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आखिर संसद और श्रम मंत्रालय मजदूरों से किस भाषा में संवाद करते हैं?

श्रम संबंधी स्थायी समिति में यदि हिंदी में प्रतिवदेन के नहीं प्रस्तुत करने का एक चलन लंबे समय से बना हुआ है तो इसके क्या कारण हो सकते हैं? यदि श्रम संबंधी संसदीय कार्यवाहियों से श्रमिकों को दूर रखने का यह कोई सचेतन प्रयास है तो उसके क्या कारण हो सकते हैं? पढ़ें, अनिल चमड़िया का यह आलेख

लोकसभा की वेबसाइट पर स्थायी समिति के प्रतिवदेन हिंदी में नहीं मिलते। ठीक इसी तरह श्रम मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट हिंदी में नहीं मिलती है। ये दोनों दस्तावेज मजदूरों से संबंधित संसद के नजरिए और मंत्रालय के श्रमिक सरोकारों के लिए महत्वपूर्ण समझे जाते हैं। अंग्रेजी में दस्तावेजों को प्रस्तुत करने का अर्थ देश के करोड़ों श्रमिकों से संवाद नहीं करने की इच्छा को दर्शाता है। इसके अलावा क्या कहा जा सकता है।

गत 27 अप्रैल, 2026 को मैंने इस बाबत लोकसभा के अध्यक्ष को एक पत्र लिखा। पत्र को श्रम मामलों की स्थायी समिति से जुड़े उन संसद सदस्यों को भी मेल किया, जिनके मेल आईडी स्थायी समिति के सदस्यों की सूची के साथ उपलब्ध है। अधिकतर संसद सदस्यों के मेल आईडी भी नहीं है। मंत्रालय के भी मंत्री समेत अन्य अधिकारियों को यह पत्र मेल से भेजा गया है।

लोकसभा के अध्यक्ष व श्रम मामलों से संबंधित स्थायी समिति के सदस्यों के नाम अपने पत्र में मैंने कहा है कि वास्तव में यह केवल संवैधानिक संस्थाओं द्वारा राजभाषा संबंधी अधिनियमों के अनुपालन करने व नहीं करने की चिंता से जुड़ा सवाल नहीं है, बल्कि देश निर्माण/विकास में लगी सबसे बड़ी श्रमिकों की आबादी के साथ संबंध और संवाद के प्रति उपेक्षाभाव से जुड़ी चिंता है।

पिछले दिनों जब देश के महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्रों में अपने प्रति उपेक्षा के रवैये के विरोध में श्रमिकों के बीच असंतोष सामने आया तो मैंने संसद में श्रम संबंधी स्थायी समिति के प्रतिवेदनों का अध्ययन करने की जरूरत महसूस की। हिंदी मेरी मूल भाषा है। मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि हिंदी में संसद की स्थायी समिति के प्रतिवेदन नहीं है। मुझे इसका यकीन नहीं हुआ कि ऐसा भी संभव है। लिहाजा मैंने श्रम संबंधी स्थायी समिति के वेबसाइट के ठिकाने पर कई बार गया। तसल्ली के लिए संसद की अन्य स्थायी समितियों के ठिकानों पर भी गया। कई दूसरी समितियों के प्रतिवेदन हिंदी में उपलब्ध हैं। लेकिन मेरा मन इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था कि श्रमिकों से संबंधित स्थायी समिति के प्रतिवेदन अपनी भाषा में नहीं हो सकते हैं। मैंने वेबसाइट के जमाने से पहले भी कई बार श्रम संबंधी प्रतिवेदन हिंदी में संसद से लिया है। लेकिन वेबसाइट का जमाना होने के बाद हिंदी में कब से प्रतिवेदन बंद हो गए है, यह मैं जानने की कोशिश करने लगा।

संसद की नई इमारत के निर्माण में लगे मजदूर

मैं एक सामान्य नागरिक की तरह सोचा कि राजभाषा अधिनियम में क्या कोई संशोधन हुआ कि प्रतिवेदन के हिंदी में होने की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है। तब मैं 20 अप्रैल, 2026 को 011-23035707 नंबर पर फोन किया। वहां से जो जबाव मिला उसके अनुसार मुझे यह स्वीकार करना पड़ा कि हिंदी में श्रम संबंधी मामलों की स्थायी समिति की रिपोर्ट केवल उपलब्ध ही नहीं है, बल्कि यह भी बताया गया कि इस समिति के प्रतिवेदन हिंदी में वेबसाइट पर डालने की अनिवार्यता भी उन पर लागू नहीं होती है।

मैंने वेबसाइट पर 13वीं लोकसभा से 18वीं लोकसभा तक के श्रम संबंधी स्थायी समिति के प्रतिवेदनों की भाषा पर गौर किया तो मैं भी इस बात के लिए परेशान हुआ कि तेरहवीं लोकसभा से हिंदी में वेबसाइट पर प्रतिवेदनों के नहीं होने की तस्वीर बिल्कुल स्पष्ट है। इन वर्षों के बीच में इक्के-दुक्के ही हिंदी में प्रतिवेदन आए हैं। यह कभी-कभार की स्थिति एक अलग शोध की मांग करती है।

चूंकि संसद की श्रम संबंधी स्थायी समिति वस्त्र और कौशल विकास समिति के साथ जुड़ी हुई है। लिहाजा वस्त्र और कौशल विकास समिति के कुछ रिपोर्ट 2021 और 2022 तक दिखते हैं।

मैं दो बातें समझने की कोशिश करता रहा हूं। पहला तो श्रम संबंधी स्थायी समिति में यदि हिंदी में प्रतिवदेन के नहीं प्रस्तुत करने का एक चलन लंबे समय से बना हुआ है तो इसके क्या कारण हो सकते हैं? यदि श्रम संबंधी संसदीय कार्यवाहियों से श्रमिकों को दूर रखने का यह कोई सचेतन प्रयास है तो उसके क्या कारण हो सकते हैं? क्योंकि दूसरी अन्य स्थायी समितियों के साथ यह भाषागत स्थिति नहीं दिखती है।

दूसरा यह कि मैंने सरकार के मंत्रालय व विभागों और संसद में श्रम संबंधी मामले और भाषा के रिश्ते पर अपने शोध के दायरे को बढ़ाया तो मैंने एक अविश्वसनीय-सी स्थिति में खुद को खड़ा महसूस किया। श्रम मंत्रालय की वेब डायरेक्टरी में राजभाषा के लिए, जन शिकायत और मीडिया से संबंधित किसी अधिकारी के नाम व नंबर भी उपलब्ध नहीं हैं। मंत्रालय की वेबसाइट पर सामग्री के लिए जिम्मेदार अधिकारी ने बात नहीं की। मंत्रालय/ विभाग की वेबसाइट को बार-बार देखने की जरूरत महसूस हुई क्योंकि वहां हिंदी दीख नहीं रही थी। यदि हिंदी कहीं दिखी भी तो उस जगह पर क्लिक करने पर पूरी रिपोर्ट अंग्रेजी में सामने आई। श्रम मंत्रालय की वेबसाइट पर वार्षिक रपटें न जाने कब से अंग्रेजी में ही उपलब्ध है। वार्षिक रपटें एक महत्वपूर्ण दस्तावेज होते हैं और श्रम मंत्रालय के वार्षिक रपटों की प्रस्तुति इस विषय के प्रति पहली नजर में ही उपेक्षा की दृष्टि का आभास होता है। संसद में श्रम संबंधी प्रश्नों व उत्तर की भी स्थिति हिंदी में ऐसी ही दिखती है।

संचार, संवाद की भाषा मेरे लिए एक महत्वपूर्ण और विषय है। आखिरकार संसद की समितियों के प्रतिवेदन केवल अंग्रेजीं भाषा जानने वाले हितधारकों के लिए नहीं है। देश के बहुसंख्यक श्रमिक तो केवल अपनी भाषा जानते हैं जिन्हें भारतीय भाषा समूह के रूप में हम जानते व समझते हैं।

मैं यह पाता हूं कि संसद की कार्यवाहियों में हिंदी का इस्तेमाल सहज नहीं है। उसे देखना व पढ़ना और समझना बेहद जटिल है। यह दिन-ब-दिन और कठिन हुआ है। शायद ही इक्का-दुक्का प्रतिवेदन मूल रूप से हिंदी या किसी भारतीय भाषा में तैयार होते हैं। हिंदी अब अनुवाद की भाषा बन चुकी है और वह अनुवाद अंग्रेजी के मूल प्रतिवेदन का सहारा लेकर पढ़ा व समझा जा सकता है। 

बहरहाल, मेरे द्वारा भेजे गए पत्र का कोई जवाब नहीं आया है। पत्र में यह अनुरोध किया गया है कि इस विषय पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना चाहिए।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अनिल चमड़िया

वरिष्‍ठ हिंदी पत्रकार अनिल चमडिया मीडिया के क्षेत्र में शोधरत हैं। संप्रति वे 'मास मीडिया' और 'जन मीडिया' नामक अंग्रेजी और हिंदी पत्रिकाओं के संपादक हैं

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