराबरी के हालात को खत्म करने के उद्देश्य से दूर चली जाती है तो इस तरह की पृष्ठभूमि के न्यायाधीश खुद पर लगाम के दबाव से मुक्त महसूस करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश अपनी टिप्पणी में संविधान की प्रस्तावना में व्यक्ति की गरिमा की सुरक्षा और संरक्षण के विचारों से खुद को मुक्त महसूस कर लेते हैं। अपनी पहली और संशोधित टिप्पणी में फर्जी डिग्री लेने वाले या बेरोजगारों में फर्क कर रहे हैं। यह दृष्टिकोण अपने आप में संविधान की प्रस्तावना की भावनाओं के खिलाफ है। यदि फर्जी डिग्री लेने वाले इतनी बड़ी तादाद में समाज में मौजूद है जिन्हें मुख्य न्यायाधीश को संबोधित करना जरूरी लगता है तो यह पूरे व्यवस्थागत ढांचे के लिए शर्मनाक है। यदि बेरोजगारों के संबंध में भी है तो वह बेरोजगारी इस व्यवस्था के लिए लज्जाजनक है।

दूसरी बात कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने फर्जी डिग्रीधारी या बेरोजगारों की जिन कामों में घुसपैठ की चर्चा की है, वह लोकतंत्र के विचारों, उसकी प्रक्रियाओं और मर्म को समझने की उनकी सीमाओं का यह एक दस्तावेज तैयार करता है। इस देश में आरटीआई कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता, मीडिया के क्षेत्र के लिए स्वयं को समर्पित करने वाले वे लोग होते हैं जो कि लोकतंत्र और संविधान की सुरक्षा के लिए अपनी सक्रियता को खुद की जिम्मेदारी महसूस करते हैं। सोशल मीडिया पर सक्रियता उनकी भी होती है जो लोकंतत्र पर प्रहार से बेचैनी महसूस करते हैं और भविष्य के प्रति चिंतित होते हैं। इन सबकी डिग्री संस्थानों में नहीं छपती है बल्कि वे स्वयं की डिग्री से तैयार होते हैं। लोकतंत्र की चेतना व संस्कृति उनकी प्रेरणा का आधार होती है।

यह मानने में हिचक नहीं होनी चाहिए कि मौजूदा मुख्य न्यायाधीश की पृष्ठभूमि भी संस्थागत है। यह उनकी सीमा है। इसीलिए उनमें वह व्यापक सामाजिक नजरिया विकसित नहीं हो सका है जो कि लोकतंत्र के विचारों और संविधान की संस्कृति के विस्तार के लिए आवश्यक है। काकरोच से तुलना यह बताता है कि सुप्रीम कोर्ट में वह किस कदर बरकरार है।

लोकतंत्र का विचार सत्ता का विचार नहीं होता है। लोकतंत्र के विचारों और संस्कृति के मौलिक प्रतिनिधि वे होते हैं जो सत्ता संस्थानों पर काबिज होने से ज्यादा उन्हें लोकतांत्रिक व्यवहार और संविधान की संस्कृति अपनाने का दबाव बनाते हैं। लोकतंत्र के कार्यकर्ता यदि मुख्य न्यायाधीश की काकरोच से लोगों की तुलना करने वाली टिप्पणी की आलोचना नहीं करते तो शायद मुख्य न्यायधीश को यह एहसास भी नहीं होता कि उन्होने किस तरह से संविधान के प्रस्तावना में व्यक्ति की गरिमा को चोट पहुंचाई हैं। 

न्यायाधीश अपनी अदालतों में अवमानना का मुकदमा ठोक देते हैं लेकिन लोकतंत्र के कार्यकर्ताओं की खुली अदालत सोशल मीडिया, मीडिया व सामाजिक मंच होते हैं और वहां वे अवमानना का मुकदमा नहीं ठोकते, क्योंकि वहां सजा देने की भाषा व संस्कृति का पाठ नहीं होता है, बल्कि उनके लिए  संविधान और लोकतंत्र का संरक्षण महत्वपूर्ण होता है। ये लोग व्यवस्था की आलोचना करते हैं क्योंकि व्यवस्था उन्हें काकरोच जैसा समझती है। काकरोच से मुख्य न्यायाधीश द्वारा इंसानों की तुलना वास्तव में उनके भीतर इस तरह के विचार का उद्घाटन है जो कि व्यवस्थागत गंदगी को दूर करने में यकीन नहीं करता बल्कि व्यवस्थागत गंदगी के बावजूद खुद को बचाए रखने की जिजीविषा से घ़ृणा करता है। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अनिल चमड़िया

वरिष्‍ठ हिंदी पत्रकार अनिल चमडिया मीडिया के क्षेत्र में शोधरत हैं। संप्रति वे 'मास मीडिया' और 'जन मीडिया' नामक अंग्रेजी और हिंदी पत्रिकाओं के संपादक हैं

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